<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356</id><updated>2012-01-03T10:03:27.770-08:00</updated><category term='urban mangement.'/><category term='woman'/><category term='environment'/><category term='save tree'/><category term='tv serial'/><category term='mythology'/><category term='fiction'/><category term='crime'/><category term='society'/><category term='sanskrit scholars'/><category term='sati'/><title type='text'>है कोई वकील ? --- hai_koi_vakeel_loktantra _ka_?</title><subtitle type='html'>A collection of my articles on socio -political and administrative issues. In HINDI</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>54</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-2714864032221246171</id><published>2011-09-03T09:22:00.001-07:00</published><updated>2011-09-03T09:22:31.148-07:00</updated><title type='text'>testing 2</title><content type='html'>&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-2714864032221246171?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/2714864032221246171/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=2714864032221246171' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/2714864032221246171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/2714864032221246171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2011/09/testing-2.html' title='testing 2'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-5607473444947673013</id><published>2011-04-04T10:48:00.000-07:00</published><updated>2011-10-26T10:14:39.931-07:00</updated><title type='text'>तीनों लेखानुक्रम</title><content type='html'>चौथे संग्रह के लिये उपलब्ध --&lt;br /&gt;चौथा  संग्रह -  &lt;br /&gt;&lt;a href="http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2009/01/blog-post.html"&gt;महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में विठ्ठल&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2008/12/blog-post.html"&gt;सोने के हथियार से लडने के लिये &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2008/10/blog-post.html"&gt;युगान्तर के पर्व में &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://leenamehendale.blogspot.com/2010/12/blog-post.html"&gt;हजारों स्कॅम  -- देशबन्धु, रायपुर  Nov, 2010 &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://leenamehendale.blogspot.com/2009/08/blog-post_1745.html"&gt;विभिन्न भारतीय भाषाओं में आदान प्रदान की संभावनाएँ&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://leenamehendale.blogspot.com/2009/08/blog-post_9171.html"&gt;हॉलण्ड का समाज दर्शन&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://leenamehendale.blogspot.com/2010/09/blog-post_22.html"&gt;स्वाइन फ्लू और सरहद देशबन्धु, रायपुर &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bhasha-hindi.blogspot.com/2011/01/blog-post_19.html"&gt;कम्प्यूटर  व हिन्दी -- विश्वहिन्दी सेक्रेटारिएट Jan 2011 issue &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2007/10/blog-post_3958.html"&gt;हिंदी बरकरार रखने के लिये संगणक &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नीतिरस्मि जिगिषिताम्‌&lt;br /&gt;हिंदू धर्म में सन्यासी - महानगर&lt;br /&gt;उदारीकरण की ओरः प्रशासन के सम्मुख समस्याएँ एवं चुनौतियां&lt;br /&gt;क्यों बजट से आम आदमी खुश नहीं है ? - महानगर&lt;br /&gt;अयोध्या कांड और हिंदू धर्म विचार&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार से निपटने का शुरुआती रास्ता - हिंदुस्तान&lt;br /&gt;गोवा इलेक्शन - (From English Articles)&lt;br /&gt;कौन करेगा यह वादा - महानगर, अफसोस जाहिर किया ठीक है - नभाटा&lt;br /&gt;महिलाओंका घटता लिंग अनुपात और फिसड्डी साक्षरता &lt;br /&gt;राजस्थान : जनमने और पढ़ने कर हक - योजना (शिशु लिंग भेद + स्त्री भ्रूण हत्या) &lt;br /&gt;महिला सशक्तीकरण की दिशा मे ---- योजना&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;सच्चाई का संस्कार, कठिन नही है डगर अभिभावक की, जानो अपनी समृद्धि को, तीनों हिमालयन ओऍसिस, सिमला के अंक में प्रकाशित और एकत्र मिलाये जा सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;खुली अर्थव्यवस्था किसके लिए खुली है - महानगर&lt;br /&gt;केंद्र सरकार में हिंदी प्रयोग को बढ़ावा देने बाबत कार्यसमिति का गठन - ?&lt;br /&gt;इस चुनाव में मैं बेजुबान&lt;br /&gt;&lt;a href="http://women-empowerment.blogspot.com/2009/10/blog-post.html"&gt;विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराध विश्लेषण - मासिक हिमप्रस्थ, सिमला में प्रकाशित  &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दूबधान - नागपूर की महिलाओं के लिए- हिंदुस्तान&lt;br /&gt;कुसुमाग्रज की प्रेमकविता - हिमप्रस्थ&lt;br /&gt;कुसुमाग्रज की कविता - विपाशा&lt;br /&gt;सरकारी कार्यालयों में संगणक&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;नौकरशाही की संवेदनशीलता कहाँ गई, व्यवस्था की एक और विफलता - महानगर, ऑगस्ट क्रांति और सरकारी छुट्टियाँ, छुट्टियाँ कम करो अभियान --- ये चार लेख तीसरे संग्रहसे मिलाकर देखना है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;---------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तीसरा संग्रह - मेरी प्रांतसाहबी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रस्तावना -- ललित सुरजन, रायपुर फोन 09827141800&lt;br /&gt;अनुक्रम&lt;br /&gt;1 मेरी प्रांतसाहबी -- नया ज्ञानोदय दिल्ली, y&lt;br /&gt;2 पेपर लीक का जबाब है&lt;br /&gt;3 कौन करेगा ये वादा&lt;br /&gt;4 व्यवस्था की एक और विफलता y&lt;br /&gt; 5 इस ढीली दण्ड प्रक्रिया को बदलिये y&lt;br /&gt;6 हिन्दी भाषा और मैं&lt;br /&gt;7 संगणक और हिन्दी -- जरूरत है मूलतत्व तक जाने की&lt;br /&gt;8 गो. नी. दाण्डेकर&lt;br /&gt;9 मथना -- एक सागर को&lt;br /&gt;10 डॉ. राज बुद्धिराजा&lt;br /&gt;11 भगवद्गीताप्रणीत बुद्धियोग&lt;br /&gt;12 तेलगी के दायरे में&lt;br /&gt;13 इस चुनाव में मैं बेजुबान&lt;br /&gt;14 विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराधों का विश्लेषण&lt;br /&gt;15 राजस्थान -- क्या है जनमने और पढने का हक&lt;br /&gt;16 महिला सशक्तीकरण की दिशा में&lt;br /&gt;17 सुरीनामियोंकी चिन्ता&lt;br /&gt;18 उन्मुक्त आनंद का फलसफा&lt;br /&gt;19 बायोडीजल -- अपार संभावनाएँ&lt;br /&gt;20 हाथ जनता की नाडी पर&lt;br /&gt;21 अगस्त क्रांति भवन -- अर्थात् कथा 9 अगस्त की इमारत की&lt;br /&gt;22 मालूम ही नही कि सुभाष स्वतंत्रता सेनानी थे&lt;br /&gt;-------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दूसरा संग्रह - है कोई वकील लोकतंत्रका&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरी भूमिका -- वकालत हमें ही करनी है।&lt;br /&gt;1. है कोई वकील ? - दै. महानगर, मुंबई, १९९१ (1996)&lt;br /&gt;२. सावित्री के साथ समाज ने अन्याय किया है - सा. रविवार, मुंबई, १९८६&lt;br /&gt;३. आदि शकंराचार्य के उत्तराधिकारी - सा. रविवार, मुंबई, १९८५&lt;br /&gt;४. आरक्षण नीति IIPA प्रतियोगिता १९९१ प्रथम पुरस्कार- दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली,&lt;br /&gt;५. गुनहगारी के बदलते चेहरे - दै. महानगर, मुंबई, सित.१९९२ (written with signed dt 1-12-92 )&lt;br /&gt;६. अभिभावक की आँखों से - दै. महानगर, मुंबई, मार्च १९९१&lt;br /&gt;७. भंडाफोड से उजागर गलतियां + चालाक दलाल व भ्रष्ट राजनीति के भण्डाफोड से किसकी पोल खुली(in 2 parts)-दै. महानगर, मुंबई, २९.०६.१९९३ + 2.7.93(written on that day???.. no, printed on those days )&lt;br /&gt;८. भारतीय नौकरशाही की पुनःसरंचना IIPA प्रतियोगिता १९९३ द्वितीय पुरस्कार -ok -दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली,&lt;br /&gt;९. निसर्गोपचार एक आवश्यक फलसफा - परिषद प्रभा, दिल्ली, 1991 + मुंबई, भाषण, १९९3&lt;br /&gt;१०. यह शोर कैसा, महानगर - दै. महानगर, मुंबई, ०२.०३.१९९४ -ok&lt;br /&gt;११ राष्ट्रभाषा बचाने का एक सूत्री कार्यक्रम - ? (19-7-??) अन्य संदर्भ दै. महानगर मई 1992&lt;br /&gt;१२. खेरनार के पक्ष में - दै. महानगर, मुंबई,&lt;br /&gt;१३. बटमारी के हिस्सेदार - दै. महानगर, मुंबई,&lt;br /&gt;१४. प्लेग का भय - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,(सित. या अक्तू.) १९९५&lt;br /&gt;१५. हवाला के मुद्दे - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २०.०२.१९९६ व २९.०२.१९९६ (dts are 20 and 21 feb or perhaps 22, 23 feb)&lt;br /&gt;१६. धुन की पक्की महिलाएँ - दै. अक्षरपर्व(देशबन्धु,) रायपुर, (written as settlement com.—96)&lt;br /&gt;१७. नौकरशाही में सन्यासी - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २४.०४.१९९५ – (was that dt of writing?) [+ हिन्दू धर्म में संन्यास-- दै. महानगर 3-5-95 (not referred while editing article for book)]&lt;br /&gt;१८. एक सिंचन व्यवस्था एक विचारधारा (in 2 parts)- दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, १२.०३.१९९५ +(??) -ok&lt;br /&gt;१९. आयुर्वेद पर अवैज्ञानिकता की मुहर क्यों ? दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, (written as settlement com.—96)&lt;br /&gt;२०. क्या भारतीय प्रशासनिक सेवाएं गैर जरूरी बन गई है? ---दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २५.०५.१९९६ --ok&lt;br /&gt;२१. दिल्ली में महिला सुरक्षा - - दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, ??&lt;br /&gt;२२. स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा --कुछ गायब है&lt;br /&gt;२३. औरत के विरुद्ध - पश्यन्ति, दिल्ली, अक्तू २००२ -ok&lt;br /&gt;२४. दिल्ली का सांस्कृतिक बंजर - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,&lt;br /&gt;२५. व्यर्थ न हो यह बलिदान - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,&lt;br /&gt;----------------------------------------------------- &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहला संग्रह - जनता की राय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;समाज बनाम प्रशासन -- मेरे लेखोंकी भूमिका&lt;br /&gt;बंद दरवाजों पर दस्तक देते आलेख -- कमलेश्वरजी द्वारा लिखी प्रस्तावना&lt;br /&gt;१. हिन्दी में शपथ - जन. १९ अक्टूबर १९९९ y&lt;br /&gt;२. बच्चों को तो बख्शिए - जन. ३० अक्टूबर १९९९ y&lt;br /&gt;३. उठो जागो - जन. ११ दिसंबर १९९९ y&lt;br /&gt;४. नई सहस्त्राब्दी के पहले - जन. १७ दिसंबर १९९९ y&lt;br /&gt;५. हर जगह वही भूल - जन. ३० दिंसबर १९९९ y&lt;br /&gt;६. सुयोग्य प्रशासन - जन. ८ जनवरी २००० y&lt;br /&gt;७. पचास साल बाद हिन्दी - जन. ३ फरवरी २००० y&lt;br /&gt;८. पुलिस प्रपंच - जन. २५ मार्च २००० y&lt;br /&gt;९. दिल्ली में युधिष्ठिर - जन. ६ अप्रैल २००० y&lt;br /&gt;१०. भीड़ के आदमी का हक - जन. १४ अप्रैल २०००&lt;br /&gt;११. नमक का दरोगा - जन. ५ जून २०००&lt;br /&gt;१२. जनतंत्र की खोज में - जन. १७ जून २०००&lt;br /&gt;१३. अर्थव्यवस्था का नमक - जन. २ अक्टूबर २०००&lt;br /&gt;१४ लालकिले पर कालिख - जन. १४ अक्टूबर २०००&lt;br /&gt;१५. इक्कीसवीं सदी की औरत X - जन. १७ दिसंबर २०००&lt;br /&gt;१६. अपने अपने शैतान - जन. २ दिसंबर २०००&lt;br /&gt;१७. तबादलों का अर्थतंत्र - जन. ६ दिसंबर २०००&lt;br /&gt;१८. काननून अन्याय - जन. २६ दिसबंर २०००&lt;br /&gt;१९. राष्ट्रीय संकट में हम - जन. २ फरवरी २००१&lt;br /&gt;२०. गुजरात ने जो कहा X - जन. ६ मार्च २००१&lt;br /&gt;२१. कलाकार की कदर X - जन. ४ मई २००१&lt;br /&gt;२२. नीरस जीवन की भुक्तभोगी X - जन. ६ मई २००१&lt;br /&gt;२३.गुजारा भत्ते की दावेदार कैसे बने - रास. १८ फरवरी २००१&lt;br /&gt;२४. एड्स का खौफ X - रास. २७ मई २००१&lt;br /&gt;२५. छोरी साइकिल चलावै छे - प्रख ३१ अक्टूबर २००२&lt;br /&gt;२६. बीजींग कान्फरंस, सीडॉ और भारतीय महिला नीति X - (जालंधर में दिया गया भाषण)&lt;br /&gt;२७. परीक्षा प्रणाली में आमूलाग्र सुधार हो X - नभाटा. १२ फरवरी १९९९&lt;br /&gt;२८. एक स्त्री का साहस X - जन. ३ फरवरी २०००&lt;br /&gt;२९. एक श्रद्धांजली X - प्रख. जून १९९९&lt;br /&gt;३०. पढाई का बोझ X - रास. २२ जुलाई २००१&lt;br /&gt;३१. क्या हमारे खून में कश्मीर है - हिंदुस्तान २३ जुलाई २००२&lt;br /&gt;३२. लिंगभेद से जूझते हुए - तारा - सनद, अंक १०&lt;br /&gt;३३. शीतला माता - अप. मार्च २००४&lt;br /&gt;३४. सत्ता तंत्र में कमाई : जनता क्या है तेरी की राय- हिंदुस्तान २३ मार्च २००४&lt;br /&gt;----------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-5607473444947673013?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/5607473444947673013/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=5607473444947673013' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/5607473444947673013'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/5607473444947673013'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='तीनों लेखानुक्रम'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-7031465725954021477</id><published>2010-10-05T21:11:00.000-07:00</published><updated>2011-05-29T23:38:13.501-07:00</updated><title type='text'>15 हवाला घपले के मुद्दे</title><content type='html'>हवाला घपले के मुद्दे -- २&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार  और घोटाले की रो.ज नई नई कहानी सामने आ रही है । जनता इन कहानियों से सिर्फ परेशान ही नहीं है, बल्कि यह सोचने लगी है कि यह सब कैसे और क्यों होता है तथा इससे निजात पाने का कोई उपाय है या नहीं। लेखक ने उन कारणों पर विस्तार से विचार किया है जिनकी वजह से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल होता है । सबसे बड़ी बाधा यह है कि किसी आरोप को अदालत में साबित कैसे किया जाए । --संपादक&lt;br /&gt;- लीना मेहेंदले - &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज यदि जनता सोचती है कि सी. बी. आई. किसी बड़े व्यक्ति की पूरी जाँच नहीं करती तो फिर इसकी मांग भी जनता को ही करनी पड़ेगी और यह भी संहिता बनानी होगी कि जाँच की लेखाजोखा जल्दी से जल्दी और लगातार जनता के सामने आता रहे । इस जाँच को बलात्कार के समकक्ष नहीं  माना जाना चाहिए और इसमें गुप्त रूप से सुनवाई की कोई गुजाइश नहीं होनी चाहिए । इसके लिए यह भी आवश्यक है कि जाँच करने वाली एजेंसी मल्टी-डिसिप्लिनरी हो । आज हालत यह है कि बाहरी आदमी चाहे लाख सिर पटक ले लेकिन जाँच पड़ताल का हक केवल पुलिस विभाग को और इस विभाग की वर्दी की सख्ती इतनी अधिक है कि कई बार अच्छे-अच्छे और ईमानदार पुलिस अफसर छटपटाकर रह जाते हैं और गुनहगारों  के विरूद्ध जाँच का काम उन्हें रोक देना पड़ता है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट और घपला&lt;br /&gt;हमारे आई. पी. सी. और सी. आर. पी. सी. में आर्थिक गुनाहों के संदर्भ में जो भी प्रणाली है वह बड़ी ढीली ढाली है । सोचने की बात है कि जिस देश का बजट ४०,००० करोड़ रूपए का है और जहाँ घपले भी उसी अनुपात में होते है यानी ३५०० करोड़ का घपला, १००० करोड़ का घपला आदि, जहाँ एक घपले का बजट हमारे राष्ट्रीय बजट, जितना बड़ा होता है वहाँ भी हम आर्थिक दुर्व्यवहार और घपले के गुनहगारों को ऐसी ही सजा दे सकते हैं जो नहीं के बराबर हैं । घर में सेंध लगाकर ट्रांजिस्टर सैट चुराने की सजा अधिक है और देश के लाखों रुपये का इनकम टैक्स डकार जाने की सजा उससे कम है । उस पर तुर्रा यह कि आर्थिक दुर्व्यवहार के केसों में सजा आज  तक बहुत ही कम मिली है । आज भी हमारे देश में कंपनियाँ है जो गर्व से छपवाती है कि उनका लाभ इतने हजार करोड़ का है और आयकर भुगतान नहीं के बराबर । कुछ लोगों ने सरकार और इसके नीति नियमों को इस कदर काबू में रखा है कि लाभ तो हो जाता है और टैक्स भी नहीं चुकाना पड़ता है । तो फिर इसी के पीछे लोग उस कंपनी के कुछ और ज्यादा  शेयर्स खरीद लेते है। कोई यह नहीं सोचता कि यह गलत हो रहा है। हर कोई यह सोचता हैं कि जब बाकी शेयर होल्ङर इसी ट्रिक के कारण अच्छा डिविडेंड ले रहे है और कुछ शेयर मैं भी लूँ । उधर शेयर घोटालों में भी तीन चार हजार करोड़ का स्कैम हो गया, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भी एक करोड़  रुपये रिश्र्वत देने का दावा किया गया और फिर भी न उस केस की कोई जाँच, न सुनवाई और न केस आगे बढ़ा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, तो मुद्दा यह है कि हमारे देश में आर्थिक गुनाहों की सजा कोई अघिक नहीं होती । कल मान लो हवाला घपला साबित हो भी गया और कोर्ट में गुनाह भी साबित हो गया तो प्रस्तावित सजा क्या होगी ?  यह सवाल लोगों को  आज  ही पूछना चाहिए कि आई. पी. सी. के किस सेक्शन में केस दर्ज हो रहा है और उसमें अघिकतम सजा क्या हो सकती है । एक महत्वपूर्ण  मुद्दा और भी है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले के कागजात तो १९९० के आसपास से ही धीरे- धीरे इकट्ठे हो रहे हैं । अर्थात् प्रधानमंत्री को उन नामों की जानकारी भी जो जैन की लिस्ट में थे और जिनके विरूद्ध  सी. बी. आई. कुछ  और जानकारी भी जुटा पाई थी जैसे उनकी संपत्त्िा का ब्यौरा । यह सारे कागज प्रधानमंञी ने अवश्य देखें होंगे । फिर भी उन लोगों को मंञिमंडल में शामिल कर लिया । क्या जनता को यह जानने का हक नहीं कि ऐसा क्यों किया गया ? जनता तो चाहती है कि हर पक्ष में कम से कम पक्ष का हाईकमान ऐसा व्यक्तित्व हो जो नीति अनीति में फर्क करता है, और अपने पक्ष में केवल नीतिमान लोगों को ही लेता है । जनता चाहती तो है, लेकिन फिर आग्रह क्यों नहीं करती? पक्ष नेताओं से प्रश्न पूछ पाने का हक क्यों नहीं करती ? पक्ष नेताओं से प्रश्न पूछ पाने का हक क्यों नहीं मांगती ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र के स्तभ्भ &lt;br /&gt;लोकशाही के चार स्तभ्भ होते है - कानून बनाने वाली संसद, देश चलाने वाली सरकार, जिससे मंञिमंडल और नौकरशाही शामिल है, न्याय व्यवस्था  और पञकारिता। कानून बनाने वालों ने भी कभी इस बात को जरूरी नहीं समझा कि चुनावी कानूनों में सुधार किए जांए ताकि कौन किससे रुपये ले रहा है यह किताब जनता के सामने खुली हो । यह प्रश्न केवल चुनावी कानूनों  का ही नहीं । धीरे - धीरे हमारे देश का कानून ऐसे बनने लगे है जिससे जानकारी का मूलभूत हक लोगों से छीना जा रहा है जो कि वास्तव में लोकतंञ की जान है । वही बात है सरकार की । उनके नियम भी वैसे ही बने है । उनके पास तो है समर्थन के लिए दो अन्य हथियार भी है - एक है गोपनीयता का और दूसरा सुरक्षा का । इन दोनों तर्कां को कई बार हास्यास्पद ढंग तक खींचकर सरकारी गैर-व्यवहार करने वाले बच निकलते हैं । अक्सर न्यायालय भी इन मुद्दों के कवच में लिपटी फ़ाइलों को छेङने से इंकार  ही करते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जनता के लिए तिनके का सहारा इस बात से है कि कभी -कोई न्यायालय, कभी कोई पञकार, कभी कोई नौकरशाह, कभी कोई सामाजिक कार्यकर्ता इस बात को लेकर अड़ जाता है कि रूको, जनता का अपना हक जनता को वापिस सौंप दो । यह जब तक नहीं हो जाता, मैं लड़ता रहूंगा । यह लड़ाई धीरे धीरे जोर पकड़ती है । उठाया हुआ मुद्दा  अपने आप में चाहे सही हो या गलत, लेकिन यदि उसमें यह मांग हो कि जनता को अमुक बात की जानकारी पाने का हक है, तो धीरे धीरे उस हक की आवा.ज उठाने वाले के पीछे लोग जमा हो ही जाते हैं । दुख इस बात का है  कि आज तक कोई ऐसा ठोस केस  सामने नहीं आया जिसमें समय रहते और पूरी तरह  से &lt;br /&gt;जनता को यह अधिकार मिल पाया हो और जो जानकारी मिली उसके चलते जनता ने ही देश को किसी गहन संकट से या प्रश्न से बचा लिया । अक्सर यह देखा गया है कि  यह जानकारी सामने &lt;br /&gt;आने में भी कई वर्ष लग जाते है । जनता इसके लिए अधिक सतर्क और अधिक आग्रही क्यों नहीं जबकि इसके अच्छे नतीजे को जनता देख चुकी है ?  इस सिलसिले में एक छोटा उदाहरण पेश है। आजकल कई बड़े स्टेशनों  पर रिजर्वेशन चार्ट लगे होते है कि कौन सी तिथि के लिए कौन सी गाड़ी में कितने स्थान उपलब्ध है । दूसरा नमूना भी है महाराष्ट्र में इंजीनियरिंग कॉलेज के नामांकन के नियम पांच - छह महीने पहले जाहिर किए जाते है, सभी अर्जी देने वाले विद्यार्थियों की लिस्ट चिपकाई जाती है और खुलेआम सब विद्यार्थियों के समक्ष मेधावी छाञों  की लिस्ट के मुताबिक सीटों बंटवारा किया जाता है । यह कदम भी महाराष्ट्र शासन ने उठाया तो  न्यायालय के आदेश से ही ।  &lt;br /&gt;लेकिन इससे विद्यार्थियों में अन्याय की भावना खत्म हो गई और न्यायालय में  इस मुद्दे पर दाखिल होने वाली  केस भी कम हो गए । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने  का अर्थ यह है कि इस प्रकार का कानून बनाने से जनता की सुविधा और जानकारी का हक  सुरक्षित रहता है और किन कानूनों से नहीं, यह समझने की शक्ति और जनता को केंद्र बनाकर कानून बनाने कि सामर्थ्य दोनों ही हमारे शासनकर्ता भूल से गए है । इसमें यदि बड़ा हिस्सा राजनीतिक लोगों का है तो छोटा हिस्सा नौकरशाही का भी है । और कोई आश्श्रर्य नहीं कि हवाला कांड में कुछ अफ़सरों  के नाम भी शामिल हों । &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आर्थिक अपराघियों के लिए कड़ी सजा हो&lt;br /&gt;अब जो महत्वपूर्ण सुधार देश के नेतागण, नौकरशाही और न्यायपंडितों को तुरंत अपने हाथ में लेना चाहिए वह दो-तीन प्रकार का है । एक तो आर्थिक गुनहगारों  की सजा कड़ी से कड़ी करने का सुधार । साथ ही आर्थिक गुनाहों  की अच्छी खासी विवेचना । दूसरे कोर्ट में सुधार ताकि वकीलों पर यह बंधन हो को वे कोर्ट को सच्चाई प्रस्थापित करने में मदद करें । यह सुधार किस प्रकार हो यह अमरीका में भी एक विवादास्पद मुद्दा है जबकि हम लोग तो उसकी तुलना में कई गुना पिछड़े हैं । अधिकांश वकीलों की दलील है - हमारी व्यावसायिक नैतिकता कहती है कि हमें अपने मुवक्किल को बचाना है, चाहे उसने कितना ही बड़ा गुनाह क्यों न किया हो । साथ ही वकील यह भी मानते है कि मुवक्किल को बचाने के लिए यदि झूठ का सहारा लेना पड़े तो बेशक लिया जाना चाहिए । व्यावसायिक नैतिकता की यह एक ऐसी दुहाई है जो मेरी और सामान्य जनता की समझ  से परे है । आखिर वकील भी समाज में रहता है, समाज का अंग है और हमारे आसपास का समाज सच्चाई  पर चलने वाला हो - इसके प्रति क्या वकीलों  की कोई जिम्मेदारी नहीं ?  आज वकीलों के अपनाए  तीन हथकंडे  ऐसे है जिनसे हमारी न्याय व्यवस्था अन्यायपरक हो रही है और लोकतंञ प्रणाली खोखली  हो रही है । इसमें पहला हथकंडा है झूठ  का सहारा लेना, दूसरा है कि फालतू मुद्दे निकाल कर कोर्ट का समय बर्बाद करना । तीसरा हथकंड़ा है अपने विरोधी गवाहों का चरिञ हनन करने का पूरा-पूरा प्रयास करना । यह तीनों ही कारनामे व्यावसायिक नैतिकता के नाम पर किए जाते हैं । लेकिन सवाल यह  है कि जब वकील हमारे समाज  का ही एक अंग है तो &lt;br /&gt;क्या यह उनकी भी जिम्मेदारी  नहीं कि समाज में  सच्चाई और शीघ्र गति से न्याय प्रस्थापित करने में और चरिञ हनन के दुर्गुण का खात्मा करने में उनका भी योगदान हो ? फिर भी आज तक ऐसा &lt;br /&gt;नहीं  देखा गया कि किसी कोर्ट ने किसी वकील के इन तीन तरह के हथंकंड़ो के प्रति कड़ी कार्रवाई की है । शायद कोर्ट भी मानती है कि वकील यदि यह सब करते हैं तो कोई गलती नहीं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जनमानस में हवाला कांड से एक आशा सी बंध गई है । एक तीर की तरह उच्चतम न्यायालय का आदेश निकला और हवाला जांच पर पड़े हुए मोटे पर्दे को चीरता चला गया । सो लोगों को यह विश्र्वास हो गया कि भले ही कानून बनाने वाली व्यवस्था हवाला जैसे कांडों का पर्दाफाश  नहीं कर  पाई  हो लेकिन अभी तक न्याय व्यवस्था  और पञकारिता के खंभे तो बचे हुए हैं, लोकतंञ को सुरक्षित रखने के लिए लेकिन इस खुशफहमी में फंसी जनता को यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि हमारा सारा हौसला ऐसी इक्का-दुक्का घटना पर टिका होगा तो यह बड़ी चेतावनी हैं और जनता को अपने हक़ों के लिए जल्दी ही चेतना होगा । हम कैसे भुला दें कि अभी तक शेयर स्कैम, नकली शेयर बिक्री बोफोर्स आदि ऐसे कई कांड बचे है जिसमें गुनाहों की जांच या कोर्ट में पेशी या सुनवाई या सजा की कार्रवाई पूरी नहीं हुई है । अर्थात् कोर्ट भी हर जगह, हर केस में कारगर नहीं हो सकता है । इसके लिए जनता को ही चेतना है और माँग करनी है कि हमारे देश में जांच की कार्रवाई अधिक से अधिक पारदर्शी हो । &lt;br /&gt;----------------------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-7031465725954021477?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/7031465725954021477/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=7031465725954021477' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/7031465725954021477'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/7031465725954021477'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/10/blog-post_05.html' title='15 हवाला घपले के मुद्दे'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-7614408888369452649</id><published>2010-10-05T21:06:00.000-07:00</published><updated>2011-05-29T23:39:48.439-07:00</updated><title type='text'>21 दिल्ली में महिला सुरक्षा</title><content type='html'>दिल्ली में महिला सुरक्षा&lt;br /&gt;-- लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  पिछले एक महीने में दिल्ली शर्म में डूबी हुई है। बलात्कार की घटनाओं से सहम जाना, उनकी निंदा करना आदि अपनी जगहों पर हैं। लेकिन जब महिला विरोधी अपराधियों के हाथ विदेशी दूतावास की महिलाओं तक पहुँचते हैं तो पूरे राष्ट्र को शर्म में डूब जाना पड़ता है। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के सुरक्षाकर्मियों द्वारा किये गये सामूहिक बलात्कार की शर्म से दिल्लीवासी अभी उभरे भी नहीं थे कि संसार भर के दूसरे देशों के आगे भी शर्म उठानी पडी। फिर एक बार जोर शोर से चर्चा हुई कि दिल्ली कितनी सुरक्षित है। कई अखबारों ने छापना आरंभ कर दिया कि यह शहर महिलाओं के लिये सुरक्षित नही है। इसी विषय को सिद्ध करने के लिए कई चर्चाएँ आयोजित हुईं।&lt;br /&gt;  लेकिन अभी तक किसी ने ऐसी चर्चा नही आयोजित की कि दिल्ली में महिलाएँ किस प्रकार सुरक्षित रह सकती हैं और न यही चर्चा सुनने में आई कि दिल्ली को महिलाओं के लिये सुरक्षित कैसे बनाया जाय। गौर से देखें तो ये दोनों प्रश्न अलग अलग हैं। महिलाएँ कैसे सुरक्षित रह सकती हैं? कइयों की मान्यता है कि यह प्रश्न बड़ा आसान है। इसका उत्तर बड़ा सीधा सादा और जाना माना है। महिलाओं को सुरक्षित रखना है, उन्हें बलात्कार की जघन्यता से बचाना है, तो उन्हें घर के अंदर रखो- बाहर मत निकलने दो।&lt;br /&gt;  कितना सरल, सुंदर, सुलभ उपाय है! औरत घर के अंदर कितनी अच्छी लगती है- कितनी सुरक्षित रहती है। उनसे सड़क पर, काम के लिए, अकेले, मत निकलने दो- खासकर शाम के बाद तो बिल्कुल ही नही। क्या जरूरत है औरतों से बाहरी काम करवाने की। वे घर के अंदर रहें, घर के कामकाज को देखें। गृहलक्ष्मी ही रहें।&lt;br /&gt;  लेकिन क्या घर के अंदर वे पूरी सुरक्षित हैं? शायद नहीं- आजकल रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार की घटनाएँ भी तेजी से सामने आ रही हैं। तो अब क्या किया जाए? इसका भी सरल एवं सुंदर उत्तर है। उन्हें बाहरी कमरों में मत आने दो। रसोईघर एवं शयनघर के आगे मत आने दो। उन्हें पडदे, घूंघट या बुरके में रखो। ताकि घर के अंदर भी वे आदमियों के सामने न पडें। औरत को असूर्यम्पश्या होना चाहिए- वह जिसे सूरज ने भी न देखा हो। वह उजाले में कभी नही आएगी तो यह खतरा कम हो जायगा कि कोई उसे देखेगा और उसे अपनी हवस का शिकार बनाएगा। औरत की जगह मुकर्रर कर दो- घर के किसी अंदरूनी कमरे के एक अंधेरे कोने में- फिर वे सुरक्षित रहेगी।&lt;br /&gt;  लेकिन क्या फिर भी वह पूरी तरह सुरक्षित रहेगी? शायद नही। आखिर अंदरूनी कमरे के अंधेरे कोने में भी कोई न कोई उसे देख ही लेगा- उस पर बलात्कार कर ही लेगा। इससे भी सुरक्षित जगह चाहिए।&lt;br /&gt;  और ऐसी जगह है भी। अति सुरक्षित जगह। जहाँ मौत के आने तक हर औरत अत्यंत सुरक्षित रह सकती है। वह जगह है गर्भ के अन्दर। वहाँ बलात्कार का कोई डर नही है। औरत को वहीं रहने दो- वहीं मरने दो। वहाँ से बाहर मत निकलने दो। निकलने के दिन पूरे हों, इससे पहले उसकी मौत का इंतजाम कर दो। भला हो डॉक्टर कम्यूनिटी का। कानून-व्यवस्था की रक्षा में उनका कितना बड़ा योगदान हो सकता है। कर दें वे स्त्री-भ्रूण हत्या। न होगी औरत, न होंगे बलात्कार। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।&lt;br /&gt;  यह सब पढ़कर क्या ऐसा नही लगता कि यह गलत निष्कर्ष है और इसके पीछे जरूर कोई गलती हुई है। जी हाँ। इसीलिए वह दूसरा प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि दिल्ली को किस तरह महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाया जा सकता है। सो सवाल है दिल्ली को सुधारने का न कि महिलाओं को घर के अंदर बंद रखने का। सवाल है दिल्ली को अधिक सौहार्दपूर्ण बनाने का और साथ ही अपराधियों को तत्परता से पकड़ने और दंड देने का। आज की दिल्ली औरतों के घूमने-फिरने या घर से बाहर निकलने के लिए माकूल ढंग से नही बनी है।&lt;br /&gt;  हम साऊथ दिल्ली को ही लें। यह एक खूबसूरती से प्लान किया हुआ इलाका है जिसमें चौडी सडकें हैं, पार्क हैं, शिक्षा-संस्थाएँ हैं, फ्लाई ओवर हैं। इसी इलाके में सरकारी दफ्तर हैं- ढेर सारे दफ्तर- बड़े-बड़े ओहदों वाले दफ्तर- जिनमें राष्ट्रपति भवन, नार्थ व साऊथ ब्लाक, तमाम मंत्रालय, विदेशी दूतावास, राज्यों के निवास इत्यादि भी हैं। इन सब की सुंदरता बनाए रखने के लिए यह खास ध्यान दिया गया है कि यहाँ रहाइशी इलाकें अधिक न हों। लोक संख्या कम हो। चीजें बेचने वालों की भीड़ न हो। और &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उससे भी बड़ी बात यह कि हर घर, हर बिल्डिंग एक लम्बे चौड़े क्षेत्र में बनाई जाए जहाँ उसकी विशालता और विस्तार भी उसकी खूबसूरती का एक अंग हो।&lt;br /&gt;  एक आर्किटेक्ट की निगेहवानी से यह सब कुछ बिल्कुल सही है। लेकिन यही बातें हैं जो असामाजिक तत्वों का काम आसान कर देती हैं। &lt;br /&gt;  आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि दिल्ली को घूमने फिरने के योग्य बनाया जाय और औरतें भी घर से बाहर निकलकर बड़ी तादाद में घूमें। पैदल चलने को और साइकलिंग को बढावा दिया जाय।&lt;br /&gt; पुणे या बैंगलोर शहर में कई अकेली औरतें घूमने निकल जाती हैं- किसी भी सड़क पर केवल घूमने के शौक से निकली औरतें देखी जा सकती हैं। कई परिवार और यार-दोस्तों की टोलियाँ घूमती हुई देखी जा सकती हैं। लेकिन दिल्ली में ऐसा नही दीखता। यदि दिल्ली की कॉलनीज में रहने वाले लोग एक अभियान के तौर पर अपने अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ सुबह-शाम पैदल या साइकिल पर घूमने लगें तो कैसा हो?&lt;br /&gt;  मुझे लगता है कि यदि दिल्ली को महिलाओं के प्रति सुरक्षित बनाना है तो चार पांच काम किए जाने चाहिए। सड़कों व पार्कों में अधिक से अधिक लोग घूमने निकलें- इसे बढावा दिया जाय। प्रभात फेरियाँ भी निकाली जा सकती हैं। दिल्ली में अच्छी साइकिलिंग का इन्तजाम किया जाय और इसे बढावा दिया जाय। महिलाओं के प्रति अपराधों को, खासकर छेड़खनी के मामलों को तत्काल दंड दिया जाय। इसके लिए मौके पर ही जुर्माने के अधिकार पुलिस को दिए जाएं। खासतौर से अभियान चलाया जाय ताकि सार्वजनिक वाहनों में होने वाले छेड़छाड़ के अपराधों को तत्काल दंडित किया जा सके। बलात्कार के अपराधी ऐसे ही नही बन जाते। अक्सर वे शुरूआत छेड़खानी से करते हैं। कई छेड़खानियाँ करने के बाद भी जब वे दंडित नही होते तो धीरे धीरे उन्हें शह मिलती जाती है और वे बड़ा अपराध करने का दुःसाहस धारण करने लगते हैं।&lt;br /&gt;  देशभर की पुलिस से नॅशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो ने जो आँकडे इकट्ठे किये वे बताते हैं कि सन् २००१ में दिल्ली में बलात्कार की ३८१ घटनाएँ दर्ज हुईं, किडनॅपिंग की १६२७ जबकि लैंगिक छेड़छाड़ की घटनाएँ केवल ५०२ दर्ज हुईं। ये आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली में छेड़छाड़ की घटनाओं को न ही गंभीरता से लिया जाता है और न दर्ज कराया जाता है। जब कि पूरे देश में छेड़छाड़ की करीब पैंतीस हजार घटनाएँ दर्ज हुईं- यानी दिल्ली से सत्तर गुनी अधिक, बलात्कार के अपराध में सोलह हजार यानी दिल्ली से चालीस गुनी अधिक घटनाएँ दर्ज हुईं। अतः आवश्यक है कि छेड़छाड़ की घटनाओं को हम प्रभावी ढंग से दर्ज करायें और तत्काल दंडित भी करें। यही नही, छेड़छाड़ की घटना का विरोध करने वालों की यथोचित सराहना भी होनी चाहिए।