Thursday, March 27, 2008

वकालत हमें ही करनी है।

span style="font-weight:bold;">वकालत हमें ही करनी है।

मेरे सामाजिक लेखों का पहला आलेख संग्रह, ‘जनता की राय’ काफी चर्चित रहा | उसीसे तय हुआ कि यह दूसरा आलेख संग्रह भी संकलित किया जाय | पहला लेख ‘है कोई वकील’ मुंबई के कुख्यात अंडरवर्ल्ड सरगना माया डोलस के पुलिस एनकाऊंटर से संबंधित और अन्तिम लेख ‘यह व्यर्थ न हो बलिदान’ राष्ट्रीय महामार्ग के भ्रष्टाचार उजागर करने के प्रयास में जिसने जान की बाजी लगाई उस सत्येंद्र दुबेसे संबंधित | ये सारे लेख प्राय: पिछली सदी के अन्तिम दशक के हैं | दोनों घटनाओं में दाँव पर लगा है हमारा लोकतंत्र | पहले लेख मे 16 नवंबर, 1991 मे मैंने सवाल उठाया था कि लोकतंत्र की वकालत करने के लिये कहाँ हैं कोई उचित न्यायालय और कहाँ हैं उचित वकील? और आज भी मुझे लोकतंत्र को न्याय मिले यह चिन्ता तो है, पर यह भी पता है कि इसकी वकालत में हमें ही आगे आना है |
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Thursday, March 13, 2008

मालूम ही नही कि सुभाष स्वतंत्रता के सिपाही थे

मालूम ही नही कि सुभाष स्वतंत्रता के सिपाही थे
एक छोटासा सवाल -- ओर उसने एक बडे अंधेरे को उजाले में ला दिया। कोई सोचेगा कि यह अंधेरा अज्ञान का था। नही, नही यह तो अकृतज्ञता का अंधेरा था।
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Wednesday, March 5, 2008

तीसरे आलेख संग्रह की तैयारीं

तेलगी के दायरे में
भ्रष्टाचार से निपटने का शुरुआती रास्ता
हाथ जनता की नाडी पर

ETC
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Thursday, January 24, 2008

जानो अपनी समृध्दि को

जानो अपनी समृध्दि को
-लीना मेहेंदळे

हमारा देश और संस्कृति दोनों अतिप्राचीन हैं | अतएव इतका
जतन करना भी हमारी जिम्मेदारी बन जाती है | जतन करने की कई
विधाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण है नामकरण और गिनती |
कया पशुपक्षी भी एक दूसरे को नाम से पहचानते या बुलाते हैं ?
शायद नही | कमसे कम हम मनुष्यों को तो यह नही मालूम | लेकिन
हम अपने संगी साथियोंको नाम से पहचानते हैं | घर में नया शिशु
ज-म लेता है ती जल्दी से उसका नामकरण करते है | घर मे कोई प्रिय
जानवर हो, जैसे गाय, बकरी, कुत्ता, घोडा, सांड तो उनका भी हम
नामकरण करते हैं | इस प्रकार नामकरण से यह सुविधा होती है कि
उस व्यकित की बाबत बात करना आसान हो जाता है | हम वस्तुओं
के भी नाम देते हैं | व्याकरण मे सबसे पहले हम नाम या संज्ञा के
विषय में ही पढते हैं | किसी वस्तु के नाम के साथ जब हम उसका
बखान करते हैं तो इससे ज्ञानके विस्तार में सुविधा होती है | यही बात
गणित और गिनती के साथ भी है |
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हिमालयन ओऍसिस, सिमला के अंक में प्रकाशित

Thursday, December 20, 2007

गुनहगारी के बदलते चेहरे

गुनहगारी के बदलते चेहरे
---- लीना मेहेंदले
फिजिक्सकी पढाई करते हुए कभी एक नियम पढा था कि किसी सिस्टम को अपने आप पर छोड दिया जाय तो उसकी एन्ट्रापी अर्थात बेतरतीबी हमेशा बढती है। तरबीती लाने के लिये बाहरी उपयोंकी जरूरत होती है। फिजिक्स निर्जीव पदार्थों का शास्त्र है। लेकिन आधुनिकतम जीवशास्त्रियों ने सजीवता की व्याख्या करने के लिये इसी नियम का उपयोग किया है। उनका कहना है कि जहाँ जीवन है, जीवन्तता है, वहाँ खुद ब खुद बेतरबीती को सँवारकर तरतीबी लाने का ज्ञान और सामर्थ्य दोनों मौजूद होते हैं। जिस सिस्टम मे ये दोंनो हैं वह सजीव है, जिस सिस्टम में यह नहीं है वह निर्जीव है।

जो नियम जीवशास्त्रियों ने किसी एक जीवजन्तु की सजीवता या निर्जीवता परखने के लिये बनाया है वही नियम मनुष्य के लिये भी है और मानव समाज के लिये भी। ऐसा कोई समाज नही होता जहाँ कभी कोई उथल पुथल, हलचल या बेतरबीती नही आये। लेकिन जब तक उसे सँवारने का ज्ञान और सामर्थ्य समाज में होगा तभी तक वह समाज जीवन्त रहेगा।

सामाजिक बेतरतीबी को मापने का एक मापदण्ड है गुनहगारी। इस मापदण्ड को लगाने पर भारतीय समाज का कौनसा रूप हमें दिखता है? यही कि गुनहगारी का चेहरा, लिबास, और आकार दिन पर दिन अधिक से अधिक भयानक होते जा रहे हैं।

कोई जमाना था जब सिनेमा टिकटों को ब्लैक में बेचने का गुनाह जोरों पर था । इस गुनहगारी की व्यापकता के बावजूद समाज में इसके प्रति कलंककी भावना थी और इस विषय को लेकर काला बाजार जैसी फिल्में भी बनी थी ।

