शनिवार, 3 सितम्बर 2011
सोमवार, 4 अप्रैल 2011
तीनों लेखानुक्रम
चौथे संग्रह के लिये उपलब्ध --
चौथा संग्रह -
महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में विठ्ठल
सोने के हथियार से लडने के लिये
युगान्तर के पर्व में
हजारों स्कॅम -- देशबन्धु, रायपुर Nov, 2010
विभिन्न भारतीय भाषाओं में आदान प्रदान की संभावनाएँ
हॉलण्ड का समाज दर्शन
स्वाइन फ्लू और सरहद देशबन्धु, रायपुर
कम्प्यूटर व हिन्दी -- विश्वहिन्दी सेक्रेटारिएट Jan 2011 issue
हिंदी बरकरार रखने के लिये संगणक
नीतिरस्मि जिगिषिताम्
हिंदू धर्म में सन्यासी - महानगर
उदारीकरण की ओरः प्रशासन के सम्मुख समस्याएँ एवं चुनौतियां
क्यों बजट से आम आदमी खुश नहीं है ? - महानगर
अयोध्या कांड और हिंदू धर्म विचार
भ्रष्टाचार से निपटने का शुरुआती रास्ता - हिंदुस्तान
गोवा इलेक्शन - (From English Articles)
कौन करेगा यह वादा - महानगर, अफसोस जाहिर किया ठीक है - नभाटा
महिलाओंका घटता लिंग अनुपात और फिसड्डी साक्षरता
राजस्थान : जनमने और पढ़ने कर हक - योजना (शिशु लिंग भेद + स्त्री भ्रूण हत्या)
महिला सशक्तीकरण की दिशा मे ---- योजना
सच्चाई का संस्कार, कठिन नही है डगर अभिभावक की, जानो अपनी समृद्धि को, तीनों हिमालयन ओऍसिस, सिमला के अंक में प्रकाशित और एकत्र मिलाये जा सकते हैं।
खुली अर्थव्यवस्था किसके लिए खुली है - महानगर
केंद्र सरकार में हिंदी प्रयोग को बढ़ावा देने बाबत कार्यसमिति का गठन - ?
इस चुनाव में मैं बेजुबान
विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराध विश्लेषण - मासिक हिमप्रस्थ, सिमला में प्रकाशित
दूबधान - नागपूर की महिलाओं के लिए- हिंदुस्तान
कुसुमाग्रज की प्रेमकविता - हिमप्रस्थ
कुसुमाग्रज की कविता - विपाशा
सरकारी कार्यालयों में संगणक
नौकरशाही की संवेदनशीलता कहाँ गई, व्यवस्था की एक और विफलता - महानगर, ऑगस्ट क्रांति और सरकारी छुट्टियाँ, छुट्टियाँ कम करो अभियान --- ये चार लेख तीसरे संग्रहसे मिलाकर देखना है।
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तीसरा संग्रह - मेरी प्रांतसाहबी
प्रस्तावना -- ललित सुरजन, रायपुर फोन 09827141800
अनुक्रम
1 मेरी प्रांतसाहबी -- नया ज्ञानोदय दिल्ली, y
2 पेपर लीक का जबाब है
3 कौन करेगा ये वादा
4 व्यवस्था की एक और विफलता y
5 इस ढीली दण्ड प्रक्रिया को बदलिये y
6 हिन्दी भाषा और मैं
7 संगणक और हिन्दी -- जरूरत है मूलतत्व तक जाने की
8 गो. नी. दाण्डेकर
9 मथना -- एक सागर को
10 डॉ. राज बुद्धिराजा
11 भगवद्गीताप्रणीत बुद्धियोग
12 तेलगी के दायरे में
13 इस चुनाव में मैं बेजुबान
14 विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराधों का विश्लेषण
15 राजस्थान -- क्या है जनमने और पढने का हक
16 महिला सशक्तीकरण की दिशा में
17 सुरीनामियोंकी चिन्ता
18 उन्मुक्त आनंद का फलसफा
19 बायोडीजल -- अपार संभावनाएँ
20 हाथ जनता की नाडी पर
21 अगस्त क्रांति भवन -- अर्थात् कथा 9 अगस्त की इमारत की
22 मालूम ही नही कि सुभाष स्वतंत्रता सेनानी थे
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दूसरा संग्रह - है कोई वकील लोकतंत्रका
मेरी भूमिका -- वकालत हमें ही करनी है।
1. है कोई वकील ? - दै. महानगर, मुंबई, १९९१ (1996)
