गुरुवार, 15 जुलाई 2010

08 भारतीय नौकरशाही की पुनसंरचना -- Restructuring Indian Bureaucracy

भारतीय नौकरशाही की पुनसंरचना
(1st prize winner article in the IIPA Essay Competition for 199????)
मुद्दा उठा है भारतीय नौकरशाही की पुन संरचना का, तो पहले हम इस मान्यता को स्वीकार करके चलेंगें कि किसी देश के प्रशासन में, अर्थात् देश की समस्याओं का निराकरण करते हुए देश को विकास और प्रगति के पथ पर ले जाने में नौकरशाही का अहम् स्थान है। फिर आज की हालत में तीन प्रकार के प्रश्नों की जाँच बड़ी आवश्यक हो जाती है, आज से अगले पचास वर्षों में भारत को क्या करना है, उसके लिए किस प्रकार की नौकरशाही की आवश्यकता है,क्या आज वह कैसी नहीं है? दूसरा प्रश्न यह है कि नौकरशाही का आज का ढाँचा किस प्रकार का है? और इसकी नई संरचना किस प्रकार होनी चाहिए? इस संरचना के लिए हमें किस प्रकार के नौकरशाह चाहिए? उनमें क्या-क्या गुण हों? तीसरा मुद्दा उठेगा कि वह नई संरचना किस प्रकार प्रत्यक्ष में लाई जाये, इसके लिये कितना समय उपलब्ध है? कौन इसके लिए समर्थ है, किसे इसके लिए प्रयास करना होगा, इत्यादि। अर्थात् Why What and How?

किसी जमाने में भारतीय नौकरशाही को स्टील फ्रेम कहा जाता था। आज कई लोग मानते हैं कि यह बदलकर अल्युमिनियम फ्रेम हो गई है। सतह पर खूब चमकीली, देखनेपर यही भ्रम पैदा करेगी स्टील फ्रेम ही है। लेकिन जब जहाँ झुकना या मोड़ना चाहो, वैसी ही मुड़ेगी और वैसी ही झुकेगी। यह मैलीएबल हो गई है। यानी पीट पीट कर इसे जैसा चाहो आकार दे सकते हैं.., डक्टाइल भी है, खींचकर इसकी तार बनाई सकती है। जरा सी समस्या आये तो इसकी spluttering शुरु हो जाती है और सतह को कुरदने पर अंदर कोई दम-खम नहीं हैं।

लेकिन अब समस्या यह नहीं है कि कैसे हम वापस स्टील फ्रेम को कायम करें। हमें समझना होगा कि यह असंभव है और अवांछित भी है, वैसे ही जैसे घड़ी की सुई को उल्टा घुमाकर पुराने समय को छूने का प्रयास करना। समय बदला। समय के साथ-साथ हमारी नौकरशाही बदली। उसके रीति-रिवाज बदले, उसकी मान्यताएँ बदलीं, उसके काम करने का ढंग बदला। यह तो होना ही था। जब हो चुका तब हम जागे और कहने लगे 'अरे, यह जो सब कुछ हुआ यह तो सिस्टम फेल्युअर है।' क्यों ऐसी नौबत आई? इसलिये कि सिस्टम कोई स्थिर व्यवस्था नही है; इसमें प्रवाह है, गति है और गति का जो डायनॉमिक इक्विलिब्रियम होता है उसे बड़ी सूझ बूझ से बनाये रखना पड़ता है। हमारी नौकरशाही भी एक सिस्टम है। हम इसे स्टेटिक, स्थिर मान कर चल रहे थे। हमने विचारपूर्वक आवश्यक परिवर्तन इसमें नहीं किये। इसलिये जो परिवर्तन होते गये उन्होंने हमें सिस्टेमिक फेल्युअर के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। सिस्टम का हर पल पुनर्मूल्यांकन करना पड़ता है, उसे नित नये रुप में ढालना पड़ता है और यह प्रयास करना पड़ता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति जो इस बदलाव के सम्पर्क में आनेवाला है, उसका प्रबोधन हो, प्रशिक्षण हो और वह इस बदलाव को समझे, माने, और इसमे सहयोग दे। हमारी नौकरशाही बिखर गई क्योंकि यह सतर्कता हम नहीं रख पाये - न तो नौकरशाही के बड़े अधिकार, न देश के नेतागण, न अकेडेमिशिअन्स और न समाज।

इसे हम एक छोटे उदाहरण द्वारा यूँ समझें - कि मंत्रालय की लिफ्ट के सामने क्यू में सब लोग खड़े होते थे - यह भी एक सिस्टम थी - किसी दिन एक आदमी ने कह दिया - भई मिनिस्टर को आगे जाने दो, वह जल्दी पहुँच गये अपने कमरे में, तो हमारे कुछ काम ही निबटा देंगे। सो मंत्री जी को क्यू से हटकर आगे भेजने का सिस्टम चल पड़ा। लेकिन जल्दी ही दो जने ऐसे और निकले जो मंत्री जी के काम में हाथ बटाने के नाम पर क्यू से आगे निकलने लगे। दो से चार हुए, चार से आठ। बस हो गया सिस्टम फेल्युअर। लेकिन यदि मंत्रीजीको क्यू में ही रखनेका नियम रहता तो क्यू सनस्टम अधिक कारगर हो जाती।

एक दूसरा उदाहरण भी है। सागरी तट पर स्मगलिंग रोकने के लिए कस्टम विभाग की नियुक्ति हुई। विभाग में कभी किसी ने छिपकर या धीमी आवाज में कह दिया - कि यदि मैंने थोड़ी घूस ले ली तो क्या हुआ? फिर औरों ने भी घूस में अपना हाथ बंटाया। एक दिन बंबई में आर्.डी.एक्स पहुँच गया और उसने तबाही बचाई। अब थापा जैसा सिनीयर अफसर कहता है कि हमने चाँदी समझ रखी थी, और चूँकि चाँदी की स्मगलिंग में आजकल ज़्यादा लाभ है इसलिए ज़्यादा रेट से घूस मांगी। इसी पर चिढ़ कर मुझे पकड़वाया गया। अब पुलिस और कस्टम वाले कहते हैं कि छि छि देखो कैसा सिस्टम फेल्युअर आ गया कि स्मगलर खुद तो ज़्यादा कमाऊ चीज ला रहे हैं (यानी चाँदी) लेकिन हमें ज़्यादा घूस देने को तैयार नहीं। मेरी निगाह में सबसे बड़ा सिस्टम फेल्युअर यह है कि कस्टम और पुलिस वालों का यह रिमार्क सुनकर नौकरशाही में कोई खलबली नहीं मची है और इस प्रवृत्ती के गंभीर खतरे के प्रति हम सजग या संवेदनशील नहीं हैं।

उपरी परिच्छेदों के व्यंग को हम न देखें। उन उदाहरणों से हमें यह समझना है कि आज की नौकरशाही की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसकी संवेदनशीलता और सतर्कता दोनों लुप्त हो चुके हैं। पुनर्रचना किस प्रकारकी हो जहाँ ये दोंनों गुण लाये जा सकें?

हमारे सामने प्रश्न है कि अगले पचास वर्षों में भारत को क्या करना है, इसके लिये किस प्रकार की नौकरशाही चाहिये और क्या आज की नौकरशाही उस प्रकार की नहीं है? पिछले चालीस पैंतालीस वर्षों में हमनें जब जब प्रश्न पूछा कि एक देश के नाते भारत को आगे क्या करना है तो कुछ ठोस उत्तर सामने आये जैसे - विकास की गति अर्थात् GDP को बढ़ाना, कल-कारखानदारी बढ़ाना, कृषि उत्पादन में स्वावलंबन लाना, अधिक रोजगार निर्माण करना, शिक्षा का समुचित प्रबंध करना, लोकसंख्या वृद्धि को रोकना, गरीबी हटाना, भ्रष्टाचार रोकना, कम्युनल हार्मोनी और राष्ट्रीय एकात्मता बनाये रखना, अंतर्गत सुरक्षा को सुधारना या सँवारना। आज भी ये मुद्दे कम नहीं हुए हैं। इनमें से प्रत्येक काम आज भी हमारी लिस्ट पर है। बल्कि हम तो यह देखते हैं कि चालीस वर्षों पहले इन कामों की जितनी अहमियत रही होगी उससे आज अधिक अहमियत है क्योंकि इसमें से प्रत्येक क्षेत्र में हमारा प्रयास अपरिपूर्ण रहा और समस्या का समाधान नहीं हो सका। यहाँ हमें सौ फीट नदी तैर कर पार करना है और हमने जी तोड़ कोशिश से नब्बे या निन्यानवे फीट भी पार कर लिय और डूब गये तो परिणाम क्या हुआ? डूबने के बाद क्या इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि अपनी शक्ति भरसक प्रयास हमने किया? या कि इस बातसे कि चलो नब्बे फीट तो हम पार कर गये? असल कसौटी है कि आपने ध्येय पाया या नहीं? इसका उत्तर यही है कि भारतीय नौकरशाही बार-बार डूबी है वह भी अकेले नहीं, साथ में कई करोड़ की संपत्ति, मेहनत और सपने लेकर डूबी है।

नतीजा यह है कि अगले पचास वर्षों में भारत को वे सब काम भी करने हैं जो पिछले चालीस वर्षों में खतम करने थे। पर अब उनसे भारी अहमियत के कुछ प्रश्न उत्पन्न हो गये हैं। जैसे यह प्रश्न कि उपरोक्त ध्येय प्राप्ति के लिये हमारे पास कितना समय बचा है? यदि उतने समय में हम कुछ हासिल नहीं कर पाये तो क्या यह देश एक सार्वभौम एकसंघ देश के रूप में जीवित रहेगा? इस ध्येय प्राप्ति के लिये यदि कुछ त्याग करना पड़े तो इसके लिये कौन राजी होगा? चालीस वर्ष पहले यह प्रश्न नहीं उठा था क्योंकि तब त्याग और सेवा की भावना से जुड़े कई हजारों नेता, कार्यकर्ता और नौकरशाहभी मौजूद थे। लेकिन आज यह प्रश्न उठेगा। क्या लोगों को हम आज भी भरोसा दिला सकते हैं कि भारतीय नौकरशाही सच्चे मन से उपरोक्त ध्येय प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हैं? क्या जनता इस बात पर विश्वास करती है कि देश की नौकरशाही में कमसे कम कुछेक प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो भ्रष्ट नहीं हैं, सक्षम हैं, समर्थ हैं और देश के जनसामान्य की सुख-सुविधा के लिये काम करते हैं? यदि जनता में यह विश्वास होगा तभी हमें उतना समय मिलेगा कि हम नौकरशाही की पुनः संरचना कर उससे कुछ उपयोगी काम करवा सकें।

आज भ्रष्टाचार ने समाज के हर क्षेत्र को छू लिया है। हमने यह स्वीकार कर लिया है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार है, वह सर्वव्यापी है, राजकीय नेता और नौकरशाह उससे अछूते नहीं हैं बल्कि कई-कई तो इसमें आकण्ठ डूबे हैं। यदि राजकाजमेंसे भ्रष्टाचार पूरी तरह निकल गया होता तो भी हमें नौकरशाही की पुनर्रचना की आवश्यकता होती क्योंकि आज का ढाँचा हमारे ध्येय प्राप्ति में फिर भी असमर्थ ही होगा- उसकी चर्चा हम थोड़ा रुक कर करेंगे। और जब हम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भ्रष्टाचार को हटाना या कम करना या आज की लेवल पर रोक कर रखना तत्काल संभव नहीं है तो हमारी कठिनाई बढ़ जाती है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि 'रुको, पहले सारे भ्रष्टाचार को समाप्त करो, फिर नौकरशाही को सुधारेगें'। दूसरी ओर यदि हम ऐसी नौकरशाही चाहते हों जे भ्रष्टाचार को तो जरा भी न छुये, उसके प्रति चुँ तक न करे और फिर भी देश को वे सारे ध्येय प्राप्त करा दे तो यह भी संभव नहीं है। नौकरशाही की पुनर्रचना इस प्रकार करनी पड़ेगी कि नई पुनर्गठित नौकरशाही भ्रष्टाचार को रोकती रहे और धीर धीर कम करती रहे ताकि अन्य कार्यक्रमों के अच्छे फल समाज तक जल्दी से जल्दी पहुँच सके। यह अतिरिक्त शक्ति नौकरशाही में लानेका क्या उपाय हो सकता है?