&lt;br /&gt;  कार से चलने वालों की सुविधा ध्यान में रखते हुए दिल्ली की सड़कों पर जगह जगह उंचे उंचे रोड डिवायडर लगा दिए गए हैं। अर्थात यदि मैं किसी रास्ते से गुजरते हुए देख भी लूँ कि परली तरफ से चलने वाली किसी महिला के साथ छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार हो रहा है, तब भी मैं शीघ्रता से वहाँ पहुँचकर अपराध को रोकने का कोई उपाय नही कर सकती। दिल्ली के आर्किटेक्चर की प्लानिंग में यह भी एक बड़ी कमी है जिसकी तरफ किसी का ध्यान नही है। &lt;br /&gt;  यह भी जरूरी है कि जहाँ कहीं संगठन हैं, वहाँ उनके बड़े अधिकारी ज्यूनियर्स के कार्यकलापों का ध्यान रखें। राष्ट्रपति भवन के सुरक्षा कर्मी- या होमगार्ड के जवान या पुलिसकर्मी- जब बलात्कार जैसे मामलों में दोषी पाए जाते हैं तो पूछा जाना चाहिए कि उनके सिनियर्स क्या कर रहे थे। कई वरिष्ठ अधिकारियों का अपना वैल्यू सिस्टम ही ऐसा होता है जिससे उनके ज्यूनियर्स को जाने अनजाने लगने लगता है कि महिलाओं से दुर्व्यवहार करना ही मर्दानगी है। इस मानसिकता को बदलने के लिए सरकार को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। यदि पुलिस में अधिक संख्या में महिलाएँ आने लगें और हर स्तर पर आने लगें तो यह मानसिकता थोड़ी बदल सकती है।&lt;br /&gt;  महीने पहले हुई घटना के बाद भी बलात्कार और दुर्व्यवहार के अपराध थमे नही हैं। पुलिस उलझ कर रह गई है चुनावी इन्तजाम में। नेताओं के भाषण, पदयात्रा, रैलियाँ, जनसभाएँ जोरों पर हैं। किसी नेता या पार्टी ने अपने अजेंडे में नही कहा है कि दिल्ली को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने का कोई सोच उनके दिमाग में है। क्या दिल्ली की महिलाएँ अपने अमूल्य बोट का धौंस जमाकर उन्हें इसके लिए घेर सकती हैं?&lt;br /&gt;------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-7614408888369452649?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/7614408888369452649/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=7614408888369452649' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/7614408888369452649'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/7614408888369452649'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='21 दिल्ली में महिला सुरक्षा'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-8401531700813477362</id><published>2010-07-19T20:21:00.000-07:00</published><updated>2011-05-29T23:40:40.139-07:00</updated><title type='text'>14 प्लेग का भय एक हतोत्साही मानसिकता</title><content type='html'>प्लेग का भय एक हतोत्साही मानसिकता&lt;br /&gt;दै. हिन्दुस्तान, दिल्ली, सप्टें. 1995 &lt;br /&gt;बात है बहुत छोटी सी, पर पिछले हफते से बतंगड़ बनी हुई है। वह है प्लेग। वैसे ईमानदारी की बात तो यह है कि पिछले दिन मुझे भी डर लगा था।लेकिन मेरा जो डर पहले दिन उतर गया वह औरों के दिमाग में अभी तक मौजूद है। यह अंतर क्योंकर है?&lt;br /&gt; २२ सिंतबर की शाम मैं कार्यालयीन कामकाजवश बडौदा पहुंची। मेरे साथ महाराष्ट्र के एडीशनल डायरेक्टर आफॅ हेल्थ भी थे। हमने बड़ौदा शहर का एक लंबा चक्कर लगाया तो पता चला कि ८-१० दिनों पहले गुजरात में जो भयानक बाढ़ आई थी उसने बड़ौदा में भी अपनी तबाही का रंग दिखाया था। बेसमेंट की बिल्डिंगें, जिनमें कई दुकानें थीं, वहां सवार्धिक हानि हुई। गलिसां , रास्ते कचरे के ढेर से भर गये। वह ढेर अब तक साफ नहीं हुए-प्रायःयही हाल अन्य शहरों में रहा होगा। कई बार दूर-दराज से पानी के रेले में बहकर लाशें भी आईं जो शहर में जगह-जगह अटक कर रह गई। धीरे-धीरे पाली कम हुआ लेकिन लाशें तुरंत हटा पाना संभव नहीं हुआ था। बहरहाल, कुछ ऐसा ही दृश्य सूरत में भी रहा होगा।&lt;br /&gt; २३ की सुबह सारे गुजराती अखबारों में सूरत में प्लेग शीर्षक की र्क खबरें थीं। कोई मृतकों की संख्या १४ बताता था, कोई चालीस तो कोई चार सौ। मेरे दिमाग में वे सारे वर्णन कौंध गये जो कि १९२६ के प्लेग के विषय में पढ़े थे-खासकर उस प्लेग के कारण पूना में अंग्रेजी सरकार के अत्याचार के जो कांड हुए थे-वह भी। यदि आज भी प्लेग की संहारकता उसी प्रकार की हुई तो क्या हमारी सरकार को भी प्लेग का फैलाव रोकने के लिए वही ज्यादती करनी पड़ेगी? और जबकि मैं सरकार में एक उच्च पद पर हूं, तो मेरी भूमिका क्या होगी?&lt;br /&gt; मैंने डा.वानेरे से पूछा - अब क्या होगा? उनका उत्तर था-टेट्रासाइक्लिन। उन्होने समझाया कि १९२६ में जब प्लेग की महामारी फैली, तब टेट्रासाइक्लिन या एण्टीबायोब्कि का अविष्कार नहीं हुआ था। आज यह ज्ञान है और गोलियां हैं। बस सीधा-सा उपाय है कि मरीज की टेट्रासाइक्लिन का एक कोर्स करा दो - वह ठीक हो जाएगा। यथासंभव उसे बाकी लोगों से अलग रखो-ताकि अन्य लोगों को इंफेक्शन होने की संभावना कम हो, और जैसा कि हर बैक्टीरियल इंफेक्शन में होता है, बुखार आ गया तो ७-९ दिन रहेगा, उतने दिन धैर्य रखो। है न सीधी-सी बात। बस इतनी-सी बात कोई सुरत के लोागों को समझा दे, कूड़े-कचरे के ढेर उठवा दे, हो गया प्लेग का किस्सा खत्म। तभी किसी ने कहा-टेट्रासाइक्लिन के साइड इफेक्टस भी है। तो चलो उसके साथ विटामिन ए.बी. कर गोलियां भी खाओ और यदि अपना खुद का बाडी रेजिस्टेन्स अच्छा है तो प्लेग वैसे भी पास नहीं फटकेगा। लेकिन शाम होते होते सारा चित्र बदल गया। धुलिया के कलेक्टर तब हमारे साथ थे। उनके लिउ संदेशा था कि सुरत से लोग भारी संख्या में धुलिया आ रहे है, उनका क्या किया जाए? कलेक्टर ने मेरी ओर देखा। हमने तय किया कि बॉर्डर सील नही करना है। आखिर यह कोई जानलेवा बीमारी तो रही नहीं। जिन्हें यह बात ठीक से समझाई नहीं जा सकी, वही सूरत से भागे है। वे बीमार भी नही है -लेकिन बीमारी के कैरियर हो सकते है, सो उन पर निगरान रखनी होगी। फिर पता चला कि सुरत, बड़ौदा और अहमदाबाद में भी बाजार से टेट्रासाइक्लिन लुप्त हो गया है। वैसी हालत में अच्छा ही है कि ये लोग दूसरी जगह चले जाए जहाँ दवाई मिलना दुश्र्वार हो।&lt;br /&gt; शनिवार को मुंबई आकर मैंने अपनी डिवीजन के तीनों कलेक्टरों से बात की जिनका जिला बॉर्डर गुजरात से लगा हुआ है। जलगांव कलेक्टर ने भ्सुसावल - सुरत लाइन के हर रेलवे स्टेशन पर गुजरात से आने वालों के लिए मेडिकल चैक पोस्ट रखे थे। धुलिया कलेक्टर ने धुलिया में स्कुल,कालेज और सिनेमा शो बंद करवाए और हर रेलवे स्टेशन और हर प्रमुख बस अड्डों पर मेडिकल चैक पोस्ट लगवाए। नासिक कलेक्टा ने भी मेडिकल टीमें बनाकर पेठ और सुरगना - दोनों तहसीलों में चार चैक पोस्ट पर चैकिंग करवाई।&lt;br /&gt; अगले चार दिनों में हर जगह बी.एच.सी. या डी.टी.सूप्रेइंग करवाया , यह व्यवस्था की गई कि टेट्रासाइक्लिन बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो। तीनों कलेक्टरों ने प्रेस और आकाशवाणी के मार्फत लोगों को बताया कि सरकार के पास किस-किस बात की उपलब्धता है-अर्थात दवाइयां, बी.एच.सी.पावडर , कितने लोग गुजरात से आए, कितनों के मेडिकल टैस्ट हुए, कितने बीमार पाए गए, किताने बीमारों का बॅल्ड टेस्टिंग किया - उसमें कितनों प्लेग बाधित निकले, कितने चूहे मरे, इत्यादि। चौबीस से तीस तारीख तक छः दिनों में सूरत से करीब साठ हजार लोग इन तीन जिलों में पहुंचे जिनमें से करीब पांस सौ को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उन्हें टेट्रासाइक्लिन दिया गया और बल्ड सेम्पलिंग भी करवरना पड़ा। हालांकि इसकी रिपोर्ट आने में एक या दो दिन लग जाते हैख् फिर भी कुल प्लेग के जीवाणु पाए जाने वाले पचास से भी कम निकले जब कि मुत्यु किसी की भी नहीं हुई।&lt;br /&gt; सबसे बड़ा डर था कि शायद लोग अपनी बीमारी छिपाने की कोशिश करेंगे। जिनके दिल में पिछले प्लेग के &lt;br /&gt;दिनों का भय है और जो अपनी अशिक्षा या अज्ञान के कारण नहीं जानते कि अब प्लेग एक आसानी से इलाज की जाने वाली बीमारी है,वही इसे छिपाना चाहेंगे। लेकिन यदि उन्हें विश्र्वास दिलाया जा सके कि इसमें डरने जैसा कुछ नहीं है, तो लोग इसे छिपाना नहीं चाहेंगे न ही इतने भयग्रस्त होंगे। उपरोक्त आंकडे भर में चार-पांच सौ लोग तो यों भी बीमार पड़ ही जाते हैं। इसी से मुझे लगता है कि यह पेनिक की, घबराहट की नौबत निराधार थी। थोड़ी सही जानकारी लोगों को पहले ही दिन मिल जाती तो लोग इतने भयभीत नहीं होते।&lt;br /&gt; पर एक क्षेत्र ऐसा है जहां वाकई बात का बतंगड़ , राई का पर्वत बन गया। हमारे लोगों का अज्ञान और हमारे शहरों की सफाई कितने छोटे से दो विषय हैं। लेकिन आज प्रायः हर शहर का प्रशासन इस एक मामले में कमजोर पड़ गया है। सूरत में सफाई नहीं हुई, तो बीमारी फैली। जनता को इलाज पता नहीं था तो लोग-बाग भागे-बंबई गए, दिल्ली गए, धुलिया और नासिक भी गए। यदि वहां की सफाई पहले ही अच्छी तरह होती तो डर की कोई बसत नहीं थी। लेकिन चूंकि पता था कि सफाई डांवाडोल है, इसलिए लोग भी डर गए। घबराहट फैली, चर्चा होने लगी और नतीजा यह हुआ कि तमाम अंतर्राष्ट्रीय हवाई कंपनियों ने भारत से आने'जाने वाली फाइट्रस पर रोक लगा दी। सूरत के हीरों के व्यापार को जितना नुकसान हुआ,टेट्रासाइक्लिन या बी.एच.सी.के लिए शहरी प्रशासन को जितना पैसा खर्च करना पड़ा उससे कई गुना अधिक नुकसान इस बात से हुआ कि विदेश व्यापार घटा और वापस नार्मल पर आने के लिए दो-तीन महीने लग जाएंगे।&lt;br /&gt; हमारे रोजमर्रा जीवन का अभिन्न अंग है हमारी उदासीनता और निष्क्रियता, जिसके चलते न हमने कभी शहरों की गंदगी के प्रति आवाज उठाई और न कभी सरकार से विस्तृत जानकारी पाने के लिए। आज उसी ने हमारा इतना नुकसान कर दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-8401531700813477362?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/8401531700813477362/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=8401531700813477362' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/8401531700813477362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/8401531700813477362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/blog-post_6380.html' title='14 प्लेग का भय एक हतोत्साही मानसिकता'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-4311127586482209126</id><published>2010-07-19T11:56:00.000-07:00</published><updated>2011-08-13T07:38:38.191-07:00</updated><title type='text'>22 स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा Incomplete, check from book</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा&lt;/span&gt; (last 2-3 paras missing&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इक्कीसवीं सदी के पहले ही देश की जनसंख्या सौ करोड़ के जादुई अंक को छू लेगी। जैसी दिशाहीन बढ़ती हुई हमारी आबादी है, वैसी ही दिशाहीन फैलती हुई हमारी स्वास्थ्य सेवाएँ भी है। किसी जमाने में डॉक्टरी का पेशा सेवाव्रत माना जाता था। ऐसे कई आदर्शवादी डॉक्टरों को नजदीक से देखने पर भी, तब भी मेरी मान्यता यह थी कि शायद उनकी सेवा की दिशा गलत है। आज तो डॉक्टरों की सेवा भावना पर ही शक किये जाने लायक परिस्थितियॉ मौजूद हो गई है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; सरकारी ऑकडे बताते है कि आज देशा में लगभग पांच लाख एम.बी.बी.एस.डॉक्टर्स और करीब इतने ही आयुवेग्द, होमियो चिकित्सा और अन्य प्रणालियों के डॉक्टर है। स्कूलों के सबसे मेघावी छात्र डॉक्टरी की ओर जाते है। परीक्षाओं की रैट रेस में आगे बने रहना, इसके लिये मेहलत और पैसे खर्च करना और डॉक्टरी के पढाई के दौरान भी वही मेहलत बनाये कोई मामूली बात नहीं है। साथ में परिवार का और समाज का भी काफी पैसा खर्च करके ही यह शिक्षा हासिल होती है। अब समाज के खर्च की बात कोई क्यों सोचे? लेकिन परिवार की लागत की पूरी-पूरी वसूली तो होनी ही चाहिये। और फिर जब उन्हें भी यह सर्टिफिकेट हासिल है कि वे समाज के सबसे अधिक मेघवी, मेहनती और विद्वान संवर्ग मे है। तो क्यों न पैसा, प्रतिष्ठा, और अन्य सुख-सुविधाओं पर उनका हक माना जाय? वह भी तब, जब कि वह डॉक्टर दिन रात मेहनत करने के लिये भी तैयार है। इस प्रकार आजकल जब डॉक्टर्स बैंक बैलेन्स के पीछे भागते दीखते हैं। तो उनके पास जस्टिफिकेशन भी होता है। यही कारण है कि डॉक्टरों में सेवा भावना विदा लेकर व्यावसायिकता की भावना आ चुकी है और होड़ लगाकर बितारों से पैसा वसूल किया जा रहा है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; कोई बड़ा मेघावी छात्र सर्जन बनता है। तुरंत अपना अस्पताल खड़ा कर देता है। उस बिल्डिंग का भी अपना ही एक अर्थशास्त्र होता है। हर दिन अमुक-अमुक ऑपरेशन न हो पायें तो बिल्डिंग का खर्चा नहीं निकलेगा। फिर यह सोच गैर लोगू हो जाता है कि पेशंट की वाकई में ऑपरेशन की जरुरत है या नहीं। या यदि किसी पेशट को अब भी अस्पताल में रखना जरुरी है लेकिन उसे वापस भेज दिया जायेगा क्यांकि किसी ऑपरेशन के पेशंट के लिये खाली कमरा चाहिये होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कोई और मेघावी डॉक्टर है - पैथॅलॉजिस्ट है। चालीस-पचास लाख का नया उपकरण लाकर वह अपनी लैब खोलता है। अब इस मशीनी लागत का हर दिन का ब्याज ही दो हजार रुपये के आसपास है। वहॉ ज्यादा केसेस चाहिये हों तो जनरल प्रैक्टीशनर का सहयोग चाहिये। वह कहे कि फलो-फलो टेस्ट किये बगैर मैं रोग निदान नहीं कर सकता और दवाई नहीं दे सकता। इसके लिये हर रेफर्ड केस के पीछे प्रतिशत का जनरल प्रॅक्टीशनर को पहुँचाया जाता है। वह चाहे ऍलोपैथी का हो या आयुर्वेद का या होमियोपैथी का और तरीके है। मरीज को कहा जाता है कि फलों ऍण्टीबायोटिक अच्छा नहीं - इसकी - जगह वह दूसरा ही लेना। इस प्रकार दूसरी दवाई की मार्केटिंग भी ये धडल्ले से करते रहते है। इस बीच नई दवा की जानकारी कितनी मालूम होती है? केवल वही जो मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव ने बताई हो, और जो उसे कंपनी ने बनाई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ऐसे चित्र आये दिन देखे जाते है। ऐसा नहीं कि हर डाक्टर गलत भावना से ही मरीज को सजाह देता हो - शायद आधे डॉक्टर्स सही हो। लेकिन मरीज को उनकी पहचान कैसे हो? क्योंकि रोग के विषय में जानकारी, समझ और अगली सलाह देने के सारे हक डॉक्टर के ही पास होते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आप डॉक्टर से ज्यादा पूछताछ भी नहीं कर सकते उनके अहंकार को ठेस पहुँचती है। उनका उत्तर होगा - डॉक्टर आप है। या हम? चुपचाप कहे मुताबिक कीजिये अर्थात् आप यदि पेशंट है। तो आप अज्ञानी ही है, वैसे चाहे पढ़े लिखें हो पर मेडिकल लेंग्वेज समझने के - हिसाब से तो अज्ञानी ही हुए। फिर वह डॉक्टर जो दिन में पांच दस हजार कमा लेता है। उसके एक मिनट की कीमत भी चार-पॉच सौ रुपये होगी, वह क्योंकर आपको समझाने के लिए अपना एक भी मिनट जाया करें। और अब तो ग्राहक मंच भी है। यदि आप कुछ जानकारी रखते हों अपने विषय में, डॉक्टर ने कोई बात कही, उसमें कोई गलती हो ही गई और आपने पकड ली तो डॉक्टर ने कोई बात कही, उसमें कोई गलती हो ही गई और आपने पकड ली तो डॉक्टर क्यों रिस्क लें? इन सब कारणों से डॉक्टर पेशंट के हित को प्राथमिकता नहीं &lt;br /&gt;देता उसकी प्राथमिकता होती है अपनी कमाई, अपना अहंकार बडप्पन और कोर्ट से अपना बचाव। फिर पेशंट का निरर्थक आपॅरेशन टालने के लिये या उसकी अनावश्यक दवाइयाँ और अनावश्यक टैस्ट्स रोने के लिये डॉक्टर कुछ नहीं करना। कई बार इलाज के दौरान मरीज को किसी दवाई के प्रति ऍलर्जी पैदा हो जाती है, पर उसे नही समझाया जाता कि भविष्य में उसें कौनसी दवाइयाँ टालनी है। यहाँ तक कि उसके केस रिपोर्टस भी उसे नहीं दिये जाते - उन्हें अस्पताल का प्रॉपर्टी कहकर रख लिया जाता है। यदि किसी पेशंट को चार वर्ष बाद या उसी समय भी दूसरे डॉक्टर की सलाह लेनी हो तो उसे उन रिपोर्टस् का उपयोग नहीं करने दिया जाता। यह है हमारे अस्पतालों की नैतिकता का मापदण्ड। सौभाग्य से हाल ही में हाई कोर्ट ने एस केस में फैसला दिया है कि मरीज के मागने पर अस्पताल को उसके टेस्ट रिपोर्ट उसे देने होंगें। यह अभी देखना बाकी है कि कितने बीमार इस फैसले का फायदा उठा पा रहे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यह सब लिखने का यह उद्देश्य नहीं कि डॉक्टरी पेशे के काले किस्से को भडकीले ढंग से प्रस्तुत किया जाय। केवल यही स्पष्ट करना है कि आज डॉक्टरी पेशे में व्यावसायिकता और बैंक बैलेन्स का विचार अवश्यंभावी बन गया है। इसके लिये आवश्यक सारी तिकड़मबाजी मेहलत और लागत लगाने का पैसा, सब डॉक्टरों के पास है। और जस्टिफिकेशन भी है। फिर जो ये हमारे अति बुद्धिमान छात्र डॉक्टर होते चलते है। उन्हें बैंक बैलेन्स के पीछे भागने में कोई संकोच नहीं होता। यह हुआ  व्यावसायिक डॉक्टरों का पक्ष।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पिसा जाता है बेचारा मरीज और उसके रिश्तेदार। व्यावसायिकता की ढाल की आड़ में उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी को डॉक्टर लोग नहीं निभाते मेरा और कई सैकड़ो लोगों का मानना है कि मरीज के रोग के बाबत खुद उससे और उसके रिश्तेदारों से विस्तृत चर्चा करना डॉक्टर का परम और प्रथम कर्तव्य है लेकिन यह सिद्धांत डाक्टरों को तीन प्रकार से खलता है। एक तो उनका सुपिरिऑरिटी का अंहकार चोट खा जाता है यदि मरीज अपने विषय में कुछ करना या जानना चाहे। दूसरे उनका कमाई का समय खर्च हो जाता है, तीसरे यह भी डर है कि जानकारी लेने के दौरान उनकी कोई गलती मरीज ने पकड़ ली तो कन्ज्यूमर कोर्ट में उन्हें खींचा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कई बार इससे थलग डॉक्टर्स भी देखे जाते है। जो मरीज को अनावश्यक टेस्ट तो करवाये अनावश्यक ऑपरेशन की सलाह न दे लेकिन वे भी मरीज से चर्चा करने से कतराते। उनके लिये पूरा आदर भव रखकर भी कहना पडेगा कि मैं केवल उनकी सेवा भावना से ही सहमत हूँ सेवा की दिशा से नहीं। इसका भी एक महत्वपूर्ण कारण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यह प्रायः देखा गया है कि अच्छे अच्छे सेवाभावी डॉक्टर्स भी अपने डॉक्टरी झाम को लेकर एक अहंकार या कहिये कि एक बडप्पन का भाव पाल लेते है। और उस रौ में यह भूल जाते है कि सामने वाला हर रोगी अपने आप में एक बुद्धिशाली व्यक्ति है जिसके जीवन और जीवन्नता ने उसे भी बहुत कुछ सिखाया होता है। उसके अपने अनुभव के आधार पर जो ज्ञान उसके पास संचित होता है उसे नकारकर इलाज नहीं किया जा सकता। इसीलिये डॉक्टर की रोगी से विस्तृत चर्चा होनी आवश्यक है। डॉक्टर केवल सेवाभावी न हो, वह एक अच्छा शिक्षक और एक अच्छा विद्यार्थी भी हो। उसका प्रयत्न हो कि औरों के पास भी छोटे पैमाने पर ही सही मेडिकल ज्ञान बढ़े न कि उनके संचित अनुभव और ज्ञान का उपहास हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक उदाहरण देखें। मैंने बचपन में कभी नानी से सुना कि हरसिंगार के पत्ते चबाने से बुखार उतर जाता है। अभी चल कर इसका उपयोग हमारे घर मे जमकर किया गया। अब हर बार तो नहीं, लेकिन कई बार हरसिंगार की पत्त्िायाँ खाने से बुखार उतर गया है। अब अगर आप डॉक्टर से कहें कि साधारण ही बुखार हो तो बताइये, फिर हम आपकी दवा खाने के बजाय हरसिंगार की पत्त्िायाँ ही खा लेगें तो उसकी प्रतिक्रिया क्यों होगी? बेहद गुस्से की - आप यहाँ आये ही क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; गुस्सा उतर चुकने के बाद ऍलोपैथी डॉक्टर ही तो कहेगा - यह बकवास है, अंधश्रद्धा है, आप ही जैसे लोगों के कारण हिन्दुस्तान में इतना अस्वास्थ्य है इत्यादि। और आयुर्वेद का वैद्य भ्ंी हो तो उसकी भी प्रतिक्रिया होगी तो हम उनके लिये अच्छी और पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं करापा रहे है। और दूसरी ओर उनका स्वास्थ्य विषयों का ज्ञान बढ़े इसके लिये भी हम कुछ नहीं कर रहे। जब भी पैसा उनलब्ध हुआ और चुन्ना पडा कि हम उनके लिये कौन सी नीति उपनीयेंगे अधिक स्वास्थ्य सेवा देने की अधिक स्वास्थ्य शिक्षा देने की तो हर बार हमने स्वास्थ्य सेवा को ही प्रधानता दी &lt;br /&gt;नतीजा यह है कि आज वह स्वास्थ्य सेवा हर तरह से लडखड़ा रही है और गरीब तथा पिछड़े इलाकों का समाज स्वास्थ्य सेवा के साथ साथ स्वस्थ्य शिक्षा से भी वंचित हो रहा है। आज अमारे दुर्गम और पिछड़े इलाके प्यादा मात्रा में डॉक्टरों पर निर्भर है जबकि वहॉ डॉक्टर उपलब्ध ही नहीं है। फिर क्यों उन्हें कमसे कम इतना नहीं सिखा पाते है कि चलो इस बीमारी में डॉक्टर के न मिलने तक कम से कम ये ये बातें करते रहना। यह शिक्षा देने की जिम्मेदारी डॉक्टरों की है, जिसे उन्होंने पूरी तरह टाल दिया है और इसके लिये लज्जिात भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मुझे एक प्रसंग याद आता है। एक सज्जान के घर एक सुविख्यात प्राईवेट डॉक्टर से परिचय हुआ। यह सुनकर कि मैं IAS हूँ और कलेक्टर हूँ - उन्होंने कहा - आप IAS अधिकारी बड़ी गलत नीतियाँ बनाते है। 'सो कैसे' तो उनका उत्तर था - देखिये गाँव गाँव में जो बीमारियाँ और महामारियों फैलती है उनका मुख्य कारण होता है पीने का दूषित पानी।&lt;br /&gt;और आप लोग पर्याप्त और शुद्ध पानी मुहैया करने पर अधिक जोर देने के बजाय ज्यादा नये PHU खोलने की नीति बनाते है। अरे PHU  में डॉक्टर जायेगा भी तो दूषित पानी से कैसे लड़ेगा?  बात बिल्कुल सही कही डॉक्टर साहब ! यह बात तो एक डॉक्टर ही ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है, फिर आज तक कितने डॉक्टरों ने बुलन्द आवाज उठाकर माँग की है कि PHU का बजट कम करके अच्छे पानी की सुविधा के लिये बजट बढ़ाया जाय? वैसे हाल में कुछ डॉक्टर धीमी आवाज में यह कह रहे है। लेकिन वे सारे Public Health Systems  के डॉक्टर्स है। जिन्हें डॉक्टरों की जमात में सबसे निचले दर्जे का माना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक प्रसंग और है। पिछले चार वर्षो से महाराष्ट्र के आदिवासी भागों में मलेरिया महामारी की तरह आता है और हाहाःकार मचाता हुआ तीन चार महीनों के बाद कम हो जाता है। ऐसे हर मौके पर पाया गया कि ग्रामीण अस्तताल और जन स्वास्थ्य केंद्र झ््रघ्-क्ट इस संकट के आगे ढुलमुल हो गये है। एक छोटा सा आवश्यक काम होता है कि रोगी के खून की जॉच कर मलेरिया पॉजिटिव है या नहीं और यदि है तो कौन सा पॉल्सिफेरम या...................इसकी जॉच की जाय। इसमें टैक्निकल स्टाफ कम पड़ जाता है। सीधी सी बात है क्यों नही उसी इलाके के नौंवी और ग्यारवी के छात्रों को यह सिखाया जाय कि रोगी की अंगुली से एक बूंद खून कैसे जमा किया जाता है और स्लाइड को माइक्रोस्कोप में कैसे टेस्ट किया जाता है?  टेस्ट करने में पांच मिनट से अधिक समय नहीं लगताऔर यूँ भी इन छात्रों की पढ़ाई में स्लाइड बनाकर उनके निरीक्षण की बात शामिल है। फिर मलेरिया की जॉच के लिए उनका उपयोग क्यों न किया जाय? यदि ऐसा हो सके तो मेरी समझ में वह अच्छा डॉक्टर हो ही नहीं सकता क्यांकि रोग जिज्ञासा और औपध जिज्ञासा इन दो गुणों को उसने भुला दिया है। वेद्य के लिए यह ज्ञान कोई नई बात नहीं। लेकिन उसे भी यह विचार करना चाहिए और रोगी से चार्चा करनी चाहिये कि किस रोग में किस कारण से  केवल हरसिंगार के पत्ते पर्याप्त नहीं होते, किस किस प्रकार के अन्य रोग में क्या क्या पूरक औपधियाँ चाहियें इसके बजाए यदि वह रेडिमेड पारिजातक वटि खाने की सलाह देता है तो वह रोगी के ज्ञान की बढ़ावा नहीं देता बल्कि उसे परावलंबी ही बनाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; शायद यह परावलंबिता शहरी जीवन के लिये ठीक भी हो। लेकिन गांव के इलाके में, आदिवासी और दुर्गम भागों में क्या हो? एक ओर कि सीधे पेड को तोडकर हरसिंगार संस्कृत नाम - परिजातक के पत्ते खाने के बजाय आप परिजातक वटी खाइये - आयुर्वेद में पश्य, कुपथ्य का विचार बहुत होता है, सब है। - आप वही लीजिये - अर्थात् रेडिमेड ! धंधे की वजह से करोडों लोगों के पास रोग और स्वास्थ्य के विषय में जो भी ज्ञान है उसका विचार होने के बजाय उसका हम खात्मा कर रहे है। बुद्धिमान अलोपैथी की डॉक्टर हो और हरसिंगार की पत्त्िायों से बुखार उतरने की बात उसुनकर यदि उसकी उत्सुकता जागृत नहीं होती, यदि वह नहीं सोच पाता कि मैं भी अपने चार पांच रोगियों के लिये यह जॉचकर देखूँ कुछ आयुर्वेद की पुस्तकें पढ़कर देखूँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-4311127586482209126?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/4311127586482209126/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=4311127586482209126' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/4311127586482209126'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/4311127586482209126'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/blog-post_19.html' title='22 स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा Incomplete, check from book'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-832324236611156634</id><published>2010-07-15T12:10:00.000-07:00</published><updated>2010-07-15T12:11:37.325-07:00</updated><title type='text'>13 बटमारी के हिस्सेदार</title><content type='html'>बटमारी के हिस्सेदार &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाणिज्य राज्यमंत्री ने फेयरग्रोथ कंपनी में खरीदे शेयरों के कारण इस्तीफा दे दिया तो एक नयी बहस की शुरूआत हो गयी। लोग पुछने लगे कि किसी कंपनी ने गैरकानूनी ढंग से मुनाफ़ा कमाया हो और उस कंपनी के मुनाफ़े के कारण शेयर होल्डरों को डिविडेंड मिलता हो या उनके शेयरों के दाम बढ़ते हों तो इस मुनाफ़े को स्वीकार करने में क्यों कोई दोष माना जाय ? आखिर कंपनी के कामकाज के तरीकों पर या सिद्धांतों पर शेयर होल्डर का नियंत्रण नहीं के बराबर होता है। खासकर जब लाखों शेयरों की तुलना में उसके शेयरों की संख्या केवल सैकड़ों या हजारों में ही होता है। प्रश्न है कि क्या यह दलील सही मानी जा सकती है ? इसके लिए हमें अर्थशास्त्र के कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर नजर डालनी पड़ेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी उत्पादन के लिए पूंजी एक महत्वपूर्ण घटक होता है। इसके अलावा चाहिए जमीन, कच्ची सामग्री और म.जदूर। लेकिन इन सबसे पहले चाहिए एक अच्छा दिमाग, तकनीकी ज्ञान, उत्पादन से हो सकने वाले मुनाफ़े का सही अंदाज लगा पाने की क्षमता और इस काम में कूद पड़ने के लिए निर्णय ले पाने का साहस ! ये अंतिम गुण जिस उद्योजक में होंगे वही पूंजी जुटाने की बात सोचेगा। उसकी अपनी पूंजी कम हो तो शेयरों के माध्यम से पूंजी जुटायेगा। शेयरों की अधिक से अधिक बिक्री हो इसलिए वह अपनी योजना और उससे होने वाले मुनाफ़े का अनुमान लोगों के सामने रखेगा। लोग उसका प्रस्ताव परखेंगे। यह जानना चाहेंगे कि उसके कारखाने का मैनेजमेंट अच्छा होगा या नहीं। खासकर यदि उसने पहले किसी उद्योग में अच्छा मुनाफ़ा कमाया हो तो लोग उसकी जांच परख की क्षमता और उद्योग चला सकने की क्षमता पर भरोसा रखेंगे और उसकी नयी प्रस्तावित कंपनी में अपनी भी पूंजी लगायेंगे। किसी नये उद्योग का पब्लिक इशू जब ओवर सब्सक्राइब हो जाता है तो इसका अर्थ होता है कि लोगों को उस उद्योजक के या उसकी कंपनी के सफल होने की आशा है। इसलिए उन्होंने अपनी पूंजी भी उसके साथ लगायी ताकि मुनाफ़े और शेयर एप्रीसिएशन के लाभ में उनका भी हिस्सा रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सामान्य आदमी किसी उद्योग में पूंजी लगाता है तो माना जाता है कि उस उद्योग के कारण बढ़ने वाली उत्पादकता और राष्ट्रीय संपत्त्िा की बढ़ोतरी में वह हाथ बंटा रहा है। इसी कारण मुनाफ़े में हिस्सा कमाना भी उसका हक माना जायेगा। लेकिन यह है उन देशों की परिस्थिति जहां पिछले दो शतकों में औधोगिक क्रांति हुई। नई-नई मशीनों के आविष्कार हुए, उन मशीनों से उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। लोगों ने नए-नए कल-कारखाने लगाये, देश की उद्योग क्षमता और उद्योग संपत्त्िा बढ़ायी। दुर्भाग्य से हमारा देश उनकी पंक्ति में नहीं बैठाया जा सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से हमारे देश में प्रथा चल पड़ी है कि नयी कंपनी घोषित करना ही काफी है, उसमें अच्छी प्लानिंग करना या अच्छा उत्पादन निकालना या पूरी कार्यक्षमता से कंपनी को चलाना आवश्यक नहीं है। आप पूछेंगे कि भाई उत्पादन न हो तो मुनाफ़ा कहां से आयेगा। इसका उत्तर भी इस प्रथा में है। कंपनी का उद्देश्य जब केवल मुनाफ़ा कमाना ही है, तो हर चीज जाय.ज है वाली कहावत लागू हो जाती है। फिर आप अलग तरीकों से भी मुनाफ़ा कमा सकते हैं -- मसलन आपकी कंपनी टैक्स ही न दे। कहा जाता है कि हर्षद मेहता और उसकी कंपनियों ने अब तक ३००० करोड़ से भी अधिक रुपये का टैक्स छिपाया है। यह तो मुम्बई शहर से वसूल होने वाले कुल टैक्स से भी अधिक है। लेकिन टैक्स छिपाकर अपना मुनाफ़ा बढ़ानेवाला पहला व्यक्ति हर्षद मेहता हो एसा भी नहीं है। उसके पहले भी कई और नाम सामने आ चुके हैं। मुनाफ़ेखोरी का दूसरा तरीका यह भी है, आपकी कंपनी या आप साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर सरकारी नीतियों को ही अपने हक में यूं घूमा-फिरा लें कि आयात और निर्यात की सुविधा, कम ब्याज दर पर बैंक से कर्ज मिलने की सुविधा या अपनी कंपनी के शेयरों को उछालने के लिए थोड़े समय तक बैंक से पैसे या कर्ज हासिल करने की सुविधा इत्यादि आपको मिलती रहे जो कि अन्य किसी कंपनी को नहीं मिल रही हो। यह मुनाफ़ा उत्पादन से नहीं बल्कि हिसाब की हेरा-फेरी से बढ़ा है, भले ही शेयर मार्केट में इसे स्मार्ट्-नेस का नाम दे दिया गया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब अर्थशास्त्र का नियम है कि जब वास्तविक उत्पादन के कारण मुनाफ़ा बढ़ रहा तो किसी से कुछ छिने बगैर कंपनी अपनी आय और मुनाफ़ा बढ़ा रही होती है। कंपनी का उत्पादन लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा होता है, लेकिन जब उत्पादन करके भी हेरा-फेरी से मुनाफ़ा कमाया जाता है तो किसी की जेब से निकलकर पैसा ''स्मार्ट गाय'' की जेब में जा रहा होता है। आखिर किसकी जेब से पैसा जाता है? उसकी जेब से जिसने अपनी मेहनत की कमाई बैंक में डिपॉजिट की या उछाल आने पर अपनी कमाई से शेयर खरीद लिये, क्योंकि जिन शेयरों को उत्पादन का जोर नहीं है, उन्हें कभी तो गिरना ही है। आज भी स्टेट बैंक का ५०० करोड़ रुपये के घाटे का उदाहरण हम देखें या कराड़ बैंक के डिपॉजिटर्स का नतीजा वही है कि इस घाटे में सामान्य आदमी ही पिसेगा। बैंक के वरिष्ठ अधिकारी तो कई एक करोड़ डकार जायेंगे। किसी एकाध को सजा हो जायेगी बस क्योंकि अपने देश के कानून भी उतने सक्षम नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश को सरकार की या शासन की असल जरुरत इसलिए होती है कि एसी हेरा-फेरी को सरकार रोक सके, कानून को और कानूनी प्रक्रिया को सक्षम रखे और आम आदमी के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखे। लेकिन आम आदमी से अलग अपने देश में एक ऊंचे तबके का कुनबा है जिसके लोग इस हेरा-फेरी को रोकने के बजाय इसके मुनाफ़े में हाथ बंटाने में विश्र्वास रखते हैं। इसलिए जब फेयरग्रोथ जैसी कंपनी धड़ल्ले से मुनाफ़ा कमाती है तो शेयर होल्डर यह नहीं पूछता कि मुनाफ़ा कहां से आया? कंपनी के तौर-तरीके क्या हैं। वह मुनाफ़े में अपना हिस्सा पाकर संतुष्ट हो जाता है बल्कि कंपनी के लिए दुआ भी करता है। लेकिन यह अब जाहिर है कि फेयरग्रोथ का मुनाफ़ा ईमानदारी से नहीं आया बल्कि यह लूट का मुनाफ़ा ही है। फिर क्या शेयर होल्डर का इस दोष में कोई भी हिस्सा नहीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं कि ऋषि वाल्मीकि पहले बटमार थे, राह चलतों को लूटकर उनका धन लूटते थे। एक दिन नारद मुनि से सामना हो गया। मुनि ने कहा -- मुझे मारते हो तो मारो, लेकिन यह पाप ही है। जिन घरवालों और रिश्तेदारों की सुख-सुविधा के लिए तुमने यह पाप का रास्ता चुना, वे तुम्हारी लूट से खुश होते हैं, लूट में हिस्सा बंटाते हैं, लेकिन क्या वे तुम्हारे पाप में भी हिस्सा बांटेंगें? जरा पूछकर तो आना। डाकू ने घर जाकर सबसे पूछा तो वे कहने लगे - तुम्हारा पाप तुम्हारे पास, इसका जिम्मा हमपर कैसा? और जब जिम्मा नहीं तो पाप में हमारा हिस्सा भी क्यों करें? इस पर वाल्मीकि का मोहभंग हुआ और वो बटमारी छोड़कर तपस्या करने चले गये। हर्षद मेहता या फेयरग्रोथ जैसी नावों पर सवार हजारों की संख्या में शेयरों की खरीद-फ़रोख्त करने वाले इस कलयुग में वाल्मीकि के रिश्तेदार ही हैं। उन्हें इससे क्या मतलब कि कंपनी वाकई कुछ उत्पादन कुछ काम करती है या हेरा-फेरी! वह तो यही कहेंगें कि हमने इतनी पूंजी लगायी। कंपनी ने इतने डिविडेंड दिये और शेयर इतने चढ़े, इससे हमें इतना मुनाफ़ा हुआ बस! और इन हेरा-फेरी प्रवीण कंपनियों की मदद से अपना ढोल पिटवाते लोग भी कहेंगें कि देखो-देखो, पूछो इन शेयर होल्डरों से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जो जानता है कि बिना उत्पादन के देश की संपत्त्िा नहीं बढ़ती और जिसे इस देश की चिंता है, यहां के उत्पादन की चिंता है, या जिस पर यह चिंता करने की जिम्मेदारी है, वह जानता है कि फेयरग्रोथ जैसी कंपनी के मुनाफ़े में हिस्सा बांटने पर वह किस दोष की श्रेणी में आता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-832324236611156634?