बुधवार, 7 नवंबर 2007

मृगशिरा नक्षत्र


आओ बच्चों 1

वसंत ऋतु आ पहुंचा । दिन बड़े होने लगे । और यदि सूर्यास्त के घंटें भर बाद तुम पूरब की ओर देखो तो आकाश में सबसे खूबसूरत नक्षत्र मृगशिरा को तुम आसानी से पहचान सकोगे । इसे अंग्रेजी में ओरायन कहते हैं ।

आकाश के सबसे बड़े तारे हैं शुक्र, गुरू, व्याध, और अभिजित। आजकल गुरू भी मृगशिरा नक्षत्र के पास है इसलिए आजकल गुरू और व्याध की आसान सी पहचान यह है कि शाम को पूरब की ओर सबसे बड़े जो दो सितारे हैं वही व्याध और गुरू हैं। देखो चित्र।

मृगशिरा नक्षत्र आकाश में काफी फैला हुआ है । इसके तीन चमकीले छोटे तारे एक सीधी रेखा में हैं और बड़े खूबसूरत हैं । उन्हें त्रिकांड कहते हैं । उनके कारण मृगको पहचानना बहुत सरल है । त्रिकांड के चारों ओर आयताकार चार तारे है । और नीचे की ओर तीन छोटे छोटे तारे हैं । त्रिकांड की बाई ओर व्याध तथा दाईं ओर रोहिणी का बडा तारा है आरे ये पांच एक सीधी रेखा में हैं । व्याध से थोडा ऊपर पुनर्वसु नक्षत्र के चार चमकीले तारे हैं। पुनर्वसु, रोहिणी, व आर्द्रा, नक्षत्रों की पहचान बाद में करेंगे ।


मृगशिरा का अर्थ होता है हिरण का सिर। भारतीय मिथकों में कहानी है कि एक दुष्ट राक्षस ने रोहिणी नामक अप्सरा को तंग करने के लिये हिरण का रूप लिया और उसे सताने लगा । इस पर विष्णु ने एक व्याध या शिकारी बनकर एक बाण चलाया जो हिरण के पेट में लगा । यही बाण त्रिकांड के तीन तारे हैं । इसी कारण व्याध, त्रिकांड और रोहिणी एक लाईन में हैं । त्रिकांड के नीचे तीन छोटे तारे हैं जो बाण लगने से बहने वाली खून की बूंदे हैं । चार आयताकार तारों के बीच छोटे छोटे और कई तारे हैं जो हिरण के शरीर हैं। उन्हें दूरबीन से ही देखा जा सकता है ।

लेकिन ग्रीक मिथकों के अनुसार मृगशिरा का नाम है ओरायन । माना जाना है कि ओरायन अपने जमाने का एक घुरंधर शिकारी था जो अपनी कमर में हीरों जड़ी चमकीली बेल्ट बांधता है जिससे उसका खंजर नीचे लटकता है । त्रिकांड के तीने तारे हुए बेल्ट और उनसे नीचे लटकने वाले तीन तारे हुए खंजर । और जिस तारे को हम व्याध अर्थात शिकारी कहते हैं, उसका ग्रीक मिथकों मे नाम है सिरीयस जो कि ओरायन का बडा कुत्ता था । अंग्रेजी पुस्तकों में उसे केनिस मेजर कहते है । इसके अलावा एक केनिस मायनर भी है । यानी ओरायन को छोटा कुत्ता ।

पृथ्वी के सबसे नजदीक जो तारे हैं वे क्रमशः सूर्य, अल्फा सेंटारी और व्याध हैं । इस लिये भी व्याध तारे का बडा महत्व है ।

आजकल मृगशिरा या ओरायन नक्षत्र सूर्यास्त के बाद से ही पूर्व दक्षिण क्षितिज में देखा जा सकता है । धीरे धीरे ऊपर आकर दूसरे दिन भोर में दक्षिण पश्च्िाम दिशा में इसके एक एक तारे ढलने लगते हैं । उनसे दोस्ती बढानी है तो रात में अलग अलग समय उठकर देखते चलो कि यह आकाश में कहाँ कहाँ कैसे भ्रमण करते हैं।

आजकल रोहिणी के साथ मंगल ग्रह भी देखा जा रहा है, लेकिन वह हमेशा वहाँ नही होगा । एक महीने के बाद वह रोहिणी से काफी हट कर अलग हो जायेगा । हर सप्ताह देखते रहो तो आगे वह जहाँ कहीं जाये, तुम पहचान सकोगे । तो फिर क्यों न अभी से उससे दोस्ती बना ली जाय ।
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लीना मेहेंदले,
ई १८, बापू धाम सेंट मार्टिन मार्ग चाणक्यपुरी नई दिल्ली ११००२१

published in Devputra monthly from Indore
Also on ye_ye_pawsa. Star chart kept separate

10 यह शोर कैसा, महानगर ?

यह शोर कैसा, महानगर ?


पिछले एक महीने से महानगर में एक मुद्दा बार बार उठाया जा रहा है - अश्लील गीतों का । माना कि अपनी तरूपाई के दिनों में जिस किसी ने शैलेन्द्र, साहिर, प्रदीप, नीरज या हसरत जयपुरी के गीत सुने होंगे और उनके सूक्ष्म भावों पर रीझे होंगे, वे इन नये गीतों को सुनकर अपने बाल नोचना चाहेंगे। ठीक है, नोचे।

द्रलेकिन बेचारे नये गीतकारों, गायकों के पीछे आप क्यों पड़े है? ये वही लिख रहे हैं, वही दे रहे हैं जो जनता लेना चाहती है।च्च् ये शब्द हैं फिल्म सेंसर बोर्ड से संबंधित कई अधिकारियो और मंत्री महोदय के भी। किसी ने उनसे पूछा आप इन गीतों, इन दृश्यों को पास क्यों कर देते है, उन्हें रोकते क्यों नहीं? तो अधिकारियों ने बड़ी ईमानदारी से दो कारण बताये - एक यह कि जब जनता ऐसे गीतों और दृश्यों को चाहती है, ऐसे ही आल्बम और फिल्में बिकती हैं, बाकी सपाट - समांतर फिल्में धंधा नहीं कर पाती हैं- तो सेंसर बोर्ड उन्हें क्यों रोके ?