विचारणीय है कि नौकरशाहीका आजका गठन कैसा है। इसके चार हिस्सों की अलग अलग जाँच करनी होगी। एक हिस्सा है डी, सी और बी वर्ग के कर्मचारियों का। आज का ढाँचा ऐसा है कि ये कर्मचारी नीति-निर्धारण
(policy formulation) के काम में हाथ नहीं बँटाते। साथ ही implementation की जिम्मेदारी भी इनपर नहीं हैं। यह दोनों काम ए वर्ग के अधिकारियों के जिम्मे पड़ते हैं। लेकिन सिस्टम की गतिमानता को बनाये रखनेमें इनका महत्वपूर्ण योगदान है जिसे आजतक अनदेखा गया है। नई संरचना में इस मुद्दे की विस्तृत चर्चा आगे करेंगे। ए वर्ग में भी दो हिस्से पड़ते हैं - IAS और non-IAS अर्थात जनरॅलिस्ट और स्पेशॅलिस्ट। इसिलिये कि जो non-IAS हैं वे अपने-अपने क्षेत्र के कुशल तंत्रज्ञ या यंत्रज्ञ होते हैं जैसे डॉक्टर हों या रॉकेट के विशेषज्ञ हों या बैंक की क्रेडिट पॉलिसी के माहिर हों। इनकी तुलना में IAS अधिकारी संख्या में अत्यंत कम होते हुए भी उनका पूर्णतया अलग रोल होता है। उनका अपना कोई एक क्षेत्र नहीं होता, फिर भी एक तरह की सर्वव्यापकता उन्हें सौंपी जाती है। यह माना जाता है कि स्पेशॅलिस्ट केवल अपने एक दायरेके बारेमें सोचता है, इस तरह के कई दायरे मिलाने हों तो जो ग्रुप बनेगा, उसमें स्पेशॅलिस्ट कुछ नहीं कर सकता। तो वहाँ ऐसे अफसर की जरुरत होगी जिसने कई समस्याओं को एक साथ देखा है। इसिलिये IAS अधिकारी के जिलास्तरीय पोस्टींग में ही कई कामों के निपटारे का जिम्मा और अधिकार दोनों उन्हें दिये गये हैं। आजकल बर जिलेके लिये एक संपर्क मंत्री नियुक्त करने का रिवाज भी चल पडा है। निचले स्तर पर यही अधिकार पंचायत समिती अध्यक्ष, सरपंच आदि को दिये गये हैं।


इस नौकरशाही में जो दुर्गुण उतर गये हैं, एक नजर उनपर डालें - इन्हें हम दो भागों में बाँटेंगे - एक ऐसे ऑफिसों के दुर्गुण जो टिपिकली छोटे हैं और जिन्हें केवल प्रोग्राम implementation करना पड़ता है - दूसरे उन ऑफिसों के दुर्गुण जिन्हें पॉलिसी भी बनानी पड़ती है।

पहली श्रेणी के ऑफिसों का सबसे बड़ा दुर्गुण है अविश्वास का। प्रशासन के लिये हमारे देश में जो नियम और कानून बने हैं, उन्हें पढ़ने पर यह स्पष्ट रुप में देखा जा सकता है कि उन सबका केंद्रीय सूत्र यही है कि अपने निचले अधिकारी पर विश्वास मत करो - सदा उसे अविश्वास की दृष्टि देखो। यह एक अत्यंत downgrading मानसिकता है जिससे नौकरशाही को उबारना आवश्यक है।

जिस कर्मचारी को हमेशा अविश्वास के वातावरण में काम करना पड़ता है, उसकी मानसिकता ऐसी बन जाती है कि खुद भी अपने आपको विश्वास का अपात्र मानने लगता है। यहीं से धीरे धीरे उसका आत्मसमान, उसका initiative खतम होने लगता है। दूसरी और जो कर्मचारी जिम्मेदारी नहीं निभाता, विश्वास का दुरुपयोग करता है, उसे सजा देने की पध्दती और नीति अत्यंत धीमी गती से चलती है। इस प्रकार निचले तबके के कर्मचारियों में काम करने का, काम को अच्छे ढ़ंग से निबटाने का, या काम की जिम्मेदारी उठाने का motivation खतम हो चुका है। कामचोर या भ्रष्टाचारी को सजा मिलती नही और काम करनेवालों को पुरस्कार और प्रशंसा के बदले अविश्वास से भरपूर नियम मिलते हैं जो उसकी कार्यक्षमता को बांध कर रख देते हैं। यह एक बात भी बाकी कर्मचारियों को हतोत्साह करने के लिये काफी है। वरिष्ठ अधिकारी भी ऐसे नियम बनाने का प्रयास करते हैं जो फुलप्रुफ हों। जिसमें निचला अधिकारी गलती या भ्रष्टाचार न कर सके। अकसर ऐसे नियमों में पहला नियम होता है कि सारी फाइलें, सारे निर्णय अधिकारी के हाथों ही निपटाई जायें। यानी उसका काम बढ़ा, डेलीगेशन ऑफ पॉवर की जितनी अच्छाइयाँ हों उनसे ऑफिस वंचित रहा, लोगों के काम में देर लगने लगी और निचले वर्ग में जो अच्छे कर्मचारी थे उन्हें अपनी कार्यप्रणवता बढ़ाने का कोई मौका नहीं मिला। मुझे याद आता है, कि एक जिला कार्यालय में ऐसा नियम बनाया गया कि सारे क्लर्क एक जगह बैठे, उसी कमरे में सुपरवाइजर भी बैठे ताकि बाहर से आनेवाला व्यक्ति केवल सुपरवाइजर से मिले ताकि कोई क्लर्क भ्रष्टाचार नहीं कर सके। बहुत वाहवाही हुई। उस सुपरवाइजर को बाद में यह कहते सुना गया कि लोगों से उसका जितना समय बरबाद हुआ उसकी तुलना में पुरानी ही सिस्टम अच्छी थी। क्योंकि इस नई सिस्टम में भी क्लर्क का मोटिवेशन तो हुआ नहीं।

ऐसा अविश्वास और उससे उपजी अकर्मण्यता धीरे धीरे उपर तक पहुँचने लगती है। हर व्यक्ति डेलिगेशन ऑफ पॉवर से कतराता है। लेकिन जो स्मार्ट व्यक्ति है और जिसे कामचोरी करनी है या भ्रष्टाचार, वह तो उसे करने के सौ तरीके ढूँढ ही लेगा क्योंकि सजा उसे होनी नहीं है। आज सरकारी नौकरी में बी, सी और डी वर्ग में आनेवाला कर्मचारी आने से पहले ही सोचता है कि उसे उपरी आमदनी कितनी मिलेगी, काम कितना टाला जा सकता है, घूमने का मौका कितना है, और देर से ऑफिस आने तथा आकर काम न करने की क्या क्या सुविधाएँ हैं। कई व्यक्ति अपने सारे काम निचले अधिकरियों को डेलिगेट कर अपना सारा काम टाल जायेंगा - यहाँ तक कि जो अधिकार और जिम्मेदारी उनकी अपनी है - वह भी। लेकिन मॉनिटरिंग नहीं कर पायेंगे। बगैर proper monitoring के कोई भी delegation प्रभावशाली नही हो सकता। साथ ही अब अपवार्ड डेलिगेशन ऑफ पॉवर भी होने लगा है। निर्णय की जिम्मेदारी टालना हो, और फाइलें पढ़ने में अपनी पूरी इमानदारी या समय नहीं लगाना हो तो आसान तरीका है कि फाइल को बॉस के पास भेज दिया जाय।

इन बातों की विस्तृत चर्चा यहाँ करने का कारण है कि नई संरचना में इस स्थिति में सुधार लाना अत्यंत आवश्यक होगा।
इसके लिये नौकरशाही के निचले तबके में जो सुधार तत्काल आवश्यक हैं वे है -

(क) विश्वास और विश्वसनीयता का वातावरण पैदा करना
(ख) हर कर्मचारी को जिम्मेदारी उठाने की, समय के माँग को तोलने की ट्रेनिंग देकर इस लायक बनाना।
(ग) अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार को शीध्रगति से कड़ी सजा देना।
(घ) निचले अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपकर उनके कामके monitoring की व्यवस्था सुधारना।
(ङ) ऑडिट और इन्स्पेक्शन के जिन मुद्दोंमें खास आर्थिक खतरे नहीं हैं और कर्मचारियों का समय बचाया जा सकता है वहाँ वे आवश्यक सुधार लाना। इन सुधारों का उद्देश हो विश्वास पैदा करना और आर्थिक efficiency लाना।
(च) कर्मचारियों को काम के लिये प्रोत्साहित करने के उपाय लागू करना।
(छ) सरकारी कामों की लाभ हानि की जाँच की ट्रेनिंग देना।
इत्यादि।

अच्छे प्रशासन की एक बड़ी फिट व्याख्या शिवाजी के गुरु रामदास ने एक पत्र में की है। शिवाजी पुत्र संभाजी महाराज को यह समझाते हुए कि प्रशासन कैसे चलाया जाये, गुरु रामदास कहते है -'जनांचा प्रवाहो चालला, म्हणिजे कार्यभाग झाला, जन ठायी-ठायी तुंबला, म्हणजे खोटे!' अर्थात् यदि लोगों के काफिले आ - जा रहे हों, उनके काम में रुकावटें नहीं आती हों, तो समझना तुम्हारा शासन अच्छा है, जव देखना कि लोग जगह जगह अटक रहे हैं, उनकी समस्याएँ उलझ रही हैं, उनके समस्या-निवारण में देर लग रही है तो समझना कि तुम्हारे प्रशासन में खोट है - कमजोरी है। जिस नौकरशाही में सबसे निचला कर्मचारी भी इस व्याख्या को निभा लेता हो, वही सक्षम नौकरशाही है। जो इस व्याख्या को कपोल कल्यना या utopia मानते हों वे जान लें कि विदेशों में इस व्याख्या का प्रत्यक्ष उदाहरण रोजाना ही देखा जा सकता है।

आज देशभर में कई training institutes प्रशिक्षण का काम करने का प्रयास भी कर रही हैं। किन्तु गैरसरकारी क्षेत्रों के कई गण्य मान्य व्यक्तियों को सरकारी प्रशिक्षण संस्थाओं के प्रभावशाली होने पर संदेह है। क्योंकि जब उन संस्थाओंकोभी भी आज के प्रभावहीन ढाँचे के मुताबिक काम करना है तो वे दूसरों को क्या सुधार सिखायेंगी। खासतौर पर जहाँ नवीनता लाने की आवश्यकता है, प्रशिक्षण संस्थाओं को आज तक प्रभावी नही पाया गया। इसका कारण यह नही कि प्रशिक्षणकी संकल्पना गलत है। कारण है कि उसका तरीका शायद गलत, अपूर्ण, inadequate और केद्रित है। वास्तविक ट्रेनिंग तब होगी जब ऑफिस का हर बड़ा अधिकारी छोटे अधिकारी के ट्रेनिंग को अपनी जिम्मेदारी मानता हो, साथ ही प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश हो कि कैसे ऑफिस एक अच्छे टीमवर्कसे कामको निपटाता है और टीमके हर मेंबरके प्रशिक्षणमें रुचि लेता है। वैसी सिस्टम हम नहीं बना पायें हैं।