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/832324236611156634/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=832324236611156634' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/832324236611156634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/832324236611156634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/13.html' title='13 बटमारी के हिस्सेदार'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-3878193190359821363</id><published>2010-07-15T08:08:00.000-07:00</published><updated>2010-09-06T03:28:10.086-07:00</updated><title type='text'>25 व्यर्थ न हो यह बलिदान (सत्येंद्र दुबे)</title><content type='html'>व्यर्थ न हो यह बलिदान&lt;br /&gt;( The climax chapter of my book है कोई वकील लोकतंत्रका!)&lt;br /&gt; सत्येंद्र दूबे की हत्या हुई और सारे ईमानदार अफसरों को धमका गई कि खबरदार, हो जाओ तैयार, या तो अपना मुँह पर पड़ी चुप्पी पर सात ताले और लगा लो या फिर कफन के अंदर घुस जाओ। दोनों ही सूरतों में मुँह से आवाज न निकले- शिकायत में कलम न चले। क्यों कि यदि यह हो गया तो क्या भ्रष्टाचारी और क्या सत्ताधारी, दोनों तुमसे पल्ला झाड़ लेंगे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; जब हत्या हो गई तो सबसे पहले जो एक तबका जागा- वह था उन नौजवान, होनहार, उच्चशिक्षित इंजिनियरों का जो अभी तक देश छोड़ कर भागे नही हैं। हालाँकि सुनहरे मौके उनके लिए भी होंगे, यदि वे जाना चाहें, लेकिन वे अभी गए नही हैं और इसी देश का कुछ कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। और एक वह तबका भी जागा जो विदेश में है लेकिन दिल में एक आस बसाए हुए कि कभी उन्हें भी अपने देश में वापस आना है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; जब ऐसे हजारों लोगों ने आवाज उठाई तब कहीं जाकर सरकार के सर्वोच्च पदस्थ व्यक्ति ने कहा कि कातिलों को नहीं छोड़ा जायगा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; वैसे यह हजारों बार कहा जाता है कि इसे, उसे नही  छोड़ा जाएगा, सब को न्याय मिलेगा, सत्य की विजय होगी इत्यादि। उसके बाद क्या होता है- लोग हिंदी सिनेमा का अगला हिस्सा देखने लगते हैं कि कैसे हीरो छत से कूदा, सात मशीनगनों के बीच सीना ताने चलता रहा एक मुष्टिप्रहार में सारी दीवारें तोड़ दीं वगैरा वगैरा। लोगों में अभी यह उम्मीद जग ही रही होती है कि अब अपराधी पकडे जाएंगे और उन्हें दंड मिलेगा कि फिल्म खत्म हो जाती है और मुँह बाए दर्शक को एहसास होता है कि यह सब तो तमाशा था- अब रात हो गई- चल कर सो जाओ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; सत्येंद्र दुबे के परिवार के दुख में इस देश का हर संवेदनशील और ईमानदार व्यक्ति शामिल है। लेकिन क्या हरेक के दिल में यह पूरा पूर्ण विश्र्वास है कि कातिल पकड़ा जाएगा?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; और जब वह पकड़ा जाएगा तो क्या होगा? चलेगा एक लम्बा सिलसिला कोर्ट कचहरी की तारीखों का और शायद आज से पच्चीस वर्ष बाद हमें कोई अखबार सातवें पेज के कॉलम चार के निचले कोने में बताएगा कि सत्येंद्र के अपराधी को सजा मिल गई।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; तब कोई यह पूछने की स्थिंति में नही होगा कि अपराधी कौन था और अपराध क्या था। इसलिए यह चर्चा आज ही होनी चाहिए।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; क्या हम भी मान लें कि सत्येंद्र का अपराधी वह आदमी है जिसने गोली चलाई। नही, मैं नही मानती। वह तो अपराधियों की एक लम्बी कतार का सबसे आखिरी व्यक्ति है। उसके पहले कतार में कई कई लोग खड़े हैं। क्या हमारी नजरें और उंगली उन पर पड़ी है?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; सत्येंद्र ने एक लम्बा पत्र लिखकर स्वप्निल स्वर्णिम परियोजना में चल रहे भ्रष्टाचार की ओर ध्यान आकर्षित किया था। सत्येंद्र जीवित रहा तो बार बार ध्यान आकर्षित करेगा इसलिए उसे मार दिया गया। यदि उन बातों से हमारा ध्यान हटा जिन्हें उजागर करने और रोकने के लिए सत्येंद्र ने अपनी जान गँवाई तो उसका बलिदान व्यर्थ हो जायगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आइए, हम याद करें कि सरकारी तंत्र में चल रहे भ्रष्टाचार पर उंगली उठाकर मौत को ललकारने वाला और शहीद होने वाला पहला अफसर सत्येंद्र ही है। उसे मृत्यु का खतरा भी अवगत था जो उसने अपने पत्र में भी लिखा था। इस खतरे के बावजूद वह पीछे नही हटा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मुझे इतिहास याद आता है कि जब साइमन कमिशन के विरोध में सभा का नेतृत्व करने का निर्णय लाला लाजपतराय ने लिया या असेम्बली में बम धमाका करके अपने आपको पुलिस को सौंप देने का निर्णय भगतसिंह ने लिया तो वे भी अपनी मृत्यु के खतरे को पहचानते थे। लालाजी ने जब लाठियाँ झेलीं तब उन्होंने कहा था कि मेरे शरीर पर पड़ने वाली एक एक लाठी वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य पर एक एक प्रहार है जिसमें वह साम्राज्य ढह जायगा। और यही हुआ भी। लालाजी की खाई चोटें व्यर्थ नही गईं। उन्होंने अन्ततः देश को स्वाधीनता दिलाई। इसी प्रकार सत्येंद्र का बलिदान भी व्यर्थ नही होना चाहिए। उससे शुरूआत होनी चाहिए कि देश में संगठित रूप में चल रहे भ्रष्टाचार का समापन हो। वह केवल सत्येंद्र पर गोली चलाने वाले को ढूँढने से नहीं होगा। हमें कतार में आगे खड़े लोगों को देखना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; क्या लिखा था सत्येंद्र ने अपने पत्र में? क्यों किसी भी अखबार में वह पत्र नही छापा? वह छप जाय तो लोगों को पता चले कि शक की सुई किन किन की ओर है। उनके पास सत्येंद्र की हत्या का मकसद 'थ््रदृद्यत्ध्ड्ढ' है। सी.बी.आई. की जाँच की शुरूआत उनसे होनी चाहिए और वह भी जनता को बताकर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; जो लोग सत्येन्द्र के हत्यारे को ढूँढने में लगे हैं उन्हें लगने दीजिए। लेकिन मुझे लगता है कि हमारी नजरें केवल उस गोली पर टिककर न रह जाए जो सत्येंद्र के शरीर में धँसी। हमारी नजरें उस पत्र पर होनी चाहिए जो सत्येंद्र के कलम से निकला था। उसमें वह था जो सत्येंद्र चाहता था। आज हर आईआईटीयन को चाहिए और देश के हर ईमानदार अफसर को चाहिए कि सत्येंद्र का वह पत्र फ्रेम में मढवाकर अपने सामने दीवार पर टाँग कर रखे। इस एक बात से कुछ ऐसी शुरूआत होगी जिससे सत्येंद्र का बलिदान व्यर्थ न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;ई-१८, बापूधाम,&lt;br /&gt;सेन्ट मार्टिन मार्ग, &lt;br /&gt;नई दिल्ली- ११००२१&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-3878193190359821363?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/3878193190359821363/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=3878193190359821363' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/3878193190359821363'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/3878193190359821363'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/25.html' title='25 व्यर्थ न हो यह बलिदान (सत्येंद्र दुबे)'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-4397297878643157323</id><published>2010-07-15T08:01:00.000-07:00</published><updated>2010-07-19T21:40:29.970-07:00</updated><title type='text'>18 एक सिंचन व्यवस्था : एक विचारधारा</title><content type='html'>एक सिंचन व्यवस्था: एक विचारधारा&lt;br /&gt;-  लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;- सेटलमेंट कमिशनर, महाराष्ट्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     बड़े बांध, बड़ा बजट, बड़ी तकनीक, बड़ी मशीनरी, बड़े फ़ायदे और बड़ी समस्यांएँ एक तरफ़ और छोटे बांध , छोटा बजट, छोटे फ़ायदे और छोटी समस्यांएँ दूसरी तरफ़। इनमें से आप किसे चुनेंगे ? उन्नीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद अब तक यह मान्यता रही कि चुनाव का निर्णय मुख्यतया तकनीकी पर निर्भर है। जो तकनीक जितने बडे पैमाने पर लागू हो सकती है, जितनी आधुनिक है, वही ज़्यादा अच्छी। लेकिन इक्कीसवीं सदी के आते-आते अब पश्चिमी और प्रगत देश मानने लगे हैं कि किसी प्रणाली के व्यवस्थापन की सहूलियत देखनी भी जरूरी है। वे अब सस्टेनेबिबलटी अर्थात् सुचारु ढंग से किसी प्रणाली का चलना आवश्यक मानने लगे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, एक पुरानी सिंचन प्रणाली पर कुछ विचार।&lt;br /&gt;    महाराष्ट्र के उत्तर-पश्चिम छोर पर स्थित है, जिला धुलिया या धुळे, जो आजकल सरदार सरोवर की वजह से बहुचर्चित है। इसके भूगोल में है, पूरब-पश्चिम फैले हुए विन्ध्य पर्वत, विन्ध्यपुत्री नदी नर्मदा, फिर सातपुडा पर्वत और सातपुडापुत्री नदी ताप्ती। एक तीसरी नदी भी है - पांझरा, जो सह्याद्री से निकली है। पहले यह पूरब की ओर साक्री और धुले तहसीलों से बहती है। फिर धुले शहर का चक्कर लगाकर उत्तर और पश्चिम को मुड़कर ताप्ती से मिल जाती है। &lt;br /&gt;    नर्मदा और पांझरा - इन दो नदियों के माघ्यम से हमारी सिंचन प्रणाली के दो विभिन्न चित्रों की तुलना यहाँ प्रस्तुत है। यह दो चित्र अलग कालखंडों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पांझरा की सिंचन प्रणाली क़रीब तीन सौ वर्ष पुरानी है, जबकि नर्मदा की और ख़ासकर सद्य-प्रस्तावित नर्मदा-सागर से जुड़ी हुई सिंचन व्यवस्था अत्याधुनिक है। इन दो कालखंडों के बीच विज्ञान और तकनीकी की जो प्रगति हुई है, उसका प्रभाव या यों कहिए कि उस कारण पड़ने वाला अंतर दोनों प्रणालियों में अवश्यंभावी है। यह कहा जा सकता हे कि पांझरा पर जब सिचंन प्रणाली बनी तो आज उपलब्ध तकनीक उन लोगों के पास नहीं थी, अतः जो सिंचन व्यवस्था उस काल के अज्ञान की द्योतक है, उसकी आज चर्चा क्यों ? लेकिन उस काल की मजबूरी, अज्ञान या भिन्नता के कारण ही सही, पर जो अंतर दो प्रणालियों में आ ही गया है उसे देखने में क्या हर्ज है, ख़ासकर मैंने महसूस किया कि विचार प्रणालियों की और व्यवस्थापन प्रणालियों की भिन्नता भी जो इन दो चित्रों से जुड़ी हुई है वह शायद इस प्रश्न से जुड़े सभी व्यक्तियों को कुछ सोचने के लिए उकसा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  पहले देखें कि नर्मदा पर बन रही सिंचन प्रणाली क्या है। भारत की नदियाँ दो तरह की हैं -- वे जो हिमालय से निकलती है और जिनमें बर्फ़ पिघलकर आती है, जिसके कारण वे कभी सूखती नहीं, दूसरी अन्य सभी पर्वतों से निकलने वाली नदियाँ, जिनमें केवल वर्षा का ही पानी बहता है। यादि उनके उद्गम पर्वतों पर झाड़ियों की बहुतायत हो तो उनमें आने वाला पानी धीरे धीरे आएगा, जिससे नदी में पानी की धारा अघिक महीनों तक बनी रहेगी। यदि पहाड़ों पर कम पानी बरसा या बरसने वाले पानी कं वेग रोका नहीं जा सका और वह जल्दी बहकर समुद्र में चला गया तो उस नदी की, व उस पानी की उपयोगिता कम हो जाती है। नर्मदा और पांझरा दोनों ही नदियाँ दूसरी श्रेणी में आती हैं।  आधुनिक काल में इन नदियों पर जो बाँध बन रहे है - जैसे भाखरा नांगल बाध हो, या नर्मदा-सागर बांध - उनका तरीक़ा यह है कि काफ़ी ऊँचां बड़ा बाधं बनाकर बारिश के पानी को पूरी तरह रोक लियं जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    जब तक बांध पूरा भर न जाए, तब तक नदी की धार में पानी नहीं बहेगा। (इस प्रकार कई नदियाँ पूरे साल भर सूखी रह सकती हैं, क्योकि सारा पानी बाधं में ही रोक लिया गयं है। प्रसिद्ध विचारक सुंदरलाल बहुगुणाजी इसे नदीकी हत्या का अपराध मानते हैं।)   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     आधुनिक कालमें चूँकीं यह मालूम है कि बाधं में कितना पानी है, अतः यह प्लानिंग भी की जा सकती है कि उस पानीकी उपलब्धता पर आधारित कौन सी फ़सल बोनी चाहिए। प्रायः हर बड़े बांध से सिचाई किये जाने वाला क्षेत्र पचास हजार एकड़ से अघिक होता है, जिसकी प्लनिगं के लिए काड़ा अर्थात कमांड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटीज बनाई जाती हैं। इनका काम होता है हर साल पानी की उपलब्धता देखकर किसानों को बताया जाए कि उस साल उन्हें कौन सी फ़सल उगानी चाहिए और उसके लिए कितने पानी की गारंटी दी जा सकती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     लेकिन अक्सर यह प्लानिंग काग़ज पर धरी ही रह जाती है। अक्सर देखा जाता है कि जब बारिश अच्छी हो, बांध में पानी की बहुतायत हो, तो किसान के खेत में भी अच्छी बारिश हुई होती है, उसे नहर के पानी की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार पिछले वर्षोंमें देखा गया है कि काडा की प्लानिंग असफल भी हो सकती है। जब किसान को सूखे के कारण पानी चाहिए होता है, तो काडा के बाधं में भी पानी कम होता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसान अपनी बुद्धि से ही अंततः तय करता हे कि वह कौन सी फ़सल उगाएगा। काड़ा व्यवस्था में यह भी मान्यता है कि घूसखोरी या राजनीतिक दबाव के आधार पर पानी नहीं चुराया जा सकता। पर यह मान्यता व्यावहारिक स्तर पर ग़लत उतरती है। सिंचाई के अलावा बड़े-बड़े बाधों के दो अन्य उपयोग बताते जाते हैं - बाढ़ को रोकना और बिजली बनाना, उसकी चर्चा यहाँ प्रस्तुत नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आज से तीन सौ वर्ष पूर्व पांझरा और उसकी दो उपनदियों में आने वाले पानी की उपलब्धता के अधार पर क़रीब साढ़े तीन हजार एकड़ क्षेत्र के लिए एक सिंचन व्यवस्था बनाई गई, जो कई मायनों में आज की व्यवस्था से नितांत भिन्न है अपने उद्गम स्थान से नीचे तक आते-आते पांझरा क़रीब दो सौ किलोमीटर की दूरी तय करती है और क़रीब पैंतीस गाँवों को पीने का पानी देती है। सिंचाई के लिए पांझरा और दोनों उपनदियों पर जगह छोटे-छोटे कुल सत्तर बाँध बनाए गए हैं, जिनमें से कुछ मिट्टी और कुछ पत्थर-चूने के हैं, लेकिन बाँधो का उद्देश्य यह नहीं है कि पानी को पूरी तरह रोककर रखा जाए। बाँधोंकी ऊँचांई आठ या दस फीट ही है। बांध से समकोण बनाती हुई नदी की धारा के समान्तर एक दिवाल बांधी गई है, जिसकी उचांई धीरे-धीरे घटते हुए, जमीन की सतह तक आ जाती है । इस दिवाल के ऊपरी मुहानेपर सुयोग्य स्थान पर एक छोटा गड्डा बनाकर एक नहर निकली जाती है, जिससे पानी खेतों तक पहुँचाया जाता है। लेकिन नहर की क्षमता से ज़्यादा जितना भी पानी नदी में आता है, वह दिवाल के साथ - साथ बहता हुआ वापस नदी में चला जाता है। इस प्रकार नदी की धार कहीं भी सूखती नहीं। अगले बाँध पर फिर इसका कुछ पानी सिंचाई के लिए रोक लिया जाता है, लेकिन नदी का मुख्य प्रवाह बना रहता है। नहर में कितना पानी उपलब्ध होगा, यह निर्भर करता है कि नहर के मुहाने पर दिवाल की उचांई कितनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     नहर का पानर ढलान की राह खेतों तक पहुँचाता है। यह तय है कि पानी किस-किस खेत तक पहुँचेगा। पूरी सिंचनयोग्य जमीन तीन हिस्सों में बाटीं गई है जिन्हें फड कहते है। ये है गेंहू, गन्ने और ज्चार के फड। फ़सल के लिए प्रत्येक फड के सभी किसान तीन वर्षों का प्रोग्राम बनाते हैं। पहले फड के किसान गेहूँ बोएगें तो दूसरे फड के किसान गन्ना, ओर तीसरे फड के किसान ज्वार बोएगें। और अगले वर्ष गेहूँ के फड में गन्ना, गन्ना के फड में ज्वार, और ज्वार के फड में गेहूँ बोया जाएगा। किसान को अपने फड के ग्रुप के मुताबिक़ ही फ़सल उगानी पड़ेगी, उसे इन तीन फ़सलों के अलावा अन्य फ़सलें उगाने की अनुमति नहीं है। केवल गन्नें की जगह कहीं-कहीं पूरे फडमें केले उगाने की अनुमति है, और गेहूँकी जगह चना। यह व्यवस्था तीन सौ वर्षों से चली आ रही है - बिना झगड़े झंझट के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     इस सिचांई व्यवस्था में जिस बात ने मुझे सबसे अघिक प्रभावित किया वह है इस प्रणाली की सुचारुता और आत्मनिर्भरता। पंझरा के किनारे बसा हर गाँव पानी के लिए इस पर निर्भर है। साथ ही हर गाँव के कुछ किसान (पर सभी नहीं) इस व्यवस्था से सिंचाई का पानी पाते हैं। अतः यह तय किया गया है कि किसी समय किसी को एक ख़ास मात्रा से अघिक पानी नहीं दिया जा सकेगा। पानी की अघिकतम मात्रा क्या होगी - यह निर्भर है नहर की दिवाल और बांध की ऊँचाई पर। तीन सौ वर्ष पहले मराठा-राज में पेशवाओंने जब यह सिंचन व्यवस्था बनाई तभी तय किया गया कि प्रत्येक गाँव के बाँध की उचांई क्यं होगी। यह ऊँचांई बढ़ाने का हक़ किसी को नहीं है। यदि पानी नहीं बरसा, तो किसी को पानी नहीं मिलेगा। लेकिन यदि बरसा तो भी किसी एक दिन एक ख़ास मात्रा से अधिक जितना पानी आएगा, वह नदी की धारा में ही वापस जाएगा ताकि पीने के पानी का मूल स्त्रोत बना रहे। हाँ, यह संभव है कि सिंचाई के लिए अधिक दिनों तक पानी मिलता रहे -- यदि नदी की धार बरसात के मौसम के बाद भी अधिक दिनों तक बनी रहे। यह तभी सभंव है जब नदी के ऊपरी हिस्से में पेड़-झाड़ी-जंगल बहुतायत में हों, ताकि बरिश का सारा पानी बरसात में ही बहकर बह न जाए, बल्कि पहाड़ों से झरकर धीरे-धीरे आता रहे और महीनों तक बहता रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     नदी किनारे के सभी तीस-पैतीस गाँवों की एक समिति हर साल बरसात के मौसम से पहले और बाद में प्रत्येक बांध की जाँच-पड़ताल करती है कि कहीं किसी ने बांध को थोड़ा ऊँचा न कर दिया हो और कहीं बाँध में मरम्मत की जरूरत न हो। साथ ही गाँव के सिंचाई करने वाले सारे किसान इस बात की भी जाँच करते हैं कि क्या नहर को मरम्मत की जरूरत है। यदि बाँध या नहर में मरम्मत की आवश्यकता हुई तो उस गाँव के किसान श्रमदान के माघ्यम से इसकी पूर्ति करते हैं। इस प्रकंर बांध और नहरो की मरम्मत और नदी के पानी के बँटवारे और व्यवस्था की जिम्मेदारी संयुक्त रूप से इन तीस-पैंतीस ग्रामवासियों की है, जो उन्होंने पिछले तीन सौ वर्षों से निभाई। सफल भी रहे और काडा का ख़र्चा जो आज सरकार उठाती है, वह नहीं उठाना पड़ा, क्योकि गाँव वाले सहर्ष उस काम को बखूबी करते रहे।&lt;br /&gt;    आज बड़े - बड़े बांधो में सिल्टिंग या मिट्टी छा जाने की समस्या बडे पैमाने पर सिरदर्द बनी हुई है। यदि बांधमें मिट्टी भर जाए तो फिर उनमें उतना पानी जमा नहीं हो पाएगा  जितना डिजायन में था और किसान को उतना पानी नहीं दिया जा सकेगा, जिसकी गांरटी की चाह थी। इस प्रकार कई बांध आज निरुपयोगी होने की राह पर हैं। धुले मॉडल में मैने देखा कि सिल्टिंग या बांध में मिट्टी का आ जाना एक वरदान है न कि शाप। क्योंकि बांध में यदि मिट्टी आ गई तो बरसात में बांध जल्दी भरेगा, अर्थात नदी के उद्गम से दूर-दूर बसे गाँवों में पानी मिलने की प्रकिया जल्दी शुरू हो जाएगी। साथ ही सिंचाई के लिए पानी की वही मात्रा उपलब्ध होगी, जो कि यों भी मिल ही जाती। इस प्रकार आघुनिक बांधों में टेल-एंड जो प्रश्न है, कि अंतिम छोर को तब तक पानी नहीं मिलेगा, जब तक बीच के सभी को न मिल जाए, वह प्रश्न यहाँ पैदा नहीं होता । आधुनिक बांधो में बड़ी-बड़ी नहरें बनानी पड़ती हैं - जिन्हें आंरभ में अत्याधिक पानी ढोना पड़ता है, जिससे उनके रखरखाव, टूट-फूट की बड़ी समस्या हो जाती है। हमारे कई बड़े बांधो की उपयोगिता चालीस, पचास प्रतिशत से कम है, क्योंकि नहरें टूट-फूट गयीं, मरम्म्त नहीं हुई, कभी-कभी दुबारा बनानी पड़ी, जिससे प्रोजेक्ट पूरा करने में आठ-दस वर्ष ज़्यादा लग गयै। यह समस्या केवल बड़े ही नहीं, बल्कि मघ्यम आकार के और छोटे आकार के बांधो में भी है। &lt;br /&gt;     उस तुलना में पांझरा नदीकी विकेंद्रित सिंचन व्यवस्था के कारण व्यवस्थपन और मरम्मत की जिम्मेदारी छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गयी, हर गाँव के हिस्से थोड़ीसी ही जिम्मेदारी रही जो ग्रामवासियों के लिए सहज सरल था। उन्हें कहीं से ऊँचीं तनख़्वाह वाले इंजीनियर इंपोर्ट नहीं करने पड़े जैसा कि आधुनिक बांधों के लिए करने पडते हैं।  &lt;br /&gt;     बडे बाँधोंमें बड़ी मात्रा में जमीन डूब जाती हे और लोगों के पुनर्वास की समस्या उत्पन्न होती है। साथ ही बांध और नहरों के पास की जमीन में अक्सर खारापन आ जाता है और वह खेती के लिए बेकार हो जाती है। कई बार किसान जरूरतसे अधिक पानी लेकर या गन्ने जैसी फ़सल बार-बार लेकर अपनी जमीन का भी नुकसान करते हैं। दूसरों को पानी भी नहीं मिलने देते - पानी चुराना और उससे पनपने वाली घूसखोरी और दबाव-तंत्र को कौन नहीं जानता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    दूसरा प्रश्न अधिक मूलभूत और व्यापक है। जब हम बड़ा बांध बनाकर ऊपर ही सार पानी रोक लेने हैं, तो नदी के निचले हिस्से के गाँवों का पीनेका पानी भी छीन लेते हैं। महाराष्ट्र में ऐसी कई नदियों के नाम गिनाया जा सकते है, जिनका वजूद छोटा था, छोटा है, फिर भी उनके किनारे बसे गाँव पीने के पानी और सिंचाई दोनों दृष्टि से खुशहाल थे, फिर नदी के मुहानों पर बांध बने, नीचे के प्रवाह सूख गए। बांध के आसपास पाँच-दस गाँवों की सिंचित जमीन बढी, नीचे पच्चीस-तीस गाँवों में संकट आ गया - वहाँ की जनता गऱीब ठहरी, झगड़ नहीं पाई और आज सरकार के लिए भी हर साल गर्मी के दिन एक सिरदर्द बन जाता है, जब इन गाँवों के लिए कहीं से ढूँड-ढाँडंकर, टैंकर में भरकर, पानी लाना पड़ता है। धुले में उन छोटे-छोटे बांधो से जुड़ा एक और भी प्यारासा दृश्य देखने को मिला। हर बांध मानों एक छोटा पक्षी अभयारण्य बन गया था। समय के साथ विज्ञान की प्रगति हो, या तकनीक भी आए, समाज-विकास के लिए यह आवश्यक है, लेकिन यह देखना भी आवश्यक है कि जो पुरातन तकनीक थी, उसका तुलनात्मक विश्लेषण क्या है। बांध बनाने का आधुनिक फ़लसफ़ा यह भी है कि आँखें मूंदकर उसे नकारो जो पहले था यह मत सोचो कि वह भी एक तरीक़ा हो सकता है और कभी-कभी अपनाया जा सकता है। &lt;br /&gt;     लेकिन शायद एक दूसरा फ़लसफ़ा इससे भी बड़ा है कि सारा व्यवस्थपन अपने हाथ में ही रखो। इस बहाने कि लोग अनाड़ी हैं, गैरजिम्मेदार हैं। फिर जो अपने हाथ में है उसे चाहे दोनों हाथों से लूटो, चाहे निरूपयोगी करार दो- पूछने वाला कौन है? इस प्रकार आधुनिक व्यास्थापन एक ईमानदार और कुशल अधिकारी के लिए मोहतात होकर रह जाता है और किसान उसकी प्रतीक्षा के अलावा कुछ नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;     और हाँ एक बात और। पाझरा के बाँधोंका वर्णन मैंने गलतीसे वर्तमानकालमें कर दिया। विदित हो कि 1989 के आसपास प्रगत महाराष्ट्र के प्रगत सिंचाई-विभागने लोगोंके विरोधको तोडकर इस व्यवस्थाकी हत्या कर दी। अब वहाँ एख मध्यम सिंचन प्रकल्प है। पहले पैंतीस गांवोंमें पीनेका पानी व पंद्रहसौ एकड सिंचन होता था, अब आठ गाँवोंमें बत्तीससौ एकड सिंचन होता है, बाकी गाँव पानी के लिये तरस जाते हैं।&lt;br /&gt;--------------------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-4397297878643157323?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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राज्यों ने राष्ट्रभाषा प्रचार का काम बडे उत्साह के साथ अपनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज कहाँ है वह प्रतिष्ठा और वह उत्साह  न केवल अहिन्दी भाषी राज्यों में बल्कि हिन्दी भाषी राज्यो में भी हिन्दी का जो स्थान है वह बडा आशादायी नही कहा जा सकता हैं। यही नही, अन्य राज्यों की अपनी राजभाषा की भी क्या हालत है यह भी सोचने लायक है। कुछ वर्षो से हमने हर वर्ष संस्कृत दिन मनाने का रिवाण चलाया हुआ है। स्वतंत्रता के पूर्व और बाद में कई वर्षो तक संस्कृत का पठन-अघ्ययन हमारे यहाँ बडें उत्साह के साथ हो रहा था। अचानक यह उत्साह समाप्त हो गया मानों किसी बवंडर मे फस कर रह गया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हम ऐसी कगार पर आ खडे हुए है कि जब आज की बूढी पिढी समाप्त हो जायगी - आज से पंद्रह, बीस, वर्षो के बाद तो हमें जर्मनी सरीखे दूसरे देशों से संस्कृत सीखनी पडेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर बात आई हिन्दी - दिवस मनाने की। अब हर वर्ष केंद्र सरकार के दप्तरो मे हिन्दी - दिवस या राष्ट्रभाषा - दिवस मनाया जा रहा है। और मै यदि कभी चार - पाँच दिनों के लिये बम्बई गई तो मुझे बडी गहराई से महसूस होता है कि जल्दी ही वहाँ मराठी दिवस मनाने की भी जरूरत आज पडेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      २&lt;br /&gt;कही थम कर यह सोचने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हो रहा है  क्या इसलिये कि हमारी राष्ट्रीय भावना में कमी आ गई है    या इसलिये कि हममें से हर शिक्षित आदमी युरोपीय देशों मे नौकरी करना चाहता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या इसलिये कि अपने आसपास  नजर उठाकर देखने पर हमें यह एहसास होता है कि जिसे व्यक्तिगत रूप से आगे बढना हो उसके लिये अंग्रेजी को अपनाने के अलावा कोई चारा नही है। यदि अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा दीक्षा दिलानी है, उनके लिये बडे ओहदे की आकांक्षा रखनी है तो उन्हे कान्व्हेन्ट स्कूल या अंग्रेजी माध्यम के ही स्कूल में भेजना पडेगा। आज देश की पचास प्रतिशत जनता और जो भी देहात या गाँव थोडा सा सुधर कर म्युनिसिपालिटी की श्रेणी में आ गया है वहाँ के लोग अपने बच्चो के लिये अंग्रेजी माध्यम का स्कूल ही पसंद करते हैं। आखिर क्यों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रश्न का विश्लेषण करने पर शायद कोई कहेगा कि हम दिखावटी हो गए है। चूँकि अंग्रजी स्कूलों का तामझाम बडा आकर्षक होता है और अंग्रेजी बोलना एक स्टेटस सिम्बल बन गया है इसलिये हम उसी में उलझ कर रह गये है। यदि हम सच्चे देशभक्त है तो हमें अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा को कतई नही ठुकराना चाहिये। अंग्रेजी भाषा केवल एक खिडकी की तरह है लेकिन घर के दरवाजों से और घर के अन्दर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें अपनी भाषा को ही प्रतिष्ठित रखना चाहिये। पराई भाषा को अननाने की बजार अपना देशभिमान जागृत रखना चहिये इत्यादी लेकिन ऐसा कहने वालों के बच्चे भी प्रायः अंग्रेजी स्कूलों मे पढते पाये जाते है और इसमें में उनकी गलती नही मानती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी भाषाओं के पिछडते जाने का एक बडा जबर्दस्त कारण है लेखन का अभाव, पुस्तको का अभाव। दसवी पास करता हुआ विदयार्थी अपनी उमर की ऐसी कगार पर होता है कि लम्बी से लम्बी छलांग के लिये आकुल होता है। अपने आस पास, दुनियाँ से क्या लूँ, और क्या छोडूँ, अपनी जीत का झंडा कहीं गाडूँ, कुछ करके दिखाउूू ऐसा छलकता हुआ उत्साह उसमें होता है। इस उमर में हमारे आज के बच्चे यदि किसी विषय की किताबे पढना चाहे तो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो किताबे हैं कहाँ  हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओ में खूब किताबे लिखी जा रही है लेकिन वे सिर्फ ललितसाहित्य की श्रेणी में आती है उपन्यास, कहानी, कविता, समीक्षा, थोडे बहुत संस्मरण, कही कोई देश वर्णन इसके आगे हम कहाँ गये है  भौतिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, मनोविज्ञान, खेती, इलेक्ट्रानिकी, फोटोग्राफी, सँटेलाईटस, कम्प्यूटर - कोई भी विषय उठाकर गौर किजिये कि इन विष्यो पर पढने लायक कितनी किताबें हमारी भाषाओ में है पाठय पुस्तको को छोडो तो शायद कोई भी नही और पाठयपुस्तक भी हमारी जरूरतो के मुकाबले मे बहुत कम। हिन्दी के अखबारो मे पुस्तक समीक्षा पर नजर डालिये। या हिन्दी छापने  वाले प्रकाशन सूची देख डालिये। चाहे पिछले तीन वर्षो का प्रकाशन पढ जाइये या पिछले  तीस वर्षो का लेकिन आपकी जिज्ञासा को संतुष्ट कर पानेवाली बात नही मिलेगी। यही हाल मराठी का है, गुजराती का है, बंगाली का है, और संभवतः हर भारतीय भाषा का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि हम इस भ्रम में हैं कि भाषा के फलने - फूलने का अर्थ है ललित साहित्य की बहुतायत, तो यह निःसंदेह एक निराशाजनक परिस्थिति है' जब तक किसी भाषा में हर एक विषय पर वाइमय नही तैयार होता तब तक वह भाषा पनप नही सकती, जी नही सकती। जिस संस्कृत भाषा ने हमारे देश में प्राचीन काल में कम से कम चार हजार वर्षो तक अपना प्रभाव कायम रखा, उसके साहित्य में प्रायः हर विषय पर कुछ ना कुछ लिखा गया है। न्यायशास्त्र, दशर्नशास्त्र, युध्दशास्त्र, आयुर्वेद, कृषि सिंचाई आदि कई विषयो में साहित्य - रचना हुई। अन्ततः संस्कृत भाषा का हास तब आरंभ हुआ जब उसकी साहित्य रचना केवल ललित साहित्य तक सीमित रह गई। बोलचाल की नई भाषाएँ पैदा हुई। उनका मूल ﾋाोत फिर भी संस्कृत ही थी। अतः वह माना जा सकता है कि जब तक ये भाषाएं जीवित हैं, संस्कृत भाषा पूर्णतः लुप्त नहीं होंगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन  इन भाषाओं की क्या हालत है शास्त्र साहित्य की कमी वहां भी है। और इस अभाव का नतीजा यह है कि किसी ज्ञान - पिपासु के लिए अंग्रेजी की शरण आवश्यक हो गयी है। यदि शास्त्र विषयों की किताबों की संख्या गिनी जाय तो पूरे भारत के भारतीय लेखक मिलकर जितनी पुस्तकें लिखतें हैं, उसकी कई गुनी अधिक किताबें भारतीय लेखक अंग्रेजी में लिखते हैं और जो अन्य देशीय लेखक अंग्रेजी में लिखते हों  उनकी तो गिनती करना या तुलना करना बेकार है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि हमें राष्ट्र भाषा को बचाना है तो साथ ही अन्य भाषाओं को बचाना है तो साहित्य निर्मिती का बडा अभियान चलाना होगा ताकि हर तरह के भाषाओं में कई किताबें उपलब्ध हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर सवाल केवल किताबें लिखने का नहीं हैं। यह किताबें रोचक होना भी आवश्यक है। मुझे महसूस होता है कि हमारे साहित्यकार, लेखक, या टीवी के प्रोग्राम निदेशक यह नहीं समझ पाते हैं कि जो बात या लेखन का जो ढंग एक प्रौढ व्यक्ति के लिए रोचक सिद्ध होगा, वहीं ढंग एक छोटे बच्चे के लिए नहीं अपनाया जा सकता और वही ढंग एक किशोरवयीन के लिए भी नहीं अपनाया जा सकता। अपने लेखकों के उदासीनता तब और भी अखरती है जब अंग्रेजी लाइब्रेरी में उनकी किताबों से सामना हो जाता है। दस वर्ष से छोटे बच्चों का सेक्सन मैंने एक विदेशी लाइब्रेरी में देखा। परिकथाएं, करीब पचास भाषाओं की प्रचलित लोककथाओं के संग्रह, फोटोग्राफी, संसार के प्रायः देश का भूगोल और इतिहास, आर्कियोलोजी सिविलाइजेशन्स कैसे बनते और लुप्त होते हैं, उन्हें कैसे खोजा जाता है, उनका स्थल काल कैसे तय किया जाता है इत्यादि। संसार के अच्छे म्युजियम्स, जादूगरी, माडल, हवाई जहाज बनाना और उङाना, कैलकुलस, बडे बडे वैज्ञानिकों की जीवनी और उनके प्रयोग और सिद्धांत, अंतरिक्ष उडान, गार्डनिंग, लान ग्रासेस - गरज की आप किसी भी विषय पर वहां किताब देख सकते हैं। कई विषय जो मुझे नीरस लगते थे, मैंने उस सेक्सन की किताबों से सीखे उन्ही में से एक पुस्तक पढकर मेरा बारह वर्षीय लडका मुझे समझाने लगा कि इन्पलेशन क्या होता है और उसके ''सोशल कान्सिक्वेन्सेस'' क्या होते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तबसे मैं अननी मान्यता के विषय मे और भी अघिक कायल हो गई हूँ कि यदि हमें राष्ट्रभाषा और अननी अन्य भाषाँए बचाना है तो यह एकसूत्री अभियान चलाना पडेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य निर्मिती का साहित्य निमार्ण में भी खास कर बान साहित्य और किशोर साहित्य लिखने का काम अलग तौर पर करना पडेगा। तीसरा ध्यान रखने वाला क्षेत्र है कम्प्युटरो का आज चूँकि हर प्रोगाँम अग्रेजी भाषा में और उन्ही की लिपी में लिखे जाते है, संसार के अन्य भाषाविद भी घबराने लगे है कि कही अंग्रेजी के आगे उनकी भाषाएँ लुप्त न हो जाये। किसी दिन हमें इस समस्या को भी सुलझाना पडेगा। लेकिन हमारा पहला काम तो पूरा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता :-&lt;br /&gt;लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;भाई बंगला&lt;br /&gt;५० लोकमान्य काँलनी, पौड रोड,&lt;br /&gt;पुणे-४११ ०२९&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-1197011871550659203?