दूसरा कारण यह है कि आखिर ग्च््रज् और झ्च््रज् कि बराबरी या मुकाबले करने का क्या रास्ता है ? उनकी क्चालिटी से बराबरी ना कर सकें लेकिन अश्लीलता में तो .जरुर उनसे आगे निकल सकते हैं - तो चलने दो ऐसे गानें।

महानगर के प्रश्न पर कि साहब क्या आप कुछ कर रहे हैं ? सेंसर बोर्ड की प्रतिक्रिया असहायता की नही थी, द्रकि साहब हम क्या करें ?च्च् उनकी बड़ी ईमानदार प्रतिक्रिया थी कि हम क्यों करे। इस मामले में मेंरी उनसे पूरी सहमति है, केवल एक बात मेरी क्षुद्रबुद्धि में नही समाती, एक प्रश्न है जिसका उत्तर नहीं मिल पाता।

बड़ा छोटा सा प्रश्न है - क्या जनता चाहती है कि फिल्म सेंसर बोर्ड हो? क्या जनता जानती है कि सैंसर बोर्ड को चलाने में सरकार हर वर्ष कितना खर्च करती है? मेरी आय पर सरकार आयकर लगाती है। इसी प्रकार कई लाख आयकर भरने वाले व्यक्ति होंगे। जो जनता गरीब है और जिसे आयकर नहीं देना पड़ता, वह जनता भी जानती है कि सरकार दूसरे बहाने से, मंहगाई के रास्ते से उनपर बोझ लादे जा रही है। यह सारा पैसा सरकार किसलिए इकठ्ठा करती है? अब जब सेंसर बोर्ड का कहना है कि अश्लील गीत और दृश्य हम इसलिए पास करते है कि जनता चाहती है, तो फिर क्यों न जनता से पूछा जाए कि जनता और क्या क्या चाहती है? माना कि सब कुछ देने की जिम्मेदारी सरकार नहीं ले सकती - लेकिन जनता के चाहने पर यह सेंसर बोर्ड की फ़िजूल खर्ची तो सरकार बंद कर सकती है।

पर सरकार नहीं जानती कि जनता इस प्रश्न के मामले में क्या चाहती है। तो फिर क्यों न महानगर यह प्रश्न जनता के सामने रखें? जानने दो जनता को कि सैंसर बोर्ड क्या होता है, कब बना, क्यों बना, कैसे चला, पिछले चालीस वर्षों में उसने क्या किया और क्या नही किया? कितना पैसा खर्च किया? आने वाले दो-पाँच वर्षो में उनका खर्च कितना होगा? क्या .जरुरी है कि बोर्ड को बनाये रख्खा जाए और सरकार वह सब खर्च करे। जनता आज यह प्रश्न नही उठाती क्यों कि जनता नहीं जानती कि सेंसर बोर्ड का खर्चा कितना है। क्यों न जनता को बनाया जाये?

जनता को बहुत कुछ बताया जा सकता है - बताया जाना चाहिये। लोकतंत्र में जनता ही तो सर्वशक्तिमान होती है। अब जनता के पास अच्छे नेता होते हैं तो जनता रो.जमर्रा का प्रशासन नेता को सौंपकर अपने काम में जुट सकती है। लेकिन जब नेता दुलमुल हो जाये तो क्या जनता चुप बैठी रहती है?

महाभारत में एक बड़ी मार्मिक कथा है। वह राजाओं का जमाना था और राजा ही नेता भी थे। एक समय ऐसा आया कि एक के बाद एक राजा दुराचारी, आलसी, और गैरजिम्मेदार निकलने लगा। आखिर में जनता ने तय किया- सूत्र अपने हाथ में लिये और राजा को मार दिया। चलो, एक दुराचार तो टला। लेकिन समस्या आई कि आगे क्या हो? यदि नेता - शासक - राजा न हो तो लोगो को अपने काम काज छोडकर राजकाज चलाना पडेगा - जो कि समय को व्यर्थ गंवाने जैसे होगा - आदमी अपनी पढ़ाई, अपनी खेती व्यापार, अपनी कुशलता को बढाये या राजकाज में उलझ कर रह जाये? यह थी समस्या। सो सलाह के लिये इंद्र को बुलाया गया। कथा है कि इंद्र ने द्रजनसागरच्च् को मथा। और एक बालक निकला - मान्धाता जो राजा घोषित हुआ। आगे चलकर वह बड़ा प्रभावी, पुण्यशाली और लोकप्रिय राजा बना। और उसने लोकोपयोगी कई काम किये।

और जनसागर की कथा को समझने के लिये इतने पीछे क्यों जाये? आखिर गांधी जी ने द्रजनसागरच्च् से ही शक्ति पाकर चम्पारण का जुलाहा सत्याग्रह, नमक के विरोध में ठांडी धावा और भारत छोड़ो जैसे आंदोलन सफलता पूर्वक चलाये थे। और इसी जनसागर के बल बते पर ही श्लील या अश्लील गाने भी खप रहे हैं। मुझे उन गानों को सर आँखों पर बैठाने वाली जनता से कोई शिकवा नहीं क्यों कि जब पिछले वर्ष कारगिल कम्पनी ने भारत में नमक बनाने का विदेशी कारखाना चलाने की योजना बनाई और सरकार ने उनके आगे सर - आँखें बिछाकर, उन्हें हर तरह की सुविधा देकर उनका स्वागत किया तो जनसागर की शक्ति ने ही कारगिल के इरादोंपर रोक लगाया। इससे नतीजा यही निकलता है कि यदि जनता को जानकारी दी जाए तो जनता में निर्णय लेने की और उन्हें पूरा करवाने की ताकत है। कमी है जानकारी की । बताइये जनता को कि सेंसर बोर्ड का खर्चा कितना क्या है, और फिर देखिये, कोई सरकार या सरकारी संस्था यह नही कह पायेगी द्रहम क्यों करें।च्च्