अब जरा देखें उन दुर्गुणों को जो ऊंचे स्तर के अधिकारियों और ऑफिसों में आ गये हैं। तत्काल दिख जाने वाले और गिनाये जा सकने वाले दुर्गुण हैं कि आज की नौकरशाही असंवेदनशील है, सतर्क नही है, भ्रष्टाचार को निबटाना आवश्यक नहीं समझती बल्कि स्वंय ही भ्रष्टाचारी है। जनता यह भी बड़े पैमाने पर मानती है कि नौकरशाही भ्रष्ट के अलावा अकर्मण्य है, आलसी है, और निराश भी है। लेकिन जनता ने एक बड़ा अहम् दुर्गुण अभी तक नोट नहीं किया है। वह है नौकरशाही का अहंकार या arrogance, उध्दतता। यहाँ सरकारी अफसरों के व्यक्तिगत अहंकार या घमण्डी स्वभाव की नहीं बल्कि उस अहंकार की बात है जिसके तहत नौकरशाही कुछ मान्यताएँ लेकर चलती है
१)कि सरकार अर्थात् नौकरशाही जो भी कर रही है वह बहुत अच्छा है
२)सरकार जो कर रही है उससे अच्छा कुछ नहीं किया जा सकता।
३)जिस काम को सरकार खुद नहीं करे वह कभी नहीं हो सकता।
इस अहंकार का परिणाम पिछले चालीस वर्षों में scam का बवंडर बन कर हमारे सामने आया जिसकी चर्चा आगे चल कर करेंगे। पर अभी इसकी अन्य बुराइयों को देखें। यह ग्रुप अहंकार इतना बढ़ गया कि इसने सरकारको टुकड़े-टुकड़ेमें बाँट कर रख दिया। उदाहरण स्वरुप हम शिक्षा का क्षेत्र देखें। नौकरशाही केवल यह कह कर नहीं रुक जाती कि शिक्षा विषयक सरकारी नीतियाँ ही सर्वश्रेष्ठ हैं और सरकार के बाहरी लोगों को इस पर टिप्पणी करने का हक नहीं है - नौकरशाही आगे यह भी कहती है कि शिक्षा के विषय में नौकरशाही का शिक्षा विभाग जो कुछ कह रहा है वही सही है और बाकी नौकरशाह इस पर टिप्पणी न करे। इसीलिये यदि आप बड़े नौकरशाह भी हुए तो भी आप नहीं पूछ सकते कि शिक्षा विभाग में ऐसी सुव्यवस्था क्यों नहीं है कि आपके बच्चों को आसानी से स्कूल में एडमिशन मिल जाय? मजे की बात है कि यदि आप बहुत बड़े नौकरशाह है तो अपनी हस्ती का, अपने रुतबे का, अपने रुआब का वजन डालकर आप यह ensure कर सकते हैं कि आपके अपने बच्चों के स्कूल एडमिशन का इन्तजाम हो जाये। अर्थात् जहाँ सबके कामों में अव्यवस्था हो रही है, वहाँ आपका रुतबा या स्टेटस भी आपको अव्यवस्था हटाने की मांग का हक नहीं देता, और उस दिशा में आपकी सलाह रुतबे के बावजूद नहीं मानी जाएगी। हाँ, नौकरशाही यह इन्तजाम कर सकती है कि आपकी व्यक्तिगत कठिनाई दूर की जा सके।

इस कम्पार्टमेंटलाइसेशन के फलस्वरुप देश के हर क्षेत्र में पॉलिसी मेकिंग के exercise में हमने reductionist method अपनाई है - ये लोग नहीं बोलेंगे - वे नहीं बोलेंगे - वे तीसरे ग्रुप के भी नहीं बोलेंगे - करते करते बाकी बचता है एक डिपार्टमेंट - उसका भी एक डेस्क, और वहाँ का एक अधिकारी - यदा कदा दो या तीन। बोलने का या सोचने का अधिकार केवल उन्हीं के पास बाकी बचता है। इसलिये एकत्रित विचार नामकी कोई प्रोसेस ही सरकार में नहीं हो पाती है। कम्पार्टमेंटलाइझेशन का दूसरा असर यह पड़ा है, कि जब कोई नई समस्या, नई आइडिया, नया काम अर्थात् कुछ भी नया, कुछ भी ज़्यादा, कुछ भी वह काम जो कल नहीं किया था पर आज करना पड़ेगा - उसके प्रति प्रत्येक व्यक्ति यह रुख अपनाता है कि यह काम मेरा नहीं है - यह जिम्मेदारी मेरी नहीं है। कम्पार्टमेंटलाइझेशन का तीसरा नतीजा यह है कि हर नौकरशाह के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपना रुतबा, अपना धौंस बढ़ायें - क्योंकि तभी उसे दूसरे डिपार्टमेंट से वह सहायता मिल सकती है जो उसे एक सामान्य आदमी के नाते भी मिलनी चाहिये थी, लेकिन वास्तविकता में नहीं मिलती है। इस प्रकार जो जहाँ है वहीं अपना रुतबा बढ़ाने की कोशिश करता है। यह रुतबा मापने का तरीका भी बड़ा मजेदार है। मसलन आपका ऑफिस रुम कितना बड़ा है, आपके कण्ट्रोल में कितनी कारें हैं, कितना बजट है, कितने आदमी हैं, कितने कम्प्यूटर्स हैं, कितने सुरक्षा गार्डस हैं, आप अपने विजिटरों को कितनी देर अटका कर रख सकते हैं और सर्वोच्च मानदण्ड यह कि कितने आदमियों का काम आपकी व्यक्तिगत स्वीकृति के बगैर नहीं होता। यह एक बड़ी नकारात्मक प्रवृति नौकरशाही में पल रही है और बढ़ रही है।

नौकरशाही की पुनर्रचना की जरुरत क्यों आन पड़ी? इसका एक मुख्य कारण है कि १९५०-१९६० की तुलना में आज हमारी विकास के तरीकों की मान्यता ही बदल गई है। तब हमारा नारा था समाजवादी समाज का जिसमें प्राईवेट और पब्लिक दोनों सेक्टरों के सहयोग, और सह-अस्तित्व की बात थी। पिछले चालीस वर्षों में बड़ी धीमी गति से हम इस बात के प्रति जागे कि न तो हमने अपने प्राइवेट सेक्टर को अधिक एफिशियंट बनाया और न पब्लिक सेक्टर को। सरकार हर क्षेत्र में घुसपैठ करने लगी और कई निरर्धक काम अपने सिर पर ओढने लगी। जहाँ पब्लिक सेक्टर में नये काम किसी खास वजह से लेने पड़े वहाँ भी withdrawal scheme की आवश्यकता होती है। पर इस बात को नजरअंदाज किया गया। जिन कामोंसे सरकार १०-१५ वर्ष पहले से ही अच्छी तरह प्लान करके बाहर निकल सकती थी, वह प्लानिंग नहीं की गई। यहाँ जमशेदपूर की टाटा कंपनी का उदाहरण पेश है। उन्होंने मजदूरोंसे सलाह करके एक प्लान बनाया कि कैसे अगले १५ वर्षों में वे उनकी संख्या में कटौती कर ऑटोमेशन बढ़ायेंगे और फिर भी मजदूरी में कटौती नहीं होगी। लेकिन सरकारी क्षेत्रमें इस तरह के प्लानिंग की बात ही असंभव है। यह भी आज के ढाँचे की अपरिपक्वता का सबूत है और नये ढाँचे के लिये सावधानी बरतने की बात है।

आज हम आर्थिक सुधार और लिबरलाइझेशन की बात करते हैं। इसका उद्देश क्या है? जब हमने समाजवादी आर्थिक नीति अपनाई तो उसका उद्देश था गरीबी और अमीरी के बीच की खाई को दूर करना। इसलिये दो महत्वपूर्ण नीतियाँ अपनाई गईं - कि कोअर सेक्टर के रॉ मटेरियल जैसे कोयला, स्टील, बैंक, रेल आदि सरकारी कबजे में रहेंगे - ताकि उनके सरकारी वितरण का लाभ गरीब जनता को भी मिलता रहे और मूलभूत सुविधाएँ जैसे स्वास्थ्य, आवागमन, इत्यादि को उपलब्ध कराने का जिम्मा सरकार ले। लेकिन वास्तव में सरकार ने कोअर सेक्टर के बाहर के भी कई काम ले लिये और केवल एक expansionist या रुतबा बढ़ानेवाली नीति अपनाई!!

पुनर्संरचना के लिये नौकरशाही के ढाँचे में क्या परिवर्तन करने चाहिये यह प्रश्न और यह विषय आजकी तिथिमें महत्वपूर्ण क्यों बन गये हैं? इसका मुख्य कारण यह मान्यता है कि आज हमारी नौकरशाही आर्थिक लिबरलाइझेशन के सिद्धांतों की ओर उन्मुख नहीं है, और उसे वैसा बनाना आवश्यक है। हमारी नौकरशाही विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया में भी बाधक है, पुनर्रचना से उसे विकेंद्रीकरण में भी सहायक बनाना होगा।

पहले हम विकेंद्रीकरण की बात करेंगे। नौकरशाही का या प्रशासकीय सत्ता का आज का ढाँचा पिरॅमिड की तरह है। मानों एक बड़े मैदान में सैकड़ों पिरॅमिड खड़े कर दिये हों। हर व्यक्ति अपने अपने पिरॅमिड में एक दूसरे को पछाड़ते हुए ऊंचा उठ सकता है लेकिन एक functional sector का दूसरे के साथ कोई कम्यूनिकेशन नहीं- कोई साझा नहीं। जिस क्षेत्र में कोई पिरॅमिड नहीं उसका ख्याल रखनेवाला कोई नहीं। आज हमारा सारा प्लॅनिंग functional sector के आधार पर होता है यथा कृषि sector का प्लॅनिंग या यातायात sector का प्लॅनिंग। इसकी जगह हमें Area planning और spatial planning का ढाँचा अपनाना होगा। इस दिशा में अत्यंत छोटा प्रयास पंचायत राज व्यवस्था के अंतर्गत अभिनिविष्ट है। लेकिन उस ढाँचे को हमने पूरी तरह विकसित नहीं किया है। यहाँ फिर एक बार समय बड़ा महत्वपूर्ण बन जाता है। यदि हम आर्थिक लिबरलाइझेशन को बड़ी तेजी से लाने का प्रयास करें तो उस तेजी में हम पुराने ढांचे को खींचखांच कर, फाड़कर, तोड़-मरोड़ कर फेंक देंगे और जल्दबाजी में वह उठा लेंगे जो भी हाथ आयेगा। हमारा रवैया वैसा ही होगा जैसा किसी आग में जलते व्यक्ति का अपने कपड़ों के प्रति होता है। जाहिर है कि वैसी पुनर्रचना की बात हम नहीं कर रहे बल्कि एक सूझबूझ के साथ की जानेवाली पुनर्रचना की बात करेंगे जहाँ पुराने को सुधार कर या बदलकर नया परिवर्तन लाने के लिये कुछ समय अवश्य दिया गया हो। लेकिन यह ध्यान हमेशा रखना पड़ेगा कि बहुत कम ही समय हमारे पास उपलब्ध है।

किसी भी देश की सरकार का, प्रशासन का और नौकरशाही का एकमात्र नैतिक justification यही होता है कि वह ऐसे नियमों का सुचारु रूप से पालन करवाती है जो समाज ने अपनी सुखसुविधा के लिये उपयोगी मानकर नियत किये हैं। यह एक अत्यंत व्यापक कल्पना है जिसके सभी पहलुओं को ठीक से देखना पड़ेगा। समाज अपने लिये किस सुखसुविधा की अपेक्षा करता है? इसका प्रतिबिम्ब है रामचरितमानस में तुलसीदासजी के वचन -'दैहिक, दैविक भौतिक तापा, रामराज्य नहीं काहुंहि व्यापा' - अर्थात् प्रत्येक प्रकार की दुश्चिंतासे छुटकारा। हम सत्य की ओर चलें, प्रकाश की ओर चलें, अमृतत्वकी ओर चलें और यह करने में समाज व्यवस्था हमारी सहायक हो और इतनी ही माँग समाज का हर व्यक्ति करता है। इसका उपाय भी बताते हैं - 'संगच्छध्वं, सं वदध्वं, सं वो मनांसि जाननाम् - हम साथ साथ चलें - एकत्रित रुप से विचार करके बोलें, एक दूसरे के मन को मन से मिलायें ............... इसी नियम का पालन करके देवताओं ने श्रेष्ठत्व अर्जित किया'। यहाँ 'हम' कौन हैं? पूरा समाज - न कि केवल नौकरशाही। इसलिये आज भी नौकरशाही को बार-बार अपने मूलतत्व की ओर, अपने जड़ों की ओर देखना होगा। यह मूलतत्व - या जड़ें समाज ही हैं। नौकरशाही की उपयोगिता और प्रभावशक्ति तभी तक रहेगी जब तक वह लोगों से, समाज से अपना पोषण ले सकें, या दूसरे शब्दों में तब तक जब तक समाज उसे पोषण देने में दिलचस्पी ले। और नौकरशाही को स्वंय भी समाज की ओर उन्मुख होना होगा। समाज से उसका कम्यूनिकेशन बराबर चलता रहे और जन सामान्य की सुख सुविधा के अनुसार तुरंत ढल सकने का लचीलापन, नौकरशाही में हो। इसके लिये समाज की इकाइयों और नौकरशाही के बीच विचारों का, योजनाओं का और स्वंय व्यक्तियों का (पर्सनॅलिटीज) का भी आदान प्रदान बढ़ाना होगा। नौकरशाही को समाज के घर-आंगन तक पहुँचना होगा और समाज के हर व्यक्ति को नौकरशाही के अंतरंग तक। ऐसा हो सके इसकी दो शर्तें हैं। पहली शर्त यह कि समाज के हर व्यक्ति का स्तर ऊँचा हो, विकासमान हो और यह विकास विकेंद्रित हो। दूसरी शर्त थोड़ी अधिक गहरी है।