संगठित गुनहगारी के क्षेत्र में दूसरा बडा धंधा था बच्चों को उठाकर ले जाना, उनकी अंगुलियाँ, हाथ पाँव तोडना या आँख फोडना और उनसे भीख मंगवाना । मराठी फिल्म 'जगाच्या पाठीवर' में इसका विदारक चित्रण था । धीरे धीरे यह धंधा कम हो गया हालाँकि बच्चों का गलत उपयोग अब भी कायम है । भोली भाली किशोरियों को जाल में फाँसकर वेश्यावृति में लगाने का गुनाह हमेशा तेजी पर ही रहा है और इसमें कमी हो ऐसी कभी भी कोई संभावना नहीं दिखती ।

इसके बाद दौर चला मटका और लोगों से जुआ खिलवाने का। कोई मटका सम्राट पकडा जाता तो किसी मटका सम्राट को पुलिस सहयोग की दृष्टि से देखती। यानी धीरे धीरे पुलिस ने यह फलसफा अपनाना शुरू किया कि जिसके पास दो नंबर का पैसा बहुत अधिक है उसे पकडने की बजाय उसे राजाश्रय देकर उससे पैसा कमाना ही ज्यादा अच्छा है। इस प्रकार गुनहगारी की व्यापकता ने पुलिस को भी लपेट लिया।

उन्नीस सौ साठ और सत्तर के दशर्कों में स्मगलिंग भी एक ऐसा ही पनपता और बरकरार गुनाह था। घडियाँ, बैटरी के छोटे सेल, कॅसेट, सिंथेंटिक साडियाँ जैसी आज के लिहाज से नगण्य वस्तुओं से तस्करीका आरंभ हुआ। फिर सोने के बिस्कुट, हीरे इत्यादि की तस्करी होती रही। अब स्मगलिंग अधिक डरावना हो गया है क्यों कि इसमें ड्रग्स भी आ गये हैं और कस्टम विभाग के अधिकारी भी।

इसी दशक में गावठी शराब या हातभट्टी का धंधा भी पनपता गया । १९४७ की तुलना में आज लोग अधिक निराश, हताश, कर्तव्यचुत और शराबप्रिय होते जा रहे हैं। शराबबंदी एक के बाद राज्यों में उठाई जा चुकी है। गाँव गाँव में देसी शराब के दुकान खुले हैं। बियरबार में जाना पहले संकोच या शर्म की बात हुआ करती थी आज वह स्टेटस, स्पोर्टसमन शिप और स्मार्टनेस की द्योतक बन गई है । पहले बियर बार शाम को खुला करते थे।अब दिनभर चालू रहते हैं। पहले वहाँ केवल बुजुर्ग जाते थे अब कॉलेज स्टुडैण्ट्स तक सभी जाते हैं । आज शराब न पीना एक हेय बात है और हो सकता है कभी वह जुर्म भी बन जाये ।

पहले सरकारी ऑफिसो में भ्रष्टाचार की एक लक्ष्मण रेखा थी। सामान्य भ्र्रष्टाचार या तो बिलकुल छोटे तबके के कर्मचारी करते थे और यदा कदा अत्यंत वरिष्ट अफसर या मंत्रीगण । जैसे पंजाब के मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैंरों को भ्रष्टाचार के आरोप पर जाना पडा। लेकिन बिचले तबके के कर्मचारी और अधिकारी जिनके बलपर सरकार चलती है और जिनके कामकाज पर ही जनता की सुख सुविधाएँ निर्भर करती थीं वे सामान्यतया ईमानदार थे। आज का चित्र पूरा ही बदला हुआ है। और इसे अबला जनता ने स्वीकार भी कर लिया है। अतः आज सरकारी दफ्तरो का भ्र्रष्टाचार एक जानी पहचानी और लाइलाज बिमारी की तरह है। कई बिमारियाँ अब स्टेटसधारी भी होने लगी हैं जैसे डाइबेटिस, हार्ट डिसीज, इत्यादि। उसी प्रकार सरकारी भ्रष्टाचार भी अब इज्जतदार हो गया है।

अस्सी के दशक के आते आते संगठित गुनहगारी और बिल्डर्स का एक अजीब सा नाता चल गया । एक ओर सामान्य जनता के लिये अर्बन लैण्ड सीलींग ऍक्ट था । दूसरी ओर उसमें कई लूपहोल्स थे और कई एक्झेम्शन्स और अलॉटमेंट्स भी जिनका उपयोग लेन देन के व्यवहार में जमकर हुआ ।

दलितों पर अत्याचार, दलित और आदिवासी स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों में कमी आने का कोई सवाल ही नहीं है। लेकिन अब इसमें पुलिस और सेना भी शामिल होती सुनाई पडती है जो बडी भयावह परिस्थिति है। दहेज बलि की ओर सतीकी घटनाएँ मध्यम और उच्च वर्गो की गुनहगारी का खास चेहरा बेनकाब करती हैं। पूरे अस्सी के दशक में आंतकवाद का बढता हुआ राक्षस भी अपनी पूरी भयानकता के साथ सामने आया है। पंजाब, तामिलनाडू , काश्मीर, गुरखा लैण्ड, आसाम और अन्य उत्तर पूर्वी राज्यों में यह विकट समस्या है। और अब नक्षलवादियों का पुनरोत्थान होकर वे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और आंध्रप्रदेश मे फैल रहे हैं। इन आंतंकवादियों का अड्डा चाहे कहीं भी हो, उनका खतरा सारे देश में हर जगह पर है जो एक नई बात है।