आज यह सरकारी फैशन बन गया है द्रहम क्यों करें।च्च् यदि अश्लील गाने आते है तो सेंसर बोर्ड कुछ क्यों करे? आपके बच्चों का स्कूल कॉलेज के दाखिले का प्रश्न है - तो शिक्षा विभाग कुछ क्यों करे? मंहगाई बढ़ रही है - तो सरकार कुछ क्यों करे (जनता इसे धैर्यपूर्वक स्विकार करे) ! स्मगलर बस लैंते है, शस्त्र लाते हैं, बम्बई में जाने जाती है, लोगों के घरों में रायफल, एके फोर बरामद होते है पुलिस कुछ क्यों करें (आखिर जनता संजय दत्त को चाहती है।)

इस प्रकार जब प्रशासन और नेता दुलमुल हो रहे हों तो एक जनता ही है जो नहीं कहेगी द्रहम कुछ क्यों करें ?च्च् जनता अवश्य करेगी। बस आप उसे जानकारी देते रहिये।

संस्कृत के विद्वज्जनोंको निमंत्रण : Invitation to the

Appeal to all admirers of sanskrit:
Please volunteer. If you know anyone as a sanskrit expert, take a print out of the Hindi letter below, take it to them and request to fill it up and send at the address of Mr. Ranjan Goswami, Delhii.


परम्‌ आदरणीय श्री ........................ जी,
...................................................
....................................................

विषय : टी.वी. कार्यक्रम ''संस्कृत की दुनिया''

आदरणीय महोदय,
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सम्पूर्ण विश्व में भारतवर्ष की गणना एक महान एवं गौरवशाली देश के रूप में की जाती है। इसका मुख्य श्रेय भारतीय ऋषियों, महर्षियों, एवं मनीषियों को जाता है जिनके घोर तप एवं अथक परिश्रम के परिणाम स्वरूप गौरवशाली प्रतिमान-संस्कार, चरित्र, सहजता, सरलता, मृदुभाषिता, परोपकारिता, प्रेम, करूणा, दया, सहानुभूति, एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना आदि आदर्श जनित एवं पल्लवित हुए हैं। ये सभी गौरव शाली प्रतिमान देवभाषा 'संस्कृत' के पावन पुनीत ग्रंथों में संकलित हैं।

२१वीं शताब्दी में जहाँ एक ओर सूचना क्रांति और उद्योग-विज्ञान के युग में तकनीकी अध्ययन पर बड़ी सक्रियता से कार्य किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर संस्कृत भाषा के अध्ययन एवं अभ्यास की गति बहुत ही धीमी है। परिणाम यह है कि भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग, अनमोल संस्कृत ग्रंथों में संजोए 'गौरव पुंज' से आलोकित होने से वंचित होता जा रहा है, जिसके अगणित अस्वीकार्य दृश्य परिणाम हम सभी के सामने हैं।

ऐसी दशा में हम सब का परम्‌ कर्तव्य ही नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है कि हमें अपनी विरासत और समृद्ध परंपराओं को, नयी पीढ़ी के लिए और अधिक व्यावहारिक बनाना अति आवश्यक है। ताकि सम्पूर्ण विश्व में भारत के गौरव का गान गूँजता रहे। "कौशलम्‌ ट्रस्ट, पुणें" इस कार्य के लिए संकल्पवद्ध है, जिसकी सफलता के लिए आप जैसे मनीषियों का सहयोग अतिशिघ्र अपेक्षित है। "कौशलम्‌ ट्रस्ट" की बृहत् कार्ययोजना में, व्यापक और सभी के लिए स्वीकार्य सशक्त दृक्-श्राव्य माध्यम अर्थात् टी.वी.पर कार्य़क्रम का आयोजन भी शामिल है। इस माध्यम से 'संस्कृत की दुनिया' नामक टीवी कार्यक्रम प्रसारित किया जाएगा। इसमें संस्कृत भाषा की समृद्धि से जुड़े आपके अनुभवों एवं प्रेरणादायक विचारों को स्थान दिया जाएगा। कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण अनुलग्नक-अ, संलग्न है।इसे आप मेरे अन्य ब्लॉग संस्कृत की दुनिया proposed T.V. PROGRAMME या दूसरा ब्लॉग A Trust and a TV serial as a part of plan for revival of sanskrit पर देख सकते हैं।

आपसे विनम्र अनुरोध है कि अपनी स्वीकृति से हमें अवगत कराते हुए संलग्न प्रश्नावली (अनुलग्नक-ब) को भरकर शीघ्रातिशीघ्र निम्नलिखित पते पर भेजें। आपकी अति कृपा होगी।

इन्हीं शुभकामानओं के साथ ।
भवदीय

(.........................)
वास्ते कौशलम ट्रस्ट

अनुलग्नक-ब
प्रश्नावली (संस्कृत विद्वानों के लिए)

नाम :
पिता का नाम :
जन्म तिथि :
पत्र व्यवहार का पता :
फोन नं. :
ईमेल पता :
शैक्षणिक योग्यता :
गुरू परिचय
व्यवसाय :
शोध कार्य
प्रकाशित-प्रमुख साहित्यिक लेख :
संबंधित विषय पर दिये गये व्याख्यान :
भाषा एवं संस्कृति के क्षेत्र में किये गये प्रमुख कार्य :
अभिरूचियॉं :
अन्य उल्लेखनीय कार्य :
हस्ताक्षर
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हमारा ईमेल sanskrit_tv@yahoo.co.in
हमारा पता
Shri Ranjan Goswami
PCRA
10, Bhikaji Cama Place.
New Delhi 110061

रविवार, 4 नवंबर 2007

चंद्रसेनेचा राज्याभिषेक -- marathi

चंद्रसेनेचा राज्याभिषेक

खूप जुनी गोष्ट आहे ही. पुष्पद्वीप नांवाचा मोठा देश होता. त्याचा राजा होता अनंतकुमार. त्याला एकच मुलगी होती. तिच नांव चंद्रसेना.