यद्यपि हम नौकरशाही की पुनर्रचना की बात कर रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं कि यह विषय हमारे समाज जीवन को प्रभावित करने वाले अन्य विषयों से अछूता होता हो। नौकरशाही का जितना सीधा संबंध प्रशासन चलाने से है उतना ही संबंध देश की आर्थिक नीति से भी है, सामाजिक स्थिति से है, राजनैतिक व्यवस्था से है और उससे भी गहरा संबंध देश की चिंतन प्रणाली से है।

आज देश में चाहे नौकरशाही की पुनर्रचना करना हो या कोई दूसरा बड़ा फेरफार करना हो, पहले तीन क्षेत्रों का सम्यक् विचार करना पड़ेगा - हमारी आर्थिक नीति, हमारी शिक्षा नीति (क्योंकि यही हमारी आर्थिक efficiency को तय करेगी) और हमारा सामाजिक फलसफा, चिंतन या दर्शन।

एक खेद की बात है कि हमारे सारे प्लानिंग प्रोसेस में शिक्षा का क्षेत्र महज एक मूलभूत सुविधा का क्षेत्र बन कर रह गया। इस क्षेत्र का स्पेशल स्टेटस बहुत कम नौकरशाहों ने पहचाना। वास्तविकता यह है कि यदि शिक्षा है जो आदमी आदमी है। शिक्षा है तो समाज है, शिक्षा है तो रोजगार है, उत्पादन है, कार्यकुशलता है, efficiency है, नैतिक मूल्य है, विचार-प्रणवता है और अपनी थाति, अपनी achievements को आनेवाली पीढ़ी को सौंपने की क्षमता है। यदि शिक्षा है तो देश है। हमारी नौकरशाही का फेल्युअर यहाँ से आरंभ हुआ कि शिक्षा पध्दति को हम अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं ढाल सकें। आर्थिक क्षेत्र में हम capital expenditure, return on investment, और gestation period आदि बातें करतें हैं। लेकिन शिक्षा क्षेत्र में हमारा gestation period बढ़ता रहा। Rate of return on capital समान रुप से बढ़ने की बजाय ऐसी स्थिति आई कि ग्रॅज्युएशन अर्थात् १५ वर्ष बिताने पर भी शिक्षा के बल पर रोजी-रोटी मिलने की कोई गॅरंटी नहीं रही। जिसके पास पाँच या दस वर्ष का ही समय हो उसके लिये शिक्षा लेने या न लेने का कोई मतलब नहीं रहा। कार्यप्रणव या हुनरवाले लोग नहीं बन पाये इसलिये औद्दोगिक प्रगति भी कम रही। आज भी देश में अकुशल मजदूरों की संख्या ७० प्रतिशत से अधिक है और शिक्षित जनसंख्या ५० प्रतिशत से कम।

यह अकार्यकुशल, अशिक्षित जनता दो क्षेत्रों में हमारे पाँव पीछे खींचती है - एक तो आर्थिक efficiency के क्षेत्र में। यही एक क्षेत्र है जो तय करता है कि कोई देश सार्वभौम और स्वतंत्र रहेगा या नहीं। विचारणीय है कि भारत में ईस्ट इंडिया का काम भी व्यापार की सहुलियतों से ही आरंभ हुआ था। और जब कंपनी ने अपने पांव जमाने आरंभ किये तो सबसे पहले यहाँ के हुनरवाले, कुशल कारीगरों को समाप्त कर यहाँ के औद्योगिक उत्पादन को खतम करना उनका प्राथमिक कार्य था। आज भी आर्थिक सुधार करने हुए यदि हम अपने मानवीय संसाधनों में कम पड़ गये (और जो स्पष्ट चिन्ह दिख रहे हैं उनके अनुसार हम वाकई अपने manpower resources में कम पड़ रहे हैं) तो केवल आर्थिक लिबरलाइझेशन से देश की आर्थिक कठिनाई दूर नहीं हो सकती और न GNP बढ़ सकता है और न अमीरी-गरीबी के बीच की खाई भरी जा सकती है। अर्थात् वह आर्थिक विकास हम नहीं पा सकते जिसके लिये आर्थिक सुधार का सारा प्रयास पिछले दो वर्षों में किया जा रहा है।

दूसरा सवाल है empowerment of masses का। जब हमारी साठ से सत्तर प्रतिशत जनता अशिक्षित और अकार्यकुशल हो तो फिर empowerment of masses की संकल्पना में कितना तथ्य या जोर हो सकता है? हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि यही जनसामान्य नौकरशाही के साथ हाथ बँटायेंगे? यहाँ हम 'नौकरशाही पर अंकुश' की चर्चा नहीं कर रहे। क्योंकि अंकुश में फिर अविश्र्वास वाली बात निहित है। हमें एक साझेवाली नौकरशाही का ढाँचा चाहिये जिस ढाँचे में सामान्य जनता आसानी से आ-जा सके - कभी केवल सुझाव देकर हाथ बँटाये, कभी प्रत्यक्ष रुप में जिम्मेदारियाँ निभाकर। थोड़ी हदतक निगरानी का काम भी जनसामान्य को करना होगा क्योंकि नौकरशाही का भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता और immunity from punishments एक दिन में दूर नहीं होंगे। नौकरशाही की सिस्टम को गतिमान और balanced रखने के लिये इसके प्रत्येक काम में जनसामान्य का विचारपूर्वक साझा होना चाहिये - वह वैचारिक परिपूर्णता उचित शिक्षा के बगैर नहीं आती। इस प्रकार शिक्षा क्षेत्र को neglect करके हमने अपने लोकतंत्र को भी खतरे में डाल दिया है और नौकरशाही को भी अवरुद्ध कर दिया है। दुर्भाग्य से आज हमने नई आर्थिक नीति की बात तो आरंभ कर दी पर शिक्षा नीति की हम आज भी उतनी ही उपेक्षा कर रहे हैं बल्कि अब तो पहले से अधिक।

अन्तिम प्रश्न समूह है कि नौकरशाही की पुनर्रचना कौन करे? पुनर्रचना के कारण जिनकी अनिर्बध सत्ता खतरे में आनेवाली हो वे क्यों आसानी से पुनर्रचना लाने देंगे? एक दूसरा प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। नौकरशाही की पुनर्संरचना करनी है यही सोचकर यदि नौकरशाही में कुछ उलटा - पुलटा कर दिया तो उससे क्या लाभ? यदि विचारपूर्वक फेरफार नहीं किये तो उनसे उत्पन्न खतरे के विषय में भी हमें ठहरकर सोचना पड़ेगा। यहीं हमारे सामाजिक फलसफे का मुद्दा महत्वपूर्ण बन जाता है। नौकरशाही की सही दिशा में पुन संरचना तभी संभव है जब जनता इसकी माँग करे। जनता माँग तभी करेगी - जब वह सुशिक्षित हो और जानती हो कि 'सं वो मनांसि जानताम्' के सूत्र में उसका अपना क्या रोल है। यह रोल विचार-प्रक्रिया और कार्यकुशलता दोनों क्षेत्र में होगा। अर्थात् हमारी जनता तभी सुशिक्षित कहलायेगी जब वह कार्यकुशल भी हो और विचार प्रणव भी। क्या हमें अंदाजा है कि यह सुशिक्षा का कार्य कितने बड़े पैमाने पर करना है? देश के लगभग तीस करोड़ नाबालिग (आयु अठारह वर्ष से कम) और करीब उतने ही प्रौढ़ व्यक्ति आज शिक्षा की दृष्टि से 'empowered' नहीं हैं और इसीसे शिक्षाकी आर्थिक कीमत (फीस और समय दोनों के हिसाब से) प्रतिवर्ष बढ़ रही है। आर्थिक सुधारों की लिस्ट में एक महत्वपूर्ण और रामबाण औषधी यह मानी जा रही है कि शिक्षा की पूरी कीमत विद्यार्थी से वसूल की जाय। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय दूसरा नहीं हो सकता है। यदि यही निर्णय कायम रहा तो जनसामान्य का empowerment कभी नहीं हो सकता और जनसामान्य की नौकरशाही में साझेदारी भी नहीं हो सकती।

अर्थात् नौकरशाही की accountability में कुछ मूलभूत सुधार आवश्यक हैं। आज की स्थिति यह है प्रशासक के गलत निर्णय का आर्थिक बोझ जनता उठाती है और राजकीय consequence नेतागण उठाते हैं। नेता का गलत प्रशासकीय निर्णय हो(जैसे भ्रष्टाचार, पैरवी, शिफारस इत्यादि से उत्पन्न निर्णय) तो उसका फल भी - चाहे आर्थिक या प्रशासनिक-वह भी जनता को भुगतना पड़ता है और यदि दोनों के आर्थिक निर्णय गलत हुए तो पूरे देश का भविष्य डूब सकता है लेकिन व्यक्तिगत रुप में वह जिम्मेदार नौकरशाह बच ही जायेंगे - बल्कि कई बार तो अच्छी खासी संपत्ति या नाम भी इकठ्ठा कर लेंगा।

ऐसी स्थिति में फससफे की बात इसलिये उठी है कि सदियों से भारतीय मानस यही मानता आया है कि जीवन की सार्थकता देने में है - छीनने में नहीं। शिक्षा और ज्ञान का प्रचार और विस्तार कुछ ऐसी वस्तु है जिसकी तौल आर्थिक तराजू पर नहीं तुलती। अच्छे शिक्षक की पहचान यही बताई गई कि उसकी वृति अपरिग्रह की हो न कि चीजें बटोरने की। अच्छे समाज की पहचान बताई गई कि शिक्षक के सर्वाधिक अपरिग्रही (यानी सिक्के बटोरने की भाषा में 'गऱीब')होते हुए भी समाज उसका सर्वाधिक आदर करें। इस एक सामाजिक मूल्य ने हमारे समाज को सदियों तक बचाये रखा। टूट फूट कर बिखरने नहीं दिया। हमारी शिक्षा नीति को बनानेवाले नौकरशाह इस सामाजिक दर्शन का सदुपयोग कर शिक्षा प्रणाली को कम खर्चीली, जीवन से अधिक जुड़ी हुई बना सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नई आर्थिक नीति में सारी सोच इस फलसफे से उल्टी है। इसलिये नौकरशाही की संरचना में कोई प्रभावशाली पुनर्गठन होगा ऐसा आज नहीं लगता। शायद सरकार कई सेक्टरों में से अपने आपको हटा ले जैसा घोषित किया है। इस प्रकार नौकरशाही के आकार को कम किया जा सकता है लेकिन जरुरी नहीं कि उसके परिणामस्वरुप आर्थिक विकास की गति तेज हो। और यदि यह जल्दबाजी में हुआ तो व्यापक हिंसाचार और सामाजिक मूल्यों के अधिक ह्रास की ही संभावना अधिक है। अतएव आर्थिक विकास मापने का तरीका भी सोच समझकर ही तय करना पड़ेगा। लोगों ने यह जता दिया है कि इस देश की भूमि पर यदि कारगिल कंपनी नमक बनकर पैसे कमाती है और सरकार उनके प्रॉफिट को अपने GDP में शामिल करना चाहती है तो यह जनना को मंजूर नहीं। जनता देखना चाहेगी कि इस देश की अपनी संपत्ती बढ़ी या नहीं। यदि नई आर्थिक लहर में यह सामाजिक मूल्य बचा रह सका तो समाज में सुविधा का फैलाव भी होगा और फिर समाज नौकरशाही को बदलने में समर्थ होगा।

तब तक नौकरशाही में रहकर जिन्हें कुछ करना है उनके लिये यही सूत्र है कि अपनी अपनी जगह पर पारदर्शिता लाने का प्रयास करो, अपने अधीनस्थोंके प्रति प्रशिक्षक की भूमिका अपनाओ, जहाँ अच्छाई दिखे उससे तुरंत समानुभूति प्रकट करो, उसे अकेले न पड़ने दो और अपने कार्य की आर्थिक efficiency बढ़ाओ। जहाँ जहाँ विकेंद्रीकरण संभव है उसे अपनाओ और जनसामान्य से सिस्टम का वैचारिक आदान प्रदान बढ़ाने के तरीके अपनाओ। पुनर्रचना के लिये बना बनाया सूत्र या मॉडेल खोजने की बजाय उसे अपने देश की मिट्टी से जुड़कर यदि हम विकसित होने दें तो ही उसमें आंतरिक सामर्थ्य टिक पायेगा।
लीना मेहेंदले