आज का चित्र यह है कि गुनहकारी का दायरा काफी बडा है और बढता ही जा रहा है। एक गुनहगारी है जो गुण्डागर्दी, मसल पावर, भाले बरछी, बन्दूक और एके ४७ मशीनगन के बल पर चलती है । सामान्य आदमी सोचता है कि मैं उस जगह से भाग जांऊँ, वहाँ दखल अन्दाजी न करूँ तो मैं सुरक्षित रह सकता हूँ। हालाकिं यह गलतफहमी है। बिहार के कोयला खानों पर माफिया राज और मुंबई के वसई विरार ठाणे, कल्याण उल्हासनगर के इलाकों का माफिया राज यही दर्शाता है कि सामान्य व्यक्ति की असुरक्षिता धीरे धीरे बढती रहेगी ।

यह जानीमानी बात है कि चुनाव लडने के लिये कई बार राजनितिक पार्टियों और कई उम्मीदवार काफी पैसा जुडाते हैं। पहले बडे बडे उद्योगपति और कंपनियाँ चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों के लिये पैसा खर्च करती थीं। धीरे धीरे वे बिल्डर्स और माफिया गैंग के दादा जिन्होंनें नेतागणों के आशीर्वाद से पैसे कमाये, उन्होनें भी चुनाव में खुलकर पैसा लगाना आरंभ किया । ऐसी हालत में जीतने वाले नेता और इन दादाओं के गठबंधन गहरे होते गये। यह सिलसिला ऐसा बढा कि पिछले चुनाव में कई उम्मीदवार ऐसे भी उतरे और चुने गये जिन्हे सामान्य जनता गुंडागर्दी और गुनहगारी के लिये जानती थी।

लेकिन जो सबसे लेटेस्ट है वह है आर्थिक गुनहगारी जिससे कोई भी व्यक्ति अछूता या सुरक्षित नहीं रहेगा। तीन प्रकार की आर्थिक गुनहगारी जोर शोर से चल रही है। पहली है आंतर्राष्ट्रीय आयात में दलाली का मामला । बाहर के देशों से बडे बडे यंत्र या हथियार खरीदे जाते हैं । वे कम्पनियाँ दलालों के मार्फत ही भारत सरकार से ये व्यवहार पूरा करवा सकती हैं। करवाने के लिये भारत सरकार में किसे, कैसे और कितना कमिशन देना पडेगा यह दलाल जानता है और वहाँ तक उसकी पहुँच भी होती है। इस प्रकार सौ करोड की वस्तु दो सौ करोड में खरीदी जाती है। उसकी क्वालिटी की कोई गारंटी नहीं होती सो अलग। यह जो सौ करोड ज्यादा खर्चा हुए वह गये सामान्य जनता की जेब से और पहूँचे दलाल एवं सरकार के उस व्यक्ति की जेब में। ।

दूसरा गुनाह है भीखमंगी में उत्सव मनाने का। इधर देश की जनता पर कर्जे का बोझा बढ रहा है। कर्जा देनेवाला साहूकार खुश है। हमें सिखाया जा रहा है कि हम कर्जा नहीं लेगें तो हमारा विकास नही होगा। सिखाने वाले भी वही हें जो आज साहूकार का अन्न खा रहे हैं और रिटायरमेंट के बाद उनके देश में जा बसने का सपना देख रहे है। और इधर उधर से आने वाले कर्जे से अपने राजसी थाट चला रहे हैं। कोई सरकारी पैसे से बीसियों फॉरेन ट्रिप लगा रहा है। कोई अपने आफिस के परदे हर दो महीने में बदलवा रहा है, तो किसी के लिये पचीसों पुलिस गार्ड तो किसी के लिये सेंट्रली एअर- कंडिशन्ड ऑफिस। बेजरूरती स्कीमें बन रही हैं। हर कोई अपने ऑफिस को अपना साम्राज्य समझता है और उसे निरंतर बढाना चाहता है क्योंकि उसका रोब दाब उसी बढोतरी पर टिका हुआ है। सरकारी अफसर के रोब का मापदण्ड यह है कि आपके ऑफिस का बजट कितना है, आपके नीचे कितने कर्मचारी काम करते हैं, आप कितनी फॉरेन ट्रिप्स पर जाते हैं , आपके नीचे कितनी गाडियाँ हैं, आपका ऑफिस रूम कितना बडा है इत्यादि। तो यह सब बडा करने के लिये पैसा चाहिये। वह ले आओ माँगकर, लगा दो किसी स्कीम का बहाना। यही रवैया आजकल सरकारी दफ्तरों मे चल रहा है।

लेकिन जो इन सब गुनाहों को पीछे छोड दे वह था स्कॅम जिसमें बैंकों के बडें अफसरों ने और उनके मार्फत देश के बडे बडे उद्योगपतियों और नेताओं ने जनता की सबसे बडी लूट की है। इनमें विदेशी बैंक भी शामिल हैं। लूट का अंदाजा आप कुछ उदाहरणों से लगा सकते हैं।