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/1197011871550659203/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=1197011871550659203' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1197011871550659203'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1197011871550659203'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/11.html' title='11 राष्ट्रभाषा बचाने का एकसूत्री कार्यक्रम'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-1967007025133013891</id><published>2010-07-15T07:56:00.000-07:00</published><updated>2010-07-15T07:58:27.040-07:00</updated><title type='text'>07 भण्डाफोड से उजागर गलतियाँ</title><content type='html'>भण्डाफोड से उजागर गलतियाँ&lt;br /&gt;          &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आज जब देश के सारे पत्रो में यही समाचार उछाला जा रहा है, कि क्या श्री रावने हर्षद मेहता से एक करोड रुपये लिये, या कैसे लिये या नही लिये, तो आईये जरा उन गलतियो को गिनने का प्रयास भी करें, जो इस काण्ड में श्री राव ने की हैं, और हमने की हैं। पहले कुछ देर हम या मानकर चलते हैं कि अपने अफेडेविट में एक करोड की घटना के विषय में हर्षद मेहता ने जो कुछ कहा हैं, वह सारा सच है। बाद में दूसरी चर्चा हम यह मानकर करेंगें कि हर्षद ने गलत ब्यौरा दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; श्री राव की पहली गलती है चुनाव लडने के लिये इतना बडा बजेट बनाने की। माना कि आज चुनाव लडने के लिये हर किसी को पैसे की जुगत भिडानी पडती हैं, माना कि अमरीका जैसे प्रगत और जागरुक देश के चुनावी उम्मीदवार भी इससे नही बच पाये है, फिर भी देश के कानून के मुताबिक और देश के लिये आवश्यक स्वच्छ प्रशासन को नजर मे रखते हुए यह कहना पडेगा कि जो भी चुनावी उम्मीदवार चुनाव लडने के लिए इतनी बडी रकम लागत पर लगाने बात को स्वीकार करता है, उससे आप भ्रष्ट प्रशासन की ही अपेक्षा कर सकते है, स्वच्छ प्रशासन की नही। और हम सारे बुध्दिजीवी जो हर चुनाव में बढोतरी होने वाली चुनावी लागत को देख रहे है, और स्वीकार कर रहे हैं कि, 'हाँ आखिर उम्मीदवार भी बिचारा क्या करें?' वो हम सारे भी उस भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी और दुष्परिणामों को ढो रहें हैं और ढोते रहेंगे। फिर भी हममें और उम्मीदवार में एक फर्क अवश्य रहेगा। हमनें जो गलती हताशा में और अकर्मण्यता के कारण स्वीकार की है और जिसका दुष्परिणाम भी हमें ही भुगतना है, वह गलती चुनावी उम्मीदवार अपनी मर्जी से करता है, और उस धन व सत्ता के लिये करता है जो कई बार उसे मिल भी जाते हैं। इसे करने में जो बेईमानी हैं, वह उम्मीदवार की ही हैं। और यदि सौ उम्मीदवार यह गलती करते हैं और नही पकडे जाते, तो इससे उस एक उम्मीदवार की गलती नही छिप जाती जो पकडा जाये। उसकी और बाकी न पकडे जाने वाले उम्मीदवारों की गलती के प्रति यदि हम और आप आवाज नही उठाते तो इसका अर्थ है कि हमें वह दुर्भाग्य और दुरवस्था मंजूर है, जिसे हम अपनी इस अकर्मण्यता के द्वारा आमंत्रण दे रहे है। अगर श्री राव ने  भ्रष्ट आचरण की गलती की है, तो हमने भी गलती है अकर्मण्यता की। और हमारी गलती उनकी गलती से कई गुना अधिक गंभीर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अगर हम मान लें कि हर्षद मेहता ने जो कुछ कहा है, वह सच कहा है, तो कई और गलतियां उजागर हो जाती हैं। एक खतरनाक गलती सुरक्षा से संबंधित है। अगर हर्षद का कहना सच है तो यह मानना पडेगा कि, हर्षद जिन सुटकेसों को लेकर श्री राव से मिलने गया उन सुटकेसों की जाँच किसी भी सुरक्षाकर्मी ने नही की। साथ ही हर्षद का यह कहना है कि, उसने राव के साथ और श्री खांडेकर के साथ हुए वार्तालाप को टेप भी किया है और टेप भी उसके पास उपलब्ध है। प्रश्न यह उठता है की सुरक्षाकर्मियों ने उसे इस प्रकार टेपरेकॉर्डर अंदर किस प्रकार ले जाने दिया। अगर उसका कहना सही है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं की सुरक्षाकर्मियों का काम कितना ढीला पड गया है या पड सकता है। भविष्य में कोई भी धनी व्यक्ति पैसे भरा सूटकेस देने के बहाने रिवॉल्वर ले आ सकता है और कुछ भी हो सकता है।&lt;br /&gt;कई लेखकों के विश्लेषण में यह तर्क आया कि जब हर्षद ने श्री राव को पैसे दिये उस समय बैंक &lt;br /&gt;के प्रतिभूतियों के घोटाले नहीं शुरु हुए थे। इसलिये यह मानना गलत है कि इस प्रतिभूति के घोटाले के लेखक या कर्ताधर्ता भी श्री राव ही हैं। या यह मानना भी गलत है कि हर्षद मेहता ने यह पैसे राव को उन प्रतिभूति घोटालों को ठंडा करने के लिये दिये थे। लेकिन इस मुद्दे की चर्चा बाद में करेंगे। गौर करने की &lt;br /&gt;बात हैं कि, अगर श्री राव ने हर्षद से एक करोड रुपये लिये या उन्हें बताया गया कि, उन्हें हर्षद से एक करोड रुपये मिलने वाले है, तो उनके दिमाग में सबसे पहले यह प्रश्न उठना चाहिए कि, हर्षद मुझे यह पैसे किस लिये दे रहा हैं? और बदले में मुझसे क्या लेने वाला है। और कितना लेनेवाला है। हर्षद कहता है, और चाहता है कि हम मान लें कि यह महज एक चुनावी डोनेशन था। लेकिन जरा अपने अपने शब्दकोष पल्ट कर देखिए कि ' महज चुनावी डोनेशन ' इन शब्दों का अर्थ क्या निकलता है? इसका अर्थ यह नही है कि उसने यह रुपये उठाए, दे दिये और दामन झटक कर अलग हो गया। वह जानता था और राव भी जानते थे इस एक करोड का मूल्य कई गुना बढा चढा कर ही वसूल किया जाएगा और मान रहा था कि राव को उसमें कोई आपत्त्िा भी नही होगी। यदी राव इसे गलती नही मानते और यदि हम और आप इसे गलत मानते हैं तो इसे सुधारने का उपाय भी हमें ही करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हर्षद का कहना है कि, इसका परिचय बम्बई के दो जगमगाते सितारो के रुप मे कराया गया और तीन मिनिटों में उसने और उसके भाई अश्र्िवन मेहता ने श्री राव को समझाया कि इस देश की एकॉनॉमी को आगे ले जाने का, प्रगति के रास्ते पर, विकास के रास्ते पर ले जाने का वही आसान तरीका हो सकता है, जो वह अपना रहा है या अपनाने वाला है। यदी हम मान लें कि श्री राव ने उन तीन मिनटो की बात को अच्छी तरह से सुन लिया और स्वीकार भी कर लिया, तो यह सबसे बडी गलती मानी जानी चाहिए। बल्कि सच तो यह है कि, भले ही श्री राव ने यह गलती की हो या न की हो पर हम यह गलती कर रहें है, कि हम हर्षद को एक बडा व्यापारी मान रहे हैं, ईमानदार मान रहे हैं और जब वह यह प्रश्न उठाता है की क्या इस देश में उसे अपने मनपसंद रोजगार करने का हक नही है, तो हम भी अपना सिर हिला कर कहते है 'हाँ भाई हाँ, हक तो उसे होना ही चाहिए।' हाँलाकि कुछ अखबारों ने हर्षद के इस ब्यान का समर्थन नही किया है, फिर भी ऐसा लगता है कि सामान्य आदमी की सहानुभूति इस प्रश्न को सुनने के बाद हर्षद के साथ हो गई है। जब देश में करोड से अधिक बेरोजगार पडे हुए है, और ३० - ४० करोड से अधिक लोग पर्याप्त काम न होने से आधे पेट जिंदगी गुजार रहे है तो जो भी आदमी रोजगार के हक की दुहाई देगा, जनता उसके साथ साहनुभूति दिखाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसलिए इस बात की जाँच परख करना आवश्यक हो जाता है की, जिसे हर्षद अपना व्यापार, अपना पेट पालने का धंधा कहता है। वह क्या इस वर्णन के पात्र है। इसके लिए हमें यह बडे साफ गोई के साथ समझना पडेगा कि, व्यापार या रोजगार ऐसी चीज है, ऐसी बात है जो पूर्णतया आपकी उत्पादन क्षमता पर निर्भर करती है। अगर आप किसी चीज की पैदावार नही कर रहे है, या अगर आपका व्यापार किसी बात के पैदावार को बढावा देने के लिये नही है तो इसे एक इमानदार व्यापार या इमानदार रोजगार नही कहा जा सकता। बल्कि इसे रोजगार ही नही कहा जा सकता। यह सरासर लूट है, डकैती है और हर्षद इसे कर रहा है और सवाल हम से पूछ रहा है, इस देश की जनता से पूछ रहा है कि क्या इस देश में उसे रोटी का हक नही है? क्या इस देश में उसे रोजगार करने का हक नही है? भई, रोजगार करने का हक तो था, अगर तुम्हें रोजगार करना होता। हर सामान्य आदमी इस बात को जानता है कि, इस देश में ऐसा कोई रोजगार, ऐसा कोई व्यापार, ऐसा कोई पैदावार, ऐसी कोई इंडस्ट्री, अभी तक नही पैदा हुई जिसमें एक आदमी चार या छः वर्षों में ही इतने पैसे कमा ले कि उसके पास बैंक के सेव्हिंग अकाउंट में इकट्ठे निकालने के लिये ८० लाख रुपये से भी ज्यादा रुपये पडे रहते है। जरा सोचिए, एक परफ तो सामान्य आदमी है जो अगर बैंक में १००० रुपये जमा हो जाते है तो सोचता है कि, चलो इसकी क़क़्ङ बना ली जाए। दूसरी तरफ हर्षद मेहता जैसा आदमी है जो अपने आदमी को बैंक में दो चैको के साथ भेजता है। इसमें से एक चैक है ८० लाख का और दूसरा चैक है कोरा कि चाहे उसमे जो रकम लिखवा लो।  इसके अलावा हर्षद के घर में १५ लाख रुपये ऐसे ही फालतू पडे थे। और वो भी वह दिल्ली ले जा सका। इसके अलावा उसके उसके दूसरे बैंक के &lt;br /&gt;सेव्हिंग में पैसे यूही पडे हुये थे और उसमें से उसने तीस लाख रुपये निकाले। फिर वह जाता है दिल्ली वहाँ भी यूही सेव्हिंग बैंक में उसके पैसे पडे हुये हैं, वहाँ से वह निकालता है ४५ लाख। इन आकडो को देखिए और बताइये अपने दिमाग पर हाथ रखकर और दिल पर हाथ रखकर कि इस देश में ऐसा कौन सा इमानदार व्यापार है, जो आप और हम जानते है, जिसको करने से इतने पैसे मिलते हो कि, आप अपने घर में इतनी कैश इकठ्ठी रखे और आप अपनी बैंक कि सेव्हिंग अकाउंट में इतनी कैश इकट्ठी पडी रहने दें। अगर हर्षद का यह कहना सच है कि, वह श्री नरसिंह राव से मिला, उसने श्री राव को एक करोड रुपये दिये और श्री नरसिंह राव ने उसकी बाते आंनदपूर्वक सुन ली और उससे कहा कि, आप आइए, और दोबारा मुलाकात किजिए। हम अपने अर्थमंत्री से आपको मिलवायेंगे इत्यादि तो इस पूरे काण्ड में मेरी निगाह में श्री राव की सबसे बडी गलती यह नही है की, उन्होनें एक करोड रुपये लिये। यह भी नही है कि उन्होने हर्षद जैसे आदमी को मिलने के लिए मौका दिया। उनकी सबसे बडी गलती यह थी, कि जब हर्षद ने उनसे कहा की कैसे कम ही समय में पैसे बनाये जाते है तो उसी समय श्री राव की समझ में आना चाहिए था कि यह इमानदारी के रास्ते की बात नही कर रहा । अगर हमारे देश का प्रधानमंत्री इस बात को नही समझ सकता है तो हमारी राजनिति, हमारी अर्थव्यवस्था और हमारा समाज अवश्यमेव डूबेगा। हम आज श्री रीव के प्रति सहानुभूति रखे या न रखे यह बात अलाहिदा है। लेकिन हमें यह अच्छी तरह से समझना चाहिए कि इस पूरे काण्ड में अगर उनसे कई गलतियां हुई है तो सबसे बडी गलती कहा हुई । अगर इस गलती को हम गलती नही कहेंगे तो हम भी अपनी जिम्मेदारी से नही बच सकते और यदि कुछ आशा इस देश के बचने की है तो वह इसी बात पर निर्भर करती हैं, कि हम में से कितने व्यक्ति इस गलती को गलती कहकर पहचान सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          दिनांक : २९-०६-२००५&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता :&lt;br /&gt;लीना मेंहेंदले,&lt;br /&gt;'भाई' बंगला,&lt;br /&gt;५०, लोकमान्य नगर,&lt;br /&gt;पौड रोड, कोथरुड,&lt;br /&gt;पुणे ४११०३८.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-1967007025133013891?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/1967007025133013891/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=1967007025133013891' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1967007025133013891'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1967007025133013891'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/07.html' title='07 भण्डाफोड से उजागर गलतियाँ'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-2555612266214878154</id><published>2010-07-15T06:44:00.000-07:00</published><updated>2010-07-15T07:30:12.117-07:00</updated><title type='text'>12 खैरनार के पक्ष में</title><content type='html'>खैरनार के पक्ष में&lt;br /&gt;-- लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दो-चार महीने पहिले कई लोग श्री खैरनार को आदर की दृष्टि से देखते थे- इसलिये कि यह एक ऐसा अधिकारी था जिसने सरकार की सर्वोच्च कुर्सी को चॅलेंज दे दिया। उन्हे काम सौंपा था कि अतिक्रमणों को तोडो - मुंबई को क्लीन रखो ताकि हम शासकों की जिंदगी सुख चेन से गुजारें। जब तक खैरनार झोपडपट्टियों को तोडते रहे, फूटपाथ से स्टॉलवालों को हटाते रहे, रास्तों पर से मंदिर मस्जिद या कोई भी अन्य बिल्डिंग उठवाते रहे तब तक गरीबों का आक्रोश चाहे उनके सर पर आ पडा हो पर धनिकों का अंगार नही पडा था। और जिन गरीबों का आक्रोश था उन्हें कहीं न कहीं अपनी गलती का एहसास भी था। क्योंकि इसमें कोई दो राय नही है कि उनके अनधिकार व्यवसाय या झोपडपट्टी को रोककर उनके लिए किसी अलग तरह के प्लॉनिंग की जरूरत है।&lt;br /&gt;  लेकिन जब खैरनार ने अपना रूख उन धनिकों की ओर उठाया जो पैसे के बल पर कुर्सी और कुर्सीधारियों को खरीद सकते हैं- और बदले में न केवल धन बल्कि वोट, मसलमॅन, भूखंड, फ्लॅट, और आर डी एक्स भी दे सकते हैं तो सारे कुर्सीधारी चौंक गये। खैरनार को रोकने के प्रयास व्यर्थ रहे क्योंकि जब उन्हें अतिक्रमण विभाग से हटा दिया गया तो उन्होंने बोलना शुरू कर दिया। जब उन्हें सस्पेंड किया गया तो उन्होंने और अधिक बोलना शुरू कर दिया। इस बीच उन्हे मूर्ख और पागल कहा गया और न्यायालय के सामने खींचने की बात भी हुई लेकिन उन्हें चुप नही किया जा सका। वह हिम्मत दिखाते रहे और लोगों को बताते रहे कि उन्हें किसलिये रोका जा रहा है, किसके कहने से रोका जा रहा है, और इस रोकने का अर्थ केवल एक ही है- भ्रष्टाचार।&lt;br /&gt; खैरनार के प्रति लोगों का आदर बढा वह उनकी इस हिम्मत के कारण। कुर्सी के भ्रष्टाचार का नतीजा तो सभी देख रहे थे। इसमें किसी को कोई संदेह नही था कि आज कानून और सुव्यवस्था की जो बिगडी हुई हालत है वह कुर्सी के भ्रष्टाचार के ही कारण है। लेकिन हमारे यहाँ महाभारत काल से ही एक आदर्श चला आ रहा है कि बेहोश अभिमन्यु के सिर पर लात मार कर उसका सिर काटने वाले जयद्रथ को सामने देखने पर भी वचनबद्ध अर्जुन ने उस पर शस्त्र नही उठाया- बेटे के अपमान और मृत्यु का दुख पीकर भी अर्जुन का धनुष नही उठा। आखिर कृष्ण को सूर्य पर से अपना चक्र हटाना पडा- तो देखो अर्जुन- वह है सूर्य और वह है जयद्रथ। यानि तुम्हारे वचन के अनुसार दिन अभी डूबा नही है- अब चलाओ अपना तीर! इसलिये जब खैरनार बोलने लगे तो लोगों का उत्साह उमड पडा अब यह हिम्मतवाला सबकी पोल खोलकर हमें से छुटकारा दिलायेगा।&lt;br /&gt; वैसे पिछले पंद्रह दिनों में खैरनार को मिलने वाला जनता का सपोर्ट या सम्मान घटा नही है लेकिन अब उसमें एक दुर्भाग्यपूण मोड आ गया है। कई 'इंटलेक्चुअल्स्' कहने लगे हैं कि खैरनार जो आरोप कर रहे हैं उसका सबूत भी पेश करें। उधर खैरनार ने यह भूमिका अपनाई है कि सबूत जुटान मेरा काम नही है। इसी बात पर इंटलेक्चुअल्स भरमा गये हैं- खैरनार की बुराई करने की या कम से कम उनकी तरु एक प्रश्नचिन्ह लगाने की एक होड अब आरंभ हो गई है और इस सिद्धान्त की दुहाई दी जा रही है कि जब &lt;br /&gt;तक न्यायालय के सम्मुख सारे सबूत पेश करके भ्रष्टाचार को सिद्ध नही किया जा सकता तब तक खैरनार को सही नही मानना चाहिये न ही उन्हें कोई बढावा देना चाहिये।&lt;br /&gt; यह तर्क एक ऐसी गुगली है, ऐसी भूलभलैया है जिससे हमें बिल्कुल बचकर निकलना होगा। खैरनार की भूमिका को इस हद तक अवश्य स्वीकार करना होगा कि सबूत जुटाना उनका काम नही है। आज जो लोग इसे स्वीकार नही करते वह ऐसी गलती कर रहे हैं जिसकी भयानक सजा हम सभी को भुगतनी पडेगी। उधर यह सिद्धान्त भी शत-प्रतिशत खरा है कि जिस व्यक्ति के विरूद्ध आरोप सिद्ध न हो। उसे सजा नही मिलनी चाहिये और यही वह भूलभुलैया है जिसमें हमारे इंटलैक्युअल्स भरमा गये हैं।&lt;br /&gt; गौर कीजिये कि एक कुर्सी है जो सारे में शासन व्यवस्था की प्रमुख है- और एक है अदना सा पोलिस का सिपाही, या इंस्पेक्टर, या डी सी पी, या डी.जी, या एक म्युनिसिपल कर्मचारी, या एक मंत्रालयीन डेप्युरी सेक्रटरी या- पर अपनी अपनी जगह पर सारे ही अदने- क्योंकि ये सेक्रेटरी- सारे उस कुर्सी की मेहेरबान नजर के कारण अपनी कुर्सी पर टिके हुए हैं, अपनी मनचाही पोस्ट पा सकते हैं, अपने मनचाहे सम्मान, सरकारी कोटे से प्लॉट या भूखंड, विदेश दौरा भी पा सकते हैं और कुर्सी के विरूद्ध कुछ बोलें तो ता उम्र देश निकाला (नौकरशाही के अर्थ मे- यानी की अवांछित पोस्टिंग, सारे सम्मान और &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाइमलाईटों से बाहर जिंदगी गुजारने की सजा, पैसा खाने हों तो जहॉ न खा सकें या कम खा सकें ऐसी पोस्टिंग इत्यादिऋ। सबूत जुटाने की प्रभुत्ता-यानी ऍथॉरिटी- इन अदने लोगों के कांपते हाथों को बहाल है। इस काम को जिम्मेदारी या जोखम न समझे- यह वह सत्ता है- वह प्रभुत्ता है जो एक मदमस्त हाथी से भी अधिक मदमस्त कर सकती है- लेकिन आपको तभी तक दी जा सकती है जब तक आप की ऑखें, सर और मस्तिष्क उस कुर्सी की शरणागत हैं। जब सबूत इनके हाथ आ जाय तो उसे नष्ट करने की ताकत भी उन हाथों को है। या फिर उस सबूत का क्या अर्थ लगाया जाय या उसे कोर्ट में किस तरह पेश किया जाय यह तय करने की प्रभुत्ता भी इन्हीं हाथों को है।&lt;br /&gt; जो इंटेलेक्चुअल्स् खैरनार से सबूत जुटाने की माँग करते हैं क्या वे उन तमाम केसों की खबरों को भूल गये जिनमें स्वयं कोर्ट ने पुलिस पर केस को ठीक पेश न करने के लिये तीव्र आक्षेप उठाये। क्या हम अंतुले की केस को भूल गये जब खुद जस्टिस लेंटिन ने दुबारा फाईल देखी तो पाया कि पहली बार के उनके देखे कई कागज दूसरी बार फाईल में नही थे। क्या हम बोफोर्स की केस को भूल गये जब नोबेल कंपनी के कई अधिकारी दिल्ली में गवाही देने के लिए आये- और उनके देश की नैतिकता के मुताबिक वे यहाँ भी कोई के सामने यदि शपथपूर्वक बयान देते तो सच ही बताते लेकिन शंकरानंद की जेपीसी ने स्वयं सुझाव दिया कि उन्हें बयान देने की कोई आवश्यकता नही? क्या हम जलगांव नगरपालिका की केस भूल गये जिसे सरकार भी। लेकिन आज वे अपने अपने छोटे से दायरे में कैद हैं- और अपनी अपनी जगह पर अकेले हैं। उन्हें सपोर्ट चाहिये। सपोर्ट ऐसी किसी सिस्टम से नही आ सकता जिसका अस्तित्व उस बडी कुर्सी के इशारों पर निर्भर है। इसके लिये चाहिये कि इन्वेस्टिगेटिंग सिस्टम में जनसामान्य को प्रवेश हो न्यायदान का एक सिद्धान्त है कि जस्टिस शुड नॉट ओनली बी डन बट शुड ऑल्ले ऍपीयर टु हॅव बीन डन, अर्थात केवल न्याय कर देना काफी नही है- लोगों को भी लगना चाहिये कि वाकई पूरी सजगता और ईमानदारी के साथ न्याय किया गया है। यही सिद्धान्त इन्व्हेस्टिगेटिंग एजन्सी पर भी लागू हैं। आज हमारी एजन्सी कुर्सी के चरणों में झुकी हुई है, सबूत मिटा सकती है, झूठे सबूत जुटा सकती है, सबूतों को तोड मरोड सकती है, जनसामान्य से कह सकती है कि यह कॉन्फिडेन्शियल डॉक्यूमेंट है- और यदि कोई उन्हें सरकारी फाइलों से लेते हुए पकडा जाय तो उसे ऑफिशियल सीक्रट ऍक्ट के तहत जेल भेज सकती है। यह जानकर भी, और अपने आपको बुद्धिधारी कहलाते हुए भी जब हम खैरनार से सबूत जुटाने की माँग &lt;br /&gt;करते हैं तो हम किसे धोखा दे रहे हैं, किससे धोखा खा रहे हैं और किस कीमत पर? क्या हम भूल गये कि जब भाई ठाकुर को कलकत्ता एअर पोर्ट पर पुलिस ने गिरफ्तार किया तो मुंबई पोलिस के बडे अधिकारियों ने यह कहकर उसे छुडवा दिया और नेपाल जाने दिया कि उसके विरूद्ध कोई केस नही है। क्या हम भूल गये कि जब पप्पू कलानी का सीमा रिझोर्ट तोडा गया और उसमें पोलिस और मंत्रियों की लीला दिखाने वाले कॅसेट मिले तो एक डी सी पी ने पुलिस इंस्पेक्टर को धमकाकर वे कॅसेट छीन लिये और बाद में यह कह कर लौटा दिये कि उनके किसी के अगेन्स्ट कुछ नही है। क्या हम वाकई विश्र्वास कर लें कि उस डी सी पी के लिये कॅसेट बदलना, इरेज करना या टॅम्पर करना असंभव था। &lt;br /&gt; जो खैरनार से सबूत जुटाने की माँग करते हैं वे गलती कर रहे हैं। हमारी माँग यह होनी चाहिये कि वर्तमान कालीन पुलिस इन्वेस्टिगेस्टिंग की व्यवस्था बदली जाय। इस व्यवस्था में ऐसे बदलाव किये जायें, मॉनिटरिंग की ऐसी व्यवस्था हो, पारदर्शिता ऐसी हो कि यह संदेह नही बना रहे कि क्या पोलिस ने कोई टेंपरिंग किया? हमें नही भूलना चाहिये कि ईमानदार, कर्तव्य के प्रति जागरूक और सजग अधिकारी पुलिस में भी हैं और मंत्रालय में यह कह कर नही बर्खास्त कर रही कि उसे नोटिस नही दी गई- क्या हम भाई ठाकुर और पप्पू कलानी को भूल गये जो इसलिये टाडा से छूट ये कि सरकार ने १८० दिनों के अंदर अंदर उन्हें चार्जशीट नही किया। सरकारी नौकरशाही की भूलभुलैया में हर आदमी यदि फाईल को एक दिन रोक ले तो भी यह गॅरंटी हो जाती कि १८० दिनों की मियाद पूरी हो जायगी और अपना आदमी टाडा से बच निकलेगा। ऐसे कई टाडा वासियों को सरकार की इसी इन्वेस्टिगेटिंग एजन्सी ने बचाया है- कभी अपनी जेन्युइन अकार्यक्षमता के कारण तो कभी अकार्यक्षमता की आड में गॅरंटी से कह पायेगा कि भाई ठाकुर पुलिस की अकार्यक्षमता के कारण टाडा से बच निकला या कुर्सी के इशारों पर? जब ऐसा संदेह उत्पन्न होता है तो हम वही ऑप्शन अपनाते हैं जहाँ अपने अधिकारी को बलि चढाना संभव है ताकि कुर्सी बच जाय।&lt;br /&gt;..............................................................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-2555612266214878154?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/2555612266214878154/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=2555612266214878154' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/2555612266214878154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/2555612266214878154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/blog-post_4062.html' title='12 खैरनार के पक्ष में'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-1972225825291571712</id><published>2010-07-15T06:24:00.000-07:00</published><updated>2010-08-03T14:44:15.003-07:00</updated><title type='text'>08 भारतीय नौकरशाही की पुनसंरचना -- Restructuring Indian Bureaucracy</title><content type='html'>भारतीय नौकरशाही की पुनसंरचना&lt;br /&gt;(1st prize winner article in the IIPA Essay Competition for 199????)&lt;br /&gt;           मुद्दा उठा है भारतीय नौकरशाही की पुन संरचना का, तो पहले हम इस मान्यता को स्वीकार करके चलेंगें कि किसी देश के प्रशासन में, अर्थात् देश की समस्याओं का निराकरण करते हुए देश को विकास और प्रगति के पथ पर ले जाने में नौकरशाही का अहम् स्थान है।  फिर आज की हालत में तीन प्रकार के प्रश्नों की जाँच बड़ी आवश्यक हो जाती है, आज से अगले पचास वर्षों में भारत को क्या करना है, उसके लिए किस प्रकार की नौकरशाही की आवश्यकता है,क्या आज वह कैसी नहीं है?  दूसरा प्रश्न यह है कि नौकरशाही का आज का ढाँचा किस प्रकार का है? और इसकी नई संरचना किस प्रकार होनी चाहिए?  इस संरचना के लिए हमें किस प्रकार के नौकरशाह चाहिए?  उनमें क्या-क्या गुण हों?  तीसरा मुद्दा उठेगा कि वह नई संरचना किस प्रकार प्रत्यक्ष में लाई जाये, इसके लिये कितना समय उपलब्ध है?  कौन इसके लिए समर्थ है, किसे इसके लिए प्रयास करना होगा, इत्यादि। अर्थात् Why What and How?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            किसी जमाने में भारतीय नौकरशाही को स्टील फ्रेम कहा जाता था।  आज कई लोग मानते हैं कि यह बदलकर अल्युमिनियम फ्रेम हो गई है।  सतह पर खूब चमकीली, देखनेपर यही भ्रम पैदा करेगी स्टील फ्रेम ही है।  लेकिन जब जहाँ झुकना या मोड़ना चाहो, वैसी ही मुड़ेगी और वैसी ही झुकेगी।  यह मैलीएबल हो गई है।  यानी पीट पीट कर इसे जैसा चाहो आकार दे सकते हैं.., डक्टाइल भी है, खींचकर इसकी तार बनाई सकती है। जरा सी समस्या आये तो इसकी spluttering शुरु हो जाती है और सतह को कुरदने पर अंदर कोई दम-खम नहीं हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           लेकिन अब समस्या यह नहीं है कि कैसे हम वापस स्टील फ्रेम को कायम करें।  हमें समझना होगा कि यह असंभव है और अवांछित भी है, वैसे ही जैसे घड़ी की सुई को उल्टा घुमाकर पुराने समय को छूने का प्रयास करना।  समय बदला।  समय के साथ-साथ हमारी नौकरशाही बदली।  उसके रीति-रिवाज बदले, उसकी मान्यताएँ बदलीं, उसके काम करने का ढंग बदला। यह तो होना ही था।  जब हो चुका तब हम जागे और कहने लगे 'अरे, यह जो सब कुछ हुआ यह तो सिस्टम फेल्युअर है।'  क्यों ऐसी नौबत आई?  इसलिये कि सिस्टम कोई स्थिर व्यवस्था नही है;  इसमें प्रवाह है, गति है और गति का जो डायनॉमिक इक्विलिब्रियम होता है उसे बड़ी सूझ बूझ से बनाये रखना पड़ता है।  हमारी नौकरशाही भी एक सिस्टम है।  हम इसे स्टेटिक, स्थिर मान कर चल रहे थे।  हमने विचारपूर्वक आवश्यक परिवर्तन इसमें नहीं किये।  इसलिये जो परिवर्तन होते गये उन्होंने हमें सिस्टेमिक फेल्युअर के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया।  सिस्टम का हर पल पुनर्मूल्यांकन करना पड़ता है, उसे नित नये रुप में ढालना पड़ता है और यह प्रयास करना पड़ता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति जो इस बदलाव के सम्पर्क में आनेवाला है, उसका प्रबोधन हो, प्रशिक्षण हो और वह इस बदलाव को समझे, माने, और  इसमे सहयोग दे।  हमारी नौकरशाही बिखर गई क्योंकि यह सतर्कता हम नहीं रख पाये - न तो नौकरशाही के बड़े अधिकार, न देश के नेतागण, न अकेडेमिशिअन्स और न समाज।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसे हम एक छोटे उदाहरण द्वारा यूँ समझें - कि मंत्रालय की लिफ्ट के सामने क्यू में सब लोग खड़े होते थे - यह भी एक सिस्टम थी - किसी दिन एक आदमी ने कह दिया - भई मिनिस्टर को आगे जाने दो, वह जल्दी पहुँच गये अपने कमरे में, तो हमारे कुछ काम ही निबटा देंगे।  सो मंत्री जी को क्यू से हटकर आगे भेजने का सिस्टम चल पड़ा।  लेकिन जल्दी ही दो जने ऐसे और निकले जो मंत्री जी के काम में हाथ बटाने के नाम पर क्यू से आगे निकलने लगे।  दो से चार हुए, चार से आठ।  बस हो गया सिस्टम फेल्युअर। लेकिन यदि मंत्रीजीको क्यू में ही रखनेका नियम रहता तो क्यू सनस्टम अधिक कारगर हो जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          एक दूसरा उदाहरण भी है।  सागरी तट पर स्मगलिंग रोकने के लिए कस्टम विभाग की नियुक्ति हुई।  विभाग में कभी किसी ने छिपकर या धीमी आवाज में कह दिया - कि यदि मैंने थोड़ी घूस ले ली तो क्या हुआ?  फिर औरों ने भी घूस में अपना हाथ बंटाया।  एक दिन बंबई में आर्.डी.एक्स पहुँच गया और उसने तबाही बचाई।  अब थापा जैसा सिनीयर अफसर कहता है कि हमने चाँदी समझ रखी थी, और चूँकि चाँदी की स्मगलिंग में आजकल ज़्यादा लाभ है इसलिए ज़्यादा रेट से घूस मांगी।  इसी पर चिढ़ कर मुझे पकड़वाया गया।  अब पुलिस और कस्टम वाले कहते हैं कि छि छि देखो कैसा सिस्टम फेल्युअर आ गया कि स्मगलर खुद तो ज़्यादा कमाऊ चीज ला रहे हैं (यानी चाँदी) लेकिन हमें ज़्यादा घूस देने को तैयार नहीं।  मेरी निगाह में सबसे बड़ा सिस्टम फेल्युअर यह है कि कस्टम और पुलिस वालों का यह रिमार्क सुनकर नौकरशाही में कोई खलबली नहीं मची है और इस प्रवृत्ती के गंभीर खतरे के प्रति हम सजग या संवेदनशील नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;             उपरी परिच्छेदों के व्यंग को हम न देखें। उन उदाहरणों से हमें यह समझना है कि आज की नौकरशाही की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसकी संवेदनशीलता और सतर्कता दोनों लुप्त हो चुके हैं।  पुनर्रचना किस प्रकारकी हो जहाँ ये दोंनों गुण लाये जा सकें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            हमारे सामने प्रश्न है कि अगले पचास वर्षों में भारत को क्या करना है, इसके लिये किस प्रकार की नौकरशाही चाहिये और क्या आज की नौकरशाही उस प्रकार की नहीं है?  पिछले चालीस पैंतालीस वर्षों में हमनें जब जब प्रश्न पूछा कि एक देश के नाते भारत को आगे क्या करना है तो कुछ ठोस उत्तर सामने आये जैसे - विकास की गति अर्थात् GDP को बढ़ाना, कल-कारखानदारी बढ़ाना, कृषि उत्पादन में स्वावलंबन लाना, अधिक रोजगार निर्माण करना, शिक्षा का समुचित प्रबंध करना, लोकसंख्या वृद्धि को रोकना, गरीबी हटाना, भ्रष्टाचार रोकना, कम्युनल हार्मोनी और राष्ट्रीय एकात्मता बनाये रखना, अंतर्गत सुरक्षा को सुधारना या सँवारना।  आज भी ये मुद्दे कम नहीं हुए हैं।  इनमें से प्रत्येक काम आज भी हमारी लिस्ट पर है।  बल्कि हम तो यह देखते हैं कि चालीस वर्षों पहले इन कामों की जितनी अहमियत रही होगी उससे आज अधिक अहमियत है क्योंकि इसमें से प्रत्येक क्षेत्र में हमारा प्रयास अपरिपूर्ण रहा और समस्या का समाधान नहीं हो सका।  यहाँ हमें सौ फीट नदी तैर कर पार करना है और हमने जी तोड़ कोशिश से नब्बे या निन्यानवे फीट भी पार कर लिय और डूब गये तो परिणाम क्या हुआ?  डूबने के बाद क्या इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि अपनी शक्ति भरसक प्रयास हमने किया?  या कि इस बातसे कि चलो नब्बे फीट तो हम पार कर गये?  असल कसौटी है कि आपने ध्येय पाया या नहीं?  इसका उत्तर यही है कि भारतीय नौकरशाही बार-बार डूबी है  वह भी अकेले नहीं, साथ में कई करोड़ की संपत्ति, मेहनत और सपने लेकर डूबी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           नतीजा यह है कि अगले पचास वर्षों में भारत को वे सब काम भी करने हैं जो पिछले चालीस वर्षों में खतम करने थे।  पर अब उनसे भारी अहमियत के कुछ प्रश्न उत्पन्न हो गये हैं।  जैसे यह प्रश्न कि उपरोक्त ध्येय प्राप्ति के लिये हमारे पास कितना समय बचा है?  यदि उतने समय में हम कुछ हासिल नहीं कर पाये तो क्या यह देश एक सार्वभौम एकसंघ देश के रूप में जीवित रहेगा?  इस ध्येय प्राप्ति के लिये यदि कुछ त्याग करना पड़े तो इसके लिये कौन राजी होगा?  चालीस वर्ष पहले यह प्रश्न नहीं उठा था क्योंकि तब त्याग और सेवा की भावना से जुड़े कई हजारों नेता, कार्यकर्ता और नौकरशाहभी मौजूद थे।  लेकिन आज यह प्रश्न उठेगा।  क्या लोगों को हम आज भी भरोसा दिला सकते हैं कि भारतीय नौकरशाही सच्चे मन से उपरोक्त ध्येय प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हैं?  क्या जनता इस बात पर विश्वास करती है कि देश की नौकरशाही में कमसे कम कुछेक प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो भ्रष्ट नहीं हैं, सक्षम हैं, समर्थ हैं और देश के जनसामान्य की सुख-सुविधा के लिये काम करते हैं?  यदि जनता में यह विश्वास होगा तभी हमें उतना समय मिलेगा कि हम नौकरशाही की पुनः संरचना कर उससे कुछ उपयोगी काम करवा सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;              आज भ्रष्टाचार ने समाज के हर क्षेत्र को छू लिया है।  हमने यह स्वीकार कर लिया है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार है, वह सर्वव्यापी है, राजकीय नेता और नौकरशाह उससे अछूते नहीं हैं बल्कि कई-कई तो इसमें आकण्ठ डूबे हैं।  यदि राजकाजमेंसे भ्रष्टाचार पूरी तरह निकल गया होता तो भी हमें नौकरशाही की पुनर्रचना की आवश्यकता होती क्योंकि आज का ढाँचा हमारे ध्येय प्राप्ति में फिर भी असमर्थ ही होगा- उसकी चर्चा हम थोड़ा रुक कर करेंगे।  और जब हम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भ्रष्टाचार को हटाना या कम करना या आज की लेवल पर रोक कर रखना तत्काल संभव नहीं है तो हमारी कठिनाई बढ़ जाती है।  हम यह नहीं कह सकते हैं कि 'रुको, पहले सारे भ्रष्टाचार को समाप्त करो, फिर नौकरशाही को सुधारेगें'। दूसरी ओर यदि हम ऐसी नौकरशाही चाहते हों जे भ्रष्टाचार को तो जरा भी न छुये, उसके प्रति चुँ तक न करे और फिर भी देश को वे सारे ध्येय प्राप्त करा दे तो यह भी संभव नहीं है।  नौकरशाही की पुनर्रचना इस प्रकार करनी पड़ेगी कि नई पुनर्गठित नौकरशाही भ्रष्टाचार को रोकती रहे और धीर धीर कम करती रहे ताकि अन्य कार्यक्रमों के अच्छे फल समाज तक जल्दी से जल्दी पहुँच सके।  यह अतिरिक्त शक्ति नौकरशाही में लानेका क्या उपाय हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          विचारणीय है कि नौकरशाहीका आजका गठन कैसा है।  इसके चार हिस्सों की अलग अलग जाँच करनी होगी।  एक हिस्सा है डी, सी और बी वर्ग के कर्मचारियों का।  आज का ढाँचा ऐसा है कि ये कर्मचारी नीति-निर्धारण &lt;br /&gt;(policy formulation) के काम में हाथ नहीं बँटाते।  साथ ही implementation की जिम्मेदारी भी इनपर नहीं हैं।  यह दोनों काम ए वर्ग के अधिकारियों के जिम्मे पड़ते हैं।  लेकिन सिस्टम की गतिमानता को बनाये रखनेमें इनका महत्वपूर्ण योगदान है जिसे आजतक अनदेखा गया है।  नई संरचना में इस मुद्दे की विस्तृत चर्चा आगे करेंगे।  ए वर्ग में भी दो हिस्से पड़ते हैं - IAS और non-IAS अर्थात जनरॅलिस्ट और स्पेशॅलिस्ट।  इसिलिये कि जो non-IAS हैं वे अपने-अपने क्षेत्र के कुशल तंत्रज्ञ या यंत्रज्ञ होते हैं जैसे डॉक्टर हों या रॉकेट के विशेषज्ञ हों या बैंक की क्रेडिट पॉलिसी के माहिर हों।  इनकी तुलना में IAS अधिकारी संख्या में अत्यंत कम होते हुए भी उनका पूर्णतया अलग रोल होता है।  उनका अपना कोई एक क्षेत्र नहीं होता, फिर भी एक तरह की सर्वव्यापकता उन्हें सौंपी जाती है।  यह माना जाता है कि स्पेशॅलिस्ट केवल अपने एक दायरेके बारेमें सोचता है, इस तरह के कई दायरे मिलाने हों तो जो ग्रुप बनेगा, उसमें स्पेशॅलिस्ट कुछ नहीं कर सकता।  तो वहाँ ऐसे अफसर की जरुरत होगी जिसने कई समस्याओं को एक साथ देखा है।  इसिलिये IAS अधिकारी के जिलास्तरीय पोस्टींग में ही कई कामों के निपटारे का जिम्मा और अधिकार दोनों उन्हें दिये गये हैं। आजकल बर जिलेके लिये एक संपर्क मंत्री नियुक्त करने का रिवाज भी चल पडा है। निचले स्तर पर यही अधिकार पंचायत समिती अध्यक्ष, सरपंच आदि को दिये गये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           इस नौकरशाही में जो दुर्गुण उतर गये हैं, एक नजर उनपर डालें - इन्हें हम दो भागों में बाँटेंगे - एक ऐसे ऑफिसों के दुर्गुण जो टिपिकली छोटे हैं और जिन्हें केवल प्रोग्राम implementation करना पड़ता है - दूसरे उन ऑफिसों के दुर्गुण जिन्हें पॉलिसी भी बनानी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          पहली श्रेणी के ऑफिसों का सबसे बड़ा दुर्गुण है अविश्वास का।  