बुधवार, 14 जुलाई 2010

16 धुन की पक्की महिलाएँ

धुन की पक्की महिलाएँ
- लीना मेहेंदले

कवि प्रदीप ने तुफान से लड़नेवाले एक दिये का वर्णन यों किया था - अपनी धुन में मगन, उसकी लौ में अगन, उसके मन में लगन भगवान की, ये कहानी है दिये की और तुफान की---

पिछले पचास वर्षों में अर्थात स्वतन्त्रता प्राप्त्िा के बाद से बीसवीं सदी के अंत तक हमारे देश की जिन महिलाओं पर यह वर्णन लागू होता है - उन पर एक नजर डालना बड़ा ही महत्वपूर्ण है क्योंकि मैं मानती हूँ कि इन पचास वर्षों में महिलाओं ने जो सहा, जो लड़ाईयाँ लड़ाईंयाँ लड़ी, जो उपलब्धियां पाई, जिस धुन से और जिस गहराई से जिंदगी को जिया, समाज को जो आदर्श दिये वह सारी बातें अगले पचास या सौ वर्षों के समाज को प्रेरणा देंगी और हमारे देश की प्रगति की दिशा को तय करेंगी।

ऐसी धुनवाली महिलाओं में मैं जिनकी गिनती कर सकूँ उनमें सर्वप्रथम हैं श्रीमती इंदिरा गांधी। उनके अलावा लता और आशा मंगेशकर बहनें, अमृता प्रीतम, निरजा भानोत, ऍना मलहोत्रा, पी. टी. उषा, किरण बेदी, मेघा पाटकर, भवरी देवी, सुधा चंद्रन, मदर तेरेसा आदि कई नाम दिमाग में कौंध जाते हैं। एक अलग सदंर्भ से जयललिता, मायादेवी और फूलनदेवी के नाम भी गिनाए जा सकते हैं। इनमें से हर किसी की कोई बड़ी उपलब्धि है जिसे पाने के लिये उन्हें समाज का रोष सहना पड़ा। स्त्रियों को हर मोड़ पर बेड़ियों में जकड़ने वाले समाज की कुप्रथाओं और दकियानूसी बरताव के खिलाफ अपना साहस जुटाना पड़ा। इन सबके अंदर जो समान गुण मैंने महसूस किया वह था उनकी अन्दरूनी ताकत, उनका सत जिसके बलपर उनकी लड़ाईयाँ सफल हुईं।

श्रीमति इंदिरा गांधी करीब सोलह साल इस विशाल देश की प्रधान मंत्री रहीं। पूरी दूनियाँ में गिनी चुनी ही महिलाऐं होंगी जिन्हें यह उपलब्धि मिल पाई हो। मैं नहीं मानती कि केवल पंडित नेहरू की बेटी होने के नाते ही उन्हें यह पद मिला। स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान, उसी माहौल में उनकी परवरिश हुई और बाद में घर के राजकीय वातावरण में भी वे बहुत कुछ सीखती रहीं। प्रधान मंत्री का पद संभालने पर इस शिक्षा - दीक्षा का लाभ उन्हें अवश्य मिला। कभी उन्होंने कई साहसी निर्णय किये तो कभी तिकड़मबाजी वाले। कभी कोई निर्णय सही निकले तो कोई गलत। पर दो बड़े साहसी और महत्वपूर्ण निर्णय यादगार बने रहेंगे। बंगला देश की लड़ाई में मुजीबुरर्रहमान का साथ देकर उन्होंने भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमरीकी जलपोतों के पहले ही अपनी नौसेना को बंगाल के उपसागर में उतारकर उन्होंने जिस रणनीति और सूझबूझ का परिचय दिया उससे पूरी दूनिया में देश की धाक जम गई और इसी के बल पर बांगला देश में भारतीय सेना विजयी हुई।

उनका दूसरा महत्वपूर्ण कार्यक्रम था परिवार नियोजन। १९५० की तुलना में आज हमारी लोकसंख्या ३० करोड़ बढ़कर सौ करोड़ के पास पहुँच गई है और प्रति तीन सेंकद में एक दर से बढ़ रही है। इसकी रोकथाम के लिये भी दृढ़ता से कदम उठाना १९७८ के बाद से किसी के लिये संभव नहीं हुआ - खुद उनके लिए भी नहीं। इस हतोस्ताहिता के दुष्परिणाम आज हम देख रहे हैं लेकिन १९७८ के पहले उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया। उनके कार्यक्रम में कृषि, अणुविज्ञान और अवकाश विज्ञान के क्षेत्र में देश को अच्छी सफलता मिली। हरित क्रांति के अंतर्गत अनाज की नई फसलोंपर शोध हुआ जिससे देशपर आया अन्न संकट टला.

अमृता प्रीतम मेरी प्रिय लेखिका रही हैं। सच्चाईपर इनके उपन्यासों में बहुत बल दिया है, और पात्रों में सच्चाई इसलिये है कि  वह इनके नायक और नायिका की सहज प्रवृत्ति है इसलिए उनके पात्रों के सामाजिक संदर्भ भी वर्तमानकाल से बहुत कुछ आगे का सोचनेवाले होते हैं। यही बात और प्रखरता से पढ़ने को मिली आशा पूर्णा देवी के लेखन में। उनका कथाबीज भी मुख्य रूप से यही है कि जीवन में दुख नहीं बल्कि सुख शाश्र्वत है और मनुष्य यदि थोड़ी भी बुद्धि और नैतिक गुण दिखा पायें तो वह सुख का भागी हो सकता है।

अग्रगण्य महिला लेखिकाओं में दुर्गाबाई भागवत एक ऐसी लेखिका है जो कथा उपन्यास कम और चिन्तनात्मक लेखन अधिक लिखती हैं। मैं इन्हें एक बड़ी हीरो मानती हूँ। हम सभी कहते हैं कि साहित्यिक के पास विचार का शस्त्र होता है इसलिये अन्याय विरूद्ध आवाज उठाने में पहला कदम उसका हो। साहित्यिक स्वाभीमानी हो, किसी के सामने लाचार न हो -- वह किसी से नहीं डरे यहाँ तक कि निरंकुश सत्ताधारी से भी नहीं इमर्जेन्सी के काल में जब देश के बड़े छोटे सभी साहित्यिक - चुप्पी साधकर बैठे रहे तो श्रीमती दुर्गाबाई भागवत ने इसके विरूद्ध जमकर आवाज उठाई, भाषण दिये, लेख लिखे और बदले में कारावास भी भुगता। देश की लोकाशाही में पहली मिसाल थी कि सत्ताधारी के अन्याय के प्रति एक ज्येष्ठ साहित्यिक अपनी आवाज बुलंद करें - वह भी किसी वैयक्तिक लाभ के लिये नहीं बल्कि इस भावना से कि अन्याय के विरूद्ध बोलपाना ही विचारवंतो की असली पहचान है। दुर्गाबाई उनके साहित्य से भी अधिक आदरणीय हैं क्योंकि उन्होंने अपना साहित्य केवल लिखा नहीं बल्कि जिया भी है।

लता और आशा ने फिल्मसंगीत बहुलता से गाया। संगीत की परंपरा में दूसरा मनमोहक पहलू है शास्त्रीय संगीत का जो कड़ी मेहनत के बाद ही सिद्ध होता है और तभी लुभा पाता है। ऐसी सिद्ध गायिकाओं में मेरी पंसदी की चार गायिकाएँ हैं - श्रीमती सुब्बलक्ष्मी, हिराबाई बडोदेकर, किशोरी अमोणकर और परवीन सुलताना।
संगीत गाना और संगीत की रचना करना दो नितांत भिन्न कलाएँ हैं। संगीत रचना में गायन के अलावा व्यवस्थापन कौशल्य भी चाहिये और रचना को मोहक बना पाने की क्षमता भी। ऐसे बहु आयामी व्यवसाय में जो एकमात्र में जो एकमात्र महिला संगीतकार यशस्वी हुई वे है श्रीमती उषा खन्ना जिनकी बनाई कई मीठी धुने - आज भी गुनगुनाई जाती हैं।

एक दूसरी उषा है - खेल क्षेत्र में। ऑलिम्पिक में नहीं तो एशियाड ही में सही - लेकिन सुर्वणकन्या पी. टी. उषा के नाम का एक ही पन्ना भारत के खेल जगत में महिलाओं के नाम है। लेकिन इसके साथ ही भारतीय महिला तैराकों में जिनकी उपलब्धि मैं महत्वपूर्ण मानती हूँ वे हैं आरती सहा (फ्रान्सिकी खाडीको सर्व प्रथम तैरनेवाली भारतीय महिला) और अनीता सूद।

इसके विपरित सिने कलाकारों में चमक दमक वाले कई नाम गिनायें जा सकते हैं क्योंकि उनके व्यवसाय का आंरभ का आंरभ ही चमकीली रोशनी में होता है। मैं इस क्षेत्र में विशेष जानकर नहीं लेकिन अपनी पसंद के नाम गिनाने हों तो मैं मीनाकुमारी, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी और स्मिता पाटील के नाम गिनाउँगी।

दूसरों की लड़ाई लड़ने वाली एक और महिला हैं मेधा पाटकर। जिन आदिवासी जनों की कोई सुनवाई नही है उनके दुख दर्द को वाचा और भाषा दी है मेधा पाटकर के प्रयत्नों ने। स्वतन्त्रता के बाद यह दुविधा कई बार उठी है कि क्या अपनी ही लोकशाही सरकार से अपनी ही माँग के लिये जूझना पड़ेगा? इस दुविधा में यह तय कर पाना कभी कभी मुश्किल हो जाता है कि कौन सा विचार सही है और कौन सा गलत। ऐसे समय अपनी विवेक बुद्धि जो राह दिखाये उसी को मानकर अपने विचारों की लड़ाई लड़ने के लिये, वह भी अथक रूप से वर्षों तक लड़ने के लिये एक अनन्य साहस और स्टेमिना की जरूरत है जो मेधा पाटकर ने दिखा दिया है। उसके हर प्रस्ताव को गलत करार देने वाले सरकारी अफसर भी आज मानते हैं कि यदि मेधा न होती तो आज आदिवासियों के उचित पुर्नवास के के भी प्रयास किये जा रहें हैं वो शायद नहीं किये जाते। मेधा पाटकर को नोबुल जैसे ही अन्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इतना ही नहीं स्वयं वर्ल्ड बैंक ने पुनर्वास के सारे दकियानूसी नियम और तरीके बदल कर अच्छे पुनर्वास की दिशा में कदम उठाने को कहा।नतीजा यह रहा कि १९६० से लेकर जितने पुराने बांधों के दौरान पुनर्वास ठीक ढंग से नहीं हुआ है उनकी फिर से जाँच की जा रही है।
सफल लड़ाई लड़ने वालों में एक नाम मेरे सामने और है - जो सुधा चन्द्रन का है। इसकी लड़ाई थी अपने ही नसीब के साथ। सुधा भले ही भरत नाटयम में पहले नंबर पर ना हो, लेकिन उसका नंबर बहुत नीचे भी नहीं है। लेकिन अँक्सीडेंट में घुटने तक पांव कट जाने के बाद जयपुर फुट बैठाकर, उसी निर्जिव रबर के पैर के साथ अपनी प्रैक्टीस चालू रख कर दुबारा नृत्य में प्रवीणता पानेवाली उसकी धुन को देखकर खुद नसीब ने ही उसे अदाब बजाए होंगे।