१९८१ में सिमेंट के अलॉटमेंट में जो घोटाला हुआ उसमे महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमान अंतुले पर एक करोड रूपये के भ्रष्टाचार का आरोप था। बोफोर्स कांड में दी गई दलाली का आरोप एक सौ करोड रूपया का है। बैंक स्कॅम में हुए घोटाले में से जो कागज हासिल हुए हैं उनका घोटाला तीन हजार करोड रूपयों से अधिक है और जो कागज हासिल नहीं हो पाये लेकिन उनके होने की जानकारी मौजूद है उनके घोटाले का अनुमान तैंतीस हजार करोड रूपयों से अधिक है। यह इसलिये संभव हुआ कि बैंकिग क्षेत्र में जहाँ कही नियमों मे गलतियाँ या खामियाँ रह गई - उनमें सुधार करने के लिये सरकार को आवश्यक जानकारी देने के बजाय बैंक के कुछ वरिष्ट अधिकारियों ने उन गनतियों का फायदा उठाकर अपनी जेबें भरीं। लेकिन इस प्रकार जेब भरने के लिये पहले सामान्य जनता की जेब से पैसा निकालना पडता है। इसके लिये उन्हे किसी इंडस्ट्री के लाभ के सब्जबाग दिखायें जायें तो वह इंडस्ट्री जमकर पैसा बटोर सकती है। सामान्य जनता उस उद्योगपति के पीछे दिवानी होकर पैसा उसके शेयरों में लगाती है। इधर वह उद्योगपति और उसकी कंपनियाँ पैसे कमाती है। उधर शेयर मार्केट के दलाल। उधर बैंक और सरकार के वरिष्ट अधिकारी और मंत्रीगण। ऊपर से सरकार को यह जताने का मौका मिलता है कि बैंको का बहुत लाभ हो रहा है ( अर्थात वह बहुत एफिशियंट है ) और सरकार की उद्योग नीति के कारण उद्योग कितने सुधर गये है । सामान्य आदमी की जेब से पैसा जाता रहता है। बाद मे पता चलता है कि ये सारे ही सब्जबाग थे। न तो उद्योंगो में अधिक उत्पादन हुआ न तो बैंको से लोगों को अच्छी सर्विस मिली न तो सरकारी खर्चा घटा, न ही सरकारी उद्योगों का कामकाज सुधरा और न महँगाई कम हुई। स्कॅम के घोटाले का अंदाज आप इस बात से भी लगाइये कि अपने देश का वार्षिक बजट तीस हजार करोड रूपये के लगभग है और स्कॅम का का घोटाला भी कराब उतना ही। वह बजेट जो देश की सौ करोड जनता के लिये कुछ कर सकता है उतना ही पैसा देश के बडे उद्योगपति बैंक अधिकारी और नेता खा जाते हैं। क्या है आप में वह सामर्थ्य और ज्ञान जो इस बेतरबीती सँवार सके?
--दै. हमारा महानगर, मुंबई, सितम्बर 1992
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Saturday, December 15, 2007