चंद्रसेना हुषार होती, खेळकर होती, गुणाची होती. घोडेस्वारी आणि भालाफेकीत तरबेज होती. पण तिला एक खोड होती. गणिताचा अभ्यास तिला अजिबात आवडत नसे. गणित शिकवणारे शिक्षक आले की, तिच्या सबबी सुरु झाल्याच. कधी तिला झोप येत असायची, तर कधी तिचा लाडका घोडा शेरु आजारी असायचा. खुद्द महाराणी पुष्पावती यांनी तिला गणित शिकवण्याचा प्रयत्न केला| पण चंद्रसेनेच्या सबबी वाढतच गेल्या.

महाराज अनंतकुमार चिंतित झाले आणि क्रोधित झाले. चंद्रसेना त्यांची एकुलती एक मुलगी होती, त्यांच्यानंतर राज्य सिंहासनावर तीच बसणार होती - राज्यकारभार करणार होती. पण अनंतकुमारांची पक्की धारणा होती की, ज्याला गणित येणार नाही. त्याला राज्यकारभार कांय येणार? गणित नीट शिकल्याशिवाय ही राज्य करायला लागली तर राज्य बिघडून ठेवील| शेवटी राजाने घोषणा करुन टाकली - जर चंद्रसेना नीटपणे गणित नाही शिकली तर तिला राज्य मिळणार नाही.

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गुरुवार, 1 नवंबर 2007

संस्कृत की दुनिया proposed T.V. PROGRAM

संस्कृत की दुनिया

T.V. PROGRAMME

---Sfx. Opening Music---

प्रस्तावना : भारत का हरेक प्रकार का गौरव संस्कृत भाषा के साथ जुड़ा हुआ है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब हम संस्कृत को लेकर कोई TV programme बनाने की बात सोचें तो कई प्रकार की जिज्ञासाएं हो सकती हैं.....।

यह कार्यक्रम क्यों, कैसा और किसके लिए....? इस प्रकार के कार्यक्रम से क्या-क्या लाभ हो सकते हैं....वगैरह.....।

इन सभी प्रकार की शंकाओं और जिज्ञासाओं के उत्तर में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि आज ईक्कीसवीं शताब्दी की पहली दशाब्दी में, सूचना क्रान्ति और उद्योग-विज्ञान के तकनीकी युग में, हमें अपनी विरासत और समृद्ध परम्पराओं को, नयी पीढ़ी के लिए और अधिक व्यावहारिक बनाना है और इसके लिए व्यापक और सभी के लिए स्वीकार्य माध्यम है - TV.

यह कार्यक्रम किन-किन बातों पर विशेष ध्यान देगा :

चूंकि इस प्रकार के कार्यक्रम को कई segments में बांट देने से अपार ज्ञान राशि और विविध प्रकार की सूचनाओं का संकलन व्यवस्थित हो सकता है अतः हम निम्नलिखित बिन्दुओं में से किसी एक को, एक एपीसोड के सिर्फ एक segment में शामिल कर सकते हैं। ये संलक्षित (Targeted) बिन्दु हैं -

1. Preservation of knowledge Treasure.
2. Propagation of language and literature.
3. Learning + Teaching which can be quick and higher.
4. Revalidation of Indian traditions and knowledge (पुनः
प्रस्थापना)।
5. Felicitation and highlight of scholars, institutions, manuscripts family for world to know.
6. To apply modern technology for 1 - 5.
7. Explore Sanskrit as tool for modernity.
8. Apart from literature, Astrology, Ayurveda, Mantra-sound, Environment-cleansing, Geography, Archaeology, Music
(गान, तन्त्र), Economics Toursim, Political Science, Health
Science, Yoga etc.
9. Six system of Philosophy and other prevalent thoughts of
world.
10. Computer related matters and Sanskrit grammer (NASA)

इस कार्यक्रम को रोचक और स्वीकार्य बनाने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर विशेष ध्यान दिया जायेगा -

1. Client audience.
2. Programme has to compete with other programmes.
3. Entertainment + Knowledge + Action.
4. Information - invite (to invite audience to recite Sanskrit).
5. Recital by audience.

FORMAT OF THE PROGRAMME -

''संस्कृत की दुनिया'' नामक इस टी० वी० कार्यक्रम की अवधि १२ से १५ मिनिट्स की हो सकती है जिसमें ३ अथवा ४ segments रखें जायें। कार्यक्रम का पहला segment - Prog-Montage से शुरू करते हुए शीर्षक गीत में वैदिक शान्ति पाठ को शामिल किया जाए। इस कार्यक्रम की भाषा प्रमुखतया हिन्दी ही हो किन्तु कार्यक्रम के स्वरूप के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर संस्कृत, अंग्रेजी या कहीं-कहीं, थोड़ी-थोड़ी क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग भी हो सकता है।

सूत्रधार (He or She) एपीसोड के नायक, संस्कृत-जीवी को highlight करेगा या करेगी। उसकी उपलब्धियों और रचनाओं की प्रासंगिकता को वर्तमान-जगत्‌ की उपयोगिता के लिए प्रस्तुत किया जाए।

एपीसोड का नायक-विद्वान्‌ आधुनिक या प्राचीन परम्पराओं से (School of thoughts may be different) जुड़ा हो सकता है।

कार्यक्रम का तीसरा segment रोचकता से भरपूर हो जिससे सामान्य दर्शक भी अपने आपको इसके साथ जोड़ सके। इसके लिए मनोरंजक घटना, कथा-कहानी या चुटकुला भी हो सकता है।

चौथे और अन्तिम segment में दर्शक से कोई एक प्रश्न पूछा जाए और बाद में सच्चा जवाब भेजने वाले को नकद या कोई गिफ्ट या पुरस्कार दिया जाए।

अंत में सुभाषित का सन्दर्भ भी दिया जा सकता है, जिससे अप्रत्यक्षरूप से युवा-पीढ़ी को नैतिक सन्देश मिल सके।

कार्यक्रम का समापन करने से पहले Anchor, ''संस्कृत की दुनिया'' से जुड़ी राष्ट्रीय, अन्तराष्ट्रीय या क्षेत्रीय कोई भी विशेष घटना, रचना, उपलब्धि या कार्य की update सूचना दे कर, कार्यक्रम का एपीसोड पूरा करें।