पिछले पचास वर्षों में पढ़ाई - लिखाई का प्रसार जैसे बढ़ा तो महिलाएँ नौकरी में आना आरंभ हो गईं। IAS, IPS   और न्याय संस्थाओं में भी उच्च पदों पर महिलाएँ आती रहीं हैं। IAS का आंरभ १९४७ से हुआ। पहली महिला IAS श्रीमती ऍना मलहोत्रा १९४७ में तमिलनाडू में आईं। ये अपने प्रशासकीय कुशलता और ईमानदारी के लिये काफी विख्यात हुईं। देश की पहली महिला चीफ सेक्रेटरी रहीं श्रीमती द्विवेदी, पहले मेघालय में और फिर आसम में। दूसरी महिला चीफ सेक्रेटरी रहीं मध्य प्रदेश में श्रीमति निर्मला बुच। इनके नाम तो जनता के सामने आ गये लेकिन काम नहीं क्योंकि प्रशासन का जो रूप हमने स्वीकार किया उसमें प्रशासकों के लिये पहली शर्त यह है कि प्रसिद्धि से दूर रहें, उनके काम में भी उनकी अनामिकता को आवश्यक माना जाता है। उनके अच्छे काम की निजी तौर पर जानकारी केवल उनके सन्निकट वरिष्ठ अफसर को ही मालूम हो सकती है। उसने महत्व जाना ते ठीक वरना नहीं। इससे देश में एक घाटा यह रहता है कि समाज या जनता अच्छे काम करनेवाले प्रशासक के विषय में कुछ अधिक नहीं जान पाती। पिछले तीस वर्षों में IAS में आये अधिकारियों की संख्या ४००० से कम है जिसमें महिलाओं की संख्या ४०० से कम है। १९७० पहले रहेक राज्य में एक या दो ही महिला IAS थीं और कुल बीस पच्चीस रही होंगी जो अब एक एक करके रिटायर हो जायेंगी।उनकी कार्य प्रणाली के विषय में कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं - महिला होने के कारण उन्हें क्या दिक्कत हुई, क्या उनके वरिष्ठों ने उनके काम का मजाक उड़ाया या अच्छे काम की यथोचित प्रंशसा की? वे जहाँ गईं वहाँ क्या कुछ नया कर दिखा पाना सभंव हुआ? किस तरह ये संभव हुआ? यदि कोई अच्छा लेखक एक मुहिम बनाकर पहले बीस वर्षों की महिला IAS अधिकारियों का इंटरव्यू करें और किताब लिखें तभी यह सारी सामाजिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जानकारी अगली पीढ़ीयों को उपलब्ध होगी वरना बड़ी जल्दी ही समय के परदे के पीछे चली जायेगी।

---- कभी क्रूरकर्मा भी हो सकता है। इसके विपरित न्याय देने के लिये, राजकाज चलाने के लिये और विकास कर पाने के लिये सुमति, कर्तव्यदक्षता, न्यायबुद्धि और प्रशासकीय कुशलता भी चाहिये। फूलनदेवी के लोकसभा में आ जाने से यह चर्चा भी योग्य परिप्रेक्ष्य में आगे चल पाये तो यह भी क्या बुरा है?
इन महिलाओं के अलावा अन्य कई क्षेत्रों में भी महिलाओं की उपलब्धि है। वह छोटी ही सही पर अपने आप में महत्वपूर्ण, एक मिसाल कायम करने वाली और अगली कई स्त्रियों की राह को सरल करने वाली उपलब्धियाँ हैं। जहाँ कहीं किसी महिला ने पहल की, समझ लीजिये कि उसने अपने पीछे सौ महिलाआं का रास्ता आसान कर दिया। इस प्रकार पहल करने वाली महिलाओं में पहली महिला वैज्ञानिक सौदामिनी देशमुख हैं, पहली रेलवे ड्राइवर हैं, पहली ट्रक ड्राइवर हैं, नौसेना की महिला कँडेट अफसरों की एक पूरी टुकड़ी है या फिर कई राज्यों में पूरी की पूरी महिला  टुकड़ी है। इनके संघर्ष और सफलता को कलमबद्ध करना समाज की अगली पीढ़ीयों के लिये हमेशा मार्गदर्शक होता है। इसी प्रकार मुस्लिम समाज में छोटे ही स्तर पर सामाजिक जाग्रति का बढ़ा काम करनेवाली रजिया पटेल और छोटी ही बात पर पूरे मुस्लिम समाज को झिंझोड़ देनेवाली शहनाज बानो का नाम गिनाना भी आवश्यक है। जब किसी समाज को इस प्रकार झिंझोड़ा जाता है तभी उसकी उन्नति का रास्ता बनता है।

जाते जाते दो नितांत अलग बातें मैं कहना चाहूँगी। यदि झिंझोड़ने से ही समाज के विकास का रास्ता बनता है, तो फिर भारतीय न होते हुए भी पर अपने बहुत ही करीबी देश की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का नाम भी इसी लेख में रखना उचित होगा। मुस्लिम समाज के पिछड़े रहने में सबसे बड़ा कारण है मुस्लिम स्त्र्िायों में शिक्षा का अभाव और हर मोड़ पर स्त्री के लिये सैंकड़ों रूकावटे खड़ा करने वाला मुस्लिम समाज। हिन्दू साज में स्त्र्िायों का स्तर उंचा उठाने के लिये और स्त्रियों को शिक्षा दिलाने के लिये राजा राममोहन रॉय, महात्मा फुले, महर्षि कर्वे, पंडिता रमाबाई, लाला लाजपतराय जैसे सुधारक भी आगे आये और स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ने वाली स्त्री क्रांतिकारियों का भी इसमें बड़ा हिस्सा रहा। मुस्लिम स्त्री अगर अपने धर्म के परिवेश में ही विकास की मिसाल खोजना चाहो तो दूर से देखने के लिये ही सही लेकिन बेनजीर भुट्टो हैं तो जरूर इसीलिये उना प्रधानमंत्री बनना मैं इस अर्ध सदी की एक अच्छी उपलब्धि मानती हूँ।

दूसरी बात एक कमजोर पक्ष की है। आज यद्यपि भारतीय महिला ने लेखिका, नायिका, राजकीय नेतृत्व, साहसी नारी के क्षेत्र में सफलता पाई है पर फिर भी जहाँ व्यवस्थापन कुशलता और चिन्तन दोनों आवश्यक हैं ऐसे कई क्षेत्रों में भारतीय महिला काफी पीछे है। हमारे देश में जागतिक किर्ति पाने वाली उद्योगपति, सेनाधिपति, समग्र प्रशासक, दार्शनिक अर्थशास्त्री, पत्रकार, समाजशास्त्री बँकर या वैज्ञानिक महिलाएँ नहीं बनी हैं- अपवाद हैं केवल श्रीमति रोमिला थापर जो जागतिक किर्ती की इतिहासकार हैं। अब क्या हम उम्मीद रखें कि अगले पचास वर्षों में इन अछूते क्षेत्रों में भी जागतिक स्तर की महिलाएँ हमारे समाज में पैदा होंगी।

-लीना मेहेंदले
सेटलमेंट कमिश्नर महाराष्ट्र
(तथा  कुलगुरु, नाशिक मुक्त विद्यापीठ)

लीना मेहेंदले,
५०, लोकमान्य कॉलनी,
पौड रोड़, कोथरूड,
पुणे - ४९९००३८

04 आरक्षण नीति - एक चिंतन incomplete

आरक्षण नीति - एक चिंतन



आरक्षण की नीति के मामले को लेकर हमारा देश कई दुर्भाग्य पूर्ण दौर से गुजर चुका है। स्वतंत्रता प्राप्त्िा के पश्चात हमारे संविधान कर्ताओं ने बड़े सोच विचार के बाद इस नीति को अपनाया था। भारतीय संविधान के अनुसार न कोई छोटा है न बड़ा - सबको एक ही सा हक है, चाहे वह राजा हो या रंक। लेकिन हमारे देश में हजारों वर्षों से जो जातिव्यवस्था चली आ रही थी, उसने समाज को टुकड़े-टुकड़े बाँट कर रख दिया था। पिछड़े वर्ग और पिछड़ी जाति को कोई सामाजिक स्थान प्राप्त न था। छुआछूत की समस्या थी। साथ ही पिछड़ी जातियां आर्थिक दृष्टि से कमजोर थी और शिक्षा के स्तर पर भी। यही सब देखकर आरक्षण कि नीति अपनाने की जरूरत आन पड़ी। यह विचार किया गया कि, यद्यपि देश में संविधान के सम्मुख सभी नागरिकों का हक एक सा माना जाना चाहिए, पर फिर भी इस मूल्यांकन में पिछड़े वर्गों को साथ कुछ रियायत बरतना आवश्यक है। शताब्दियों की शोषित मानशिकता के बाद इन जाति जमातियों अपने गुण या अपना मूल्य बढ़ाने का यह मौका नही मिला है जो उच्चवर्णियों को मिला है और जिन्हें मौका मिला भी हो उनकी वह क्षमता नहीं थी कि, मौके का सही लाभ सकें। हमारे संविधान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्वांत है अवसर की समानता, लेकिन यह पिछड़ी जातियाँ इस कदर पिछड़ी है कि अवसर की समानता या मौके का लाभ सही ढंग से उठा पाना उनके लिये संभव नहीं। संविधान कर्ताओं ने इस आवश्यकता को महसूस किया कि पिछड़े वर्गों को आगे लाने के लिये उनकी प्रगति का स्तर अधिक वेग से बढ़ाना आवश्यक था और यह सभी संभव था जब उन्हें कुछ विशेष आरक्षण प्रदान किया जाय।

आरक्षण का आरभं हुआ राजनैतिक क्षेत्र से । हमारे देश ने जब प्रजातंत्र को स्वीकार किया तो नागरिकता और मतदान का हक हर एक वयस्क व्यक्ति को दिया गया जो सामाजिक विषमता दूर करने के लिये एक आवश्यक कदम था। लेकिन केवल मतदान का हक दे देना काफी नहीं था। यह भी आवश्यक थाकि पिछड़ी जातियां राजकीय मुख्य धारा से जुड़े और सरकार चलाने में भी उनका सहयोग हो। अतएव संविधान के अंतर्गत एक विशेष सूची बनाई गई जिसमें उन जातियों को शमिल किया गया जिन्हें अछूत माना गया था और जो इस अछूतपन के कारण समाज की अनन्य उपेक्षा के पात्र बने। साथ ही जनजातियों की भी एक अलग सूची बनी। इस प्रकार अनुसूचित जातियां और जनजातियां घाषित हुई। संविधान की धारा ३३० और ३३२ के अंतर्गत यह प्रावधान तय हुआ कि लोकसभा में और राज्यों की विधानसभाओं में इनके लिये कुछ सीटें आरक्षित रखी जायेंगी । आरंभ में यह आरक्षण केवल १० वर्षों के लिये था और यह अवधि १९६० में समाप्त हो जाती। लेकिन यह देखकर कि दस वर्षों के आरक्षण से इस धारा का पूर्ण उद्देश्य सफल नहीं हो रहा था, सरकार ने हर बार संविधान में संशोधन करते हुए दस - दस वर्षों से इस अवधि को बढ़ाया । सन् १९९० में किये गये संविधान के कारण अब इस प्रावधान की अवधि सन् २००० तक कायम रहेगी।

थोड़ा सा पिछला इतिहास देखने पर हम पाते है कि अंग्रेजों के शासन काल के दौरान सर्वप्रथम मद्रास के गबर्नर ने मुसलमानों को पिछड़ा घोषित किया और सन् १८८१ की जनगणना में, जो भारत की दूसरी जनगणना थी, जाति के आधार पर जनसंख्या के आंकड़े इकट्ठे हुए। धीरे धीरे हिंदू धर्म के अंतर्गत विभिन्न व्यवसायों पर आधारित जो जातियां है, जैसे दर्जी, धोबी, कुम्हार इत्यादि इनका ब्यौरा जनगणना में दिया जाने लगा। सामाजिक उच्च स्तरीय विचार से भारतीय समाज की दस श्रेणियां बनाई गईं और प्रत्येक श्रेणी की जनगणना के अलग अलग आंकड़े जुटाये गये। इसमें एक श्रेणी उनकी भी थी जो अछूत थे या उन्हें मंदिर प्रवेश के अधिकार से वंचित रखा गया था। इसी प्रकार पिछड़ी जनजातियों की अलग श्रेणी बनी। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि इन आंकड़ों के आधार पर इन सभी जातियों या धर्मों के लिये अलग अलग चुनाव क्षेत्र बनाये जा सकें। इस प्रकार की व्यवस्था के कारण मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों को अलग धर्मों के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया । इस लाभ् से प्रभावित होकर सायमन कमिशन के सम्मुख दलितों की १६ संस्थाओं ने अलग चुनाव क्षेत्र और अलग प्रतिनिधित्व की मांग की। यह अलगाव जो एक जाति को दूसरी जाति से, और एक धर्म को दूसरे धर्म से काट कर रख देता है, अंग्रेजों की राजनीति का एक प्रमुख अंग था।

परन्तु स्वतत्रंता प्राप्त्िा के बाद यह तय हुआ कि यद्यपि हमें अलगाव की वह नीति दूर रखनी पड़ेगी जो अंग्रेजों ने चलाई थी, फिर भी अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये कुछ विशेष प्रयत्न करने पड़ेगें । इसे पॉजिटिव
डिसक्रिमिनेशन का नाम दिया गया। जहाँ संविधान की धारा ३३० के अनुसार लोकसभा में और ३३२ के अनुसार विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिय सीटें आरक्षित की गई उसी प्रकार धारा ३३१ और ३३३ के अनुसार ऍग्लोइंडियनों के लिये भी सीटें आरक्षित हुई। लेकिन अंग्रेजों ने जो जातिवार जनगणना की पद्वति चलाई थी उसे समाप्त करा दिया गया। अतएव केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों के अलावा अन्य जातियों का अलग स्थान कम से कम जनगणना में नकारा गया है। इसके पीछे भूमिका यही थी कि इससे लाभ के बजाय हानि ही होगी क्योंकि जातीय अलगाववाद बढ़ेगा।