मन ना जाने मन को

मन ना जाने मन को
नन्हा पौधा बहुत दूर कहीं पर था । सच पूछो तो वह पौधा भी नही - केवल एक बीज था । या, बीज भी नही, बस एक खयाल! ना, वह भी नही ! कुछ भी नही था। बस एक अनाम सा अस्तित्व बोध, कि कुछ है !
फिर कैसे वह धीरे धीरे तुम्हारे पास आ गया ? अमूर्त से मूर्त बन कर ! अनाम से नामधारी बनकर ! क्यों तुमने उसे पुकारा ? उसे छुआ? बाँहो में भरकर उसकी सांवली, कोमल पत्त्िायों पर अपने होंठ टेक दिये ?
कहीं से तुमने मिट्टी जमा की, कहीं से गमला और कहीं से पानी! फिर पौधे को उसमें जमा दिया और गमला घर ले आयें । पडा रहेगा यहाँ अपनी बाल्कनी में, तुमने मनोरमा से कहा!
इसे रोज रोज पानी कौन डालेगा? मुझसे नहीं होगा वो सब! मनोरमा ने कहा।
'चिंता न करो। मैं डाल दूँगा। '
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कई दिन बीते। तुम विदेश से आकर अपनी नोकरीमें उलझ गये थे। रोज सुबह देर से उठना और भाग दौड करते हुए आफिस पहुचना! वापसी में कभी बच्चों को लेना, तो कभी सब्जी! कभी स्कूटर सर्विसिंग तो कभी शेअर्स! अक्सर दोस्तोंके साथ बैठकर बियर! रोज रात देर से सोना - रोज थकान लेकर जागना ।
एक दिन अचानक तुम जल्दी उठ गये। बाल्कनी में आए। पौधे को देखा, असीसा। वाह! अभी टिका हुआ है, मैं तो पानी ही नही दे पाया इतने दिन! माफ करना यार! तुमने पूरी बालटी गमले में उलट दी - आधा पानी जमीन पर !
एक दिन नाश्ते पर मनोरमा ने कहा -' आज जल्दी घर आना । लखनऊ वाले फूफाजी के .यहाँ शादी में जाना है। और वह तिवारी के बेटे के जनम दिन पर भी तो जाना था ।'
'वह परसों है! क्या बात है कि तिवारी के घर जाने के लिये इतने उतावले हो!
'भाई, मेरा पुराना दोस्त है, हम दोनों ने एक साथ ही तो नौकरी शुरू की थी।'
'यह क्यों नहीं कहते कि उसकी बीबी बडी खूबसूरत है। और तुम उसे घाल डालना चाहते हो ।
'कैसी बातें करती हो? जरा सोचो, कभी सुन लिया तो बेचारे तिवारी पर क्या गुजरेगी!'
तुम उठकर बाल्कनी में चले आये। बहुत दिन बाद आये। पौधा हवा में झूले झूल रहा था। तुमने कहा - आज समय नही है। मुझे तुरंत आफिस पहुँचना है। पौधे ने सोचा कोई बात नही, इतने दिन तुम नहीं दिखे, तो मैंने तो कुछ नही पूछा! पर तुमने शायद वह नही सुना। तुम वापस चल चुके थे।
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अजीब है तुम्हारा आफिस भी । या शायद सभी आफिस ऐसेही होते है। काम करने वाले के सिर पर चार गुने काम और न करनेवाले को आराम का इनाम! पर तुम अपने काम में मस्त हो। दुसरे काम करं या न करें, तुम करोगे। देर रात तक आफिस में बैठोगे। ब्रिज और ओवर ब्रिजेस के ड्राइंग बनवाना, टेंडर शर्तों को तय करना, टेंडर्स मंगवाना, आडर्स निकालना, मशीनरी जाँचना, कन्सल्टंट लगवाना साइट इन्स्पेक्शन सारे काम तो एक ही तरह के, एक ही रूटीन के होते हैं। तुम्हें उनमें हर बार क्या नया दिख जाता है कि हर ब्रिज को नये नये ज्यूनियर इंजिनियर की तरह ध्यान से पढे बगैर तुम रह नहीं सकते? टेक्निकल किताबें मँगवाते रहते हो। मैं कहाँ का नया टेकनीक अपनामा जा रहा है, तुम्हें उसकी जानकारी होती है। फिर बास तुम्हें रोक लेते हैं - 'जरा बताना जो इस बारे में!' वह खुद क्यों नहीं कुछ पढते?
न पढें, मुझे पढना अच्छा लगता है, पढता हूँ - इसीसे साइट इन्स्पेक्शन भी करता हूँ - क्या पढा था और वह जमीन पर कैसे उतरा है।
'फिर तुम्हें प्रमोशन क्यों नहीं मिल रही?
बास भी न जाने कहाँ कहाँ से अपने चमचों को उठा लाते हैं और उन्हीं को प्रमोशन देते हैं। मुझे भी दे सकते थे। मेरे और कई कलिग्स को दे सकते थे, पर नहीं दिया। हमारा मंत्री भी वैसा ही है। तभी तो कहता हूँ, सरकार में काम करने वाले को काम है और न करने वाले को इनाम है।
'फिर तुम काम क्यों करतो हो? '
'वह मेरी आदत है। क्या काम न करूँ?'
'नही, तुम उस तरह की बेईमानी में नहीं जी सकोगे।'
फिर मेरे काम की इतनी जाँच और जिद्द क्यों?
'यों ही, जाओ तुम अपना काम करते रहो।'
'आज एक अमरीकन एक्सपर्ट अपना प्रेझेंटेशन दे रहा है। मुझे जाना है उसे सुनने के लिये। रात देर हो जायेगी। घर पहुँचूँगा तो थक चुका हूँगा।'
और तुम्हारे उस पौधे का क्या हुआ जिसके बारे में बता रहे थे?
अरे, उसे तो देखा ही नहीं - बहुत दिन हो गये। पता नहीं किस जात का है कि बिना पानी दिये भी इतने दिन जी लेता है! अच्छा मिल गया था।
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मनोरमा ने नौकरी छोडने का फैसला किया। तुमने समझाना चाहा, देखो,पंकज और नन्दिनी वैसे भी होस्टल में हैं, रहा गुड्डू! तुम्हारी नौकरी के पैसे की जरूरत तो हमें कभी नहीं थी। फिर भी तुम्हारा मन लगा रहेगा लेकिन मनोरमा अपनी जिद में किसी की नहीं सुनती।