प्रशासन के लिये हमारे देश में जो नियम और कानून बने हैं, उन्हें पढ़ने पर यह स्पष्ट रुप में देखा जा सकता है कि उन सबका केंद्रीय सूत्र यही है कि अपने निचले अधिकारी पर विश्वास मत करो - सदा उसे अविश्वास की दृष्टि देखो।  यह एक अत्यंत downgrading मानसिकता है जिससे नौकरशाही को उबारना आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           जिस कर्मचारी को हमेशा अविश्वास के वातावरण में काम करना पड़ता है, उसकी मानसिकता ऐसी बन जाती है कि खुद भी अपने आपको विश्वास का अपात्र मानने लगता है।  यहीं से धीरे धीरे उसका आत्मसमान, उसका initiative खतम होने लगता है।  दूसरी और जो कर्मचारी जिम्मेदारी नहीं निभाता, विश्वास का दुरुपयोग करता है, उसे सजा देने की पध्दती और नीति अत्यंत धीमी गती से चलती है।  इस प्रकार निचले तबके के कर्मचारियों में काम करने का, काम को अच्छे ढ़ंग से निबटाने का, या काम की जिम्मेदारी उठाने का motivation खतम हो चुका है। कामचोर या भ्रष्टाचारी को सजा मिलती नही और काम करनेवालों को पुरस्कार और प्रशंसा के बदले अविश्वास से भरपूर नियम मिलते हैं जो उसकी कार्यक्षमता को बांध कर रख देते हैं।  यह एक बात भी बाकी कर्मचारियों को हतोत्साह करने के लिये काफी है।  वरिष्ठ अधिकारी भी ऐसे नियम बनाने का प्रयास करते हैं जो फुलप्रुफ हों।  जिसमें निचला अधिकारी गलती या भ्रष्टाचार न कर सके।  अकसर ऐसे नियमों में पहला नियम होता है कि सारी फाइलें, सारे निर्णय अधिकारी के हाथों ही निपटाई जायें।  यानी उसका काम बढ़ा, डेलीगेशन ऑफ पॉवर की जितनी अच्छाइयाँ हों उनसे ऑफिस वंचित रहा, लोगों के काम में देर लगने लगी और निचले वर्ग में जो अच्छे कर्मचारी थे उन्हें अपनी कार्यप्रणवता बढ़ाने का कोई मौका नहीं मिला। मुझे याद आता है, कि एक जिला कार्यालय में ऐसा नियम बनाया गया कि सारे क्लर्क एक जगह बैठे, उसी कमरे में सुपरवाइजर भी बैठे ताकि बाहर से आनेवाला व्यक्ति केवल सुपरवाइजर से मिले ताकि कोई क्लर्क भ्रष्टाचार नहीं कर सके।  बहुत वाहवाही हुई।  उस सुपरवाइजर को बाद में यह कहते सुना गया कि लोगों से उसका जितना समय बरबाद हुआ उसकी तुलना में पुरानी ही सिस्टम अच्छी थी।  क्योंकि इस नई सिस्टम में भी क्लर्क का मोटिवेशन तो हुआ नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ऐसा अविश्वास और उससे उपजी अकर्मण्यता धीरे धीरे उपर तक पहुँचने लगती है।  हर व्यक्ति डेलिगेशन ऑफ पॉवर से कतराता है।  लेकिन जो स्मार्ट व्यक्ति है और जिसे कामचोरी करनी है या भ्रष्टाचार, वह तो उसे करने के सौ तरीके ढूँढ ही लेगा क्योंकि सजा उसे होनी नहीं है।  आज सरकारी नौकरी में बी, सी और डी वर्ग में आनेवाला कर्मचारी आने से पहले ही सोचता है कि उसे उपरी आमदनी कितनी मिलेगी, काम कितना टाला जा सकता है, घूमने का मौका कितना है, और देर से ऑफिस आने तथा आकर काम न करने की क्या क्या सुविधाएँ हैं।  कई व्यक्ति अपने सारे काम निचले अधिकरियों को डेलिगेट कर अपना सारा काम टाल जायेंगा - यहाँ  तक कि जो अधिकार और जिम्मेदारी उनकी अपनी है - वह भी।  लेकिन मॉनिटरिंग नहीं कर पायेंगे।  बगैर proper monitoring के कोई भी delegation प्रभावशाली नही हो सकता।  साथ ही अब अपवार्ड डेलिगेशन ऑफ पॉवर भी होने लगा है।  निर्णय की जिम्मेदारी टालना हो, और फाइलें पढ़ने में अपनी पूरी इमानदारी या समय नहीं लगाना हो तो आसान तरीका है कि फाइल को बॉस के पास भेज दिया जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           इन बातों की विस्तृत चर्चा यहाँ करने का कारण है कि नई संरचना में इस स्थिति में सुधार लाना अत्यंत आवश्यक होगा।&lt;br /&gt;       इसके लिये नौकरशाही के निचले तबके में जो सुधार तत्काल आवश्यक हैं वे है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(क) विश्वास और विश्वसनीयता का वातावरण पैदा करना&lt;br /&gt;(ख) हर कर्मचारी को जिम्मेदारी उठाने की, समय के माँग को तोलने की ट्रेनिंग देकर इस लायक बनाना।&lt;br /&gt;(ग) अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार को शीध्रगति से कड़ी सजा देना।&lt;br /&gt;(घ) निचले अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपकर उनके कामके monitoring की व्यवस्था सुधारना।&lt;br /&gt;(ङ) ऑडिट और इन्स्पेक्शन के जिन मुद्दोंमें खास आर्थिक खतरे नहीं हैं और कर्मचारियों का समय बचाया जा सकता है वहाँ वे आवश्यक सुधार लाना।  इन सुधारों का उद्देश हो विश्वास पैदा करना और आर्थिक efficiency लाना।&lt;br /&gt;(च) कर्मचारियों को काम के लिये प्रोत्साहित करने के उपाय लागू करना।&lt;br /&gt;(छ) सरकारी कामों की लाभ हानि की जाँच की ट्रेनिंग देना।  &lt;br /&gt;इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            अच्छे प्रशासन की एक बड़ी फिट व्याख्या शिवाजी के गुरु रामदास ने एक पत्र में की है।  शिवाजी पुत्र संभाजी महाराज को यह समझाते हुए कि प्रशासन कैसे चलाया जाये, गुरु रामदास कहते है -'जनांचा प्रवाहो चालला, म्हणिजे कार्यभाग झाला, जन ठायी-ठायी तुंबला, म्हणजे खोटे!'  अर्थात् यदि लोगों के काफिले आ - जा रहे हों, उनके काम में रुकावटें नहीं आती हों, तो समझना तुम्हारा शासन अच्छा है, जव देखना कि लोग जगह जगह अटक रहे हैं, उनकी समस्याएँ उलझ रही हैं, उनके समस्या-निवारण में देर लग रही है तो समझना कि तुम्हारे प्रशासन में खोट है - कमजोरी है।  जिस नौकरशाही में सबसे निचला कर्मचारी भी इस व्याख्या को निभा लेता हो, वही सक्षम नौकरशाही है।  जो इस व्याख्या को कपोल कल्यना या utopia मानते हों वे जान लें कि विदेशों में इस व्याख्या का प्रत्यक्ष उदाहरण रोजाना ही देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           आज देशभर में कई training institutes प्रशिक्षण का काम करने का प्रयास भी कर रही हैं।  किन्तु गैरसरकारी क्षेत्रों के कई गण्य मान्य व्यक्तियों को सरकारी प्रशिक्षण संस्थाओं के प्रभावशाली होने पर संदेह है। क्योंकि जब उन संस्थाओंकोभी  भी आज के प्रभावहीन ढाँचे के मुताबिक काम करना है तो वे दूसरों को क्या सुधार सिखायेंगी।  खासतौर पर जहाँ नवीनता लाने की आवश्यकता है, प्रशिक्षण संस्थाओं को आज तक प्रभावी नही पाया गया।  इसका कारण यह नही कि प्रशिक्षणकी संकल्पना गलत है।  कारण है कि उसका तरीका शायद गलत, अपूर्ण, inadequate और केद्रित है।  वास्तविक ट्रेनिंग तब होगी जब ऑफिस का हर बड़ा अधिकारी छोटे अधिकारी के ट्रेनिंग को अपनी जिम्मेदारी मानता हो, साथ ही प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश हो कि कैसे ऑफिस एक अच्छे टीमवर्कसे कामको निपटाता है और टीमके हर मेंबरके प्रशिक्षणमें रुचि लेता है।  वैसी सिस्टम हम नहीं बना पायें हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            अब जरा देखें उन दुर्गुणों को जो ऊंचे स्तर के अधिकारियों और ऑफिसों में आ गये हैं।  तत्काल दिख जाने वाले और गिनाये जा सकने वाले दुर्गुण हैं कि आज की नौकरशाही असंवेदनशील है, सतर्क नही है, भ्रष्टाचार को निबटाना आवश्यक नहीं समझती बल्कि स्वंय ही भ्रष्टाचारी है।  जनता यह भी बड़े पैमाने पर मानती है कि नौकरशाही भ्रष्ट के अलावा अकर्मण्य है, आलसी है, और निराश भी है।  लेकिन जनता ने एक बड़ा अहम् दुर्गुण अभी तक नोट नहीं किया है।  वह है नौकरशाही का अहंकार या arrogance, उध्दतता।  यहाँ सरकारी अफसरों के व्यक्तिगत अहंकार या घमण्डी स्वभाव की नहीं बल्कि उस अहंकार की बात है जिसके तहत नौकरशाही कुछ मान्यताएँ लेकर चलती है  &lt;br /&gt;१)कि सरकार अर्थात् नौकरशाही जो भी कर रही है वह बहुत अच्छा है &lt;br /&gt;२)सरकार जो कर रही है उससे अच्छा कुछ नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;३)जिस काम को सरकार खुद नहीं करे वह कभी नहीं हो सकता।  &lt;br /&gt;           इस अहंकार का परिणाम पिछले चालीस वर्षों में scam का बवंडर बन कर हमारे सामने आया जिसकी चर्चा आगे चल कर करेंगे।  पर अभी इसकी अन्य बुराइयों को देखें।  यह ग्रुप अहंकार इतना बढ़ गया कि इसने सरकारको टुकड़े-टुकड़ेमें बाँट कर रख दिया।  उदाहरण स्वरुप हम शिक्षा का क्षेत्र देखें।  नौकरशाही केवल यह कह कर नहीं रुक जाती कि शिक्षा विषयक सरकारी नीतियाँ ही सर्वश्रेष्ठ हैं और सरकार के बाहरी लोगों को इस पर टिप्पणी करने का हक नहीं है - नौकरशाही आगे यह भी कहती है कि शिक्षा के विषय में नौकरशाही का शिक्षा विभाग जो कुछ कह रहा है वही सही है और बाकी नौकरशाह इस पर टिप्पणी न करे। इसीलिये यदि आप बड़े नौकरशाह भी हुए तो भी आप नहीं पूछ सकते कि शिक्षा विभाग में ऐसी सुव्यवस्था क्यों नहीं है कि आपके बच्चों को आसानी से स्कूल में एडमिशन मिल जाय?  मजे की बात है कि यदि आप बहुत बड़े नौकरशाह है तो अपनी हस्ती का, अपने रुतबे का, अपने रुआब का वजन डालकर आप यह ensure कर सकते हैं कि आपके अपने बच्चों के स्कूल एडमिशन का इन्तजाम हो जाये।  अर्थात् जहाँ सबके कामों में अव्यवस्था हो रही है, वहाँ आपका रुतबा या स्टेटस भी आपको अव्यवस्था हटाने की मांग का हक नहीं देता, और उस दिशा में आपकी सलाह रुतबे के बावजूद नहीं मानी जाएगी।  हाँ, नौकरशाही यह इन्तजाम कर सकती है कि आपकी व्यक्तिगत कठिनाई दूर की जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           इस कम्पार्टमेंटलाइसेशन के फलस्वरुप देश के हर क्षेत्र में पॉलिसी मेकिंग के exercise में हमने reductionist method अपनाई है - ये लोग नहीं बोलेंगे - वे नहीं बोलेंगे - वे तीसरे ग्रुप के भी नहीं बोलेंगे - करते करते बाकी बचता है एक डिपार्टमेंट - उसका भी एक डेस्क, और वहाँ का एक अधिकारी - यदा कदा दो या तीन। बोलने का या सोचने का अधिकार केवल उन्हीं के पास बाकी बचता है।  इसलिये एकत्रित विचार नामकी कोई प्रोसेस ही सरकार में नहीं हो पाती है।  कम्पार्टमेंटलाइझेशन का दूसरा असर यह पड़ा है, कि जब कोई नई समस्या, नई आइडिया, नया काम अर्थात् कुछ भी नया, कुछ भी ज़्यादा, कुछ भी वह काम जो कल नहीं किया था पर आज करना पड़ेगा - उसके प्रति प्रत्येक व्यक्ति यह रुख अपनाता है कि यह काम मेरा नहीं है - यह जिम्मेदारी मेरी नहीं है।  कम्पार्टमेंटलाइझेशन का तीसरा नतीजा यह है कि हर नौकरशाह के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपना रुतबा, अपना धौंस बढ़ायें - क्योंकि तभी उसे दूसरे डिपार्टमेंट से वह सहायता मिल सकती है जो उसे एक सामान्य आदमी के नाते भी मिलनी चाहिये थी, लेकिन वास्तविकता में नहीं मिलती है।  इस प्रकार जो जहाँ है वहीं अपना रुतबा बढ़ाने की कोशिश करता है।  यह रुतबा मापने का तरीका भी बड़ा मजेदार है।  मसलन आपका ऑफिस रुम कितना बड़ा है, आपके कण्ट्रोल में कितनी कारें हैं, कितना बजट है, कितने आदमी हैं, कितने कम्प्यूटर्स हैं, कितने सुरक्षा गार्डस हैं, आप अपने विजिटरों को कितनी देर अटका कर रख सकते हैं और सर्वोच्च मानदण्ड यह कि कितने आदमियों का काम आपकी व्यक्तिगत स्वीकृति के बगैर नहीं होता।  यह एक बड़ी नकारात्मक प्रवृति नौकरशाही में पल रही है और बढ़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               नौकरशाही की पुनर्रचना की जरुरत क्यों आन पड़ी?  इसका एक मुख्य कारण है कि १९५०-१९६० की तुलना में आज हमारी विकास के तरीकों की मान्यता ही बदल गई है।  तब हमारा नारा था समाजवादी समाज का जिसमें प्राईवेट और पब्लिक दोनों सेक्टरों के सहयोग, और सह-अस्तित्व की बात थी।  पिछले चालीस वर्षों में बड़ी धीमी गति से हम इस बात के प्रति जागे कि न तो हमने अपने प्राइवेट सेक्टर को अधिक एफिशियंट बनाया और न पब्लिक सेक्टर को।  सरकार हर क्षेत्र में घुसपैठ करने लगी और कई निरर्धक काम अपने सिर पर ओढने लगी। जहाँ पब्लिक सेक्टर में नये काम किसी खास वजह से लेने पड़े वहाँ भी withdrawal scheme की आवश्यकता होती है। पर इस बात को नजरअंदाज किया गया। जिन कामोंसे सरकार १०-१५ वर्ष पहले से ही अच्छी तरह प्लान करके बाहर निकल सकती थी, वह प्लानिंग नहीं की गई। यहाँ जमशेदपूर की टाटा कंपनी का उदाहरण पेश है। उन्होंने मजदूरोंसे सलाह करके एक प्लान बनाया कि कैसे अगले १५ वर्षों में वे उनकी संख्या में कटौती कर ऑटोमेशन बढ़ायेंगे और फिर भी मजदूरी में कटौती नहीं होगी। लेकिन सरकारी क्षेत्रमें इस तरह के प्लानिंग की बात ही असंभव है। यह भी आज के ढाँचे की अपरिपक्वता का सबूत है और नये ढाँचे के लिये सावधानी बरतने की बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       आज हम आर्थिक सुधार और लिबरलाइझेशन की बात करते हैं।  इसका उद्देश क्या है? जब हमने समाजवादी आर्थिक नीति अपनाई तो उसका उद्देश था गरीबी और अमीरी के बीच की खाई को दूर करना। इसलिये दो महत्वपूर्ण नीतियाँ अपनाई गईं - कि कोअर सेक्टर के रॉ मटेरियल जैसे कोयला, स्टील, बैंक, रेल आदि सरकारी कबजे में रहेंगे - ताकि उनके सरकारी वितरण का लाभ गरीब जनता को भी मिलता रहे और मूलभूत सुविधाएँ जैसे स्वास्थ्य, आवागमन, इत्यादि को उपलब्ध कराने का जिम्मा सरकार ले। लेकिन वास्तव में सरकार ने कोअर सेक्टर के बाहर के भी कई काम ले लिये और केवल एक expansionist या रुतबा बढ़ानेवाली नीति अपनाई!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          पुनर्संरचना के लिये नौकरशाही के ढाँचे में क्या परिवर्तन करने चाहिये यह प्रश्न और यह विषय आजकी तिथिमें महत्वपूर्ण क्यों बन गये हैं? इसका मुख्य कारण यह मान्यता है कि आज हमारी नौकरशाही आर्थिक लिबरलाइझेशन के सिद्धांतों की ओर उन्मुख नहीं है, और उसे वैसा बनाना आवश्यक है। हमारी नौकरशाही विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया में भी बाधक है, पुनर्रचना से उसे विकेंद्रीकरण में भी सहायक बनाना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          पहले हम विकेंद्रीकरण की बात करेंगे।  नौकरशाही का या प्रशासकीय सत्ता का आज का ढाँचा पिरॅमिड की तरह है। मानों एक बड़े मैदान में सैकड़ों पिरॅमिड खड़े कर दिये हों। हर व्यक्ति अपने अपने पिरॅमिड में एक दूसरे को पछाड़ते हुए ऊंचा उठ सकता है लेकिन एक functional sector का दूसरे के साथ कोई कम्यूनिकेशन नहीं- कोई साझा नहीं।  जिस क्षेत्र में कोई पिरॅमिड नहीं उसका ख्याल रखनेवाला कोई नहीं। आज हमारा सारा प्लॅनिंग functional sector के आधार पर होता है यथा कृषि sector का प्लॅनिंग या यातायात sector का प्लॅनिंग।  इसकी जगह हमें Area planning और spatial planning का ढाँचा अपनाना होगा। इस दिशा में अत्यंत छोटा प्रयास पंचायत राज व्यवस्था के अंतर्गत अभिनिविष्ट है। लेकिन उस ढाँचे को हमने पूरी तरह विकसित नहीं किया है। यहाँ फिर एक बार समय बड़ा महत्वपूर्ण बन जाता है। यदि हम आर्थिक लिबरलाइझेशन को बड़ी तेजी से लाने का प्रयास करें तो उस तेजी में हम पुराने ढांचे को खींचखांच कर, फाड़कर, तोड़-मरोड़ कर फेंक देंगे और जल्दबाजी में वह उठा लेंगे जो भी हाथ आयेगा। हमारा रवैया वैसा ही होगा जैसा किसी आग में जलते व्यक्ति का अपने कपड़ों के प्रति होता है। जाहिर है कि वैसी पुनर्रचना की बात हम नहीं कर रहे बल्कि एक सूझबूझ के साथ की जानेवाली पुनर्रचना की बात करेंगे जहाँ पुराने को सुधार कर या बदलकर नया परिवर्तन लाने के लिये कुछ समय अवश्य दिया गया हो। लेकिन यह ध्यान हमेशा रखना पड़ेगा कि बहुत कम ही समय हमारे पास उपलब्ध है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;             किसी भी देश की सरकार का, प्रशासन का और नौकरशाही का एकमात्र नैतिक justification यही होता है कि वह ऐसे नियमों का सुचारु रूप से पालन करवाती है जो समाज ने अपनी सुखसुविधा के लिये उपयोगी मानकर नियत किये हैं। यह एक अत्यंत व्यापक कल्पना है जिसके सभी पहलुओं को ठीक से देखना पड़ेगा। समाज अपने लिये किस सुखसुविधा की अपेक्षा करता है? इसका प्रतिबिम्ब है रामचरितमानस में तुलसीदासजी के वचन -'दैहिक, दैविक भौतिक तापा, रामराज्य नहीं काहुंहि व्यापा' - अर्थात् प्रत्येक प्रकार की दुश्चिंतासे छुटकारा।  हम सत्य की ओर चलें, प्रकाश की ओर चलें, अमृतत्वकी ओर चलें और यह करने में समाज व्यवस्था हमारी सहायक हो और इतनी ही माँग समाज का हर व्यक्ति करता है। इसका उपाय भी बताते हैं - 'संगच्छध्वं, सं वदध्वं, सं वो मनांसि जाननाम् - हम साथ साथ चलें - एकत्रित रुप से विचार करके बोलें, एक दूसरे के मन को मन से मिलायें ............... इसी नियम का पालन करके देवताओं ने श्रेष्ठत्व अर्जित किया'। यहाँ 'हम' कौन हैं? पूरा समाज - न कि केवल नौकरशाही। इसलिये आज भी नौकरशाही को बार-बार अपने मूलतत्व की ओर, अपने जड़ों की ओर देखना होगा। यह मूलतत्व - या जड़ें समाज ही हैं। नौकरशाही की उपयोगिता और प्रभावशक्ति तभी तक रहेगी जब तक वह लोगों से, समाज से अपना पोषण ले सकें, या दूसरे शब्दों में तब तक जब तक समाज उसे पोषण देने में दिलचस्पी ले। और नौकरशाही को स्वंय भी समाज की ओर उन्मुख होना होगा। समाज से उसका कम्यूनिकेशन बराबर चलता रहे और जन सामान्य की सुख सुविधा के अनुसार तुरंत ढल सकने का लचीलापन, नौकरशाही में हो। इसके लिये समाज की इकाइयों और नौकरशाही के बीच विचारों का, योजनाओं का और स्वंय व्यक्तियों का (पर्सनॅलिटीज) का भी आदान प्रदान बढ़ाना होगा। नौकरशाही को समाज के घर-आंगन तक पहुँचना होगा और समाज के हर व्यक्ति को नौकरशाही के अंतरंग तक। ऐसा हो सके इसकी दो शर्तें हैं। पहली शर्त यह कि समाज के हर व्यक्ति का स्तर ऊँचा हो, विकासमान हो और यह विकास विकेंद्रित हो। दूसरी शर्त थोड़ी अधिक गहरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;              यद्यपि हम नौकरशाही की पुनर्रचना की बात कर रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं कि यह विषय हमारे समाज जीवन को प्रभावित करने वाले अन्य विषयों से अछूता होता हो। नौकरशाही का जितना सीधा संबंध प्रशासन चलाने से है उतना ही संबंध देश की आर्थिक नीति से भी है, सामाजिक स्थिति से है, राजनैतिक व्यवस्था से है और उससे भी गहरा संबंध देश की चिंतन प्रणाली से है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           आज देश में चाहे नौकरशाही की पुनर्रचना करना हो या कोई दूसरा बड़ा फेरफार करना हो, पहले तीन क्षेत्रों का सम्यक् विचार करना पड़ेगा - हमारी आर्थिक नीति, हमारी शिक्षा नीति (क्योंकि यही हमारी आर्थिक efficiency को तय करेगी) और हमारा सामाजिक फलसफा, चिंतन या दर्शन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            एक खेद की बात है कि हमारे सारे प्लानिंग प्रोसेस में शिक्षा का क्षेत्र महज एक मूलभूत सुविधा का क्षेत्र बन कर रह गया। इस क्षेत्र का स्पेशल स्टेटस बहुत कम नौकरशाहों ने पहचाना। वास्तविकता यह है कि यदि शिक्षा है जो आदमी आदमी है। शिक्षा है तो समाज है, शिक्षा है तो रोजगार है, उत्पादन है, कार्यकुशलता है, efficiency है, नैतिक मूल्य है, विचार-प्रणवता है और अपनी थाति, अपनी achievements को आनेवाली पीढ़ी को सौंपने की क्षमता है। यदि शिक्षा है तो देश है। हमारी नौकरशाही का फेल्युअर यहाँ से आरंभ हुआ कि शिक्षा पध्दति को हम अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं ढाल सकें। आर्थिक क्षेत्र में हम capital expenditure, return on investment, और gestation period आदि बातें करतें हैं।  लेकिन शिक्षा क्षेत्र में हमारा gestation period  बढ़ता रहा।  Rate of return on capital समान रुप से बढ़ने की बजाय ऐसी स्थिति आई कि ग्रॅज्युएशन अर्थात् १५ वर्ष बिताने पर भी शिक्षा के बल पर रोजी-रोटी मिलने की कोई गॅरंटी नहीं रही। जिसके पास पाँच या दस वर्ष का ही समय हो उसके लिये शिक्षा लेने या न लेने का कोई मतलब नहीं रहा। कार्यप्रणव या हुनरवाले लोग नहीं बन पाये इसलिये औद्दोगिक प्रगति भी कम रही। आज भी देश में अकुशल मजदूरों की संख्या ७० प्रतिशत से अधिक है और शिक्षित जनसंख्या ५० प्रतिशत से कम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            यह अकार्यकुशल, अशिक्षित जनता दो क्षेत्रों में हमारे पाँव पीछे खींचती है - एक तो आर्थिक efficiency के क्षेत्र में।  यही एक क्षेत्र है जो तय करता है कि कोई देश सार्वभौम और स्वतंत्र रहेगा या नहीं। विचारणीय है कि भारत में ईस्ट इंडिया का काम भी व्यापार की सहुलियतों से ही आरंभ हुआ था। और जब कंपनी ने अपने पांव जमाने आरंभ किये तो सबसे पहले यहाँ के हुनरवाले, कुशल कारीगरों को समाप्त कर यहाँ के औद्योगिक उत्पादन को खतम करना उनका प्राथमिक कार्य था। आज भी आर्थिक सुधार करने हुए यदि हम अपने मानवीय संसाधनों में कम पड़ गये (और जो स्पष्ट चिन्ह दिख रहे हैं उनके अनुसार हम वाकई अपने manpower resources में कम पड़ रहे हैं) तो केवल आर्थिक लिबरलाइझेशन से देश की आर्थिक कठिनाई दूर नहीं हो सकती और न GNP बढ़ सकता है और न अमीरी-गरीबी के बीच की खाई भरी जा सकती है। अर्थात् वह आर्थिक विकास हम नहीं पा सकते जिसके लिये आर्थिक सुधार का सारा प्रयास पिछले दो वर्षों में किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दूसरा सवाल है empowerment of masses का। जब हमारी साठ से सत्तर प्रतिशत जनता अशिक्षित और अकार्यकुशल हो तो फिर empowerment of masses की संकल्पना में कितना तथ्य या जोर हो सकता है?  हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि यही जनसामान्य नौकरशाही के साथ हाथ बँटायेंगे?  यहाँ हम 'नौकरशाही पर अंकुश' की चर्चा नहीं कर रहे। क्योंकि अंकुश में फिर अविश्र्वास वाली बात निहित है। हमें एक साझेवाली नौकरशाही का ढाँचा चाहिये जिस ढाँचे में सामान्य जनता आसानी से आ-जा सके - कभी केवल सुझाव देकर हाथ बँटाये, कभी प्रत्यक्ष रुप में जिम्मेदारियाँ निभाकर। थोड़ी हदतक निगरानी का काम भी जनसामान्य को करना होगा क्योंकि नौकरशाही का भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता और immunity from punishments एक दिन में दूर नहीं होंगे। नौकरशाही की सिस्टम को गतिमान और balanced रखने के लिये इसके प्रत्येक काम में जनसामान्य का विचारपूर्वक साझा होना चाहिये - वह वैचारिक परिपूर्णता उचित शिक्षा के बगैर नहीं आती।  इस प्रकार शिक्षा क्षेत्र को neglect करके हमने अपने लोकतंत्र को भी खतरे में डाल दिया है और नौकरशाही को भी अवरुद्ध कर दिया है।  दुर्भाग्य से आज हमने नई आर्थिक नीति की बात तो आरंभ कर दी पर शिक्षा नीति की हम आज भी उतनी ही उपेक्षा कर रहे हैं बल्कि अब तो पहले से अधिक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अन्तिम प्रश्न समूह है कि नौकरशाही की पुनर्रचना कौन करे?  पुनर्रचना के कारण जिनकी अनिर्बध सत्ता खतरे में आनेवाली हो वे क्यों आसानी से पुनर्रचना लाने देंगे? एक दूसरा प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। नौकरशाही की पुनर्संरचना करनी है यही सोचकर यदि नौकरशाही में कुछ उलटा - पुलटा कर दिया तो उससे क्या लाभ? यदि विचारपूर्वक फेरफार नहीं किये तो उनसे उत्पन्न खतरे के विषय में भी हमें ठहरकर सोचना पड़ेगा। यहीं हमारे सामाजिक फलसफे का मुद्दा महत्वपूर्ण बन जाता है। नौकरशाही की सही दिशा में पुन संरचना तभी संभव है जब जनता इसकी माँग करे।  जनता माँग तभी करेगी - जब वह सुशिक्षित हो और जानती हो कि 'सं वो मनांसि जानताम्' के सूत्र में उसका अपना क्या रोल है। यह रोल विचार-प्रक्रिया और कार्यकुशलता दोनों क्षेत्र में होगा। अर्थात् हमारी जनता तभी सुशिक्षित कहलायेगी जब वह कार्यकुशल भी हो और विचार प्रणव भी। क्या हमें अंदाजा है कि यह सुशिक्षा का कार्य कितने बड़े पैमाने पर करना है? देश के लगभग तीस करोड़ नाबालिग (आयु अठारह वर्ष से कम) और करीब उतने ही प्रौढ़ व्यक्ति आज शिक्षा की दृष्टि से 'empowered' नहीं हैं और इसीसे शिक्षाकी आर्थिक कीमत (फीस और समय दोनों के हिसाब से) प्रतिवर्ष बढ़ रही है। आर्थिक सुधारों की लिस्ट में एक महत्वपूर्ण और रामबाण औषधी यह मानी जा रही है कि शिक्षा की पूरी कीमत विद्यार्थी से वसूल की जाय।  इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय दूसरा नहीं हो सकता है। यदि यही निर्णय कायम रहा तो जनसामान्य का empowerment कभी नहीं हो सकता और जनसामान्य की नौकरशाही में साझेदारी भी नहीं हो सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अर्थात् नौकरशाही की accountability में कुछ मूलभूत सुधार आवश्यक हैं। आज की स्थिति यह है प्रशासक के गलत निर्णय का आर्थिक बोझ जनता उठाती है और राजकीय consequence नेतागण उठाते हैं। नेता का गलत प्रशासकीय निर्णय हो(जैसे भ्रष्टाचार, पैरवी, शिफारस इत्यादि से उत्पन्न निर्णय) तो उसका फल भी - चाहे आर्थिक या प्रशासनिक-वह भी जनता को भुगतना पड़ता है और यदि दोनों के आर्थिक निर्णय गलत हुए तो पूरे देश का भविष्य डूब सकता है लेकिन व्यक्तिगत रुप में वह जिम्मेदार नौकरशाह बच ही जायेंगे - बल्कि कई बार तो अच्छी खासी संपत्ति या नाम भी इकठ्ठा कर लेंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ऐसी स्थिति में फससफे की बात इसलिये उठी है कि सदियों से भारतीय मानस यही मानता आया है कि जीवन की सार्थकता देने में है - छीनने में नहीं।  शिक्षा और ज्ञान का प्रचार और विस्तार कुछ ऐसी वस्तु है जिसकी तौल आर्थिक तराजू पर नहीं तुलती। अच्छे शिक्षक की पहचान यही बताई गई कि उसकी वृति अपरिग्रह की हो न कि चीजें बटोरने की। अच्छे समाज की पहचान बताई गई कि शिक्षक के सर्वाधिक अपरिग्रही (यानी सिक्के बटोरने की भाषा में 'गऱीब')होते हुए भी समाज उसका सर्वाधिक आदर करें। इस एक सामाजिक मूल्य ने हमारे समाज को सदियों तक बचाये रखा। टूट फूट कर बिखरने नहीं दिया। हमारी शिक्षा नीति को बनानेवाले नौकरशाह इस सामाजिक दर्शन का सदुपयोग कर शिक्षा प्रणाली को कम खर्चीली, जीवन से अधिक जुड़ी हुई बना सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नई आर्थिक नीति में सारी सोच इस फलसफे से उल्टी है।  इसलिये नौकरशाही की संरचना में कोई प्रभावशाली पुनर्गठन होगा ऐसा आज नहीं लगता। शायद सरकार कई सेक्टरों में से अपने आपको हटा ले जैसा घोषित किया है। इस प्रकार नौकरशाही के आकार को कम किया जा सकता है लेकिन जरुरी नहीं कि उसके परिणामस्वरुप आर्थिक विकास की गति तेज हो। और यदि यह जल्दबाजी में हुआ तो व्यापक हिंसाचार और सामाजिक मूल्यों के अधिक ह्रास की ही संभावना अधिक है। अतएव आर्थिक विकास मापने का तरीका भी सोच समझकर ही तय करना पड़ेगा। लोगों ने यह जता दिया है कि इस देश की भूमि पर यदि कारगिल कंपनी नमक बनकर पैसे कमाती है और सरकार उनके प्रॉफिट को अपने GDP में शामिल करना चाहती है तो यह जनना को मंजूर नहीं। जनता देखना चाहेगी कि इस देश की अपनी संपत्ती बढ़ी या नहीं। यदि नई आर्थिक लहर में यह सामाजिक मूल्य बचा रह सका तो समाज में सुविधा का फैलाव भी होगा और फिर समाज नौकरशाही को बदलने में समर्थ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक नौकरशाही में रहकर जिन्हें कुछ करना है उनके लिये यही सूत्र है कि अपनी अपनी जगह पर पारदर्शिता लाने का प्रयास करो, अपने अधीनस्थोंके प्रति प्रशिक्षक की भूमिका अपनाओ, जहाँ अच्छाई दिखे उससे तुरंत समानुभूति प्रकट करो, उसे अकेले न पड़ने दो और अपने कार्य की आर्थिक efficiency बढ़ाओ।  जहाँ जहाँ विकेंद्रीकरण संभव है उसे अपनाओ और जनसामान्य से सिस्टम का वैचारिक आदान प्रदान बढ़ाने के तरीके अपनाओ। पुनर्रचना के लिये बना बनाया सूत्र या मॉडेल खोजने की बजाय उसे अपने देश की मिट्टी से जुड़कर यदि हम विकसित होने दें तो ही उसमें आंतरिक सामर्थ्य टिक पायेगा।&lt;br /&gt;लीना मेहेंदले&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-1972225825291571712?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/1972225825291571712/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=1972225825291571712' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1972225825291571712'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1972225825291571712'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html' title='08 भारतीय नौकरशाही की पुनसंरचना -- Restructuring Indian Bureaucracy'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-261155821424360587</id><published>2010-07-14T13:52:00.000-07:00</published><updated>2010-07-15T07:32:25.155-07:00</updated><title type='text'>16 धुन की पक्की महिलाएँ</title><content type='html'>धुन की पक्की महिलाएँ &lt;br /&gt;- लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि प्रदीप ने तुफान से लड़नेवाले एक दिये का वर्णन यों किया था - अपनी धुन में मगन, उसकी लौ में अगन, उसके मन में लगन भगवान की, ये कहानी है दिये की और तुफान की---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले पचास वर्षों में अर्थात स्वतन्त्रता प्राप्त्िा के बाद से बीसवीं सदी के अंत तक हमारे देश की जिन महिलाओं पर यह वर्णन लागू होता है - उन पर एक नजर डालना बड़ा ही महत्वपूर्ण है क्योंकि मैं मानती हूँ कि इन पचास वर्षों में महिलाओं ने जो सहा, जो लड़ाईयाँ लड़ाईंयाँ लड़ी, जो उपलब्धियां पाई, जिस धुन से और जिस गहराई से जिंदगी को जिया, समाज को जो आदर्श दिये वह सारी बातें अगले पचास या सौ वर्षों के समाज को प्रेरणा देंगी और हमारे देश की प्रगति की दिशा को तय करेंगी।&lt;br /&gt; ऐसी धुनवाली महिलाओं में मैं जिनकी गिनती कर सकूँ उनमें सर्वप्रथम हैं श्रीमती इंदिरा गांधी। उनके अलावा लता और आशा मंगेशकर बहनें, अमृता प्रीतम, निरजा भानोत, ऍना मलहोत्रा, पी. टी. उषा, किरण बेदी, मेघा पाटकर, भवरी देवी, सुधा चंद्रन, मदर तेरेसा आदि कई नाम दिमाग में कौंध जाते हैं।  एक अलग सदंर्भ से जयललिता, मायादेवी और फूलनदेवी के नाम भी गिनाए जा सकते हैं।   इनमें से हर किसी की कोई बड़ी उपलब्धि है जिसे पाने के लिये उन्हें समाज का रोष सहना पड़ा। स्त्र्िायों को हर मोड़ पर बेड़ियों में जकड़ने वाले समाज की कुप्रथाओं और दकियानूसी बरताव के खिलाफ अपना साहस जुटाना पड़ा। इन सबके अंदर जो समान गुण मैंने महसूस किया वह था उनकी अन्दरूनी ताकत, उनका सत जिसके बलपर उनकी लड़ाईयाँ सफल हुईं।&lt;br /&gt; श्रीमति इंदिरा गांधी करीब सोलह साल इस विशाल देश की प्रधान मंत्री रहीं। पूरी दूनियाँ में गिनी चुनी ही महिलाऐं होंगी जिन्हें यह उपलब्धि मिल पाई हो। मैं नहीं मानती कि केवल पंडित नेहरू की बेटी होने के नाते ही उन्हें यह पद मिला। स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान, उसी माहौल में उनकी परवरिश हुई और बाद में घर के राजकीय वातावरण में भी वे बहुत कुछ सीखती रहीं। प्रधान मंत्री का पद संभालने पर इस शिक्षा - दीक्षा का लाभ उन्हें अवश्य मिला। कभी उन्होंने कई साहसी निर्णय किये तो कभी तिकड़मबाजी वाले। कभी कोई निर्णय सही निकले तो कोई गलत। पर दो बड़े साहसी और महत्वपूर्ण निर्णय यादगार बने रहेंगे। बंगला देश की लड़ाई में मुजीबुरर्रहमान का साथ देकर उन्होंने  भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमरीकी जलपोतों के पहले ही अपनी नौसेना को बंगाल के उपसागर में उतारकर उन्होंने जिस रणनीति और सूझबूझ का परिचय दिया उससे पूरी दूनिया में देश की धाक जम गई और इसी के बल पर बांगला देश में भारतीय सेना विजयी हुई। उनका दूसरा महत्वपूर्ण कार्यक्रम था परिवार नियोजन। १९५० की तुलना में आज हमारी लोकसंख्या ३० करोड़ बढ़कर सौ करोड़ के  पास पहुँच गई है और  प्रति तीन सेंकद में एक दर से बढ़ रही है। इसकी रोकथाम के लिये भी दृढ़ता से कदम उठाना १९७८ के बाद से किसी के लिये संभव नहीं हुआ - खुद उनके लिए भी नहीं। इस हतोस्ताहिता के दुष्परिणाम आज हम देख रहे हैं लेकिन १९७८ के पहले उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया। उनके कार्यक्रम में कृषि, अणुविज्ञान और अवकाश विज्ञान के क्षेत्र में देश को अच्छी सफलता मिली। हरित क्रांति के अंतर्गत अनाज की नई बल्कि इसलिए होती है कि वह इनके नायक और नायिका की सहज प्रवृत्त्िा है इसलिए उनके पात्रों के सामाजिक संदर्भ भी वर्तमानकाल से बहुत कुछ आगे का सोचनेवाले होते हैं। यही बात और प्रखरता से पढ़ने को मिली आशा पूर्णा देवी के लेखन में। उनका कथाबीज भी मुख्य रूप से यही है कि जीवन में दुख नहीं बल्कि सुख शाश्र्वत है और मनुष्य यदि थोड़ी भी बुद्धि और नैतिक गुण दिखा पायें तो वह सुख का भागी हो सकता है।        &lt;br /&gt; अग्रगण्य महिला लेखिकाओं में दुर्गाबाई भागवत एक ऐसी लेखिका है जो कथा उपन्यास कम और चिन्तात्मक लेखन अधिक लिखती हैं। मैं इन्हें एक बड़ी हीरो मानती हूँ। हम सभी कहते हैं कि साहित्यिक के पास विचार का शस्त्र होता है इसलिये अन्याय विरूद्ध आवाज उठाने में पहला कदम उसका हो। साहित्यिक स्वाभीमानी हो, किसी के सामने लाचार न हो -- वह किसी से नहीं डरे यहाँ तक कि निरंकुश सत्ताधारी से भी नहीं इमर्जेन्सी के काल में जब देश के बड़े छोटे सभी साहित्यिक - चुप्पी साधकर बैठे रहे तो श्रीमती दुर्गाबाई भागवत ने इसके विरूद्ध जमकर आवाज उठाई, भाषण दिये, लेख लिखे और बदले में कारावास भी भुगता। देश की लोकाशाही में पहली मिसाल थी कि सत्ताधारी  के अन्याय के प्रति एक ज्येष्ठ साहित्यिक अपनी आवाज बुलंद करें - वह भी किसी वैयक्तिक लाभ के लिये नहीं बल्कि इस भावना से कि अन्याय के विरूद्ध बोलपाना ही विचारवंतो की असली पहचान है। दुर्गाबाई उनके साहित्य से भी अधिक आदरणीय हैं क्योंकि उन्होंने अपना साहित्य केवल लिखा नहीं बल्कि जिया भी है।