राजनैतिक क्षेत्र के अलावा शिक्षा और आर्थिक स्तर पर अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देने का प्रयास खासकर तीन दिशाओं में हुआ। पहला था शिक्षा की दिशा में । पिछड़ी जातियों की समुचित शिक्षा की गरज से उन्हें मिलनेवाले वजीफें और अन्य सहायता द्वारा, साथ ही शिक्षा संस्थाओं जैसे कॉलेज में उनके लिये कुछ स्थान आरक्षित कराके सबसे पहले उनकी शिक्षा का स्तर सुधारने के प्रयास हुए। नौकरी में उनके लिये कुछ स्थानों का आरक्षण कराके उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास हुआ। और तीसरा सूत्र यही था कि विभिन्न पंचवार्षिक और वार्षिक योजनाओं में कुछ हिस्सा खास तौर से अनुसूचित जाति और जनजातियों की प्रगति के लिये नियत किया जाये।

लेकिन राजनैतिक आरक्षण और अन्य प्रकार के आरक्षणों में यह अंतर है कि शिक्षा और नौकरी के आरक्षण के लिये संविधान में अनुसूचित जाति-जलजातियों के साथ साथ पिछड़ी जातियों का भी अंतर्भाव किया गया है। संविधान की धारा १६ में उल्लेखित शब्द क्ष्द्यद्म डठ्ठड़त्त्ध््रठ्ठद्धड्ड ड़थ्ठ्ठद्मद्मड्ढद्म दृढ ड़त्द्यत्ड्ढदद्म. पर काफी चर्चा हुई। क्योंकि इस प्रावधान में केवल अनुसूचित जाति जनजातियों की ही नहीं बल्कि सभी पिछड़े और कमजोर वर्गों को समाविष्ट किया गया है। उनके लिये प्रयुक्त शब्द भी 'वर्ग' है न कि 'जाति' । इस प्रकार यह तय है कि जहाँ संविधान की धारा ३३०, ३३२ और ३३५ के प्रावधान में अनुसूचित जाति और जनजातियों का उनकी जाति पर आधारित स्पष्ट उल्लेख है, उस प्रकार संविधान की धारा १५ में जो शिक्षा संबंधी आरक्षण का प्रावधान है और धारा १६ में जो सरकारी नौकरियों के आरक्षण संबंधी प्रावधान है वहाँ केवल जाति को आधारभूति नहीं माना गया है।

इस प्रावधान के अंतर्गत केंद्रीय सरकार ने केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये शैक्षणिक और नौकरी के आरक्षण के लिये नियम बनाये। अनुसूचित जातियों के लिये शिक्षा संस्थाओं और सरकरी नौकरी में १५ प्रतिशत आरक्षण और अनुसूचति जनजातियों के लिये ७.५ प्रतिशत आरक्षण नियत हुआ। इस प्रकार के आरक्षण के लिये कोई अंतिम अवधि नहीं की गई है। न्यायालयों ने भी कई बार इसे संपूर्णतया न्यायोचित ही ठहराया है कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये यदि विकास की तेज रफ्तार प्रदान करनी है तो वह आरक्षण नीति द्वारा ही संभव है । उनके लिये शिक्षा और नौकरियों के विशेष और समुचित साधन न जुटाने का अर्थ वही होगा मानो उन्हें मौका प्राप्त करने के सामर्थ्य से वंचित किया गया हो।

अन्य पिछडे वर्गों के लिये आरक्षण देने की नीति को राज्य सरकारों पर छोड़ा गया । फलस्वरूप विभिन्न राज्यों में जहाँ अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये आरक्षण का प्रतिशत तय है पिछड़े वर्गों के आरक्षण के प्रतिक्षण अलग अलग है और समय समय पर इस प्रतिशत में परिवर्तन हुए हैं। साथ ही विभिन्न राज्यों में पिछड़े वर्गों की सूचियाँ विभिन्न हैं। इन्हें बनाने का आधार भी प्रायः जातियाँ ही रही हैं। विभिन्न जातियों ने अपने राजनैतिक दबाव क्षमता के अनुसार बारम्बार आरक्षण सुविधायें अपने पक्ष में जुटाने का प्रयास किया है। इसके कारण कई राज्यों में आंदोलन भी हुए हैं - कभी सौम्य रूप में तो कभी उग्र रूप में, कभी आरक्षण समर्थकों की ओर से तो कभी आरक्षण विरोधकों की ओर से । जब तक यह आंदोलन राज्यों की परिधि में रहे, बाकी देश पर इनका असर कम पड़ा । लेकिन जब केंद्र सरकार ने भी इस नीति पर अमल करना चाहा तो आंदोलनों ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया । आने वाले दिनों में जब भी इस नीति की बात चलेगी तो आंदोलन अवश्य होगें । साथ ही यह आंदोलन दिन प्रति दिन अधिकाधिक हिंसक बनेंगें और समाज में कटुता और अलगाव को बढ़ावा देते रहेगें।

अतः प्रश्न यह उठता है कि जो नीति एक अच्छे उद्देश्य से बनाई गई और आरंभिक काल में जिसके विरुद्ध कोई आक्रोश नहीं उठा, आज उसी नीति को लेकर समाज बिखराव की स्थिति में क्यों आया है?

बलसागर भारत -- साने गुरुजी, हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले

बलसागर भारत
-- साने गुरुजी
हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले
[Can be sung with the same tune as original Marathi]
published in Devputra monthly from Indore
बलसागर होवे भारत
विश्र्व में रहे अपराजित।

ये कंकण बाँधा कर में
जीवन हो जनसेवा में
हों प्राण राष्ट्र के हित में
मैं मरने को भी उद्यत
बलसागर होवे भारत।

वैभव दिलवाऊँ इसको
सर्वस्व सौंप दूँ इसको
तिमिर घोर संहारन को
तुम बंधु, बनो सहायक
बलसागर होवे भारत।

हाथों में हाथ मिलाकर
हृदयों से हृदय जुडाकर
एकता मंत्र अपनाकर
हो जाएं कार्यों में रत
बलसागर होवे भारत।

कर ऊँची दिव्य पताका
गूँजाओ गीत भारत का
विश्र्व में पराक्रम इसका
दिग्‌ दिगन्त गूँजे स्वागत
बलसागर होवे भारत।

अब उठो श्रम करो सार्थ
दिखलाना है पुरुषार्थ
यह जीवन ना हो व्यर्थ
चमकाओ भाग्य का सूरज
बलसागर होवे भारत।

भारत माँ फिर सँवरेगी
प्रभुता भी दिव्य पाएगी
विश्र्व में शांति लाएगी
वह स्वर्णिम दिन है निश्चित
बलसागर होवे भारत।
-------------------------------------
बलसागर भारत होवो, विश्वात शोभुनी राहो

हे कंकण करि बांधियले, जनसेवे जीवन दिधले
राष्ट्रार्थ प्राण हे उरले, मी सिद्ध मरायाला हो

वैभवी देश चढवीन, सर्वस्व त्यास अर्पीन
तिमीर घोर संहारीन, या बंधु सहाय्याला हो

हातांत हात घेऊन, हृदयास हृदय जोडून
ऐक्याचा मंत्र जपून, या कार्य करायाला हो

करि दिव्य पताका घेऊ, प्रिय भारतगीते गाऊ
विश्वास पराक्रम दावू, ही माय निजपदा लाहो

या उठा करू हो शर्थ, संपादु दिव्य पुरुषार्थ
हे जीवन ना तरि व्यर्थ, भाग्यसूर्य तळपत राहो

ही माय थोर होईल, वैभवे दिव्य शोभेल
जगतास शांति देईल, तो सोन्याचा दिन येवो

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

03 आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी

आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी
published in weekly Ravivar

कवि इकबाल ने बडे फख्र के साथ कहा कि युनानी, मिस्त्री, रोमन सभी सभ्यताएँ जहाँ मिट गई, मगर हमारी पहचान अभी बाकी है - कुछ ऐसी बात है कि हमारी सभ्यता मिटती नही है ।

मिटती तो खैर न हो, लेकिन सिमटती जा रही है जरूर वह भी हमारे ही बनाये छलावो के कारण ऐसे समय में पथदीपक कौन है ? जब इतिहास की ओर नजर उठाई तो सबसे पास एक व्यक्तित्व दीख पड़ता है - आदि शंकराचार्य

प्रचुर विव्दता, सन्यासी प्रवृत्त्िा, सामाजिक प्रश्नों की मार्मिक पहचान एक तिलतिलाहट, एक चुभन - कि क्योंकर हिन्दु समाज सारी सामाजिक कुरीतियों के दलदल में फंस रहा है, क्योंकर लोगो को सामाजिक न्याय की निश्च्िातंता केवल बौध्द धर्म में ही मिल रही है ? क्योंकर वैदिक कर्मकांण्ड़ मे उलझ कर रह गया हमारा विव्दत् समाज एक शिक्षक, एक आलोचक और एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में असमर्थ है? आदि शंकराचार्य की पहचान हम जाने अनजाने इन प्रश्नों के साथ और उनके समाधान के साथ करते है.

अत्यंत छोटी आयु मे ही आदि शंकराचार्य संन्यास ग्रहण किया और फिर घर से बाहर सुदूर प्रांतो में जाकर विधाध्ययन किया । हिंदू समाज रचना में संन्यासी का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है । सारे समाज को पीढीदर - पीढी गलत रास्ते पर भटकने से रोकते रहना हो तो समाज में कुछ ऐसी परम्परा का होना और कुछ ऐसे व्यक्तियों का होना आवश्यक है जो द्रष्टा हो, दार्शनिक हों और अपने वैयक्तिक लाभ से परे उठकर समाज के विषय मे सोच सकें और समाज को राह दिखाने का काम कर सकें. कहते है कि इस प्रकार पथप्रदर्शन का काम राजा और विद्वान छोटे पैमाने पर और सन्यासी बडे पैमाने पर कर सकते है । लेकिन शर्त यह है कि सन्यासी को अपना धर्म अच्छी तरह मालूम हो । उसका सन्यासी बनना महज एक आलसी के लिये पेट पालने का बहाना न हो।

निश्च्िात ही यह माना जा सकता है कि आदि शंकराचार्य को उस मर्म की पहचान थी। तभी तो सन्यासी होते हुए भी उन्होने समाज से दूर, समाज से अपरिचित रहने का रास्ता नहीं अपनाया। बल्कि समाज में रहते हुए, घुम घुम कर, समाज की अनिष्ट मान्यताओ का खंड़न किया व्दैतवाद के चक्कर में बुरी तरह से फँसे और वैष्णव - शैव - शाक्वत वाद के फलस्वरूप टुकडे टुकड़े होकर बिखर रहे समाज में अव्दैतवाद की स्थापना कर समाज में एकीकरण की प्रक्रिया जारी कराई. इसके साथ बुध्द धर्म में भी जो अधःपतन और अवनति हो रहा था उस पर चोट की जिससे एक और यधापि बौध्द धर्म का भारतवर्ष में विस्तार भले ही रूक गया हो, पर इस अवनति से उबरने के प्रयत्न भी आरंभ हो गये।

अंततः शंकराचार्य ने भारतवर्ष के चारो कोने में चार ज्ञानपीठों की स्थापना की और अपने उत्तराधिकारियों की वहाँ प्रस्थापित किया ताकि यह ज्ञानपीठ पूर्णतः सही माने में समाज के पथप्रदर्शन के लिये एक परमेंनेट इनस्टियुशॅन बन जाये

यह बडे दुर्भाग्य की बात है कि शंकराचार्य की विभिन्न रचनाओं को जिस प्रकार उन्होने शब्दबध्द किया, निबधित किया और उसकी प्रतियाँ बनाकर सुरक्षित रखी गई, उस प्रकार शंकराचार्य के विभिन्न वाद - विवाद, शास्त्रार्थ और चर्चाओ को शब्दाकिंत कर सुरक्षित रखने कि आवश्कता किसी ने नही समझी

परंतु शंकराचार्य के जीवन काल की एक घटना ऐसी है जिसकी दुहाई उनके उत्तराधिकारी बार बार देते है उस घटना व्दारा अव्दैतवाद के सिध्दान्त की पुष्टि कराने के लिये

कहते है कि एक बार आदि शंकराचार्य बनारस के घाट पर गंगा स्नान करके बाहर निकले ही थे कि एक चमार उनसे छुआ गया संस्कारों के प्रबल प्रभाव के अंतगर्त शंकराचार्य ने कहा दिया अपसर अर्थात 'दूर हो जा'

चमार ने हँसकर उनसे पुछा यह तुम किससे दूर हटने के लिये कह रहे हो क्या मेरी आत्मा से? पर वह और तुम्हारी आत्मा ब्रह्म एक ही है. रही बात मेरी दोह की तो तुम्हे उससे क्या अंतर पड़ता है? वह उसी के चाभ से बनी है जिससे तुम्हारी भी देह बनी है.
इस पर शंकराचार्य को अपनी गलती का पता चला और उन्होने चमार को प्रणाम कर अपना गुरू बना लिया.