तुम सिगरेट का डब्बा उठाकर बाल्कनी में आ गये। यंत्रचलित सा पौधे के पास आ खडे हुए, फिर सिगरेट सुलगा दी। एक अजीब अनमनेपन में भर कर पौधे को सहलाते लगे। उसने धीरे से कहा - सिगरेट से पौधोंको तकलिफ होती है। 'अच्छा', तुमने चुटकी लेकर कहा - तुम्हारी दो नई डालियाँ निकलेगी तब मैं छोड दूँगा। 'तुम अपनी खातिर भी तो छोड सकते हो', पौधा मचलने लगा। और तुम भी अपनी ही खातिर डालियाँ फैल सकते हो। पौधे ने हार मान ली। फिर झूमने लगा।
बच्चे एक से एक अच्छा रिझल्ट कर फुर्र से उड रहे हैं। नंदिनी ब्याह रचा कर और पंकज इंजिनियरिंग के बाद अमेरिका जा चुके हैं। छोटा गुड्डू भी चेन्नई में पढाई कर रहा है। तुमने नई कार खरेदी ली है। एक प्रमोशन मिल चुका है, अगला भी तय है, बस, कुछ प्रोसिजाल डिले है। अब आफिस में तुम और भी डूब गये हो।
अगली बार तुम पानी डालने लगे तो पौधे की दो नन्हीं नन्हीं टहनियाँ निकल आई थी।
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अपने सिगरेट क्यों छोडी? मनोरमा ने पूछा। यू लुक्ड व्हेरी स्मार्ट व्हाईल स्मोकिंग!
आई डोण्ट वाम्ट गुड्डू टू पिक अप धिस हॅबिट!
ओके, अपनी सूटकेस पॅक कर लो शिमला के लिये। कल सुबह हमें जल्दी निकलना है। लेकिन तुम तो आफिस से आज भी देर से ही आओगे। और मेरी पॅकिंग तुम्हें पसंद नहीं आती। और देखो, आज रात मैं खाना नहीं बनाऊँगी। तुम कलेवा से कुछ लेते आना।
वहीं चलेंगे, मैं आज आफिस से जल्दी निकल आऊँगा। या ऐसा करो, मैं ड्राइवर भेज देता हूँ। तुम और गुड्डू पहुँच जाना। मैं मिश्रा से लिफ्ट लेकर आ जाऊँगा। आठ बजे, राइट?
क्या आजकल मिश्रा की वाइफ के साथ कुछ चल रहा है?
'मनोरमा, प्लीज!'
तुम सिगरेट भी गुड्डू की वजह से नहीं छोड रहे। कोई और बात है।
ठीक कहती हो, अपनी खातिर छोड रहा हूँ। अपने हेल्थ की खातिर!
हेल्थ का खयाल है तो फिर अपनी अम्बिशन्स को भी कम करो।
वो भी कर लूँगा, अब मुझे फटाफट दो स्लाइस टोस्ट मिलेगा नाश्ते के लिये?
मनोरमा से बहस से बचना हो, तो उसे खाने पीने के किसी काम में उलझा देना एक अच्छा रास्ता है।
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'मैं उड जाऊँ? एक दिन पौधे ने पूछा!
तुम हँसे। पागल, पौधे कभी उडते हैं क्या?'
'मैं उड जाना चाहता हूँ।'
तुमने चौंककर पौधे को देखा । क्यों? बडी देर तक कोई उत्तर नहीं आया तो तुमने कहा - पेड की जडें मिट्टी में ही रहनी चाहियें, वरना वह कैसे जिएगा? पौधा फिर भी चुप! तुमने मन ही मन फैसला किया - इसे रोज सुबह शाम पानी दूँगा, लकिन फैसला उस शाम तक ही टिक पाया। पौधा भी तुम्हारे दिये पानी पर कहाँ जी रहा था?
अचानक तुम्हारी आफिस की रुटिन बदल गई। नॅशनल हायवेज पर जहाँ जहाँ रेल्वे ओवर ब्रिज या क्रासिंग फ्लाई ओवर बनने थे, सबका एक मास्टर प्लान बनाने का जिम्मा तुम्हें दिया गया। अब रात दस बजे तक आफिस में बैठना एक आम बात हो गई। कई बरसों बाद तुम्हें मौका मिला था अपनी प्रोफेशनल योग्यता दिखाने का। तुमने अपने कलिग्स से कहा - बाद में कभी भी इन रास्तों पर से गुजरूँगा तो यही सारे स्पाटस्‌ मेरी पहचान बनेंगे। जिंदगी जैसे कंपार्टमेंट्स में बँट गई। अम्बिशन नंबर एक - आफिस की नई जिम्मेदारी पूरा करना। अम्बिशन नंबर दो - मनोरमा के साथ दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच समय गुजारना।
मनोरमा मूडी है। पार्टियों का शौक उसे भी है। खासकर वहाँ तुमपर इतराना। लेकिन अचानक कोई औरत उसके दिमाग में बैठ जाती है और वह कल्पना करने लगती है कि तुम्हारा और उसका कोई संबंध बन रहा है। फिर घर आकर तुम्हें उलाहने देना और खुद डिप्रेस्ड हो जाना। हर बार एक नये उत्साह से तुम पार्टीमें जाते हो। कुछ तो ठीक रहती हैं पर कई बार वे मनोरमा के डिप्रेशन का कारण बन जाती हैं। फिर उसे कहीं बाहर ले जाना पडता है। अक्सर टूरिंग में वह साथ आने लगी है। चलो, आफिस का काम बढा है तो यह फायदा भी हुआ है कि मनोरमा को घुमाने ले जा सको।
बच्चे एक एक कर पढाई के लिये बाहर जा चुके है। अब केवल आफिस, दोस्त-रिश्तेदार और मनोरमा! जिंदगी भरी-पूटी है, सार्थक है। लेकिन नन्हे पौधे के सामने आओ तो लगता है जिन्दगी का कुछ अलग ही अर्थ है - शायद कोई अलग ही रास्ता है - अभी वह नही दिखेगा। एक धुँध सी पडी है उसपर!
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पौधे ने उसे एक दिन कहानी सुनाई। एक पंछी था। वह उड कर चाँद तक पहुँचना चाहता था। सब उसकी बात पर हँसते। रोज रात जब सारे पंछी सो जाते तो वह उठता और चाँद की तरफ चल पडता। चक्कर लगाता उसके चारों ओर। अपने पंखों को समेट कर ऊँचा, और ऊँचा उठता चला जाता था - फिर थकान में चूर होकर नीचे आ जाता था। कभी कभी ऊँचाई पर पहुँच कर भी उसके पंखों में इतनी हिम्मत होती थी कि वो खुल जाते । फिर पंछी चाँद के बिलकुल पास चक्कर लगा सकता था और फिर एक बार पंख समेट कर और ऊपर जा सकता था।
'मैंने उसे कई बार देखा है।' पौधे ने कहा - 'वह जरूर चाँद पर पहुँच जायेगा।'