&lt;br /&gt; लता और आशा ने फिल्मसंगीत बहुलता से गाया। संगीत की परंपरा में दूसरा मनमोहक पहलू है शास्त्रीय संगीत का जो कड़ी मेहनत के बाद ही सिद्ध होता है और तभी लुभा पाता है। ऐसी सिद्ध गायिकाओं में मेरी पंसदी की चार गायिकाएँ हैं - श्रीमती सुब्बलक्ष्मी, हिराबाई बडोदेकर, किशोरी अमोणकर और परवीन सुलताना।&lt;br /&gt; संगीत गाना और संगीत की रचना करना दो नितांत भिन्न कलाएँ हैं। संगीत रचना में गायन के अलावा व्यवस्थापन कौशल्य  भी चाहिये और रचना को  मोहक बना पाने की क्षमता भी। ऐसे बहु आयामी व्यवसाय में जो एकमात्र में जो एकमात्र महिला संगीतकार यशस्वी हुई वे है श्रीमती उषा खन्ना जिनकी बनाई कई मीठी धुने - आज भी गुनगुनाई जाती हैं।&lt;br /&gt; एक दूसरी  उषा है - खेल क्षेत्र में। ऑलिम्पिक में नहीं तो एशियाड ही में सही - लेकिन सुर्वणकन्या पी. टी. उषा के नाम का एक ही पन्ना भारत के खेल जगत में महिलाओं के नाम है। लेकिन इसके साथ ही भारतीय महिला तैराकों में जिनकी उपलब्धि मैं महत्वपूर्ण  मानती हूँ वे हैं आरती सहा (फ्रान्सिकी खाडीको सर्व प्रथम तैरनेवाली भारतीय महिला) और अनीता सूद।&lt;br /&gt; इसके विपरित सिने कलाकारों में चमक दमक वाले कई नाम गिनायें जा सकते हैं क्योंकि उनके व्यवसाय का आंरभ का आंरभ ही चमकीली रोशनी में होता है। मैं इस क्षेत्र में विशेष जानकर नहीं लेकिन अपनी पसंद के नाम गिनाने हों तो मैं मीनाकुमारी, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी और स्मिता पाटील के नाम गिनाउँगी।&lt;br /&gt; दूसरों की लड़ाई लड़ने वाली एक और महिला हैं मेधा पाटकर। जिन आदिवासी जनों की कोई सुनवाई नही है उनके दुख दर्द को वाचा और भाषा दी है मेधा पाटकर के प्रयत्नों ने। स्वतन्त्रता के बाद यह दुविधा कई बार उठी है कि क्या अपनी ही लोकशाही सरकार से अपनी ही माँग के लिये जूझना पड़ेगा? इस दुविधा में यह तय कर पाना कभी कभी मुश्किल हो जाता है कि कौन सा विचार सही है और कौन सा गलत। ऐसे समय अपनी विवेक बुद्धि जो राह दिखाये उसी को मानकर अपने विचारों की लड़ाई लड़ने के लिये, वह भी अथक रूप से वर्षों तक लड़ने के लिये एक अनन्य साहस और स्टेमिना की जरूरत है जो मेधा पाटकर ने दिखा दिया है। उसके हर प्रस्ताव को गलत करार देने वाले सरकारी अफसर भी आज मानते हैं कि यदि मेधा न होती तो आज आदिवासियों के उचित पुर्नवास के के भी प्रयास किये जा रहें हैं वो शायद नहीं किये जाते। मेधा पाटकर को नोबुल जैसे ही अन्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इतना ही नहीं स्वयं वर्ल्ड बैंक ने पुनर्वास के सारे दकियानूसी नियम और तरीके बदल कर अच्छे पुनर्वास की दिशा में कदम उठाने को कहा।नतीजा यह रहा कि १९६० से लेकर जितने पुराने बांधों के दौरान पुनर्वास ठीक ढंग से नहीं हुआ है उनकी फिर से जाँच की जा रही है।&lt;br /&gt; सफल लड़ाई लड़ने वालों में एक नाम मेरे सामने और है - जो सुधा चन्द्रन का है। इसकी लड़ाई थी अपने ही नसीब के साथ। सुधा भले ही भरत नाटयम में पहले नंबर पर ना हो, लेकिन उसका नंबर बहुत नीचे भी नहीं है। लेकिन अँक्सीडेंट में घुटने तक पांव कट जाने के बाद जयपुर फुट बैठाकर, उसी निर्जिव रबर के पैर के साथ अपनी प्रैक्टीस चालू रख कर दुबारा नृत्य में प्रवीणता पानेवाली उसकी धुन को देखकर खुद नसीब ने ही उसे अदाब बजाए होंगे।&lt;br /&gt; पिछले पचास वर्षों में पढ़ाई - लिखाई का प्रसार जैसे बढ़ा तो महिलाएँ नौकरी में आना आरंभ हो गईं। क्ष्ऋच्, क्ष्घ्च् और न्याय संस्थाओं में भी उच्च पदों पर महिलाएँ आती रहीं हैं। क्ष्ऋच् का आंरभ १९४७ से हुआ। पहली महिला क्ष्ऋच् श्रीमती ऍना मलहोत्रा १९४७ में तमिलनाडू में आईं। ये अपने प्रशासकीय कुशलता और ईमानदारी के लिये काफी विख्यात हुईं। देश की पहली महिला चीफ सेक्रेटरी रहीं श्रीमती द्विवेदी, पहले मेघालय में और फिर आसम में। दूसरी महिला चीफ सेक्रेटरी रहीं मध्य प्रदेश में श्रीमति निर्मला बुच इनके नाम तो जनता के सामने आ गये लेकिन काम नहीं क्योंकि प्रशासन का जो रूप हमने स्वीकार किया उसमें प्रशासकों के लिये पहली शर्त यह है कि प्रसिद्धि से दूर रहें, उनके काम में भी उनकी अनामिकता को आवश्यक माना जाता है। उनके अच्छे काम की निजी तौर पर जानकारी केवल उनके सन्निकट वरिष्ठ अफसर को ही मालूम हो सकती है। उसने महत्व जाना ते ठीक वरना नहीं। इससे देश में एक घाटा यह रहता है कि समाज या जनता अच्छे काम करनेवाले प्रशासक के विषय में कुछ अधिक नहीं जान पाती। पिछले तीस वर्षों में क्ष्ऋच् में आये अधिकारियों की संख्या ४००० से कम है जिसमें महिलाओं की संख्या ४०० से कम है। १९७० पहले रहेक राज्य में एक या दो ही महिला क्ष्ऋच् थीं और कुल बीस पच्चीस रही होंगी जो अब एक एक करके रिटायर हो जायेंगी।उनकी कार्य प्रणाली के विषय में कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं - महिला होने के कारण उन्हें क्या दिक्कत हुई, क्या उनके वरिष्ठों ने उनके काम का मजाक उड़ाया या अच्छे काम की यथोचित प्रंशसा की? वे जहाँ गईं वहाँ क्या कुछ नया कर दिखा पाना सभंव हुआ? किस तरह ये संभव हुआ? यदि कोई अच्छा लेखक एक मुहिम बनाकर पहले बीस वर्षों की महिला क्ष्ऋच् अधिकारियों का इंटरव्यू करें और किताब लिखें तभी यह सारी सामाजिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जानकारी अगली पीढ़ीयों को उपलब्ध होगी वरना बड़ी जल्दी ही समय के परदे के पीछे चली जायेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी क्रूरकर्मा भी हो सकता है। इसके विपरित न्याय देने के लिये राजकाल चलाने के लिये और विकास कर पाने के लिये सुमति, कर्तव्यदक्षता, न्यायबुद्धि और प्रशासकीय कुशलता भी चाहिये। फूलनदेवी के लोकसभा में आ जाने से यह चर्चा भी योग्य परिप्रेक्ष्य में आगे चल पाये तो यह भी क्या बुरा है?&lt;br /&gt; इन महिलाओं के अलावा अन्य कई क्षेत्रों में भी महिलाओं की उपलब्धि है। वह छोटी ही सही पर अपने आप में महत्वपूर्ण, एक मिसाल कायम करने वाली और अगली कई स्त्र्िायों की राह को सरल करने वाली उपलब्धियाँ हैं। जहाँ कहीं किसी महिला ने पहल की, समझ लीजिये कि उसने अपने पीछे सौ महिलाआं का रास्ता आसान कर दिया। इस प्रकार पहल करने वाली महिलाओं में पहली महिला वैज्ञानिक सौदामिनी देशमुख हैं, पहली रेलवे ड्राइवर हैं, पहली ट्रक ड्राइवर हैं, नौसेना की महिला कँडेट अफसरों की एक पूरी टुकड़ी है या फिर कई राज्यों में पूरी की पूरी महिला घ्च्क्ष् की टुकड़ी है। इनके संघर्ष और सफलता को कलमबद्ध करना समाज की अगली पीढ़ीयों के लिये हमेशा मार्गदर्शक होता है। इसी प्रकार मुस्लिम समाज में छोटे ही स्तर पर सामाजिक जाग्रति का बढ़ा काम करनेवाली रजिया पटेल और छोटी ही बात पर पूरे मुस्लिम समाज को झिंझोड़ देनेवाली शहनाज बानो का नाम गिनाना भी आवश्यक है। जब किसी समाज को इस प्रकार झिंझोड़ा जाता है तभी उसकी उन्नति का रास्ता बनता है। &lt;br /&gt; जाते जाते दो नितांत अलग बातें मैं कहना चाहूँगी। यदि झिंझोड़ने से ही समाज के विकास का रास्ता बनता है, तो फिर भारतीय न होते हुए भी पर अपने बहुत ही करीबी देश की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का नाम भी इसी लेख में रखना उचित होगा। मुस्लिम समाज के पिछड़े रहने में सबसे बड़ा कारण है मुस्लिम स्त्र्िायों में शिक्षा का अभाव और हर मोड़ पर स्त्री के लिये सैंकड़ों रूकावटे खड़ा करने वाला मुस्लिम समाज। हिन्दू साज में स्त्र्िायों का स्तर उंचा उठाने के लिये और स्त्र्िायों को शिक्षा दिलाने के लिये राजा राममोहन रॉय, महात्मा फुले, महर्षि कर्वे, पंडिता रमाबाई, लाला लाजपतराय जैसे सुधारक भी आगे आये और स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ने वाली स्त्री क्रांतिकारियों का भी इसमें बड़ा हिस्सा रहा।  मुस्लिम स्त्री अगर अपने धर्म के परिवेश में ही विकास की मिसाल खोजना चाहो तो दूर से देखने के लिये ही सही लेकिन बेनजीर भुट्टो हैं तो जरूर इसीलिये उना प्रधानमंत्री बनना मैं इस अर्ध सदी की एक अच्छी उपलब्धि मानती हूँ।&lt;br /&gt; दूसरी बात एक कमजोर पक्ष की है। आज यद्यपि भारतीय महिला ने लेखिका, नायिका, राजकीय नेतृत्व, साहसी नारी के क्षेत्र में सफलता पाई है पर फिर भी जहाँ व्यवस्थापन कुशलता और चिन्तन दोनों आवश्यक हैं ऐसे कई क्षेत्रों में भारतीय महिला काफी पीछे है। हमारे देश में जागतिक किर्ति पाने वाली उद्योगपति, सेनाधिपति, समग्र प्रशासक, दार्शनिक अर्थशास्त्री, पत्रकार, समाजशास्त्री बँकर या वैज्ञानिक महिलाएँ नहीं बनी हैं- अपवाद हैं केवल श्रीमति रोमिला थापर जो जागतिक किर्ती की इतिहासकार हैं। अब क्या हम उम्मीद रखें कि अगले पचास वर्षों में इन अछूते क्षेत्रों में भी जागतिक स्तर की महिलाएँ हमारे समाज में पैदा होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                -लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;          सेटलमेंट कमिश्नर महाराष्ट्र&lt;br /&gt;       (तथा कन्. ज्त्ड़ड्ढ क्ण्ठ्ठदड़ड्ढथ्थ्दृद्ध,नाशिक मुक्त विद्यापीठ)   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लीना मेहेंदले,&lt;br /&gt;५०, लोकमान्य कॉलनी,&lt;br /&gt;पौड रोड़, कोथरूड,&lt;br /&gt;पुणे - ४९९००३८&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-261155821424360587?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/261155821424360587/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=261155821424360587' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/261155821424360587'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/261155821424360587'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/blog-post_3894.html' title='16 धुन की पक्की महिलाएँ'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-4471041532042203614</id><published>2010-07-14T13:50:00.000-07:00</published><updated>2010-07-15T07:33:06.276-07:00</updated><title type='text'>04 आरक्षण नीति - एक चिंतन incomplete</title><content type='html'>आरक्षण नीति - एक चिंतन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आरक्षण की नीति के मामले को लेकर हमारा देश कई दुर्भाग्य पूर्ण दौर से गुजर चुका है। स्वतंत्रता प्राप्त्िा के पश्चात हमारे संविधान कर्ताओं ने बड़े सोच विचार के बाद इस नीति को अपनाया था। भारतीय संविधान के अनुसार न कोई छोटा है न बड़ा  - सबको एक ही सा हक है, चाहे वह राजा हो या रंक। लेकिन हमारे देश में हजारों वर्षों से जो जातिव्यवस्था चली आ रही थी, उसने समाज को टुकड़े-टुकड़े बाँट कर रख दिया था। पिछड़े वर्ग और पिछड़ी जाति को कोई सामाजिक स्थान प्राप्त न था। छुआछूत की समस्या थी। साथ ही पिछड़ी जातियां आर्थिक दृष्टि से कमजोर थी और शिक्षा के स्तर पर भी। यही सब देखकर आरक्षण कि नीति अपनाने की जरूरत आन पड़ी। यह विचार किया गया कि, यद्यपि देश में संविधान के सम्मुख सभी नागरिकों का हक एक सा माना जाना चाहिए, पर फिर भी इस मूल्यांकन में पिछड़े वर्गों को साथ कुछ रियायत बरतना आवश्यक है। शताब्दियों की शोषित मानशिकता के बाद इन जाति जमातियों अपने गुण या अपना मूल्य बढ़ाने का यह मौका नही मिला है जो उच्चवर्णियों को मिला है और जिन्हें मौका मिला भी हो उनकी वह क्षमता नहीं थी कि, मौके का सही लाभ सकें। हमारे संविधान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्वांत है अवसर की समानता, लेकिन यह पिछड़ी जातियाँ इस कदर पिछड़ी है कि अवसर की समानता या मौके का लाभ सही ढंग से उठा पाना उनके लिये संभव नहीं। संविधान कर्ताओं ने इस आवश्यकता को महसूस किया कि पिछड़े वर्गों को आगे लाने के लिये उनकी प्रगति का स्तर अधिक वेग से बढ़ाना आवश्यक था और यह सभी संभव था जब उन्हें कुछ विशेष आरक्षण प्रदान किया जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आरक्षण का आरभं हुआ राजनैतिक क्षेत्र से । हमारे देश ने जब प्रजातंत्र को स्वीकार किया तो नागरिकता और मतदान का हक हर एक वयस्क व्यक्ति को दिया गया जो सामाजिक विषमता दूर करने के लिये एक आवश्यक कदम था। लेकिन केवल मतदान का हक दे देना काफी नहीं था। यह भी आवश्यक थाकि पिछड़ी जातियां राजकीय मुख्य धारा से जुड़े और सरकार चलाने में भी उनका सहयोग हो। अतएव संविधान के अंतर्गत एक विशेष सूची बनाई गई जिसमें उन जातियों को शमिल किया गया जिन्हें अछूत माना गया था और जो इस अछूतपन के कारण समाज की अनन्य उपेक्षा के पात्र बने। साथ ही जनजातियों की भी एक अलग सूची बनी। इस प्रकार अनुसूचित जातियां और जनजातियां घाषित हुई। संविधान की धारा ३३० और ३३२  के अंतर्गत यह प्रावधान तय हुआ कि लोकसभा में और राज्यों की विधानसभाओं में इनके लिये कुछ सीटें आरक्षित रखी जायेंगी । आरंभ में यह आरक्षण केवल १० वर्षों के लिये था और यह अवधि १९६० में समाप्त हो जाती। लेकिन यह देखकर कि दस वर्षों के आरक्षण से इस धारा का पूर्ण उद्देश्य सफल नहीं हो रहा था, सरकार ने हर बार संविधान में संशोधन करते हुए दस  - दस वर्षों से इस अवधि को बढ़ाया । सन् १९९० में किये गये संविधान के कारण अब इस प्रावधान की अवधि सन् २०००  तक कायम रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; थोड़ा सा पिछला इतिहास देखने पर हम पाते है कि अंग्रेजों के शासन काल के दौरान सर्वप्रथम मद्रास के गबर्नर ने मुसलमानों को पिछड़ा घोषित किया और सन् १८८१ की जनगणना में, जो भारत की दूसरी जनगणना थी, जाति के आधार पर जनसंख्या के आंकड़े इकट्ठे हुए। धीरे धीरे हिंदू धर्म के अंतर्गत विभिन्न व्यवसायों पर आधारित जो जातियां है, जैसे दर्जी, धोबी, कुम्हार इत्यादि इनका ब्यौरा जनगणना में दिया जाने लगा। सामाजिक उच्च स्तरीय विचार से भारतीय समाज की दस श्रेणियां बनाई गईं और प्रत्येक श्रेणी की जनगणना के अलग अलग आंकड़े जुटाये गये। इसमें एक श्रेणी उनकी भी थी जो अछूत थे या उन्हें मंदिर प्रवेश के अधिकार से वंचित रखा गया था। इसी प्रकार पिछड़ी जनजातियों की अलग श्रेणी बनी। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि इन आंकड़ों के आधार पर इन सभी जातियों या धर्मों के लिये अलग अलग चुनाव क्षेत्र बनाये जा सकें। इस प्रकार की व्यवस्था के कारण मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों को अलग धर्मों के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया । इस लाभ् से प्रभावित होकर सायमन कमिशन के सम्मुख दलितों की १६ संस्थाओं ने अलग चुनाव क्षेत्र और अलग प्रतिनिधित्व की मांग की। यह अलगाव जो एक जाति को दूसरी जाति से, और एक धर्म को दूसरे धर्म से काट कर रख देता है, अंग्रेजों की राजनीति का एक प्रमुख अंग था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; परन्तु स्वतत्रंता प्राप्त्िा के बाद यह तय हुआ कि यद्यपि हमें अलगाव की वह नीति दूर रखनी पड़ेगी जो अंग्रेजों ने चलाई थी, फिर भी अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये कुछ विशेष प्रयत्न करने पड़ेगें । इसे पॉजिटिव &lt;br /&gt;डिसक्रिमिनेशन का नाम दिया गया। जहाँ संविधान की धारा ३३०  के अनुसार लोकसभा में और ३३२ के अनुसार विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिय सीटें आरक्षित की गई उसी प्रकार धारा ३३१ और ३३३ के अनुसार ऍग्लोइंडियनों के लिये भी सीटें आरक्षित हुई। लेकिन अंग्रेजों ने जो जातिवार जनगणना की पद्वति चलाई थी उसे समाप्त करा दिया गया। अतएव केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों के अलावा अन्य जातियों का अलग स्थान कम से कम जनगणना में नकारा गया है। इसके पीछे भूमिका यही थी कि इससे लाभ के बजाय हानि ही होगी क्योंकि जातीय अलगाववाद बढ़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; राजनैतिक क्षेत्र के अलावा शिक्षा और आर्थिक स्तर पर अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देने का प्रयास खासकर तीन दिशाओं में हुआ। पहला था शिक्षा की दिशा में । पिछड़ी जातियों की समुचित शिक्षा की गरज से उन्हें मिलनेवाले वजीफें और अन्य सहायता द्वारा, साथ ही शिक्षा संस्थाओं जैसे कॉलेज में उनके लिये कुछ स्थान आरक्षित कराके सबसे पहले उनकी शिक्षा का स्तर सुधारने के प्रयास हुए। नौकरी में उनके लिये कुछ स्थानों का आरक्षण कराके उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास हुआ। और तीसरा सूत्र यही था कि विभिन्न पंचवार्षिक और वार्षिक योजनाओं में कुछ हिस्सा खास तौर से अनुसूचित जाति और जनजातियों की प्रगति के लिये नियत किया जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; लेकिन राजनैतिक आरक्षण और अन्य प्रकार के आरक्षणों में यह अंतर है कि शिक्षा और नौकरी के आरक्षण के लिये संविधान में अनुसूचित जाति-जलजातियों के साथ साथ पिछड़ी जातियों का भी अंतर्भाव किया गया है। संविधान की धारा १६ में उल्लेखित शब्द क्ष्द्यद्म डठ्ठड़त्त्ध््रठ्ठद्धड्ड ड़थ्ठ्ठद्मद्मड्ढद्म दृढ ड़त्द्यत्ड्ढदद्म. पर काफी चर्चा हुई। क्योंकि इस प्रावधान में केवल अनुसूचित जाति जनजातियों की ही नहीं बल्कि सभी पिछड़े और कमजोर वर्गों को समाविष्ट किया गया है। उनके लिये प्रयुक्त शब्द भी 'वर्ग'  है न कि 'जाति' । इस प्रकार यह तय है कि जहाँ संविधान की धारा ३३०, ३३२ और ३३५ के प्रावधान में अनुसूचित जाति और जनजातियों का उनकी जाति पर आधारित स्पष्ट उल्लेख है, उस प्रकार संविधान की धारा १५ में जो शिक्षा संबंधी आरक्षण का प्रावधान है और धारा १६  में जो सरकारी नौकरियों के आरक्षण संबंधी प्रावधान है वहाँ केवल जाति को आधारभूति नहीं माना गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस प्रावधान के अंतर्गत केंद्रीय सरकार ने केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये शैक्षणिक और नौकरी के आरक्षण के लिये नियम बनाये। अनुसूचित जातियों के लिये शिक्षा संस्थाओं और सरकरी नौकरी में १५  प्रतिशत आरक्षण और अनुसूचति जनजातियों के लिये ७.५ प्रतिशत आरक्षण नियत हुआ। इस प्रकार के आरक्षण के लिये कोई अंतिम अवधि नहीं की गई है। न्यायालयों ने भी कई बार इसे संपूर्णतया न्यायोचित ही ठहराया है कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये यदि विकास की तेज रफ्तार प्रदान करनी है तो वह आरक्षण नीति द्वारा ही संभव है । उनके लिये शिक्षा और नौकरियों के विशेष और समुचित साधन न जुटाने का अर्थ वही होगा मानो उन्हें मौका प्राप्त करने के सामर्थ्य से वंचित किया गया हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  अन्य पिछडे वर्गों के लिये आरक्षण देने की नीति को राज्य सरकारों पर छोड़ा गया । फलस्वरूप विभिन्न राज्यों में जहाँ अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये आरक्षण का प्रतिशत तय है पिछड़े वर्गों के आरक्षण के प्रतिक्षण  अलग अलग है और समय समय पर इस प्रतिशत में परिवर्तन हुए हैं। साथ ही विभिन्न राज्यों में पिछड़े वर्गों की सूचियाँ विभिन्न हैं। इन्हें बनाने का आधार भी प्रायः जातियाँ ही रही हैं। विभिन्न जातियों ने अपने राजनैतिक दबाव क्षमता के अनुसार बारम्बार आरक्षण सुविधायें अपने पक्ष में जुटाने का प्रयास किया है। इसके कारण कई राज्यों में आंदोलन भी हुए हैं - कभी सौम्य रूप में तो कभी उग्र रूप में, कभी आरक्षण समर्थकों की ओर से तो कभी आरक्षण विरोधकों की ओर से । जब तक यह आंदोलन राज्यों की परिधि में रहे, बाकी देश पर इनका असर कम पड़ा । लेकिन जब केंद्र सरकार ने भी इस नीति पर अमल करना चाहा तो आंदोलनों ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया । आने वाले दिनों में जब भी इस नीति की बात चलेगी तो आंदोलन अवश्य होगें । साथ ही यह आंदोलन दिन प्रति दिन अधिकाधिक हिंसक बनेंगें और समाज में कटुता और अलगाव को बढ़ावा देते रहेगें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अतः प्रश्न यह उठता है कि जो नीति एक अच्छे उद्देश्य से बनाई गई और आरंभिक काल में जिसके विरुद्ध कोई आक्रोश नहीं उठा, आज उसी नीति को लेकर समाज बिखराव की स्थिति में क्यों आया है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-4471041532042203614?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/4471041532042203614/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=4471041532042203614' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/4471041532042203614'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/4471041532042203614'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/incomplete.html' title='04 आरक्षण नीति - एक चिंतन incomplete'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-8987306533122358360</id><published>2010-07-14T13:45:00.000-07:00</published><updated>2010-07-14T13:46:04.761-07:00</updated><title type='text'>बलसागर भारत -- साने गुरुजी, हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बलसागर भारत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; -- साने गुरुजी&lt;br /&gt;हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले&lt;br /&gt;[Can be sung with the same tune as original Marathi]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बलसागर होवे भारत&lt;br /&gt;विश्र्व में रहे अपराजित।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कंकण बाँधा कर में &lt;br /&gt;जीवन हो जनसेवा में&lt;br /&gt;हों प्राण राष्ट्र के हित में&lt;br /&gt;मैं मरने को भी उद्यत&lt;br /&gt;बलसागर होवे भारत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैभव दिलवाऊँ इसको&lt;br /&gt;सर्वस्व सौंप दूँ इसको&lt;br /&gt;तिमिर घोर संहारन को&lt;br /&gt;तुम बंधु, बनो सहायक&lt;br /&gt;बलसागर होवे भारत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथों में हाथ मिलाकर&lt;br /&gt;हृदयों से हृदय जुडाकर&lt;br /&gt;एकता मंत्र अपनाकर&lt;br /&gt;हो जाएं कार्यों में रत&lt;br /&gt;बलसागर होवे भारत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर ऊँची दिव्य पताका&lt;br /&gt;गूँजाओ गीत भारत का&lt;br /&gt;विश्र्व में पराक्रम इसका&lt;br /&gt;दिग्‌ दिगन्त गूँजे स्वागत&lt;br /&gt;बलसागर होवे भारत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उठो श्रम करो सार्थ&lt;br /&gt;दिखलाना है पुरुषार्थ&lt;br /&gt;यह जीवन ना हो व्यर्थ&lt;br /&gt;चमकाओ भाग्य का सूरज&lt;br /&gt;बलसागर होवे भारत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत माँ फिर सँवरेगी&lt;br /&gt;प्रभुता भी दिव्य पाएगी&lt;br /&gt;विश्र्व में शांति लाएगी&lt;br /&gt;वह स्वर्णिम दिन है निश्च्ित&lt;br /&gt;बलसागर होवे भारत।&lt;br /&gt;--------------------------------------&lt;br /&gt;published in Devputra monthly from Indore&lt;br /&gt;kept on http://www.geocities.com/man_na_jane_manko/kavita_h_m&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-8987306533122358360?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/8987306533122358360/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=8987306533122358360' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/8987306533122358360'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/8987306533122358360'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/blog-post_14.html' title='बलसागर भारत -- साने गुरुजी, हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-253756033738555429</id><published>2010-07-01T21:21:00.000-07:00</published><updated>2010-07-15T07:33:44.129-07:00</updated><title type='text'>03 आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी</title><content type='html'>आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी&lt;br /&gt;published in weekly Ravivar&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि इकबाल ने बडे फख्र के साथ कहा कि युनानी, मिस्त्री, रोमन सभी सभ्यताएँ जहाँ मिट गई, मगर हमारी पहचान अभी बाकी है - कुछ ऐसी बात है कि हमारी सभ्यता मिटती नही है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिटती तो खैर न हो, लेकिन सिमटती जा रही है जरूर वह भी हमारे ही बनाये छलावो के कारण ऐसे समय में पथदीपक कौन है ? जब इतिहास की ओर नजर उठाई तो सबसे पास एक व्यक्तित्व दीख पड़ता है - आदि शंकराचार्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रचुर विव्दता, सन्यासी प्रवृत्त्िा, सामाजिक प्रश्नों की मार्मिक पहचान एक तिलतिलाहट, एक चुभन - कि क्योंकर हिन्दु समाज सारी सामाजिक कुरीतियों के दलदल में फंस रहा है, क्योंकर लोगो को सामाजिक न्याय की निश्च्िातंता केवल बौध्द धर्म में ही मिल रही है ? क्योंकर वैदिक कर्मकांण्ड़ मे उलझ कर रह गया हमारा विव्दत् समाज एक शिक्षक, एक आलोचक और एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में असमर्थ है? आदि शंकराचार्य की पहचान हम जाने अनजाने इन प्रश्नों के साथ और उनके समाधान के साथ करते है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अत्यंत छोटी आयु मे ही आदि शंकराचार्य संन्यास ग्रहण किया और फिर घर से बाहर सुदूर प्रांतो में जाकर विधाध्ययन किया । हिंदू समाज रचना में संन्यासी  का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है । सारे समाज को पीढीदर - पीढी गलत रास्ते पर भटकने से रोकते रहना हो तो समाज में कुछ ऐसी परम्परा का होना और कुछ ऐसे व्यक्तियों का होना आवश्यक है जो द्रष्टा हो, दार्शनिक हों और अपने वैयक्तिक लाभ से परे उठकर समाज के विषय मे सोच सकें और समाज को राह दिखाने का काम कर सकें. कहते है कि इस प्रकार पथप्रदर्शन का काम राजा और विद्वान छोटे पैमाने पर और सन्यासी बडे पैमाने पर कर सकते है । लेकिन शर्त यह है कि सन्यासी को अपना धर्म अच्छी तरह मालूम हो । उसका सन्यासी बनना महज एक आलसी के लिये पेट पालने का बहाना न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्च्िात ही यह माना जा सकता है कि आदि शंकराचार्य को उस मर्म की पहचान थी। तभी तो सन्यासी होते हुए भी उन्होने समाज से दूर, समाज से अपरिचित रहने का रास्ता नहीं अपनाया। बल्कि समाज में रहते हुए, घुम घुम कर, समाज की अनिष्ट मान्यताओ का खंड़न किया व्दैतवाद के चक्कर में बुरी तरह से फँसे और वैष्णव - शैव - शाक्वत वाद के फलस्वरूप टुकडे टुकड़े होकर बिखर रहे समाज में अव्दैतवाद की स्थापना कर समाज में एकीकरण की प्रक्रिया जारी कराई. इसके साथ बुध्द धर्म में भी जो अधःपतन और अवनति हो रहा था उस पर चोट की जिससे एक और यधापि बौध्द धर्म का भारतवर्ष में विस्तार भले ही रूक गया हो, पर इस अवनति से उबरने के प्रयत्न भी आरंभ हो गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः शंकराचार्य ने भारतवर्ष के चारो कोने में चार ज्ञानपीठों की स्थापना की और अपने उत्तराधिकारियों की वहाँ प्रस्थापित किया ताकि यह ज्ञानपीठ पूर्णतः सही माने में समाज के पथप्रदर्शन के लिये एक परमेंनेट इनस्टियुशॅन बन जाये &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बडे दुर्भाग्य की बात है कि शंकराचार्य की विभिन्न रचनाओं को जिस प्रकार उन्होने शब्दबध्द किया, निबधित किया और उसकी प्रतियाँ बनाकर सुरक्षित रखी गई, उस प्रकार शंकराचार्य के विभिन्न वाद - विवाद, शास्त्रार्थ और चर्चाओ को शब्दाकिंत कर सुरक्षित रखने कि आवश्कता किसी ने नही समझी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु शंकराचार्य के जीवन काल की एक घटना ऐसी है जिसकी दुहाई उनके उत्तराधिकारी बार बार देते है उस घटना व्दारा अव्दैतवाद के सिध्दान्त की पुष्टि कराने के लिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते है कि एक बार आदि शंकराचार्य बनारस के घाट पर गंगा स्नान करके बाहर निकले ही थे कि एक चमार उनसे छुआ गया संस्कारों के प्रबल प्रभाव के अंतगर्त शंकराचार्य ने कहा दिया अपसर अर्थात 'दूर हो जा' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चमार ने हँसकर उनसे पुछा यह तुम किससे दूर हटने के लिये कह रहे हो क्या मेरी आत्मा से? पर वह और तुम्हारी आत्मा ब्रह्म एक ही है. रही बात मेरी दोह की तो तुम्हे उससे क्या अंतर पड़ता है? वह उसी के चाभ से बनी है जिससे तुम्हारी भी देह बनी है.&lt;br /&gt;इस पर शंकराचार्य को अपनी गलती का पता चला और उन्होने चमार को प्रणाम कर अपना गुरू बना लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना से वह स्पष्ट है कि स्पृश्य - अस्पृश्य के भेदभाव को समाप्त  करना का निर्णय शंकराचार्य ने अवश्य किया होगा. अवश्य ही उनके ज्ञानपीठो में उन्होने कुछ निर्देश दिये होगें. लेकिन आज इन्ही ज्ञानपीठो के सत्ताधिकारी किसी सामाजिक प्रश्न पर चर्चाए चलाते हुए नही पाये जाते है - और खासकर अस्पृश्यता के प्रश्न पर तो अब ऐसा रुख अपनाया जा रहा है जो अव्दैतवाद के सिध्दान्त को किसी गहन अंधेरे कोने में फेंक देने का सामथ्य रखता है यह भ एक दुर्भाग्य की ही बात है कि ज्ञानपीठो के ये अधिकारी सत्ताधिकारी तो है लेकिन वे ज्ञानाधिकारी है या नही इसके विषय में संदेह किया जो सकता है जब मंड़न मिश्र की पत्नी ने शंकराचार्य को विव्दत्सभा में शास्त्रार्थ के लिए ललकारा तो आदि शंकराचार्य पीछे नही हटे . परन्तु आज यादि कोई जिज्ञासु भी प्रश्न पुछे तो उसे दरकिनार कर दिया जाएगा फिर शास्त्रार्थ के लिए तैयार होना तो दुर ही रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए आदि शंकराचार्य की गद्दी पर जो भी बैठते हो, यदि उनका दावा है कि वे ज्ञान के अधिकार से वहाँ बैठे है - तो एक प्रश्न उनसे पुछना आवश्यक है । वह यह कि समाज पुरूष की प्रगति के लिए सबसे बाछनीय क्या है? धन धान्य का विस्तार या निरंकुश सत्ता का विस्तार या ज्ञान का विस्तार? यदि ज्ञान का विस्तार ही सबसे - अधिक वाछनीय है, तो किसी को अस्पृश्यता के नाम पर ज्ञान से वंचित रखना क्या उचित है ? यह भी उनसे पुछना चाहिए कि ज्ञानोपासना में श्रध्दा का क्या महत्व है ? (हालाँकि इसका उत्तर भगवद्गीता में है - जब श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि मेरे दर्शन के अधिकारी तुम ङुए हो वह तुम्हारे ज्ञान, दान, जप, तप की अपेक्षा तुम्हारी भक्ति के कारण हुए हो. ) यदि नही है तो स्वयं भी मंदिरो में जाना छोड़ दें - और यदि है तो किसी को श्रध्दास्थान में जाने से रोककर क्या ज्ञान का विस्तार हो सकता है ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञान की बात मेंने इसलिए उठाई है के अस्पृश्यता सिध्दान्त को जब कभी बढाया दिया गया और दूसरी ओर से कबुल भी कर लिया गया - उस समय निश्चय ही उनके अज्ञान का लाभ उठाया गया और फिर लाभ कायम रखने के लिये उनके अज्ञान को पनपाया गया - यह कहकर कि वे ज्ञान के अधिकारी नही है. और खासकर आज के परिप्रेक्ष्य में जब हमारा समय अपने ही दायरे में सिमट कर छोटा होता जा रहा है और बिखर रहा है, और वही काम एक बार फिर करना आवश्यक हो गया है जो कभी आदि शंकराचार्य ने किया था - तो जाहिर है कि इस प्रश्न की जिम्मेदारी न केवल उनके उत्तराधिकारियों को ही निभानी है बल्कि उन सभी को जो इन शंकराचार्येकी भक्त मंड़ली में है. क्या वे निभायेगें  इस जिम्मेदारी को?&lt;br /&gt;-------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-253756033738555429?