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एक असहाय मगर की मृत्युगाथा

१९-- एक असहाय मगर की मृत्युगाथा

सन १९९४ के मार्च महीने में पुरी-भुवनेश्र्वर के आसपास घटित हुई थी यह सत्यकथा जो मैंने अपनी भाभी श्रीमती अग्निहोत्री से सुनी। उड़ीसा गरीबी, बदहाली, और भूखमरी से बेहार राज्य माना जाता है। शिक्षा का प्रमाण बिहार या उत्तर प्रदेश से अच्छा है, लेकिन बेरोजगारी भीषण है। एक भरे पेट वाला इन्सान जितने प्यार या सद्भावना से पशुओं - प्राणियों की बात करता है (या हम सोचते हैं कि समझता है), शायद उस तरह की संवेदनशीलता एक खाली पेट वाला इंसान नहीं रख सकता। यहां एक ही बात का महत्व है कि शत्रु को मत छोडो, जिसके कारण जीवन के असुरक्षित होने का अनुमान है- उसे मत छोडो। इसी अनुमान का शिकार बनी एक असहाय मगर।

इस बदहाल उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्र्वर में एक प्राणी-संग्रहालय है। नाम है नंदन कानन अर्थात्‌ स्वर्ग का बगीचा। और वाकई मैंने जितने चिडिया घर देखे हैं, नन्दन कानन मेरा सबसे पसंदीदा है। यहाँ प्राणियों को केवल पिंजरे में बंद करके नहीं रखते, बल्कि उनकी पैदावार बढाने का उद्यम भी किया जाता है। यहाँ गोह, मगर, काला चीता और सफेद शेर की पैदाइश के केंद्र बने हुए हैं जिनके अच्छे परिणाम आ रहे हैं - और इन प्राणियों की संख्या धीरे-धीरे बढ रही है। करीब पचीस वर्ष पहले इस पैदावार केंद्र की स्थापना हुई। तबसे कार्तिक के पिता इसके मगर-पैदावार केंद्र में काम करते थे। फिर कार्तिक ने भी यहाँ काम करना शुरू किया। आज उसकी उम्र होगी कोई चालीस - पैंतालीस साल की। उसका काम है मगरों की निगरानी करना। पहले उनके अंडों की देखभाल, फिर जब मगर के बच्चे पैदा होते हैं, और उनका आकार प्रकार बढता है, तो उन्हें उचित जगहों पर ले जाना। इतना ही नहीं, कार्तिक और उसके अन्य साथी कर्मचारी इनकी गिनती भी रखते हैं । गिनती के लिये इन बच्चों की खाल पर चाकू या किसी तेज धार वाले हथियार से सांकेतिक चिन्ह बनाये जाते हैं - जैसे धोबी अपने कपडों पर गिनती के लिये मार्क लगाते हैं - कुछ इसी तरह से। इस प्रक्रिया में मगर की कोई जखम इत्यादि नहीं होती है। लेकिन यह काम तभी करना पडता है जब मगर के बच्चे छोटे हों।

नंदन कानन में जो प्रजाति पैदा की जाती है वह घडियाल प्रजाति है, जो नरभक्षी नहीं होती। इसके विपरीत उड़ीसा में बौला और कुम्हारी नाम मगर की दो अन्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो नरभक्षी हो जाती हैं।

यह यह घटना घटी तब उड़ीसा प्रशासन के इरिगेशन विभाग में श्रीमती अग्निहोत्री अतिरिक्त सचिव थीं। एक दिन उनके पास कटक कलेक्टर ने एक अजीब सा टेलिग्राम भेजा। उसमें लिखा था कि पुरी मेन कॅनॉल में नहर के मुहाने से करीब चालीस किलोमीटर दूर प्रतापपूर गांव के आसपास नहर में एक मगर देखी गई है। नहर में मगर आ जाने के कारण आस पास की ग्रामीण जनता डरी हुई है। पिछले दो दिनों से गाँववाले मगर को मारने का प्रयास करते करते थक चुके हैं। मगर का बंदोबस्त तत्काल न हुआ तो गाँव वालों ने ''रास्ता रोको'' की धमकी दी है। कम से कम चार गाँवों के ग्रामीण रास्ता रोको में शामिल होंगे। अतएव आवश्यक है कि पुलिस विभाग, सिंचाई विभाग और वन विभाग तत्काल इस मगर को मारने की कारवाई करें। प्रार्थना है कि मुख्यमंत्री स्वयं इस मामले पर गौर करें। अन्यथा ग्रामवासियों ने आक्रोश भरे शब्दों में अपनी भावना व्यक्त की है।

इस टेलीग्राम से भुवनेश्र्वर के मंत्रालय में खलबली मच गई। प्रायः सभी वरिष्ठ अधिकारियों का मत था कि मगर को मारा न जाय। केवल पकड कर नहर से बाहर कर दिया जाए। इस काम की जिम्मेदारी श्रीमति अग्निहोत्री को दी गई।
तत्काल वन-विभाग के अधिकारियों की एक टुकडी प्रतापपुर के लिये रवाना हो गई। कटक जिला वन-अधिकारी इस टुकडी के प्रमुख थे।

पहले यह मगर नहर में पानी की दिशा के साथ ही जा रही थी लेकिन अचानक उसने अपना रूख बदल दिया और अब वह नहर की विपरीत दिशा में तैर रही थी। ग्रामवासियों का मानना था कि वह बौला जाती की नरभक्षी मगर थी। मगर पानी से ऊपर भूले भटके ही दिखाई देती थी। कारण यह था कि वह स्वयं ग्रामवासियों से डरी हुई थी। नहर के दोनों किनारों पर लोगों ने एक मानवी श्रृंखला तैयार की थी। लाठी - काठी लेकर मगर को मारने के लिए लोग मुस्तैदी से तैनात थे। इसके अलावा भयानक शोरगुल, नगाडे, ढोल इत्यादि पीटकर उसे डराने का प्रयास भी किया जा रहा था। ताकि डर कर वह बाहर आये तो उसे मारा जा सके। रात में भी लोग नहर के पास से हटने का नाम नहीं ले रहे थे, बल्कि मशालें जला कर रातभर नहर के किनारों पर पहरा दे रहे थे। पुलिस भी उन्हें हटाने में असफल हो रही थी। या शायद खुद पुलिस का मनोबल ही कम पडा रहा था।