२. सावित्री के साथ समाज ने अन्याय किया है - सा. रविवार, मुंबई, १९८६
३. आदि शकंराचार्य के उत्तराधिकारी - सा. रविवार, मुंबई, १९८५
४. आरक्षण नीति IIPA प्रतियोगिता १९९१ प्रथम पुरस्कार- दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली,
५. गुनहगारी के बदलते चेहरे - दै. महानगर, मुंबई, सित.१९९२ (written with signed dt 1-12-92 )
६. अभिभावक की आँखों से - दै. महानगर, मुंबई, मार्च १९९१
७. भंडाफोड से उजागर गलतियां + चालाक दलाल व भ्रष्ट राजनीति के भण्डाफोड से किसकी पोल खुली(in 2 parts)-दै. महानगर, मुंबई, २९.०६.१९९३ + 2.7.93(written on that day???.. no, printed on those days )
८. भारतीय नौकरशाही की पुनःसरंचना IIPA प्रतियोगिता १९९३ द्वितीय पुरस्कार -ok -दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली,
९. निसर्गोपचार एक आवश्यक फलसफा - परिषद प्रभा, दिल्ली, 1991 + मुंबई, भाषण, १९९3
१०. यह शोर कैसा, महानगर - दै. महानगर, मुंबई, ०२.०३.१९९४ -ok
११ राष्ट्रभाषा बचाने का एक सूत्री कार्यक्रम - ? (19-7-??) अन्य संदर्भ दै. महानगर मई 1992
१२. खेरनार के पक्ष में - दै. महानगर, मुंबई,
१३. बटमारी के हिस्सेदार - दै. महानगर, मुंबई,
१४. प्लेग का भय - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,(सित. या अक्तू.) १९९५
१५. हवाला के मुद्दे - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २०.०२.१९९६ व २९.०२.१९९६ (dts are 20 and 21 feb or perhaps 22, 23 feb)
१६. धुन की पक्की महिलाएँ - दै. अक्षरपर्व(देशबन्धु,) रायपुर, (written as settlement com.—96)
१७. नौकरशाही में सन्यासी - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २४.०४.१९९५ – (was that dt of writing?) [+ हिन्दू धर्म में संन्यास-- दै. महानगर 3-5-95 (not referred while editing article for book)]
१८. एक सिंचन व्यवस्था एक विचारधारा (in 2 parts)- दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, १२.०३.१९९५ +(??) -ok
१९. आयुर्वेद पर अवैज्ञानिकता की मुहर क्यों ? दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, (written as settlement com.—96)
२०. क्या भारतीय प्रशासनिक सेवाएं गैर जरूरी बन गई है? ---दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २५.०५.१९९६ --ok
२१. दिल्ली में महिला सुरक्षा - - दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, ??
२२. स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा --कुछ गायब है
२३. औरत के विरुद्ध - पश्यन्ति, दिल्ली, अक्तू २००२ -ok
२४. दिल्ली का सांस्कृतिक बंजर - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,
२५. व्यर्थ न हो यह बलिदान - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,
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पहला संग्रह - जनता की राय
समाज बनाम प्रशासन -- मेरे लेखोंकी भूमिका
बंद दरवाजों पर दस्तक देते आलेख -- कमलेश्वरजी द्वारा लिखी प्रस्तावना
१. हिन्दी में शपथ - जन. १९ अक्टूबर १९९९ y
२. बच्चों को तो बख्शिए - जन. ३० अक्टूबर १९९९ y
३. उठो जागो - जन. ११ दिसंबर १९९९ y
४. नई सहस्त्राब्दी के पहले - जन. १७ दिसंबर १९९९ y
५. हर जगह वही भूल - जन. ३० दिंसबर १९९९ y
६. सुयोग्य प्रशासन - जन. ८ जनवरी २००० y