'ओ! क्या इसी लिये तुम्हारे दिमाग में उडने की बात आई?'
'नही, इस लिये नहीं !'
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एक दिन पौधेने उसे एक तितली की कहानी सुनाई। वह रानी तितली भी - मतलब जैसे मधुमख्खियों में या चींटीयों में रानी होती हैं - वैसी नही । लेकिन उसका स्वभाव रानियों जैसा था। वह हुकुमत करना भी जानती थी और उदार मन से किसी को कुछ भी दे सकती थी। उसने कई फूलों के उपर अपने पैरों से एक अदृश्य जाल सा बनाया था। फिर रात में वह जाल के तारों पर नाचती थी। नाचते नाचते उसके पंख झड जाते और नए निकलते। उसके पास सौ जोडियाँ पंख थे। जिस रात नाच की गति तेज हो जाएगी और निन्यान्नवे जोडियाँ झड कर आखिरी पंख बाहर आएंगे, उस रात तितली सबके लिये सुहरे पल बाँट सकेगी। तुम भी उससे सुनहरे पल ले सकोगे।
हँसते हँसते तुम्हारा बुरा हाल हो गया। क्या बेवकुफी भरी कहानियाँ गढते हो, तुमने पौधे से कहा । मैं उड जाऊँ? पौधे ने अपनी साँस रोककर पूछा। नहीं, तुम मर जाओगे। तुमने अचानक पौधे की पत्त्िायों को चूम लिया।
याद है, बरसों पहले एक बार तुमने यहीं किया था। पौधे ने खिल कर कहा ।
'मै ऐसा और भी कर सकता हूँ, लेकिन . . . '
'कोई देखेगा तो कहेगा कि मैं पागल हूँ।'
पौधा गुमसुम हो गया। तुमने उसे बहुत छेडा, पर वह चुप ही रहा।
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इधर मनोरमा की तबियत कुछ ज्यादा खराब हो रही है। उसका शक्की मिजाज और डिप्रेशन दोनों ही बढ रहे हैं। पता नहीं क्यों वह मेरे बारे में ऐसा सोचती है?
यह शक्की स्वभाव कब से शुरू हुआ?
एकदम शुरू से ही ! शादी की रात ही उसने मुझसे कहा कि तुम इतने स्मार्ट,.हँडसम हो, तो ऐसा हो नहीं सकता कि तुमपर लडकियाँ न मरती हो।
तुमने क्या कहा था?
मैं हँस पडा था। देखो, कोई कहे कि तुम स्मार्ट और हँडसम हो तो आदमी पहले उसी बात को सोचता है और एक गरूर सा महसूस करता है। हालाँ कि उसकी दूसरी बात सच नही थी लेकिन मैंने उस पर ध्यान ही नही दिया - न उसका कोई प्रतिवाद किया। वैसे सच पूछो तो मनोरमा भी बहुत सुंदर थी। मुझसे कई गुनी सुंदर। मैं तो पहले दिन देखकर ही उससे प्यार करने लगा था।
और वह भी पहले ही दिनसे तुमसे प्यार करने लगी।
पता नहीं !
ऐसा क्यों कहते हो? वह तुम्हारे बच्चों की माँ है, घर बडी खूब सूरती से संभालती है, तुम्हारा साथ देती है, पार्टियों में तुम्हारी पत्नी होने का गरूर भी कितना दिखाती है।
क्या वही प्यार है?
फिर प्यार क्या है? जब तुम कहते हो कि तुम पहले ही दिन से उसे प्यार करने लगे थे। तो तुम्हारा मतलब क्या है? डेफिनिशन क्या हैं?
मैं इतना सब नही जानता। मैं तो अपना सब कुछ उसे दे देने के लिये तैयार था, दिया भी । लेकिन शायद उसके दिल में कोई रिझर्व्हेशन रहा, इसीसे वह मुझपर शक करती है।
उसे डाक्टर के पास ले जाओ।
वह नहीं जाती। मैंने सुझाया था। अण्टी डिप्रेशन की गोलियाँ भी अपने मन से ले लेती है।
वे गोलियाँ अच्छी नहीं। उन्हें बार बार लेना भी रिस्की है।
उसे यह भी पता है।
उसे डाक्टर के पास ले जाना जरूरी है। दॅट शषुड बी युवर फर्स्ट प्रायोरिटी।
लेकिन कैसे ले जाऊँ?
अपने प्यार का वास्ता देकर! आय थिंक तुम्हारी एक कमजोरी यह है कि तुम्हें जब जो बातें - कह देनी चाहियें, तुम कहते नही हो।
मैं सीखूँगा। थँक्स फार दि टिप !
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पौधे ने एक सीप की कहानी सुमाई। सीप के कीडे को पता होता है कि उसके आस पास का समुद्र, उसकी रेत और पानी के तलदृष्टी की घासफूल कैसी होती है। उसकी सीप की नक्काशी भी वह उसी प्रकार बना लेता है ताकि अपने परिवेश में सीप धुलमिल जाये, उभर कर न दिखे । इससे उसका खतरा टल जाता है। एक दिन एक सीप ने कहा कि वह दूर घूमने जायेगी और रास्ते में अपने रंग बदलते हुए जायेगी। रास्ते में सीप थकने लगी। एक तो रास्ते की थकन, दूसरे रंग बदलने की मेहनत। फिर वह एक चित्रकार के पास गई। उसने उसपर ब्रश फेरकर उसे बहुत बडा आकार दे दिया और उछाल कर बादलो में डाल दिया। तूम कभी बारिश के समय बादलों को देखना तो बडे सीप का आकार दिखेगा। ये वही सीप है।
तुम जो मुझे ये पंछियों, सीपों की कहानियाँ सुनाते हो, इनका क्या मतलब है? क्या तुम्हें ये पसंद नही हैं?
बहुत पसंद हैं, पता है तुम्हारे पंछियों, तितलियों या सीपीयों की बात सोचता हूँ तो एक नया उत्साह सा पाता हूँ।
कब सोचते हो?
काम करते हुए कई बार अचानक तुम्हारी कहानियों को सोचने लगता हूँ। मेरी दुनियाँ में तो आफिस के कागज, मनोरमा, बच्चे और पार्टिया ही थे। तुम्हारी दुनियाँ बहुत बडी है, गहरी है। उमंग दिलानेवाली है।
नेरी कहानियाँ तुम्हें अच्छी लगीं ये खुशी की बात है।
बेशक, मेरे लिये भी !
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अधूरा