मगर ने जो तैरने की दिशा बदली थी वह भी ग्रामवासियों के डर से। इससे दो बाते हुईं - एक तो यह कि प्रवाह के
विरूद्ध मगर की तैरने की गति धीमी हो गई थी। दूसरी यह कि जिन ग्रामवासियों ने राहत की साँस ली थी - कि चलो मगर
हमारे गाँव से आगे चली गई- वे अब मगर के वापस आने के खयाल से फिर डर गये। इसी प्रकार चार दिन बीते।

इस बीच कुछ अधिक जानकारी सिंचाई विभाग के हाथ लगी। उसका कुल अर्थ यही था कि नंदनकानन के मगर केंद्र में पैदा होने वाले घडियालों के बच्चे थोडे बडे हो जाते हैं तो उन्हें महानद के विशाल पात्र में छोड दिया जाता है।

हमारे देश में बाकी नदियों को स्त्रीलिंगी माना जाता है परंतु ब्रहमपुत्र और महानद ये दो नद अर्थात्‌ पुल्लिंगी माने जाते हैं। इस महानद का उद्गम मध्य प्रदेश में होता है और उड़ीसा के कई जिलों को सींचता हुआ आगे समुद्र में मिल जाता है। कटक के पास इसी महानद पर एक सौ दस किलोमीटर लम्बी नहर बनाई गई है जिसका नाम है पुरी मैन कॅनॉल। इसका मुख्य दरवाजा कटक के पास मुंडली गांव में है । दो वर्ष पहले दरवाजा टूट गया था, जिसे मामूली तौर पर ठीक ठाक कर लिया गया था। लेकिन दरवाजा अभी पूरी तरह ठीक नहीं था।

महानद जहां अंगुल जिले के टिकरपाडा क्षेत्र से बहता है, वहाँ दोनों ओर ऊंची ऊची पर्वत श्रेणियाँ हैं और नद का पात्र काफी गहरा है। यहीं पर एक गॉर्ज में नद को रोककर नहर के लिये पानी छोडा जाता है। यह जगह मगर के बच्चों के लिये अच्छी सुरक्षित जगह मानी जाती है। बच्चे बडे हो जाते हैं तो उन्हें समुद्र के आसपास नद के पात्र में छोड देते हैं-फिर वे चाहे जहाँ जायें।

नंदनकानन के कार्तिक का मानना था कि प्रतापपुर गाँव के कॅनॉल में फँसी मगर नंदनकानन की घडियाल मगर ही थी। वह टीकरपाडा के गॉर्ज में पली होगी। वहाँ से कभी तेज प्रवाह में बहती हुई वेस्ट वेअर के रास्ते कॅनॉल के मुहाने पर मुंडली गाँव में पहुँची होगी। वहाँ दरवाजा तो टूटा ही था, उसी में से निकलकर नहर में आ गई होगी।

कुल मिलाकर कार्तिक का यह मानना था कि नहर में फँसी मगर नरभक्षी बौला जाति की नहीं, बल्कि घडियाल जाति की थी और उसे मारने के बजाय जिंदा पकड लेना चाहिये। अब अधिकारियों का भी यही मत था। कार्तिक के आग्रह पर उसे भी टीम में शामिल कर लिया गया।

लेकिन ''मगर पकडो टीम'' चार दिनों से मगर को पकड नहीं पा रही थी। उधर गाँव वाले मगर मारो, मारो की रट लगाये हुए थे। इतनी बडी मगर पकडने लायक जाले वाइल्ड लाइफ कन्जर्वेटर के पास या सिंचाई विभाग के पास नहीं थे। दूसरी ओर मगर का नाक जैसे ही पानी के ऊपर दीख जाता तो गाँववाले डर जाते और मारो, मारो का शोर मचाने लगते, जिससे मगर फिर पानी के अंदर चली जाती और उसका अता पता ढूँढना मुश्किल हो जाता। नाव से नहर के चक्कर लगाकर और अन्य राज्यों से जाले मँगवाकर भी टीम मगर को पकड नहीं पाई। अन्ततः कुछ स्थानिक मछुआरों को यह काम सौंपा गया। मगर को बिना जख्मी किए जिंदा पकडने के लिये तिगुनी मजदूरी तय हुई।

यों किसी प्रकार मगर पकडी गई और पानी से बाहर लाई गई। तब गाँव वालों को रोकने के लिये खुद पुलिस डी० आय्‌ जी० मौजूद थे ताकि गाँववाले बेकाबू होकर उसे मार ही न दें।

फिर उस मगर को जीप में डालकर नंदनकानन लाया गया। वह इतनी पस्त हो चुकी थी कि अपना जबडा खोलकर 'आ' नहीं कर सकती थी। पूँछ भी नहीं हिला पा रही थी। सामने रखी मछलियाँ भी नही खा सकती थीं। डॉक्टरों ने उसपर औषध उपचार करना आरंभ किया। लेकिन सब बेकार। दूसरे दिन सुबह तक उसकी मृत्यु हो गयी। जब मौत का कारण जानने के लिए उसका शव-विच्छेदन किया तो पता चला की ऑक्सीजन की कमी और आत्यंतिक मेहनत व थकान से मौत हुई।

हमारी धारणा यह होती है कि मगर तो जलचर है, उसे भला हवा की क्या जरूरत। लेकिन ऐसा नहीं है। मगर भी हमारी ही तरह हवा में साँस लेती है। इसलिये उसे बीच बीच में पानी की सतह पर आकर, अपनी थूथनी बाहर निकाल कर अपने फेफडों में हवा भरनी पडती है। लेकिन यह मगर तो साँस ही नहीं ले पा रही थी क्योंकि लोगों के डर से वह पानी के बाहर अपनी नाक भी नहीं निकाल पाती थी। वह तैरना छोडकर सुस्ताना चाहे तो वह भी नहीं कर सकती थी। प्रवाह से उलटी दिशा में तैरने के लिये भी मेहनत पड रही थी और थकान बढ रही थी। इसी बीच उसके गले और पूँछ जखम हो गये थे। इन सबके बाद वह बच नहीं पाई।