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/253756033738555429/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=253756033738555429' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/253756033738555429'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/253756033738555429'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='03 आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-5533339502253486684</id><published>2010-06-27T10:39:00.000-07:00</published><updated>2010-06-28T20:42:17.198-07:00</updated><title type='text'>मेरी प्रांतसाहबी के लोकार्पण पर श्रीमति प्रज्ञा शुक्ल</title><content type='html'>हिन्दी (भारतीय भाषा) दिवस समारोह, &lt;a href="http://www.jainendra.com/?p=329"&gt;आयोजक -- महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी, (देखें उनकी रिपोर्ट)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;14 सितम्बर, 2009&lt;br /&gt;---- श्रीमति प्रज्ञा शुक्ल&lt;br /&gt; आदरणीय मंच एवं दीर्घा  में उपस्थित आप सब को नमस्कार |&lt;br /&gt; साहित्यकार अपने परिवेश की ही पौध होता है | वह अपने जीवनमें आसपासके, विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक स्थितियों, संस्कारों एवं मूल्यों रूपी हवा, पानी एवं स्वाद से अपने व्यक्तित्व-रुपी पौधे को एक वटवृक्ष के रुप में विकसित करता है | प्रेमचन्द का कथन है कि साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है, जो भाव और विचार लोगों के ह्दयों को स्पंन्दित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं | अत: साहित्यकार अपने परिवेशसे एवं उसके साहित्य-परिवेशगत संवेदनाओंसे प्रभावित  होता है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; श्रीमती लीना मेहेंदले की पुस्तक मेरी प्रांतसाहबी  लीनाजी के बहुमुरबी व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब है | इस पुस्तक में समाविष्ट 11 लेख उनके आसपास घटित घटनाओं पर उनके वाचन, मनन और चिंतन की अभिव्यक्ति है| ठोस सामाजिक मुद्दों पर विवेचना लीनाजीके लेखन का सबसे सशक्त माध्यम है| फिजिक्स की प्रवक्ता से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के विभिन्न पदों पर कार्यरत लीनाजी का मातृभाषा मराठी एवं हिन्दी दोनों पर समान अधिकार है जिसका उन्होंने लेखन एवं अनुवाद के द्बारा रचनात्मक रूपसे भरपूर उपयोग किया है | देश की विभिन्न समस्याओं, घटनाओं, सामयिक स्थितियों नें लीनाजी को प्रभावित किया है | उनके प्रति जागरुकता दर्शाकर उन्हें सुधारने की दिशा में लीनाजी निरंतर कार्यरत एवं चिंतनरत है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; लीनाजी का लेखन केवल किसी हकीकत का सीधा सपाट बयान नहीं है परंतु उसमें वे अपने चिंतन के अमूल्य मोती भी पिरोती जाती हैं | सामान्य पाठक की जानकारी हेतु विभिन्न मुद्दों पर छोटी-छोटी टिप्पणी भी करती चलती हैं | इस पुस्तक का शीर्षक है मेरी प्रांतसाहबी | इसी शीर्षक से 41 पृष्ठों का एक आत्मकथ्यात्मक लेख है जिसमें उनके प्रशासकीय जीवन के आरंभिक अनुभव समाविष्ट हैं | असिस्टंट कलेक्टर, सब-डिविजनल ऑफिसर, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के लिए महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में प्रांतसाहब संबोधन अधिक परिचित है अत: शीर्षक है मेरी प्रांतसाहबी | इसमें लीनाजी ने अपने प्रशिक्षण एवं कार्यकाल के दौरान जो गुर सीखे, अपने पिता एवं पति के घड़ी के साथ जुड़े कार्यक्षेत्र की तुलना में अपनी चौबीस घंटोंकी डयूटी का तालमेल, अन्य अधिकारियों से प्राप्त प्रेरणा, अपने स्त्री होने के कारण प्रांतसाहब के समक्ष आनेवाली समस्याऐं एवं दायित्व, एक सजग अधिकारी के रूप में अपनी कार्यकुशलता, विवेकबुध्दि का उपयोग, शासन प्रणाली की कमजोरी एवं महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में प्रगति की धीमी गतिसे चिंतित लीनाजी का विचारोत्तेजक एवं दूरदर्शी रूप उभरता है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  महिला संशक्तिकरण एवं महिलाओं के साथ होनेवाले अत्याचार, उनकी हत्यासे आनेवाली पीढ़ी के लिए एवं देश में स्त्रियों की स्थिति के लिए लीनाजी की चिंता व्यक्त होती है | वे मानती हैं कि अपराधी को तत्परता से सजा नहीं दिए जाने के लिए हमारी ढीली दंड-प्रक्रिया और न्यायिक कार्यवाही जिम्मेदार है | “विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराधों का विश्लेषण”, “राजस्थान : कहाँ है जनमने और पढ़ने का हक”,  “महिला सशक्तिकरण की दिशा में”, तथा “उन्मुक्त आनंद का फलसफा” जैसे लेख लीनाजी की महिला विषयक गहरी सोच और सरोकार का परिचय देते हैं | “व्यवस्था की एक और विफलता” लेख हमारी कमजोर पड़ती शासन व्यवस्था का पर्दाफाश करता है | वे मानती हैं पेपरलीक का उपाय परीक्षा पद्धति में बदलाव एवं कम्प्युटर के सही उपयोग द्बारा संभव है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हिन्दी भाषा के प्रति लीनाजी का लगाव और चिंता उनके भाषा विषयक लेख दर्शाते हैं | हिन्दी एवं भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे से जुड़कर ही अपना भविष्य संवार सकती हैं | आज तक हम हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ में मान्यता नहीं दिला पाए इसके लिए वे राजनेता एवं हिन्दी साहित्यकारोंको जिम्मेदार ठहराती हैं | सुरीनामियों की भाषाविषयक चिंताको लीनाजी हमारी भाषाविषयक चिंता से जोड़कर देखती हैं | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; गो.नि.दांडेकर संस्मरण में उनके लेखनकी विशेषताओं का उल्लेख है तो कुसुमाग्रज की कविताओं के अनुवाद को वे एक सागर मथनेके समान मानती हैं | डॉ.राज बुध्दिराजा लेख में भारतीय समाज में पुत्र और पुत्री के बीच भेदभाव का मर्मस्पर्शी चित्रण है | भगवद्गीता से प्रभावित लीनाजीने उसमें वर्णित बुद्धियोग की विस्तार से चर्चा की है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नकली स्टॅम्प पेपर बनानेका करोबार चलानेवाला एक सामान्य स्टॅम्प वेन्डर तेलगी जब पूरे देश की प्रभुसत्ता के साथ खिलवाड़ करता है तो एक प्रशासक एवं जिम्मेदार नागरिक के रुप में लीनाजी का खून खौल उठता है | मतपत्रिका में नापसंदगी जताने की सुविधा के विषय में जब चुनाव आयोग ने कहा कि अभी हम इसके लिए तैयार नहीं हैं तो लीनाजी सवाल उठाती हैं कि क्या डर है चुनाव आयोग या प्रशासन या संसद-मंडल को ? कहीं यह डर लोगों की मुखरता का तो नहीं ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बायोडीजn -अपार संभावनाएँ  उनका भविष्यदर्शी चिंतनपरक लेख है | दिल्ली में स्थित खाली पड़ी अगस्तक्रांति भवन की इमारत विषयक लेख में कार्यालयों मे छुट्टी के माध्यम से राष्ट्रीय सँपत्ति गंवाने के बारे में लीनाजी ने चिंता प्रकट की है | इस पुस्तक का अंतिम लेख मालूम ही नहीं कि सुभाष स्वतंत्रता सेनानी थे सरकारी फाइलों के रिकार्ड पर करारा व्यंग्य है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कुल मिलाकर मेरी प्रांतसाहबी पुस्तक लीनाजी के व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन, उनके हर्ष-शोक, संयुक्त कुटुंब पद्धति के लाभ, एक कुशल एवं कर्मनिष्ठ प्रशासक के जीवन की विभिन्न घटनाओं एवं भाषा, समाज, प्रशासन, व देश के प्रति चिंतन का प्रामाणिक दस्तावेज है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; धन्यवाद &lt;br /&gt;----------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;uploaded at  https://sites.google.com/site/janatakiray/&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-5533339502253486684?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/5533339502253486684/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=5533339502253486684' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/5533339502253486684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/5533339502253486684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='मेरी प्रांतसाहबी के लोकार्पण पर श्रीमति प्रज्ञा शुक्ल'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-641148372389755386</id><published>2009-08-28T21:59:00.000-07:00</published><updated>2009-08-28T22:04:28.130-07:00</updated><title type='text'>तीसरा लेख संग्रह -- मेरी प्रांतसाहबी</title><content type='html'>मेरा तीसरा लेख संग्रह -- मेरी प्रांतसाहबी&lt;br /&gt;श्वेताभ अश्क&lt;br /&gt;संकेत प्रकाशन, लखनऊ&lt;br /&gt;अनुक्रम --&lt;br /&gt;मेरी प्रांतसाहबी&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-641148372389755386?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' 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src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-6006572065780261280</id><published>2009-04-04T20:24:00.000-07:00</published><updated>2009-07-08T23:43:03.302-07:00</updated><title type='text'>एक था फेंगाडया</title><content type='html'>प्रस्तावना&lt;br /&gt;-- डॉ. अरूण गद्रेके उपन्यासके भाषान्तर की--&lt;br /&gt;हजारों वर्षों पहले जब आदिमानव गुफा रहता था, जब उसने केवल आग जलाना और झुण्ड में रहना सीखा था लेकिन गिनती, खेती, वस्त्र, चित्रकला, जख्मी का इलाज आदि से अभी कोसों दूर था, उस जमाने के मानव से आज के मानव तक का उन्ननय का इतिहास क्या है?&lt;br /&gt;प्रसिद्ध मानववंश शास्त्रज्ञ डॉ मार्गरेट मीड अपने एक लेख में कहती हैं-"A healed femur is the first sign of human civilization"&lt;br /&gt;डॉ मीड कहती हैं, उत्खननों में मानवों की कई हड्डियाँ मिली थीं, जो टूटी हुई थीं। ये वे लोग थे जिनकी हड्डियाँ जानवर के आक्रमण या अन्य दुर्घटना में टूटीं और इस प्रकार असहाय, रूद्धगति बना मनुष्य मौत का भक्ष्य हो गया। कई हड्डियाँ मिली जो अपने प्राकृतिक रूप में थी- अखण्डित। ये वे मनुष्य थे जो हड्डी टूटकर, लाचार होकर नही, वरन्‌ अन्य कारणों से मरे थे। लेकिन कई सौ उत्खननों में, कई हजार हड्डियों में कभी एक हड्डी ऐसी मिली, जो टूटकर फिर जुड़ी हुई थी। यह तभी संभव था जब लाचार बने उस आदमी को किसी दूसरे आदमी ने चार छः महीने सहारा दिया हो, खाना दिया हो, जिलाया हो। जब सबसे पहली बार ऐसा सहारा देने का विचार मनुष्य के मन में आया, वहाँ से मानवी संस्कृती की, करूणा की संस्कृति की, एक दूसरे की कदर करने की संस्कृती की शुरूआत हुई। जाँघ की टूटकर जुड़ी हुई हड्डी साक्षी है उस मनुष्य के अस्तित्व की जिसमें करूणा की धारा, और उसे निभाने की सक्षमता पहली बार फूटी।&lt;br /&gt;डॉ. मीड के लेख को पढने के बाद पेशे से डॉक्टर श्री अरूण गद्रे को लगा कि यह एक बड़े ही मार्मिक संक्रमण काल का चिह्न है। कैसा रहा होगा वह मुनष्य, वह हीरो, जिसके ह्रदय में पहली बार यह दोस्ती और सहारे का झरना फूटा होगा।&lt;br /&gt;डॉ. गद्रे ने इस विषय पर डॉ. पॉल ब्रॅण्डट् से चर्चा की। डॉ. ब्रॅण्डट् तीस वर्ष तक वेल्लोर के ख्रिश्चन मेडिकल कॉलेज में कुष्ठरोगियों के बीच रहे और उनके गले हुए हाथों पर सर्जरी की पद्धति विकसित करने के लिए प्रख्यात हैं। एक पत्र में ब्रॅण्डट् ने गद्रे को ऐसी ही दूसरी कहानी लिखी है- 'कोपेनहेगेन की एक म्यूजियम में छः सौ मानवी कंकाल जतन कर रखे गए हैं। ये सारे कंकाल उन कुष्ठरोगियों के हैं जिन्हें पाँच सौ वर्ष पूर्व एक निर्जन द्वीप पर मरने के लिए छोड़ दिया गया था। इन सभी कंकालों के पैर की हड्डियाँ रोग के कारण घिसी हुई हैं। लेकिन इनमें कुछ कंकाल अलग रखे गए हैं क्योंकि उनकी पाँव की हड्डियों पर बाद में भर जाने के चिहन स्पष्ट हैं। इसलिए कि कुछ मिशनरी उस द्वीप पर गए थे और जितना बन सका उन कुष्ठ रोगियों की सेवा की। इसी से कुछ रोगियों के पैर की घिसी हड्डियाँ भर गई। वे अलग रखे गए कंकाल साक्षी हैं उन मिशनरियों की सेवा के।&lt;br /&gt;डॉ. ब्रॅण्डट् से विचार विनिमय के पश्चात डॉ. गद्रे ने जिन संदर्भ ग्रंथों को पठन और मनन किया वे थे- दि ऍसेन्ट ऑफ मॅन, कॅम्ब्रीज फील्ड गाइड टू प्रीहिस्टोरिक लाइफ, दि डॉन ऑफ ऍनिमल लाइफ, इमर्जन्स ऑफ मॅन, तथा गाइड टू फॉसिल मॅन।&lt;br /&gt;इन सभी के मंथन और डॉ. गद्रे की अपनी साहित्यिक प्रतिभा से एक उपन्यास के चरित्र तैयार हुए वे थे फेंगाडया, बापजी और बाई के। उन्हीं से ताना बाना बुना गया टोलियों और बस्तीयों के बनने, उजड़ने और आगे बढ़ने का- मानवी संस्कृति के विकास का। वही उतरा है मराठी उपन्यास 'एक होता फेंगाडया' में।&lt;br /&gt;मराठी में यह उपन्यास १९९५ में प्रकाशित हुआ। उसी वर्ष इसकी बडी जीवट वाली वृद्ध प्रकाशिका श्रीमती देशमुख से मैं मिली थी। तब तक मैं सिद्धहस्त अनुवादक के रूप में प्रसिद्ध हो गई थी क्योंकि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं से कई कहानियाँ मैंने मराठी में अनूदित की थीं और उसी कथा संग्रह का प्रकाशन देशमुख कंपनी करने वाली थी। चूँकि मेरी चुनी हुई कथाओं के कथानक नितान्त विभिन्न रंग-ढंग-इतिहास-भूगोल के थे, तो उसे मेरी रूचि जानकर मुझे यह पुस्तक पढने के लिये कहा। अगले तीन दिनों में ही मेरे दिमाग में यह इच्छा दर्ज हो गई कि इसका हिंदी अनुवाद करना है। ऐसी ही इच्छा अन्य पांच पुस्तकों के लिये है जिनपर मैंने अभी तक काम शुरू नही किया है। ज्ञानपीठ के श्री श्रोत्रिय से एक बार मैंने फेंगाडया की चर्चा की तो उनका आग्रह शुरू हो गया कि इसका अनुवाद जल्द से जल्द किया जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फेंगाडया के कथानक में एक बडी कठिनाई यह है कि यह प्रागैतिहासिक काल से जुडी हुई रचना है। मैं नही जानती की हिंदी में रांगेच राघव जी के अलावा किसी ने इस प्रकार का प्रयास किया है। यह वह काल है जब मनुष्य ने खेती नही सीखी- वस्त्र पहनना नही सीखा- यहाँ तक कि पेड की छाल लपेटना भी नही। केवल बांस की खपच्चियों से बने कुटीर का उपयोग सीखा है। आग का उपयोग सीखा है। फिर भी कंदरा और गुफा पूरी तरह से नही छूटी है। भाषा विकसित नही हुई है। फिर भी मनुष्य विकसित हो रहा है- उसमें एक 'हिरोइक स्पिरिट' है। नया सीखने की ललक है। कलाकार की प्रतिभा है, दार्शनिक का तत्व-चिंतन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी लिये उपन्यास में एक हीरो या एक हीरोईन नही है- कई हैं। एक फेंगाडया है जिसमें शक्ति-सामर्थ्य है, दूरदृष्टि है, करूणा है और अपने विश्र्वास के प्रति अडिगता है। एक पंगुल्या है जो खोजी है- वैज्ञानिक है, गणितज्ञ है। एक पायडया है जो कथाकार है, कलाकार है और संगीतकार है। एक बाई है जो नेता है, दिशादर्शक है, अनुशासन और शासन करना जानती है। एक चांदवी है जो किशोर बयीन है और हर बार सवाल उठा सकती है- क्यों? एक कोमल है जो अपनी समझदारी से सबके लिये आधार बनकर डटी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और एक बापजी है- जो सत्ता के खेल को अच्छी तरह समझ सकता है, खेल सकता है और अपनी विध्वंसक आकांक्षा के लिये मकड जाल बुन सकता है। उस जाल को तोडकर- समाज को विकास के अगले सोपान पर ले जाने वाला उपन्यास है- फेंगाडया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा- भले ही उपन्यास का प्रकाशन इक्कीसवीं सदी का हो, लेकिन उसका घटनाकाल यदि दस पंद्रह हजार वर्ष पुराना है तो उसकी भाषा कैसी होगी? इसी लिये उपन्यास में जरूरत पडी कि इसका शब्द-भंडार सीमित रखा जाय, सरल रख्खा जाय- और फिर भी अभिव्यक्ति पूरी हो। हाँ, पठन को नादमय, और लयात्मक बनाने के लिये कुछ शब्दों को खास तौर पर रखा गया है जैसे ऋतुचक्र, मरण, मृतात्मा, सूर्यदेव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा- उस काल में व्यक्तियों का नाम देने का चलन तो था (बिना नामों में उपन्यास कैसे&lt;br /&gt;बने?) लेकिन उसका तरीका क्या हो सकता है? तो सबसे सरल है कि व्यक्ति की देहयाष्टि के अनुरूप नाम दिया जाय। और मराठी में यह चलन भी है कि किसी नाम को आदरपत्र बनाना हो तो अन्त में 'बा' लगे और उसे मित्रता या छोटेपन के भाव से जोडना हो तो 'या' लगे। इसी लिये कथानक के पात्रों के नाम बने- फेंगाडया- जो पांवों को तिरछा फेंक कर चलता है, पंगुल्या- जो पंगु है। वाघोबा- अर्थात्‌ वाघ का भयकारी रूप।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयुर्वेद की कई मान्यताओं का प्रयोग भी इस उपन्यास में बखूबी हुआ है। मसलन, महाराष्ट्र में अब भी माना जाता है कि कुछ बच्चे जिनके जन्म के समय पैर पहले बाहर निकलते हैं और सिर बाद में, उनमें कुछ विशेषता होती है। उन्हें पायडया कहा जाता है। ग्रामीण भागों में अब भी माना जाता है कि किसी औरत का बच्चा आसानी से पेट से न निकल रहा हो और कोई पायडया उसके पेट पर हल्की सी लात मारे तो बच्चे का जन्म तुरंत हो जाता है। सारे पायडया प्रायः कलाकार होते हैं। यह भी माना जाता है कि उन्हें जमीन के नीचे पानी होने का संकेत मिल जाता है- और धन के होने का भी। जाहिर है कि ये मान्यताएँ हजारों वर्षों में बनी हैं। लेखक ने इनका अच्छा उपयोग उपन्यास में किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपन्यास में सारे भाव, सारे रसों की सृष्टि आखिरकार शब्दों से ही होती है। और इस उपन्यास का शब्द भांडार है सीमित। इसी लिये कई ध्वन्यात्मक शब्दों को मैंने मराठी से ज्यों का त्यों लिया है- मराठी मूलतः एक कठिन स्वरोच्चारों की भाषा है जबकि हिंदी मृदु स्वरोच्चारों की भाषा है। मराठी का शब्द भांडार भी अधिक विस्तृत है। अतएव कुछ शब्दों का चयन मराठी से करना पडा। पहली बार उन्हें पढना थोडा अटपटा जरूर लगता है, लेकिन दूसरी तीसरी बार पढते पढते उनके अर्थ, उपयोगिता और सटीकता भी सामने आने लगते हैं। ये शब्द हिंदी में इतने आसानी से घुल मिल जाते हैं कि उनका अटपटापन समाप्त हो जाता है।&lt;br /&gt;अनुवाद पूरा कर लेने के बाद श्रोत्रिय जी ने सुझाया कि इस पर श्री रामकुमार 'कृषक' से सलाह ली जाय, उधर मैंने अपने तईं श्री दिनेश शुक्ल जी से भी राय सलाह कर ली थी। इन दोनोंके सुझावों ने उपन्यास के अनुवाद को निखारा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तो प्रागैतिहास कालीन उपन्यास- तिस पर एक खास ऍन्थ्रोपोलॉजिकल तथ्य को आधार बनाकर लिखा हुआ- फिर भी मुझे विश्वास है कि हिंदी के प्रबुद्ध पाठक इसका स्वागत करेंगे, क्योंकि किसी पाठक के मन में जिज्ञासा और नवीनता के लिये जो अकुलाहट होती है- यह उपन्यास उसका समाधान करता है।&lt;br /&gt;--------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-6006572065780261280?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/6006572065780261280/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=6006572065780261280' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/6006572065780261280'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/6006572065780261280'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='एक था फेंगाडया'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-1619888757363494632</id><published>2009-03-19T14:09:00.000-07:00</published><updated>2009-03-19T14:10:47.157-07:00</updated><title type='text'>mahila samasya sahara</title><content type='html'>mahila samasya sahara&lt;br /&gt;To look for these articles.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-1619888757363494632?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/1619888757363494632/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=1619888757363494632' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1619888757363494632'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/1619888757363494632'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2009/03/mahila-samasya-sahara.html' title='mahila samasya sahara'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-8779651443291573267</id><published>2009-01-25T02:33:00.000-08:00</published><updated>2009-02-01T09:30:10.944-08:00</updated><title type='text'>Petetion for my Voting Right : Time to revise the outdated Rule 49-O&lt;</title><content type='html'>The following petetion is found on net, meant for Election Commission of India.&lt;br /&gt;It asks you to sign it so that our Voting Right which is a Fundamental Right, can be protected.&lt;br /&gt;To sign one has to klick on&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.petitiononline.com/mod_perl/signed.cgi?fix_49_o&amp;1"&gt;http://www.petitiononline.com/mod_perl/signed.cgi?fix_49_o&amp;1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Time to revise the outdated Rule 49-O&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;Ref Election Commission Press Note No.ECI/PN/35/2008&lt;br /&gt;Dated: 5th December, 2008&lt;br /&gt;To: &lt;br /&gt;The Chief Election Commissioner of India&lt;br /&gt;Sir,&lt;br /&gt;You are aware that Section 49-O of �The Conduct of Electoral Rules, 1961� reads as under :&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;Sec. 49-O Elector deciding not to vote:--&lt;br /&gt;-----&lt;br /&gt;If an elector, after his electoral roll number has been duly entered in the register of voters in Form-17A and has put his signature or thumb impression hereon as required under sub-rule (1) of rule 49L, decided not to record his vote, a remark to this effect shall be made against the said entry in Form 17A by the presiding officer and the signature or thumb impression of the elector shall be obtained against such remark.&lt;br /&gt;-----&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;This rule was framed in 1961 after 2 general elections had been held in the country. It appears that in these 2 elections it came to the notice of ECI (Election Commission of India) that there are some voters who may not want to cast vote It is for such people that the Rules provided for the procedure of using form No.17-A as detailed in Section 49-O. For long people in this country have thought that this provision is made for those voters who have not liked the candidature of any of the contesting candidate. Otherwise why would any voter, who feels that none of the contesting candidates is worthy will still take the trouble to reach the polling booth and appear for voting? Would he/she not go to enjoy the holiday as indeed many of the voters who know that ECI does not care for their opinion do go away to a holiday picnic. Sadly your notification suggests that they were right and some of us who trusted our democratic principles were wrong.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;We wish to submit that the Rules framed in 1961 are today outdated and insufficient and fail to take proper cognizance of the feelings, decision and voting right of a voter as regards the candidates contesting the election. Most important aspect is that voting choice expressed through from 17-A is not counted � its value is that of a waste-paper as indeed your notification seeks to confirm.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Any voter, who feels that none of the contesting candidates is worthy of being elected and has still taken the trouble to reach the polling booth and appear for voting, definitely wishes his or her vote to be recorded and counted. Hence the present Section 49-O needs to be modified. It should now be provided that the Ballot paper will indicate �NO CHOICE� or �None of the Above� as one of the possible voting choices and the electronic machine will also provide for this choice and have a system to record and count the same.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The Right to Express our choice through Vote is the highest right given in a democracy. Even when we wish to declare all the contesting candidates unworthy, our opinion MUST be recorded and counted during Election. Today�s rules deny us this Fundamental Right. It is a matter of abrogation of our right. People in this country look up to you and expect you to be proactive and give a platform to their feeling. Hence we the undersigned request that necessary change in the Rules be made so that all the thinking voters get a right to record their opinion which should then be counted during the process of counting of votes and be declared while declaring the results of election. This will necessitate some further reforms which we hope, will occur eventually.&lt;br /&gt;Sincerely,&lt;br /&gt;The Undersigned &lt;br /&gt;To sign one has to klick on &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.petitiononline.com/mod_perl/signed.cgi?fix_49_o&amp;1"&gt;http://www.petitiononline.com/mod_perl/signed.cgi?fix_49_o&amp;1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mail.google.com/mail/?ui=2&amp;ik=bb906cc183&amp;view=att&amp;th=11f2b5b9d5866200&amp;attid=0.2&amp;disp=inline&amp;zw"&gt;Also see a Navbharat Times news here.&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mail.google.com/mail/?ui=2&amp;ik=bb906cc183&amp;view=att&amp;th=11f2b5b9d5866200&amp;attid=0.3&amp;disp=inline&amp;zw"&gt;And a TOI news&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mail.google.com/mail/?ui=2&amp;ik=bb906cc183&amp;view=att&amp;th=11f2b5b9d5866200&amp;attid=0.1&amp;disp=inline&amp;zw"&gt;And yet another TOI news&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-8779651443291573267?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/8779651443291573267/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=8779651443291573267' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/8779651443291573267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/8779651443291573267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2009/01/petetion-for-my-voting-right-time-to.html' title='Petetion for my Voting Right : Time to revise the outdated Rule 49-O&lt;'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-2218335334047994900</id><published>2009-01-20T09:41:00.000-08:00</published><updated>2009-01-20T09:42:22.399-08:00</updated><title type='text'>महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में विठ्ठल</title><content type='html'>महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में विठ्ठल&lt;br /&gt;- लीना मेहेंदळे, भा.प्र.से.&lt;br /&gt;भक्ति व श्रध्दा मनुष्य जीवन में बडे सशक्त संबल का काम करते हैं|  समाज को संभालने, चलाने और संपुष्ट करने में जिन सामूहिक या सांघिक गुणों का बडा उपयोग रहा है, भक्ति उनमे प्रमुख है | प्रेम, भक्ति, मैत्री, करुणा आदि कई छटाएँ हैं जो मनुष्य के निजी और सामाजिक जीवन को एक अलग ही रंग में रंग देते हैं |&lt;br /&gt; किसीने भगवान से पूछा कि तुम कहाँ रहते हो, तो उत्तर मिला - भक्तों के  हृदय में रहता हूँ |  उससे कहा - सिद्ब कर दिखाओ |   तो भगवान ने हनुमान जी को प्रेरणा दी और हनुमान ने अपना हृदय चीर कर दिखा दिया कि वहाँ राम थे |  महाभारत के समर प्रसंग में अर्जुन को विश्र्वरुप दिखाने के बाद भगवान ने कहा - इस तरह से मेरे रुप को देख पाना उनके लिये नही है जो केवल ज्ञानी हैं या तपस्वी हैं या दान पुण्य करने वाले हैं | तुम मेरे अनन्य भक्त हो, इसी अनन्य भक्ति के कारण मुझे तुम देख सकते हो | &lt;br /&gt;किंवदंती है कि महाराष्ट्र के पंढरपुर गांव में पुण्डलीक नामक एक युवक रहता था |  वृध्द माँ-बाप बिमार हो गए अतएव उनकी सेवा कर रहा था और विपन्न अवस्था से चल रहा था | तो कृष्ण और रुक्मिणी मे संवाद हुआ |  रुक्मिणी ने कहा - तुम्हे जाकर उस युवक से मिलना चाहिए और उसकी सहायता करनी चाहिए |&lt;br /&gt;कृष्ण चलकर पुण्डलीेक के घर आए | वह सेवा में जुटा था | दरवाजे सें अंदर किसी व्यक्ति के आने का भान हुआ तो बिना उधर देखे पूछा - कौन हो ?  इसने बताया मैं विठ्ठल हूँ, तुम्हारी सहायता करना चाहता हूँ | पुण्डलीक ने फिर बिना देखे एक ईंट उसकी तरफ फेंक दी और कहा - इसी पर विश्राम करो, मैं माँ पिता की सेवा समाप्त कर लूँ तो तुमसे मिलता हँू |  सेवा लम्बी चली और विठ्ठल महाशय ईट पर खडे के खडे | बडी देर हुई तो रुक्मिणी खोजते हुए आई | पुण्डलीक ने यह जानकर कि और कोई व्यक्ति घर के  अंदर आया है, उसके लिए भी एक ईट सरका दी |  &lt;br /&gt;तबसे दोनों - विठ्ठल और रुक्मिणी - वहीं ईट पर खडे, कमर पर हाथ धरे प्रतीक्षा कर रहे हैं  कि  पुण्डलीक की माता - पिता - सेवा समाप्त हो, वह उनकी तरफ देखे तो आगे बात बढे |  फँस कर रह गए |  लोग  पुण्डलीक  के घर आते गए, भगवान के दर्शन कर धन्य होते गए |  ताँता लग गया |  बेचारे विठ्ठल  और रुक्मिणी भक्त के बंधन में  फँस गए |  अब भागकर निकले कैसे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना जाता है कि यह घटना करीब एक हजार वर्ष पूर्व की है |  तब से महाराष्ट्र, कर्नाटक और अन्य दक्षिणी राज्यों में  विठ्ठल भक्ति की परंपरा है |  प्राय: हर बडे गाँव में छोटा या बडा विठ्ठल  मंदिर अवश्य होता है |  महाराष्ट्रमें कृष्ण मंदिर कम ही मिलते हैं उनका विठ्ठल रूप ही मंदिरोंमे विराजना है - वह भी रुक्मिणी  के साथ |  विठ्ठल दर्शन के लिए पंढरपुर जाने की परिपाटी भी चल पडी |  सो भी  अपने गाँव  से निकलकर पैदल |  खासकर आषाढ की एकादशी से कार्तिक एकादशी तक | यही वह समय है जब चातुर्मास भी चल रहा होता है |  किसान भी बोआई कर चुके होते हैं और अगले दो महीनों तक खेतोंको उनकी आवश्यकता नही होती |  चूँकि विठ्ठल के  साथ साथ रुक्मिणी भी है अतएव दर्शनार्थियों में महिलाओं की भी भारी संख्या होती है |  पंढरपुर में कुछ काल रहकर भक्ति सागर में डुबकी लगाने की परंपरा भी चली आ रही हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे पंढरपुर देवालय के एक ट्रस्टी बताते हैं कि न्यायिक जाँच के दौरान जो इतिहास दर्ज हुआ वह यों है कि जब अल्लाउद्दिन खिलजी ने विजयनगर राज्य पर चढाई की और लूटपाट मचाते हुए देव - मंदिरों की मूतियाँ तोडने लगा तो विजयनगर के राजा ने चाहा कि उसके राज्य के मंदिर में स्थित इन मूर्तियों की पूजा भी न रूके और खिलजी के सिपाहियों को भनक भी न लगे |  अतएव उसने एक साधारण गरीब परिवार में इन मूर्तियों को रखवा दिया और फिर वहीं पर मंदिर बन गया |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पश्चिम महाराष्ट्र की एक महत्वपूर्ण नदी भीमा है |  इसका उगम पुणे जिले के भीमाशंकर स्थान से होता  है जो कि भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है |   दक्षिण - पूरब की और बहती हुई यह भीमा जब पंढरपुर पहुँचती है तो चंद्राकृति मे पुरे शहर की परिक्रमा करती हुई विठ्ठल मंदिर के पास से गुजरती है |  यहाँ इसका नाम पड जाता है -चंद्रभागा |  विशाल, संथ जलप्रवाह और दोनो ओर काफी चौडाई में फैला हुआ चमकता बालुकामय किनारा | श्रद्घालुओं के लिए सारी मनभावन रचना |  यह भी विठ्ठल का ही प्रताप माना जाता है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरहवी  सदी  में पुणे के पास एक विद्बान विठ्ठल कुलकर्णी और उनकी पत्नी रखुमाबाई ( रुक्मिणी नाम का ग्रामीण रुप ) के  घर  तीन  पुत्र  निवृत्ति,  ज्ञानदेव,  सोपानदेव  और  कन्या मुक्ताबाई ने जन्म लिया | उनकी पूरी कथा वेदना, परिश्रम, ज्ञान, साधना और मुक्ति की कथा है|  यही ज्ञानदेव आगे ज्ञानेश्वर कहलाए जिन्हे महाराष्ट्र का संत शिरोमणी माना जाता हैं |  उन्होंने प्राकृत मराठी में भगवद्गीता का विस्तृत विवेचन काव्य बद्घ किया है |  करीब साढे तीन हजार अभंगोवाली यह ज्ञानेश्वरी अपने आप में एक अद्भूत महाग्रंथ है जिसकी तुलना केवल ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य  या तुलसी रामायण से की जा सकती है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञानेश्र्वरी की रचना के बाद चारों बहन भाइयों ने पंढरपूर की यात्रा की |  जिनके माता पिता के नाम भी रखुमाई और विठ्ठल ही हों, वे पंढरपूर निवासी रखुमाई - विठ्ठल की स्तुति मे जब लिखेंगे तो कैसा अद्भूत लिखेंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है | उनके समकालीन कई संत तथा भक्त उन दिनों पंढरपुर या आसपास निवास कर रहे थे |  उनमे नामदेव हैं, संत जनाबाई है, गोरा कुम्हार है, नरहरि सोनार है |  पंढरपुर मे इस संत समागम से जो समाँ बंधा, उसके प्रतीक के रुप में भी आषाढ और कार्तिक एकादशी के दिन वहाँ पहुँचने की परंपरा ने जो जोर पकडा वह आज तक कायम है और निरंतर बढ रहा है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; महाराष्ट्र में विठ्ठल को एक ओर रखुमाईवरु अर्थात रखुमाई का पति तो साथ साथ माउली अर्थात माता के रूप में भी देखा जाता है। विठू(पुरुषवाचक), विठा(स्त्रीवाचक) सखा, राया जैसे अपनत्वभरे संबोधन जहाँ कोई तर्क नही केवल श्रद्धा है। विठ्ठलभक्ति किस उंचाई पर पहुँची है इसका अंदाज नामदेव के एक अभंग से लगाया जा सकता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; देव म्हणे नाम्या पाहे परतून&lt;br /&gt; तुज आलो असे मी शरण&lt;br /&gt; न करि  उदास, चाली तू पंढरी&lt;br /&gt; ऐसे बोले हरि, नामियासी |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ विठ्ठल पर रूठ कर जब नामदेव ने पंढरी छोडकर जाने का निश्चय किया, और गांव की सीमा लांघनेही वाला था कि विठ्ठल ने पीछे पीछे जाकर कहा - हे नामदेव, वापस मुडकर देखो, मैं तुम्हारी शरण आया हूँ, तुम मेरे से यूं मत रूठो और पंढरी छोड कर मत जाओ, ऐसे हरी ने नामदेव को मनाया |&lt;br /&gt;ऐसा धन्य है पंढरपुर जहाँ भगवान ही भक्त की शरण में आता हैं | बाद में ज्ञानेश्वर और नामदेव ने पूरे उत्तर भारत की एकत्रित यात्रा की |  इसके उपरान्त ज्ञानेश्वर ने समाधी ग्रहण की |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे दुखी नामदेवने पुन: उत्तर भारत के उन स्थानों पर यात्रा की जहाँ वेपहले ज्ञानेश्वर के साथ आए थे |  इस यात्रा में उन्होंने हिंदी में दोहे और अभंग रचे जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहब में शामिल हैं |  नामदेव के करीब सौ वर्षों के अंतर से गुरु नानक देव अवतीर्ण हुए थे और नामदेव के पदोंने उन्हें काफी प्रभावित किया था |  इसी कारण उन्होंने नामदेव के पदोंको गुरू ग्रंथ साहिब में शामिल किया और स्वयं भी तीर्थयात्रा करते हुए नाशिक तक पधारे थे |  कितने दुख की बात है कि नामदेव के इन हिंदी दोहोंकी पढाई महाराष्ट्र में नही होती और नामदेव के मराठी साहित्य की पढाई हिंदी या पंजाबी में नही होती |  भारत के राष्ट्रपती के कार्यकाल के दौरान श्री ज्ञानी जैल सिंह ने पुणे विश्वविद्यालय में एक नामदेव - चेअर की स्थापना करवा दी है, बस !