इस घटना से वह स्पष्ट है कि स्पृश्य - अस्पृश्य के भेदभाव को समाप्त करना का निर्णय शंकराचार्य ने अवश्य किया होगा. अवश्य ही उनके ज्ञानपीठो में उन्होने कुछ निर्देश दिये होगें. लेकिन आज इन्ही ज्ञानपीठो के सत्ताधिकारी किसी सामाजिक प्रश्न पर चर्चाए चलाते हुए नही पाये जाते है - और खासकर अस्पृश्यता के प्रश्न पर तो अब ऐसा रुख अपनाया जा रहा है जो अव्दैतवाद के सिध्दान्त को किसी गहन अंधेरे कोने में फेंक देने का सामथ्य रखता है यह भ एक दुर्भाग्य की ही बात है कि ज्ञानपीठो के ये अधिकारी सत्ताधिकारी तो है लेकिन वे ज्ञानाधिकारी है या नही इसके विषय में संदेह किया जो सकता है जब मंड़न मिश्र की पत्नी ने शंकराचार्य को विव्दत्सभा में शास्त्रार्थ के लिए ललकारा तो आदि शंकराचार्य पीछे नही हटे . परन्तु आज यादि कोई जिज्ञासु भी प्रश्न पुछे तो उसे दरकिनार कर दिया जाएगा फिर शास्त्रार्थ के लिए तैयार होना तो दुर ही रहा.


इसलिए आदि शंकराचार्य की गद्दी पर जो भी बैठते हो, यदि उनका दावा है कि वे ज्ञान के अधिकार से वहाँ बैठे है - तो एक प्रश्न उनसे पुछना आवश्यक है । वह यह कि समाज पुरूष की प्रगति के लिए सबसे बाछनीय क्या है? धन धान्य का विस्तार या निरंकुश सत्ता का विस्तार या ज्ञान का विस्तार? यदि ज्ञान का विस्तार ही सबसे - अधिक वाछनीय है, तो किसी को अस्पृश्यता के नाम पर ज्ञान से वंचित रखना क्या उचित है ? यह भी उनसे पुछना चाहिए कि ज्ञानोपासना में श्रध्दा का क्या महत्व है ? (हालाँकि इसका उत्तर भगवद्गीता में है - जब श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि मेरे दर्शन के अधिकारी तुम ङुए हो वह तुम्हारे ज्ञान, दान, जप, तप की अपेक्षा तुम्हारी भक्ति के कारण हुए हो. ) यदि नही है तो स्वयं भी मंदिरो में जाना छोड़ दें - और यदि है तो किसी को श्रध्दास्थान में जाने से रोककर क्या ज्ञान का विस्तार हो सकता है ?

ज्ञान की बात मेंने इसलिए उठाई है के अस्पृश्यता सिध्दान्त को जब कभी बढाया दिया गया और दूसरी ओर से कबुल भी कर लिया गया - उस समय निश्चय ही उनके अज्ञान का लाभ उठाया गया और फिर लाभ कायम रखने के लिये उनके अज्ञान को पनपाया गया - यह कहकर कि वे ज्ञान के अधिकारी नही है. और खासकर आज के परिप्रेक्ष्य में जब हमारा समय अपने ही दायरे में सिमट कर छोटा होता जा रहा है और बिखर रहा है, और वही काम एक बार फिर करना आवश्यक हो गया है जो कभी आदि शंकराचार्य ने किया था - तो जाहिर है कि इस प्रश्न की जिम्मेदारी न केवल उनके उत्तराधिकारियों को ही निभानी है बल्कि उन सभी को जो इन शंकराचार्येकी भक्त मंड़ली में है. क्या वे निभायेगें इस जिम्मेदारी को?
-------------------------------------------------

रविवार, 27 जून 2010

मेरी प्रांतसाहबी के लोकार्पण पर श्रीमति प्रज्ञा शुक्ल

हिन्दी (भारतीय भाषा) दिवस समारोह, आयोजक -- महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी, (देखें उनकी रिपोर्ट)
14 सितम्बर, 2009
---- श्रीमति प्रज्ञा शुक्ल
आदरणीय मंच एवं दीर्घा में उपस्थित आप सब को नमस्कार |
साहित्यकार अपने परिवेश की ही पौध होता है | वह अपने जीवनमें आसपासके, विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक स्थितियों, संस्कारों एवं मूल्यों रूपी हवा, पानी एवं स्वाद से अपने व्यक्तित्व-रुपी पौधे को एक वटवृक्ष के रुप में विकसित करता है | प्रेमचन्द का कथन है कि साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है, जो भाव और विचार लोगों के ह्दयों को स्पंन्दित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं | अत: साहित्यकार अपने परिवेशसे एवं उसके साहित्य-परिवेशगत संवेदनाओंसे प्रभावित होता है |

श्रीमती लीना मेहेंदले की पुस्तक मेरी प्रांतसाहबी लीनाजी के बहुमुरबी व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब है | इस पुस्तक में समाविष्ट 11 लेख उनके आसपास घटित घटनाओं पर उनके वाचन, मनन और चिंतन की अभिव्यक्ति है| ठोस सामाजिक मुद्दों पर विवेचना लीनाजीके लेखन का सबसे सशक्त माध्यम है| फिजिक्स की प्रवक्ता से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के विभिन्न पदों पर कार्यरत लीनाजी का मातृभाषा मराठी एवं हिन्दी दोनों पर समान अधिकार है जिसका उन्होंने लेखन एवं अनुवाद के द्बारा रचनात्मक रूपसे भरपूर उपयोग किया है | देश की विभिन्न समस्याओं, घटनाओं, सामयिक स्थितियों नें लीनाजी को प्रभावित किया है | उनके प्रति जागरुकता दर्शाकर उन्हें सुधारने की दिशा में लीनाजी निरंतर कार्यरत एवं चिंतनरत है |

लीनाजी का लेखन केवल किसी हकीकत का सीधा सपाट बयान नहीं है परंतु उसमें वे अपने चिंतन के अमूल्य मोती भी पिरोती जाती हैं | सामान्य पाठक की जानकारी हेतु विभिन्न मुद्दों पर छोटी-छोटी टिप्पणी भी करती चलती हैं | इस पुस्तक का शीर्षक है मेरी प्रांतसाहबी | इसी शीर्षक से 41 पृष्ठों का एक आत्मकथ्यात्मक लेख है जिसमें उनके प्रशासकीय जीवन के आरंभिक अनुभव समाविष्ट हैं | असिस्टंट कलेक्टर, सब-डिविजनल ऑफिसर, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के लिए महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में प्रांतसाहब संबोधन अधिक परिचित है अत: शीर्षक है मेरी प्रांतसाहबी | इसमें लीनाजी ने अपने प्रशिक्षण एवं कार्यकाल के दौरान जो गुर सीखे, अपने पिता एवं पति के घड़ी के साथ जुड़े कार्यक्षेत्र की तुलना में अपनी चौबीस घंटोंकी डयूटी का तालमेल, अन्य अधिकारियों से प्राप्त प्रेरणा, अपने स्त्री होने के कारण प्रांतसाहब के समक्ष आनेवाली समस्याऐं एवं दायित्व, एक सजग अधिकारी के रूप में अपनी कार्यकुशलता, विवेकबुध्दि का उपयोग, शासन प्रणाली की कमजोरी एवं महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में प्रगति की धीमी गतिसे चिंतित लीनाजी का विचारोत्तेजक एवं दूरदर्शी रूप उभरता है |

महिला संशक्तिकरण एवं महिलाओं के साथ होनेवाले अत्याचार, उनकी हत्यासे आनेवाली पीढ़ी के लिए एवं देश में स्त्रियों की स्थिति के लिए लीनाजी की चिंता व्यक्त होती है | वे मानती हैं कि अपराधी को तत्परता से सजा नहीं दिए जाने के लिए हमारी ढीली दंड-प्रक्रिया और न्यायिक कार्यवाही जिम्मेदार है | “विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराधों का विश्लेषण”, “राजस्थान : कहाँ है जनमने और पढ़ने का हक”, “महिला सशक्तिकरण की दिशा में”, तथा “उन्मुक्त आनंद का फलसफा” जैसे लेख लीनाजी की महिला विषयक गहरी सोच और सरोकार का परिचय देते हैं | “व्यवस्था की एक और विफलता” लेख हमारी कमजोर पड़ती शासन व्यवस्था का पर्दाफाश करता है | वे मानती हैं पेपरलीक का उपाय परीक्षा पद्धति में बदलाव एवं कम्प्युटर के सही उपयोग द्बारा संभव है |

हिन्दी भाषा के प्रति लीनाजी का लगाव और चिंता उनके भाषा विषयक लेख दर्शाते हैं | हिन्दी एवं भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे से जुड़कर ही अपना भविष्य संवार सकती हैं | आज तक हम हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ में मान्यता नहीं दिला पाए इसके लिए वे राजनेता एवं हिन्दी साहित्यकारोंको जिम्मेदार ठहराती हैं | सुरीनामियों की भाषाविषयक चिंताको लीनाजी हमारी भाषाविषयक चिंता से जोड़कर देखती हैं |

गो.नि.दांडेकर संस्मरण में उनके लेखनकी विशेषताओं का उल्लेख है तो कुसुमाग्रज की कविताओं के अनुवाद को वे एक सागर मथनेके समान मानती हैं | डॉ.राज बुध्दिराजा लेख में भारतीय समाज में पुत्र और पुत्री के बीच भेदभाव का मर्मस्पर्शी चित्रण है | भगवद्गीता से प्रभावित लीनाजीने उसमें वर्णित बुद्धियोग की विस्तार से चर्चा की है |

नकली स्टॅम्प पेपर बनानेका करोबार चलानेवाला एक सामान्य स्टॅम्प वेन्डर तेलगी जब पूरे देश की प्रभुसत्ता के साथ खिलवाड़ करता है तो एक प्रशासक एवं जिम्मेदार नागरिक के रुप में लीनाजी का खून खौल उठता है | मतपत्रिका में नापसंदगी जताने की सुविधा के विषय में जब चुनाव आयोग ने कहा कि अभी हम इसके लिए तैयार नहीं हैं तो लीनाजी सवाल उठाती हैं कि क्या डर है चुनाव आयोग या प्रशासन या संसद-मंडल को ? कहीं यह डर लोगों की मुखरता का तो नहीं ?

बायोडीजn -अपार संभावनाएँ उनका भविष्यदर्शी चिंतनपरक लेख है | दिल्ली में स्थित खाली पड़ी अगस्तक्रांति भवन की इमारत विषयक लेख में कार्यालयों मे छुट्टी के माध्यम से राष्ट्रीय सँपत्ति गंवाने के बारे में लीनाजी ने चिंता प्रकट की है | इस पुस्तक का अंतिम लेख मालूम ही नहीं कि सुभाष स्वतंत्रता सेनानी थे सरकारी फाइलों के रिकार्ड पर करारा व्यंग्य है |

कुल मिलाकर मेरी प्रांतसाहबी पुस्तक लीनाजी के व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन, उनके हर्ष-शोक, संयुक्त कुटुंब पद्धति के लाभ, एक कुशल एवं कर्मनिष्ठ प्रशासक के जीवन की विभिन्न घटनाओं एवं भाषा, समाज, प्रशासन, व देश के प्रति चिंतन का प्रामाणिक दस्तावेज है |

धन्यवाद
----------------------------------------------------------------------














शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

पेट्रो अंकल अर्थात मुनीश की टिप्पणी -- मेरी प्रांतसाहबी

मेरा तीसरा लेख संग्रह -- मेरी प्रांतसाहबी
श्वेताभ अश्क
संकेत प्रकाशन, लखनऊ
अनुक्रम --
मेरी प्रांतसाहबी
.
.
.
.
.