Friday, December 14, 2007

उन्मुक्त आनंद का फलसफा

उन्मुक्त आनंद का फलसफा
--- लीना मेहेंदले

आज की तारीख में तंदूरी कांड से लेकर नताशा कांड तक की घटनाओं का जायजा लिया जाय तो वर्तमान भारत की उच्च वर्ग की संस्कृति के बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है।
उदारीकरण और स्त्री मुक्ति के दौर ने एक ओर तो महिला के लिए बंद रहे कई दरवाजे खोल दिए। उसे घर से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाने के अवसर दिए। इस बात का स्वागत होना जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ महिला के लिए दिखावा नामक एक नई जंजीर भी पैदा कर दीं। उपभोक्तावाद और प्रदर्शनवाद ही उसका जीवन सिद्धान्त बन गया।
नई सदि के आते आते देश में करोडपति बनने की धूम मच गई। उसके पहले ग्लोबलायजेशन की प्रक्रिया ने हरेक को मजबूर कर ही दिया था कि वह करोडपति बनने की कोशिश करता रहे।
उच्च वर्ग की पहली और आखिरी विशेषता होती है धन। वह जमाना गया जब धन कमाने में काफी समय और काफी मेहनत पडती थी। आज भी जिसे ईमानदारी से धन कमाना है उसके लिए यही रास्ता है, लेकिन आज काला धन बटोरने के कई रास्ते खुल गये हैं। अब धन का यह नियम है कि वह जिस रास्ते से आता है, उसी रास्ते से जाता है। सो काला धन भी काले रास्ते से जाता है लेकिन जाते जाते अपनी चपेत में नहिलाओं को ले लेता है। इसकी वजह क्या है ?
उच्च वर्गी महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढा है लेकिन यह शिक्षा उन्हें वैज्ञानिकता, कलात्मकता या सृजन की तरफ नहीं ले जा रही, बल्कि उच्छृंखलता की ओर ले जा रही है। मदिरापान, क्लब और पब संस्कृति, और अर्द्धनग्नता को ही सक्षमीकरण का मापदंड माना जा रहा है जबकी पुरुषों के लिए मापदंड हमेशा अलग ही रहे।
अर्द्धनग्नता किस तरह हमारी पहचान बनी इसे इस बात से समझा जा सकता है कि पहले सिनेमा की हिरोइन कभी कैबरे नहीं नाचती थी, आज वह डान्स किसी और को मिला तो हिरोइन डरती है कि उसकी इमेज फीकी हो गई। प्रदर्शन के माहौल ने तत्काल उच्च वर्गी महिला को दो जरूरतों में बाँध दिया। पहली जरुरत कि उसके पास काफी पैसे हों और दूसरी कि वह सदा आमंत्रक, लुभावनी
लगती रहे। दोनों बातें एक दूसरे की पूरक भी हैं।
किसी उच्च शिक्षित महिला के पास ये दोनों हों तो वह क्या कर सकती है इसका एक उदाहरण मेरे मन पर बडी गहराई से छाया हुआ है। वह है एनरॉन चर्चित रेबेका मार्क जिसने भारतीय शासन -प्रशासन के कई दिग्गजों को साम दाम दंड भेद के प्रयोग से नाच नचा दिया और अपना मंतव्य पा ही लिया। पर हमारे देश की महिला के लिए वैसी बात कल्पना से भी परे है। फिर काहे का सक्षमीकरण ?
नताशा, जेसिका, अंजू जैसे कई नाम गिनाए जा सकते हैं जहाँ इस नई संस्कृति की मार महिला पर ही पडी। ऐसी महिलाओ के पास आय का कोई अपना ヒाोत नही था, अतएव वे उन पुरुषों पर निर्भर थीं जो पैसा देते। फिर या तो उनका उपयोग किया जाता था या उनका अंत हो जाता था। अंत को भले ही कई बार आत्महत्या घोषित किया गया हो, लेकिन उस कगार तक पहुँचने का कारण भी आर्थिक परावलंबिता ही था। उस ड्रामें में पुलिस का भी रोल था और मिल्कियत जताने वाले परिवार के सदस्यों का भी। उनका उपयोग कहाँ कहाँ हो सकता है इसकी एक झलक तो तहलका कांड ने भी दिखा दी। दूसरी झलक तब मिली जब काँग्रेस पार्टी की
नागपूर स्थित महिला उपाध्यक्ष ने टिकट बँटवारे में यौन शोषण का आरोप किया।
उच्च वर्ग की अधिकतर महिलाओंका सपना क्या होता है ? यही कि वे पार्टियों की रौनक बनीं रहें। उनके पास कारें तथा सुविधा के अन्य साधन हों, और वे जीवन का आनंद भरपूर उठायें। मीडिया और विज्ञापनों ने भी इसे खूब बढावा दिया है। उसने तो एक और सपना भी जोड दिया --- टी.वी.स्क्रीन पर झलकने का। क्या ऐसे सपने गलत हैं ? शायद नहीं। तो फिर विसंगति कहाँ है ?
विसंगति यही है कि अपने सपने को अपना हक माना जाता है, चाहे योग्यता हो या न हो। जब वह नही होती तो माना जाता है कि रूप और यौवन उनके पर्याय हैं। जहाँ धन और सुविधाएँ हैं उनका उपयोग योग्यता बढाने में नहीं बल्कि आनंद उठाने और मौज मस्ती में ही सार्थक समझा जाता है। ये वो दौर है जिसमें सब कुछ जायज है, विवाह बाह्य संबंध भी। लेकिन फिर पुरुषी अहंकार को चोट लगती है, खानदान की इज्जत का सवाल उठाया जाता है और कटारा कांड भी हो जाता है।
देखें कि उन सारी घटनाओं पीछे उच्च वर्ग का पुरुष कहाँ है ? तो हर जगह है। उसे धन और आनंद के साथ साथ सत्ता की भी
लालसा है, जिसके लिए औरत सीढी बन सकती है। इनकार करे तो उसे तंदूर में जलाया जा सकता है। और सजा की चिन्ता क्यों हो, जब पैसे के बल पर मुकदमें की सुनवाई को जितनी मर्जी हो घसीटा जा सकता है।
धन, सत्ता और उन्मुक्त आनंद, यह एक त्रिकोण बन गया है। उच्च वर्ग की महिला को ये सारे चाहिये और झटपट चाहिये। दिल्ली के कई फार्म हाउस पार्टी और पब के अड्डे बने हुए हैं जहाँ मदिरा है, रूप यौवन है और एक फलसफा है कि असली जिन्दगी यही है। कभी कभी जब वहाँ से झूमते झामते बाहर निकले लडके लडकियाँ कार एक्सिडेंट में किसी की जान ले लेते हैं तो दो चार दिन हो हल्ला मचता है और उन्मुक्तता फिर अबाधित चलने लगती है। कभी किसी जेसिका की जिद को खतम करने के लिए इतने सहज भाव से गोलियाँ दग जाती हैं, मानों यह कोई रोजमर्रा की बात हो। कोई नही पूछता कि क्या गोली चलानेवाला हमेशा से इसका आदी
है। क्यों कि कानून कहता है, उसकी आदतों से हमें कुछ लेना देना नही है, यह बात भुला दी जाती है कि जिसे इस तरह के शक्ति प्रदर्शन की आदत बन गई हो वही इतनी जल्दी गोलियाँ चला सकता है।
काला धन, रिश्र्वतखोरी, हवाला, सभी इस त्रिकोण को सशक्त बनाते हैं। राजकीय और कानूनी आश्रय भी