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्रहवीं सदी में महाराष्ट्र के अनन्य संत तुकाराम भी विठ्ठल भक्ति में पूरी तरह रंगे हुए थे, इतने कि वे विठ्ठल को डाँट फटकार भी सकते थे। कहा जाता है की महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा की नींव रचकर और  उसे  ठोक  पीट  कर मजबूत  करने  का  काम ज्ञानेश्वर ने किया तो तुकाराम उस भक्ति मंदिर के स्वर्ण शिखर बने | मराठी में कहते हैं - ज्ञानदेवे रचिला पाया, तुका झालासे कळस । &lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;          इसी लिए जब आषाढ के महिने में पंढरपुर की वारी (यात्रा) का समय आता है तो पहले आलंदी ग्राम से ज्ञानदेव की पालकी चलती है, बाद में देहू ग्राम से तुकाराम की पालकी आती है, और ये दोनों पंढरपुर तक जाते हैं |  बीच बीच में अन्य लोग और छोटी मोटी पालकियाँ जुडती रहती हैं |  विदर्भ, मराठवाडा जैसे महाराष्ट्र के दूर-दराज के सूबों से चलकर लोग आते रहते हैं, कोई पचास किलोमीटर से तो कोई पांचसौ किलोमीटर से |  आषाढ के महिने में ये वारकरी अलग अलग समूहों में चलते रहते है |  कई समूहोंमें केवल महिलाएँ ही होती है |  कई बार दो-तीन के गुट में या इक्का दुक्का भी बेझिझक चलनेवाली महिलाएँ देखी जा सकती है |   वैसे तो यात्रा परंपरा पूरे भारतवर्ष में है |  वैद्यनाथ धाम, हरिद्बार, ऋषीकेश और गंगोत्री से रामेश्र्वर तक की यात्रा करनेवाले कितने काँवडिये हर वर्ष देखे जा सकते हैं |  लेकिन उनमें महिलाओं को मैंने कभी कभार ही देखा है  |   इसे भी मैं महाराष्ट्र की एक विशेषता मानती हूँ  |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  वारकरी परंपरा सामाजिक प्रबोधन की एक सशक्त पाठशाला है |  आषाढ और कार्तिक के महिने में हर दिन एक एक लाख के करीब वारकरी पंढरपुर पहुँचते है |  वहाँ इन में से कई हजार पंढरपुर की “माला धारण” करते है  |  फिर इन्हें वारकरी नही बल्कि माळकरी कहा जाता है |  ऐसा व्यक्ति जब तक माला धारण करे, वह तंबाखू, शराब या कोई अन्य दुर्व्यसन नही करता, न ही मांसाहार करता है  |   माला  उतारने  के  लिये वापस पंढरपुर जाना पडता है |&lt;br /&gt;मैनें अपनी नौकरी के सिलसिले में महाराष्ट्र के कई गाँवों में घूमते हुए ऐसे कई माळकरी देखे हैं जिनके जीवन में माला लेने के बाद एक अनोखा परिवर्तन आया है |  महाराष्ट्र में कई तथाकथित नीची जातियों में भी शाकाहार और वैष्णव धर्म की परंपरा है जिसके पीछे पंढरपूर एक बडा प्रभावी कारण रहा है  |  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई वर्षो से मेरे मन में एक सपना है  |   महीने दो महीने की पैदल यात्रा करते हुए पंढरपुर पहुँचने वाले वारकरियों के भोजन, विश्राम आदि के लिये गांव-गांव के श्रद्घालु छावनी, भोजन इत्यादि की व्यवस्था करते है |  यदि उसी दौरान इनके हाथ में रुई की पुनियाँ और तकली सौंपी जाये, और उनके द्बारा काते गए सूत को अगले पडाव पर खरीद लेने की व्यवस्था हो, तो कितने अधिक मानव - श्रम का सदुपयोग किया जा सकेगा !  उसी सूत से चादर या गमछा बुनकर उसे चढावे के रुप में विठ्ठल पर चढाकर फिर उन्ही वारकरियों को प्रसाद स्वरुप भेंट दिया जाय तो कैसा रहेगा ?  ऐसा प्रसाद जब घर घर पहुँचेगा तो उस श्रम - प्रतिष्ठा से हमारा समाज धन्य हो जायगा |&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्ता :  15, सुनिती अपार्टमेंट, जगन्नाथ भोसले मार्ग, मंत्रालय के सामने, मुंबई - 21.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-2218335334047994900?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/2218335334047994900/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=2218335334047994900' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/2218335334047994900'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/2218335334047994900'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में विठ्ठल'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-834063812315214044</id><published>2008-12-21T01:41:00.000-08:00</published><updated>2009-01-07T13:19:57.722-08:00</updated><title type='text'>सोने के हथियार से लडने के लिये</title><content type='html'>सोने के हथियार से लडने के लिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम किले पर रहते थे |&lt;br /&gt;मजबूत दीवारों का अभेद्य किला&lt;br /&gt;बुर्जों पर चौकसी करते हुए&lt;br /&gt;हमें कोई तनाव न था |&lt;br /&gt;हमें दीखते थे सामने फैले&lt;br /&gt;विस्तृत मैदान&lt;br /&gt;और वहीं झाडियों में छिपा हमारा शत्रु&lt;br /&gt;वे हमें क्योंकर जीत पाते ?&lt;br /&gt;हमारे पास शस्त्र-अस्त्र थे भरपूर&lt;br /&gt;हमारे सैनिक जाँबाज - शूर&lt;br /&gt;और मैदान पार के रास्तों पर&lt;br /&gt;निश्चित रुप से पास आ रही थीं&lt;br /&gt;हमारे मित्र देशों की सेनाएँ |&lt;br /&gt;पर हाँ ....&lt;br /&gt;हमारे किले के कोने में एक छोटा मायावी द्बार था |&lt;br /&gt;द्बारपाल ने एक दिन उसे खोल दिया |&lt;br /&gt;शत्रु उसी रास्ते से आया |&lt;br /&gt;बिना लडे ही हमपर जय किया |&lt;br /&gt;शर्म की बात, पर सच्चाई की है |&lt;br /&gt;सोने का हथियार&lt;br /&gt;लोहे के हथियार पर भारी है |&lt;br /&gt;किसी जमाने में पढी थी एडविन मूर की यह कविता The Castle | उसी का भावानुवाद मैंने किया है, जो मुंबई पर हुए आतंकी हमले की घटना पर फिट है | 26/11 की रात यह कविता बारबार चेतना में गूँजती रही |&lt;br /&gt;&lt;a href="http://rajkeeya-chintan.blogspot.com/"&gt;आगे पढेने के लिये यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.geocities.com/janta_ki_ray/sone_ke_hathiyar_Mangal.html"&gt;या फिर यहाँ&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/836831776172672356-834063812315214044?l=hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/feeds/834063812315214044/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=836831776172672356&amp;postID=834063812315214044' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/834063812315214044'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/836831776172672356/posts/default/834063812315214044'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='सोने के हथियार से लडने के लिये'/><author><name>Leena Mehendale</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02195056541483851171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://photos1.blogger.com/x/blogger/6085/3146/1600/826370/image001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-836831776172672356.post-3359522492729982367</id><published>2008-10-10T22:45:00.000-07:00</published><updated>2008-10-10T22:46:09.408-07:00</updated><title type='text'>युगान्तर के पर्व में</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;युगान्तर के पर्व में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;          -   लीना मेहेंदळे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हम कहते सुनते हैं कि हिंदु धर्म मे चार वेद कहे गये हैं -  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्व वेद |  चार वर्ण भी कहे गये हैं - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र |  चार आश्रम हैं - ब्रह्मचर्य गार्हस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास |  इसी प्रकार चार युग भी कहे गये हैं - सत्य युग, त्रेता युग, द्बापर युग और कलि युग |  मेरी मान्यता हैं ये सभी संकल्पनाएँ एक दूसरे में गुंथी हुई हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; देखा जा सकता हैं कि सत्य युग में समाज की परिकल्पना तो उदित हो चुकी थी लेकिन राजा और राज्य की परिकल्पना अभी दूर थी |  आग का आविष्कार हो चुका था, उसी प्रकार भाषा का भी |  आँकडों के गणित का भी ज्ञान था और वर्णमाला तथा लेखन कला का भी |  मनुष्य अपने आविष्कारों से नए नए आयाम छू रहा था |  कृषि और पशुपालन दैनंदिन व्यवहार बन चुके थे और कृषि संस्कृति का विस्तार भी हो रहा था |   ज्ञान और विज्ञान की साधना हो रही थी |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मनुष्य यद्यपि समाज में रहने लगा था फिर भी गाँव समाज और खेती पर ही पूरी तरह निर्भर नही था |  अभी भी वन - जंगल उसे प्रिय थे और वनचर बन कर रहना उसे आता था |  ज्ञान साधना के लिये अनगिनत नए आयाम अभी खोजने बाकी थे |  जो ज्ञान मिला उसकी सिद्घता, फिर प्रचार, प्रसार और समाज के लिये उपयोगिता - सारे एक सूत्रबद्घ कार्यक्रम थे |  तभी वह ज्ञान उपजीविका का साधन बन सकता था |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसीलिये वनों मे रहकर ही ज्ञानसाधना चलतीं |  इसके लिये वनों में गुरूकुल थे |  बडें बडे ज्ञानी ऋषि बच्चोंको गुरूकुल में लाकर रखते |  उनसे ज्ञान साधना करवाते |  उनके भोजन आवास का प्रबन्ध करते थे तो उनसे काम भी करवाते थे |  जिस ऋषि के आश्रम मे भारी संख्या में विद्यार्थी हों उन्हें कुलगुरू कहा जाता |  इस संबोधन का प्रयोग महाभारत में भी हुआ है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर व्यवसाय ज्ञान का प्रसार भी हो रहा था |  खेती, पशुसंवर्धन, शस्त्रास्त्रों की खोज व निर्माण हो रहे थे |  आरोग्यलाभ और परिरक्षा के लिये आयुर्वेद फैल रहा था |  द्रुतगामी वाहन ढूँढे जा रहे थे |  शंकरजी के लिये नंदी, दुर्गा के लिये सिंह, विष्णु के लिये गरूड, यम के लिये भैंसा, इन्द्र का ऐरावत हाथी, कार्तिकेय के लिये मयूर, गणेश के लिये मूषक, लक्ष्मी का उल्लू और सूर्य का घोडा - ये सारे किस बात का संकेत देते हैं ?  इसकी कल्पना तो आज की जा सकती है लेकिन तथ्य समझना मुश्किल ही है |  फिर भी वायुवेग से चलने वाला, और ऐसी गति के लिये पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर ही ऊपर चलनेवाला इंद्र का रथ था जिसका सारथ्य मातली किया करता था |  उससे भी आगे की शताब्दियों में आकाश मार्ग से विचरण करनेवाला विमान पुष्पक कुबेर के पास था जिसे बाद में रावण नें छीन लिया |  रामायण की कथा देखें तो इसी विमान से राम लंका से अयोध्या आये और फिर विमान को विभीषण वापस लंका ले गया |  इससे कई गुना अधिक प्रभावी क्षमता थी नारद के पास - वे मन के वेग से चलते थे |  जिस पल जहाँ चाहा, पहुँच गये |  इतना ही नही, आवश्यक हुआ तो वे औरों को भी अपने साथ ले ला सकते थे |  एक ऐसे ही प्रसंग में वे एक राजा तथा उसकी विवाह योग्य कन्या रेवती को ब्रह्मदेव के पास ले गए |  जब वापस लौटे तो युग बदल गया था, और पृथ्वी पर रेवती के अनुरूप वर भी मिल गया - बलराम |&lt;br /&gt; सारांश में  तीव्र गति वाहनों की खोज, खगोल शास्त्र, अंतरिक्ष शास्त्र इत्यादि विषय उस युग में ज्ञात थे |   इन भौतिक जगत्‌ की विषय वस्तुओं के साथ साथ जीवन और मृत्यु से संबंधित विचार और चर्चाएँ भी खूब होती थीं और विभिन्न मतों का आदान - प्रदान होता था |  जीवन, मृत्यू क्या है ?  आत्मा और चैतन्य क्या है ?  मरणोपरान्त मनुष्य का क्या होता है यह भी कौतुहल का विषय था |  सत्य और अमृतत्व का कहीं न कहीं कोई गहरा रिश्ता है लेकिन वह क्या रिश्ता है यह चर्चां बारबार हुई है | मेरी व्यक्तिगत मत है कि इन चर्चाओंको भविष्य के लिये लेखाबद्ध किया गया और हो न हो, यही उपनिषद हैं।&lt;br /&gt;कठोपनिषद में यम नचिकेत संवाद का कुछ हिस्सा मुझे हर बार विस्मित कर देता है |  पिता ने कह दिया - जा मैंने तुझे यम को दान में दिया  तो नचिकेत  उठकर यम के  घर पर पहुँचा और चूँकि यम  कहीं बाहर गया हुआ था, तो नचिकेत तीन दिन भूखा प्यासा बैठा रहा | यह प्रसंग बताता है की यम कोई पहुँचसें परे व्यक्ति नही थी | आगे भी सावित्री की कथा या कुंती द्वारा यम को पाचारण करके उससे युधिष्ठिर जैसा पुत्र प्राप्त करना इसी बात का संकेत देते है |&lt;br /&gt;यम लौटा तो यम-पत्नी ने कहा - एक ब्राह्मण अपने दवार पर तीन दिन-रात भूखा प्यासा बैठा रहा - पहले उसे कुछ देकर शांत करो वरना उसका कोप हुआ तो अपना बडा नुकसान होगा | यम नचिकेत से तीन वर मॉगने को कहता है | पहले दो वरोंसे नचिकेत अपने पिता का खोया हुआ प्रेम और पृथ्वीके सुख मॉगता है लेकिन तीसरे वरसे वह जानना चाहता है की मृत्यु के बाद क्या होता है | इस ज्ञान से उसे परावृत्त करने के लिये यम उसे स्वर्गसुख और अमरत्व भी देना चाहता है लेकिन नचिकेत अड जाता है | यदि तुम मुझे अमरत्व और स्वर्ग देने की बात करते हो तो इसका अर्थ हुआ की यह ज्ञान उनसे श्रेष्ठ है | इस संवाद से संकेत मिलता है की मरणोपरान्त का अस्तित्व अमरत्व से कुछ अलग है और श्रेष्ठ भी है | इसपर यम प्रसन्न होकर नचिकेत को बताता है कि यज्ञ की अग्नि कैसे सिध्द की जाती है और उस यज्ञ से सत्य की प्राप्ति और फिर उस सत्य से मृत्यु के परे होनेवाले गूढ रहस्यों का ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाता है |&lt;br /&gt;दूसरी कथा है सत्यकाम जाबाली की - जिसमें सत्यकाम के आचरण और सत्यव्रत से प्रसन्न होकर स्वयं अग्नि हंस का रुप धरकर उसके पास आया और उसे चार बार ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया | उसका वर्णन यों है “सुन आज मैं तुम्हें सत्य का प्रथम पाद बताता हूँ” |  फिर एक एक करके सत्यके द्बितीय पाद, तृतीय पाद और चतुर्थ पाद बताये | यहाँ भी सत्य को ही ब्रह्मज्ञान बताया है |&lt;br /&gt;इसी प्रकार त्रिलोकों के पार अंतरिक्ष में जो सात लोक होने की बात की गई है उसमें सबसे श्रेष्ठ और सबसे तेजोमय लोक का नाम सत्यलोक ही है | ईशावास्योपनिषद में इसी ज्ञान के लिये विद्या और पृथ्वीतल के भौतिक ज्ञानोंके लिये अविज्ञा शब्द का प्रयोग करते हुए दोनों को एक सा महत्वपूर्ण बताया है - “जानकार व्यक्ति विद्या और अविद्या दोनों को पूरी तरह समझ लेता है, फिर अविद्या की सहायता से मृत्यु को तरकर - उससे पार होकर, अगला  प्रवास  आरंभ  करता है,  और  उस  रास्ते चलते हुए परा  विद्या  की सहायता  से अमृतत्व का प्राशन करता है” | इसीसे ईशावास्य में प्रार्थना है “सत्यधर्माय दृष्टये ” और माण्डूक्थोपनिषद की प्रार्थना है -   “सत्यमेव जयते नानृतम्‌ ”.&lt;br /&gt;तो ऐसे सत्ययुग में गणितशास्त्र की पढाई काफी प्रगत थी | खासकर कालगणना का शास्त्र | पृथ्वी पर कालगणना अलग थी और ब्रह्मलोक की अलग थी | इसीलिये रेवती की कथा में वर्णन है की जब ब्रह्मलोक का एक दिन पूरा होता है तो उतने समय में पृथ्वीपर सैकडों वर्ष निकल जाते है | उनका भी गणित दीर्घतमस्‌ ऋषि के कुछ सूक्तोंमें मिलता है |&lt;br /&gt;वर्णन है कि विविध देवता और असुरों ने कई कई सौ वर्ष तपश्चर्या की |  पार्वती ने शंकर को पाने के लिये एक सहस्त्र वर्ष तपस्या की |  और भी कईयों ने |  अगर ये सारे वर्णन सुसंगत हों तो उनका संबंध निश्चित ही अन्तरिक्ष के इन अलग अलग लोकों से होगा |&lt;br /&gt; काल गणना का एक अति विस्तृत आयाम हमारे ऋषि मुनियों ने दिया है |  उनकी गणना मानें तो ब्रह्मदेव की आयु सौ वर्ष की है |  लेकिन ब्रह्मा का एक दिन पृथ्वी लोक के एक सहस्त्र महायुगों जितना बडा होता है |  उतनी ही बडी ब्रह्मदेव की रात्री भी होती है |  एक महायुग में सत्ययुग के 1728 हजार वर्ष, त्रेता के 1296 हजार वर्ष, द्बापर के 864 हजार वर्ष और कली के 432 हजार वर्ष इस प्रकार कुल 4320 हजार वर्ष होते हैं |  इस गणित से ब्रह्मदेव की आयु के 50 वर्ष बीत चुके हैं अर्थात्‌ पृथ्वी की आयु भी 8000 करोड वर्ष हो चुकी है |&lt;br /&gt; सत्य युग में ज्ञान के नये आयामों की खोज और विस्तार और उससे समाज उपयोगी पद्घतियाँ विकसित करना ही प्रमुख ध्येय था |  &lt;br /&gt; इसके बाद आये त्रेतायुग में राजा और राज्य की परिकल्पना का उदय हुआ |  ज्ञान का विस्तार हो ही रहा था |  अब उसमें नगर रचना, वास्तुशास्त्र, भवन निर्माण, शिल्प जैसे व्यावहारिकता में उपयोगी शास्त्र जुडने लगे |  ज्ञान से सृजन और उससे संपत्ति का रक्षण महत्त्वपूर्ण हुआ |  तब शस्त्र निर्माण का महत्त्व बढ गया |  इसी काल में धनुर्वेद का उदय हुआ |  आग्नेयास्त्र, पर्जन्यास्त्र, वज्र, सुदर्शन चक्र, ब्रह्मास्त्र, महेंद्रास्त्र जैसे शक्तिशाली अस्त्र और शस्त्रों का निर्माण हुआ |  समाज की रक्षा करने के लिये और समाज व्यवस्था के लिये राजे - रजवाडों की प्रथा चल पडी |  उन्हें सेना रखने की जरूरत पडी |  सेना का खर्चा चलाने के लिये कर वसूलने की प्रथा भी चली |  खेती योग्य जमीन पर स्वामित्व की प्रथा भी चल पडी |  उत्पादन पर भी कर लगा |  यह सब कुछ संभालने का जिम्मा क्षत्रियों के कंधों पर पडा |&lt;br /&gt; ज्ञान साधना के लिये ब्राह्मणों का मान-सम्मान और आदर कायम रहा |  लेकिन नेतृत्व अब क्षत्रियों के पास आ गया |  महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर ब्राह्मणों की राय ली जाती थी |  ब्रह्मदंड का मान अब भी राजदण्ड से अधिक था |  लेकिन ब्रह्मदण्ड और राजगुरू दोनों का काम किसी निमित्त ही होता था |  रोजमर्रा की व्यवस्था के लिये राजा ही प्रमाण था |  एक विश्र्वास फैल गया कि राजा के रूप में स्वयं विष्णु विराजते हैं |&lt;br /&gt; संपत्ति के निर्माण के लिये  कई  प्रकार के तंत्रज्ञान और उससे जुडे व्यवसायों की आवश्यकता होती है |  भवन निर्माण के लिये धातुशास्त्र का अध्ययन चाहिये लेकिन साथ में कुशल लुहार, बढई चाहिये |  इसी तरह अन्य कई शास्त्रों की पढाई के साथ कुशल बुनकर, रंगरेज, ग्वाला, जुलाहा, गडेरिया, चमार, शिल्पकार इत्यादि भी चाहिये |  आयुर्वेद में भी स्वस्थ वृत्त में वर्णित यम - नियम, संयम, उचित आहार इत्यादि सिद्घान्त पीछे छूट गये और दवाइयाँ बनाने का महत्त्व बढा क्यों कि युद्घ में घायल हुए लोगों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिये वह अधिक जरूरी था |  पशुवैद्यक इतना प्रगत हुआ कि सहदेव, नकुल और भीम स्वयं राजपुत्र होते हुए भी क्रमश: गाय, घोडे और हाथियों की अच्छी प्रजातियों के संवर्द्घन में निष्णात थे |  रथों का निर्माण, सारथ्य, नौका निर्माण, रास्ते, तालाब और नहर बनाना आदि शास्त्र भी प्रगत थे | कथा के अनुसार भगीरथ ने तो गंगा को ही स्वर्ग से पृथ्वी पर उतार दिया |  व्यवहार के दृष्टिकोण से भी जिस तरह से पश्चिम वाहिनी गंगा का विशाल प्रवाह मुड कर गंगा पूर्व वाहिनी हो गई है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि धरण बनाने का शास्त्र भी प्रगत रहा होगा |  एक अन्य कथानुसार रामने तो समुद्र में ही पुल बंधवा लिया |  &lt;br /&gt; ईंट, सिक्के, आईने, धातु शिल्प इत्यादि नये व्यवसाय उदय होने लगे |  सत्ययुग में कृषि शास्त्र तो विस्तृत हो चुका था |  द्वापर में आते आते हस्तकला और हस्त - उद्योगों की संख्या ऐसी बढी कि वर्णाश्रम व्यवस्था का उदय हुआ |  ज्ञान साधन और ज्ञान प्रचार करे सो ब्राह्मण, राज्य और युद्घ करे सो क्षत्रिय, कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य करे सो वैश्य और हस्त-उद्योग, सेवा तथा देखभाल करे सो शूद्र इस प्रकार वर्ण व्यवस्था बनी |  लेकिन यह वर्णभेद जन्म से नही बल्कि गुण और कर्मों से था |  भगवद्गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा कि चातुर्वण्यं मया सृष्टं, गुणकर्मविभागश: | और यह सच भी था क्यों कि विष्णुको क्षत्रिय, परंतु उसके पुत्र ब्रह्मदेव को ब्राह्मण कहा गया | शंकर वर्णों से परे है लेकिन उसके पुत्र कार्तिकेय क्षत्रिय तो गणेश ब्राह्मण कहलाये | अश्विनीकुमार तथा धन्वन्तरी के वर्ण की बाबत मैंने कुछ नही पढा है | विश्वामित्र पहले क्षत्रिय थे  फिर ब्रह्मर्षि कहलाये |  लेकिन इन गिने चुने उदाहरणोंको छोड दें तो अगले सैकडों वर्षों मे ऐसा उदाहरण देखने को नही मिलता जिसमें मनुष्य के जन्मजात वर्ण के अलावा गुणों और कर्मोंके अनुरूप उसका परिचय अन्य वर्णीय किया गया हो |  उस काल के साहित्य या अन्य वाड्.मय ऐसा उदाहरण नही दिखाते |  क्या हम यह कहें कि इस प्रकार गुणकर्म-आधारित वर्णव्यवस्था समाजधुरिणों का एक दिवास्वप्न मात्र बनकर रह गया |  &lt;br /&gt; त्रेता के बाद आये द्बापर युग में राज्य की संकल्पना अपने चरम पर थी |  माना जाता है कि महाभारत युद्घ भी द्बापर के अंतिम चरण में घटा है |  महाभारत युद्घ में पृथ्वी के प्रायः सभी राजे और क्षत्रिय योद्घा मारे गये |  फिर समाज व्यवस्था और नियम-कानून टिकाये रखने के लिये उस जमाने के समाज शास्त्रियों ने क्या किया ?  पहले त्रेता युग में भी परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया था |  तब, या फिर महाभारत युद्घ के बाद कोई उल्लेखनीय राज्यव्यवस्था न होते हुए भी समाजव्यवस्था कैसे टिक पाई यह चर्चा किसी ग्रंथ में नही मिली |&lt;br /&gt; इसके बाद आया कलियुग | इसकें पिछले दो-अढाई हजार वर्षों का इतिहास हमारें सामने है |  इस काल में गणराज्यों की कल्पना उदित हुई जिसमें लोगों के एकत्रित सोच विचार से राज्य व्यवस्था चलाने की बात थी |  भारत में यह परम्परा 2500 वर्ष पहले चली और फिर खंडित हो गई |  लेकिन करीब 500 वर्ष पहले पश्चिमी देशों मे लोकतंत्र की परिकल्पना ने अच्छी तरह जड पकड ली और अब संसार के कई देशों मे यही राज्य यंत्रणा है |  जहाँ नही है, उस देशको मानवी विकास की दृष्टि से कम आँका जाता है |  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसका अर्थ हुआ कि त्रेता और द्बापर युग में राजा नामक जो संकल्पना उदित हुई वह कलियुग के इस दौर में कालबाह्य हो रही है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; चौदहवीं सदी से पहले खुष्की के रास्ते पश्चिमी देशों के आक्रमण भारत पर होते रहे |  लेकिन चौदहवीं सदि में समुद्री रास्ते भी खुलने लगे और उन रास्तों से व्यापार बढने लगा |  सिंदबाद की साहसी समुद्री यात्रा की कथाओं को अरेबियन नाइट्स कथासंग्रह में एक सम्माननीय स्थान प्राप्त था |  इस कालमे इंग्लंड, स्पेन, पोर्तुगाल, डेन्मार्क, फ्रान्स आदि देशों में समुद्र यात्राएँ, सागरी मार्गोंके नक्शे बनाना, उच्च कोटि की नौकाएँ बनाना और नौसेना की टुकडियाँ तैयार रखना महत्त्वपूर्ण बात हो गई |&lt;br /&gt; उन दिनों खुष्की के रास्तें भारत से यूरोप में लाया जानेवाला माल उच्च कोटी का हुआ करता था |  उसमें कपडा, रेशम, मोती, मूँगे, बेशकीमती नगीने, जवाहरात, मसाले, औषधी वनस्पतियाँ आदि प्रधान थे |  उसके बदले में व्यापार करने के लिये युरोपीय देशों के पास कुशलता से बने शस्त्र, तोप, बन्दूक आदि थे |  तलवार और तीरों के दिन बीते नही थे लेकिन अब तोपें भी साथ में आ गईं, उनके पीछे पीछे बन्दूकें भी |  &lt;br /&gt; भारत के साथ व्यापार कायम रखने के लिये बडे पैमाने पर शस्त्र निर्माण का काम किया जाने लगा |  इस प्रकार शस्त्रनिर्माण एक ऐसा बडा उद्योग बना कि आज भी वह संसार के प्रमुख उद्योंगो में एक है |&lt;br /&gt; वास्को-द-गामा ने तय किया कि वह यूरोप से भारत आने का समुद्री मार्ग खोजकर उसके नक्शे बनाएगा |  इस प्रकार समुद्र के रास्ते भारत पहुँचनेवाला वह पहला व्यक्ती था |  उसके बाद कोलंबस भी चल पडा भारत की खोजमे और उसने ढूँढ लिया एक नया प्रदेश जिसका नाम पडा अमरीका |  इस प्रदेश में खनिज संपत्ति प्रचुरता से थी जिसका उपयोग आगे चलकर शस्त्र निर्माण के लिये होता रहा |&lt;br /&gt; इस प्रकार युरोपीय देशों से समुद्र के रास्तें बडी बडी व्यापारी संस्थाएँ भारत में आने लगीं |  इधर हमने स्वयं ही अपने आप पर निर्बन्ध लाद लिये और समुद्र को लांघना धर्म निषिद्घ करार दे दिया |  मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि जिस संस्कृती में पृथ्वी प्रदक्षिणा की बात कही गई, वसुधैव कुटुम्बकम्‌ की बात की गई, समुद्र को लांघकर लंका में प्रवेश करने वाला मारूती पूजनीय हो गया, उसी देशमें समुद्र यात्रा को कब क्यों और कैसे धर्म निषिद्घ कहा गया ?&lt;br /&gt; अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी एक अलग महत्त्व रखती है |  इन दो सौ वर्षों में विज्ञान की प्रगति अभूतपर्व गति से हुई |  साथ ही उद्योग-जगत की क्रान्ति का महत्त्व इसलिये है कि इस नई क्रान्ति ने हस्त उद्योगों की छुट्टी कर दी और मशीनों द्बारा असेंब्ली लाइन पर एक साँचे में ढले सैंकडों  उत्पादन बनने लगे |&lt;br /&gt; यही समय था जब शस्त्र और नौसेना रखने वाले देशों ने अन्य देशोंपर अपना राज जमा लिया |  उधर लोकतंत्र की जडें भी मजबूत हो रही थीं |  अतएव बीसवीं सदि में जिन जिन देशों ने स्वतंत्रता की लडाई लडीं, उन सभी ने लोकतंत्र के आदर्शों पर, खास कर तीन आदर्शोंपर - न्याय समता, और बन्धुता पर जोर दिया |  यही कारण है कि आज इतने अधिक देशों ने लोकतंत्र को अपनाया |  इस नई राज्यव्यवस्था में सेना की आमने सामने लडाईयाँ, भूभाग जीतना आदि अवधारणाएँ भी पीछे छूटने लगीं |  वायुसेना और बम के आविष्कार के कारण लडाइयों में एक नया आयाम आ गया |&lt;br /&gt; साथ ही आक्रमण के बजाय व्यापारी संबंध बढाने का दौर चल पडा |  मुगल शासन काल में अंग्रेज, फ्रान्सिसी, डच, पुर्तगाली लोगों ने अपने व्यापारी केंद्र भारत में बना लिये थे जिसके लिये उन्हें मुगल शासकों ने मंजूरीयाँ दी थी |  इस प्रकार जहाँ त्रेता और द्बापर युग में राज्य जीतना प्रमुख लक्ष्य था उसकी जगह व्यापार जीतना लक्ष्य बन गया |&lt;br /&gt; आज  राजे महाराजाओं की अपेक्षा उत्पादन मे अग्रगण्य उद्यमी, व्यावसायिक कंपनियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण हैं |  जिसे हम सर्विस सेक्टर कहते हैं, जैसे बँकिंग, कम्प्यूटर्स, आवागमन, मोबाइल, इंटरनेट - आदि सेवाएँ देने वाले सेक्टर्स आगे आने लगे हैं |  अर्थात्‌ अब ब्रह्मदण्ड या राजदण्ड के नही बल्कि अर्थदण्ड का युग चल रहा है |  और इसके सेवाकारी (सेवाभावी नही) युग में बदलने की संभावना भी खूब है | &lt;br /&gt; सारांश यह की जैसे जैसे युग बदलते गए - सत्य से त्रेता, त्रेता से द्बापर और द्बापर से कलियुग आया वैसे ही वर्णोंका महत्त्व भी बदलने लगा - पहले ब्राह्मण, फिर क्षत्रिय, फिर वैश्य और शूद्र वर्ण अधिक प्रभावी होते गये |&lt;br /&gt; आर्थिक संपत्ति की माप करने के लिये कभी कृषि - जमीन और पशुधन - जैसे गोधन, अश्वधन और हाथी - प्रमाणभूत थे |  लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद जैसे जैसे मशीन से वस्तुएँ बनने लगीं और उनका उत्पादन आदमी की हाथ की बनी वस्तुओं की तुलना में हजारो - लाखों गुना अधिक बढ गया, वैसे वैसे उद्योग और उद्यमी अर्थात्‌ जिसे हम सेकंडरी सेक्टर ऑफ प्रॉडक्शन कहते हैं, उसका महत्त्व बढ गया |  फिर व्यापार बढा, तो टर्शियरी सेक्टर अर्थात्‌ सर्विस सेक्टर का महत्त्व बढा |&lt;br /&gt; जो चार पुरूषार्थ बताये गये - अर्थात्‌ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, उनमें से काम अर्थात्‌ उपभोग का महत्त्व कलियुग में अत्यधिक बढ गया |  हम अधिक से अधिक उपभोगवादी हो रहे हैं |  हालाँकि काम भी एक पुरूषार्थ है - क्यों कि इसीसे कलात्मकता को प्रश्रय मिलता है |  फिर भी उपभोगवाद की अति हो जाती है तो सर्वनाश हो जाता है |  इसका उदाहरण महाभारत मे मिलता है |  जब युद्घ समाप्त हुआ तो पृथ्वी के प्राय: सभी राजे और राज्य नष्ट हो चुके थे |  हस्तिनापुर से दूर द्वारका में यदुवंशी - राजाओं ने युद्घ में भाग नही लिया था |  अब वे निश्चिंत थे |  अगले कई वर्षों में कोई युद्घ नही आने वाला था |  उन्हें क्षत्रियोचित पराक्रम दिखाने की कोई गरज नही आने वाली थी |  वे भोग की तरफ मुडे |  क्रीडा, द्यूत और शराब, इन्हीं मे ऐसे डूबे कि आखिर आपस में ही लडकर यदुवंश के सारे क्षत्रियों का नाश हुआ |  &lt;br /&gt; आज के युग में अर्थव्यवहार को अत्यधिक महत्त्व है और इसका आरंभ अठारहवीं सदी में जो औद्योगिक क्रान्ति आई वहाँ से है |  पहले उत्पादन और व्यापार विकेंद्रित थे लेकिन औद्योगिक क्रान्ति ने दिखा दिया कि वे केंद्रित तरीके से भी किये जा सकते हैं |  आज इक्कीसवीं सदि में हम केंद्रित और विकेंद्रित दोनों व्यवस्थाओं को तौल सकते हैं |  विकेंद्रित व्यवस्था सर्वसमावेशक होती है |  वह अधिक टिकाऊ भी होती है - दीर्घकालीन होती है |  लेकिन केंद्रित व्यवस्था में हजारों गुना अधिक उत्पादनक्षमता होती हैं |  इसीलिये उसके आगे-पीछे के ताने-बाने भी उसी तरह बुनने पडते हैं |  यदि एक फलों का जूस बनाने की फॅक्टरी हो तो उसे रोजाना अमुक टन फल, इतना पानी, इतनी बिजली, इतने खरीदार भी चाहिये - उन्हें आकर्षित करने को ऍडव्हर्टाइजमेंट भी चाहिये |  ऐसे समय कई बार नैतिक, अनैतिक का विचार भी दूर रखना पडता है |  यदि अमरीका में शस्त्र बनाने फॅक्टरियाँ हैं, और उन्हें चलना हैं तो जरूरी है कि संसार में कोई न कोई दो देश युद्घ की स्थिती में हों और उन्हें शस्त्र खरीदने की जरूरत बनी रहे |  या जब कोई कंपनी लाखों युनिट इन्सुलिन बनानेवाली फॅक्टरी चलाती है तो जरूरी हो जाता है कि लोगों को डायबिटीज हो |&lt;br /&gt; औद्योगिक क्रान्ति आई तो उसमें उतरनेवाले लोगों को नए हुनर, नए तरीके सीखने की आवश्यकता पडी |  इसी प्रकार आज का युग जो टर्शियरी सेक्टर का युग है, इसके लिये आवश्यक हुनर भी कुछ अलग तरह के हैं। जैसे - फाइनान्सियल मेनेजमेंट, कम्प्यूटर्स, फिल्में बनाना, इव्हेंट मॅनेजमेंट, ये ऐसे हुनर हैं जो खेती करने या प्रॉडक्शन इंजिनियरिंग से नितान्त भिन्न है |&lt;br /&gt;  आज तीन नए सेक्टर्स सर्विस सेक्टर से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो रहे हैं |  चाहें तो हम उन्हें चतुर्थ, पंचम और षष्ठ सेक्टर कह सकते है |  एक है इन्फ्रास्ट्रक्चर का सेक्टर - जैसे नए रास्ते, नए मकान, नई ओएफसी केबल की लाइनें इत्यादि |  दूसरा है इन्फार्मेशन टेक्नॉलॉजी का सेक्टर |  इसे भले ही सर्विस सेक्टर में माना जाता था पर अब इसे अपना अलग दर्जा दिया जाये इतना इसका स्वरूप बदल रहा है |  तीसरा अति महत्त्वपूर्ण सेक्टर है RD - HRD का |  अर्थात्‌ एक ओर रिसर्च और उसके साथ ह्यूमन रिसोर्स डेव्हलपमेंट भी |  हुनर अर्थात्‌ कौशल्य की शिक्षा, पेटंट, इन्टलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट, आदि अब एक नये सेक्टर के रूप में आगे आ रहे हैं |  शायद इन्हीं के कारण भविष्यकाल युगान्तर घटेगा | &lt;br /&gt;औद्यागिक क्रान्ति ने एक नए युग को जन्म दिया था|  इसी प्रकार बिजली और उससे अधिक बल्ब की खोज ने एक नया युग ला दिया |  एडीसन ने बल्ब का सफल निर्माण किया, उससे पहले तेल जला कर उजाला किया जाता था | उसकी सीमाएँ थीं |  रात्रीपर अंधेरे का साम्राज्य हुआ करता |  बहुत कम जगहों पर ही रात में कोई व्यवहार चल पाते |  लेकिन अब चौबीस घंटे काम में लगाये जा सकते हैं |  बल्बके आविष्कार के साथ साथ रात्री की अपनी एक अलग संस्कृति बन गई जो दिन की संस्कृति से अलग लेकिन उतनी ही कर्मशील है |  इसी प्रकार रेडियो, टीव्ही, मोबाईलों ने अलग क्रान्ति लाई है |  टिश्यु कल्चर और क्लोनिंग से एक नई क्रान्ति आ रही है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; लेकिन मेरी मान्यता है कि केवल आविष्कार से या क्रान्ति से युगान्तर नही होता |  जब उस आविष्कार के कारण समाज में जीवन मूल्य बदलते हैं और समाज व्यवस्था बदलती है, तब युगान्तर होता है |  और इसके लिये आवश्यक है कि मूल्यों की चर्चा होती रहे |&lt;br /&gt; महात्मा गांधी और बाबासाहेब आंबेडकर ने अस्पृश्यता को खतम कर एक नये जीवन-मूल्य में लोगों को ढाल दिया - और इस प्रकार एक युग परिवर्तन कर दिया |  राजा राममोहन रॉय ने सती की प्रथा बंद करवा कर और जिन जिन मनीषियों ने स्त्री शिक्षा को बढावा दिया - उन सबों ने एक और युग परिवर्तन किया | ऐसे युगान्तर के पर्व में वर्ण व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था, कौशल्य प्रबंधन (स्किल मॅनेजमेंट), राज्य व्यवस्था इन सबको कसौटी पर चढना पडता है और यदि वे खरे उतरे, तभी टिक पाते हैं |  यदि नही टिक पाये तो अराजक की स्थिती निर्माण होती है जो कई समाजों और सभ्यताओं को मिटा जाती है |  कुछेक किसी खास गुट के आसरेसे टिक जाती हैं |  आवश्यक है कि ऐसी टिकनेवाली और डूबनेवाली सभ्यताओं का लेखा जोखा हम रख सकें |  इसीलिये RD-HRD का महत्त्व है |&lt;br /&gt;-----------------------------------------------&lt;br /&gt;doc,pdf, mangal files kept on janta ki ray&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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? या इसके बाद तुरंत ? या आज भी ? और हमने क्या किया ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; समाचार पत्रोंने इस दर्दनाक और शर्मनाक घटना का विवरण तत्काल प्रकाशित किया और एक प्रश्नचिन्ह जनता के सामने खडा कर दिया, पर उसके बाद ?  शायद इस प्रश्नचिन्ह को कायम लोगोंकी निगाह में रखने का प्रयत्न |  विधानसभा में प्राय: हर सदस्यने इस अपराध पर गहरा क्षोभ प्रकट किया |  उसके बाद ?   चर्चा की दिशा बदलकर यह अधिक महत्त्वपूर्ण बात बन गई कि इस प्रश्न पर स्थगन प्रस्ताव लाया जाना चाहिये या नही, सरकार गिरनी चाहिये या नही, मुख्यमंत्री या शिक्षामंत्री को पदत्याग करना चाहिये या नही ?  कई नागरिकोंने पत्रलेखन या स्तंभलेखन द्बारा अपनी तीव्र प्रतिक्रिया दर्शाई - शायद मैं भी उसी समूह की मात्र एक और सदस्य बन जाऊ