मगर की मौत की बात सुनकर श्रीमती अग्निहोत्री से नहीं रहा गया। कल शाम ही की तो बात थी कि मगर को जिंदा ला पाने का संतोष और आनंद पूरी टीम ने एक साथ मनाया था। वे खुद गईं देखने। कार्तिक भी वहाँ था। सबसे पहले उसी ने सुझाव दिया था कि हो न हो यह टिकरपाडा की कोई भूली भटकी मगर है। अब उन्हें देखकर कार्तिक सामने आया। बोला - '' माँ, देखो - - - -'' मगर की पूंछ पर तेज छुरी से काटकर बनाया हुआ निशान था। जाहिर था कि वह मगर कभी किसी दौरान कार्तिक के हाथों पली थी। उसे दिखाते हुए कार्तिक की आँखों में आँसू थे।

इस घटना के कुछ दिनों बाद श्रीमती अग्निहोत्री की बेटी अर्थात्‌ मेरी भाँजी मेरे पास रहने आई। उन्हीं दिनों नाशिक के अखबार में खबर आई कि शिकार की तलाश में जंगल से गाँव आ पहुँचे दो बाघों को एक कमरे में बंद करने के बाद गॉववालों ने उन्हें बाहर से पत्थर मारमार कर मार दिया - क्योंकि उन्हें पकडने वन विभाग के जो अधिकारी आने वाले थे, उन्हें बेहोशी का इंजेक्शन खोजते हुए देर लगी थी। बिटिया को याद आई मगर की मौत। उसने मुझसे पूछ ही लिया - बुआ, तब मगर को और अब बाघों को लोगों ने क्यों मार दिया? जबकि सच्चाई तो यह है कि वे ही हमसे डरे हुए हैं। मैंने उसे बताया कि अभी हमारे लोगों की सोच सही नहीं हुई। वे अब भी मगर से, बाघ से, साँप से डरते हैं। उन्हें दोस्त नहीं मानते। उन्हें बचाने के तरीके नही सोचते- न ही प्रकृति के चक्र में उनके महत्व को समझते हैं। जब तक हम गाँव वालों को नहीं सिखा लेते कि इनसे मत डरो, तब तक इन प्राणियों की योंही अकारण मौत होती रहेगी।
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This and many more on my blog सुवर्ण पंछी

24 दिल्लीका सांस्कृतिक बंजर

दिल्लीका सांस्कृतिक बंजर
---- लीना मेहेंदले
कुछ दिनों पहले एक बुजुर्ग से बाते हो रही थीं कि राजकीय या प्रशासकीय क्षेत्र में कहीं कोई नया सशक्त अंकुर पनपता नही दिखाई देता, तो उनका उत्तर था - फिर साहित्य क्षेत्र में तलाशो - जरूरी नही है कि लीडरशिप केवल उन्हीं क्षेत्रों से आए। अगर वाल्टेयर न होता तो फ्रेंच रिवोल्यूशन की हवा कौन बनाता? मुझे याद आई वो पंक्तियाँ ं- ''कि जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो''। यहां तोप को अनुत्साह और बौनेपन के अर्थ में पढा जा सकता है।

यह भी हुआ कि थोड़ी मेरे अखबारवाले की मेहरबानी और कुछ मेरी अपनी सक्रियता का परिणाम था कि घर में अचानक मराठी अखबार आना शुरू हो गया। पिछले छः आठ महीनों से वह बंद था। और अखबार खोलते ही जो पहली बात चेतना में आई वह थी 'आज के कार्यक्रम'' का विज्ञापन वाले दो पृष्ठ। क्या था इन विज्ञापनों में जो दिल्ली के हिंदी या अंग्रेजी अखबारों में नही होता? इसकी अंदाज उन नाटकों और अन्य कार्यक्रमों के शीर्षक से ही लगाया जा सकता है जो उस सप्ताह मुबई में हो रहे थे।

सगळ्या लटपटी लग्नासाठी, अर्थात्‌ सारा खेल शादी के लिए का वर्णन था - लव्हेबल, म्यूजिकल, डान्सिकल, फास्ट कामेडी। दूसरा नाटक था - मिशन कंतलांग जो आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर है। आमच आकाशच वेगळ - अर्थात्‌ हमारा आसमान जुदा है एक गंभीर, सामाजिक घरेलू नाटक है। हमारे बचपन से ही खेला जानेवाला एक नाटक था - गाढवाच लग्न - याने गघे की शादी। नुक्कड नाटकों की तरह इसमें नये नये राजकीय व्यंग के डायलांग परस्थिति के हिसाब से डाले जा सकते हैं। इस एक नाटक का मंचन दो अगल-अलग नाटक-संस्थाओं द्वारा अलग-अलग कलाकारों के साथ कि या जाना था।

पंडित कुमार गंधर्व की स्मृति में आयोजित एक म्यूझिकल फेस्टिवल में पधार रही थीं श्रीमति देवकी पंडित और डा.एन.राजन। उसी यशवंतराव चव्हाण केन्द्र की ओर से दो ही दिनों बाद कीर्ती मराठे के शास्त्रीय गायन का कार्यक्रम भी था। कुमार गंधर्व की यादें नामसे एक अलग कार्यक्रम का आयोजन किसी दूसरी संस्था की ओर से था।

कुछ अन्य कामेडी नाटकों के विज्ञापन थे- पैसाच पैसा' (पैसा ही पैसा), श्री तशी सौ (जैसा पति वैसी पत्नी - यानी उसी की तरह चालबाजी दिखाकर और उसी के तरीके अपनाकर उसे सुधारने वाली पत्नी की कहानी), सदा सर्वदा, यदा यदा हि अधर्मस्य, यदा कदाचित्‌ ।

मराठी की ग्रामीण नृत्य परंपरा लावणी पर आधारित दो कार्यक्रम थे - चौफुला (अर्थात्‌ वह जगह जहाँ दूर दराज के गाँवोंसे आनेवाले दो रास्ते कटते हैं) जो केवल लावणी नृत्यों का कार्यक्रम था जबकि सोळा हजारात देखणी यानी 'सोलह हजारों मे एक (सुन्दरी), उन्हीं लावणी नृत्यों पर आधारित एक नाटक है - जिसके विज्ञापन मैं पिछले पांच वर्षो से देख रही हूं - नाटक शायद और भी पुराना है ।

बर्नार्ड शॉ के प्रसिद्व नाटक पिग्मॅलियन का मराठी अनुवाद कर उसे करीब तीस वर्ष पहले मराठी के प्रसिद्व लेखक पु.ल.देशपांडे द्वारा रंगमंच पर लाया गया था। वह आज भी खेला जाता है - उस 'ती फुलराणी' का भी विज्ञापन था। 'नटसम्राट' भी ऐसा ही एक चिरंजीव नाटक है जो एक महान नाटय-कलाकार के वृद्व हो जाने पर अपने ही बच्चों द्वारा होनेवाली दुर्दशा की थीम पर पिछले पंद्रह वर्षो से भी अधिक खेला जा रहा है । इथे ओशाळला मृत्यु, ('यहाँ मृत्यु भी शरमिंदा हुआ), यह नाटक भी पिछले तीस वर्ष से अधिक खेला जा रहा है । औंरगजेब के हाथों शिवाजी - पुत्र, मराठी राज्य के राजा संभाजी की कैद, संभाजी का स्वाभिमान और उसकी अत्यंत यातनामय पद्वति से होने वाली मृत्यु (उसकी आँखे निकलवाई, फिर हाथ और पाँव तोडे, फिर जीभ कटवाई और फिर उसे घसीटकर मरवाया।) ये तीनों मंचन भी मौजूद थे । एक हॉरर नाटक था - कुणीतरी आहे तिथे अर्थात्‌ वहाँ कोई है'। यह भी पंद्रह वर्षो से रंगमंच पर आ रहा है।

महिला प्रताडना और महिलाओं की समस्या से जूझते चार नाटक थे - एक तर्फी प्रेम - अर्थात्‌ इक तरफा प्रेम, लेडीज बार , सूनमुख अर्थात बहू की मुँह - दिखाई, और रानडयांची संगीता (रानडे परिवार की लडकी संगीता) ।

कुछ और भी कॉमेडी नाटक थे - काहीतरी चाललय खर, (अर्थात 'दाल में कुछ काला है जरूर) रंगा रंगीला रे, 'गेला माघव कुणीकडे, (माधव कहाँ गया), 'बायको असून शेजारी ', (पत्नि के होते पडोसन), ढोल-ताशे (ढोल-नगाडे), 'आला काय, गेला काय', (आया क्या और गया क्या), नस्ती आफत (बेकार की आफत), 'हे रामा, आत्मा रामा'। एक नाटक पांडुरंग फुलवाले आजकल अल्फा मराठी पर सीधे नाटक की ही शूटिंग करके दिखाया जा रहा है - ऐसे कई अच्छे नाटक, नाटकीय रंगमंच और अन्य पूरे नाटकीय तामझाम और स्टाईल के साथ मराठी चैनलों पर लाये जा रहे है। लेकिन उनका अलग से मंचन भी चलता है, और खूब चलता है - पूरा टिकट लगाकर।

एक सस्पेन्स युक्त कॉमेडी - डबल गेम , एक कौटुंबीय नाटक - मन ओढाळ - ओढाळ (मन आकुल - आकुल)े एक और कॉमेडी नाटक - तुमचा मुलगा काय करतो (आपका लडका क्या है )ै और मु.पो. बोबिलवाडी (मुकाम पोस्ट मछली - बाजार, लेकिन बोंबल शब्द का अर्थ है- चीखते रहो) ।

इनके अलावा भारतीय गंधर्व महाविद्यालय का मासिक शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम था, आर्केस्ट्रा और कविता-गायन के कार्यक्रम थे। इन सबके अलावा एक विज्ञापन और था आंतर-महाविद्यालयीन एकांकिका स्पर्घा के अंतिम राउंड के पांच नाटकों के मंचन का।

इन पन्नों को मैं देखती हूं तो महाराष्ट्र की एक शानदार सांस्कृतिक परंपरा दीखती है। ऐसे ही पन्ने दिखेंगे पूणे, या नागपूर, नाशिक, औरंगाबाद, कोल्हापूर, जलगाँव जैसे जिला मूख्यालयों से निकलने वाले अखबारों में भी। उनमें कई बार किसी लोकप्रिय वक्ता के भाषणों के भी कार्यक्रम होते हैं तो कभी किसी भजनी मंडल के भी।

कई दशकों पूर्व पूर्ण में सवाई गंधर्व शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें लगातार तीन रातें शाम सात बजे से अगले दिन सुबह सात (और कभी कभी दोपहर बारह बजे तक भी) शास्त्रीय संगीत की समर्पित होती हैं। इसमें दस हजार के आसपास श्रोता उपस्थित होते है। आरंभ में इसे पुर्ण महानगर पालिका की ओर से काफी अनुदान और सुविधाएं मुहैया हुई और अब यह एक विराट जन - आंदोलन बन चुका है। पंडित जसराज, पंडित शिवकुमार शर्मा, उस्ताज अमजद अली खान और पंडित भीमसेन जोशी से लेकर सारे कलाकर इस कार्यक्रम में हाजिरी लगाते है और जो नहीं लगा पाते उन्हें एक छटपटाहट सी लगी रहती है अगले वर्ष तक।

इस सारी पृष्ठभूमि में दिल्ल्‌ी महानगर निगम का वह फैसला भी सुना जिसके तहत उन्होंने हर महीने नेहरू पार्क में आयोजित किया जानेवाला मॉर्निंग रागाज कार्यक्रम बंद कर दिया। खुले आकाश के नीचे, बिना रोक टोक के जाये जा सकेवाले इस कार्यक्रम में कोहरे भरे कडाके की सर्दी या मूसलाधार बारिश को झेलते हुए भी (जैसा पंडित भीमसेन जोशी के कार्यक्रम में हुआ) हजार से दो हजार श्राताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी। इसे बंद करवाकर दिल्ली में पनप रहे एक सांस्कृतिक अंकुर को उखाड फेकने से किसने क्या पाया और क्या बचाया?

दै. हिन्दुस्तान दि.