७. पचास साल बाद हिन्दी - जन. ३ फरवरी २००० y
८. पुलिस प्रपंच - जन. २५ मार्च २००० y
९. दिल्ली में युधिष्ठिर - जन. ६ अप्रैल २००० y
१०. भीड़ के आदमी का हक - जन. १४ अप्रैल २०००
११. नमक का दरोगा - जन. ५ जून २०००
१२. जनतंत्र की खोज में - जन. १७ जून २०००
१३. अर्थव्यवस्था का नमक - जन. २ अक्टूबर २०००
१४ लालकिले पर कालिख - जन. १४ अक्टूबर २०००
१५. इक्कीसवीं सदी की औरत X - जन. १७ दिसंबर २०००
१६. अपने अपने शैतान - जन. २ दिसंबर २०००
१७. तबादलों का अर्थतंत्र - जन. ६ दिसंबर २०००
१८. काननून अन्याय - जन. २६ दिसबंर २०००
१९. राष्ट्रीय संकट में हम - जन. २ फरवरी २००१
२०. गुजरात ने जो कहा X - जन. ६ मार्च २००१
२१. कलाकार की कदर X - जन. ४ मई २००१
२२. नीरस जीवन की भुक्तभोगी X - जन. ६ मई २००१
२३.गुजारा भत्ते की दावेदार कैसे बने - रास. १८ फरवरी २००१
२४. एड्स का खौफ X - रास. २७ मई २००१
२५. छोरी साइकिल चलावै छे - प्रख ३१ अक्टूबर २००२
२६. बीजींग कान्फरंस, सीडॉ और भारतीय महिला नीति X - (जालंधर में दिया गया भाषण)
२७. परीक्षा प्रणाली में आमूलाग्र सुधार हो X - नभाटा. १२ फरवरी १९९९
२८. एक स्त्री का साहस X - जन. ३ फरवरी २०००
२९. एक श्रद्धांजली X - प्रख. जून १९९९
३०. पढाई का बोझ X - रास. २२ जुलाई २००१
३१. क्या हमारे खून में कश्मीर है - हिंदुस्तान २३ जुलाई २००२
३२. लिंगभेद से जूझते हुए - तारा - सनद, अंक १०
३३. शीतला माता - अप. मार्च २००४
३४. सत्ता तंत्र में कमाई : जनता क्या है तेरी की राय- हिंदुस्तान २३ मार्च २००४
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चौथा संग्रह -
महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में विठ्ठल
सोने के हथियार से लडने के लिये
युगान्तर के पर्व में
हजारों स्कॅम -- देशबन्धु, रायपुर Nov, 2010
विभिन्न भारतीय भाषाओं में आदान प्रदान की संभावनाएँ
हॉलण्ड का समाज दर्शन
स्वाइन फ्लू और सरहद देशबन्धु, रायपुर
कम्प्यूटर व हिन्दी -- विश्वहिन्दी सेक्रेटारिएट Jan 2011 issue
हिंदी बरकरार रखने के लिये संगणक
नीतिरस्मि जिगिषिताम्
हिंदू धर्म में सन्यासी - महानगर
उदारीकरण की ओरः प्रशासन के सम्मुख समस्याएँ एवं चुनौतियां
क्यों बजट से आम आदमी खुश नहीं है ? - महानगर
अयोध्या कांड और हिंदू धर्म विचार
भ्रष्टाचार से निपटने का शुरुआती रास्ता - हिंदुस्तान
गोवा इलेक्शन - (From English Articles)
कौन करेगा यह वादा - महानगर, अफसोस जाहिर किया ठीक है - नभाटा
महिलाओंका घटता लिंग अनुपात और फिसड्डी साक्षरता
राजस्थान : जनमने और पढ़ने कर हक - योजना (शिशु लिंग भेद + स्त्री भ्रूण हत्या)
महिला सशक्तीकरण की दिशा मे ---- योजना
सच्चाई का संस्कार, कठिन नही है डगर अभिभावक की, जानो अपनी समृद्धि को, तीनों हिमालयन ओऍसिस, सिमला के अंक में प्रकाशित और एकत्र मिलाये जा सकते हैं।
खुली अर्थव्यवस्था किसके लिए खुली है - महानगर
केंद्र सरकार में हिंदी प्रयोग को बढ़ावा देने बाबत कार्यसमिति का गठन - ?
इस चुनाव में मैं बेजुबान
विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराध विश्लेषण - मासिक हिमप्रस्थ, सिमला में प्रकाशित
दूबधान - नागपूर की महिलाओं के लिए- हिंदुस्तान
कुसुमाग्रज की प्रेमकविता - हिमप्रस्थ
कुसुमाग्रज की कविता - विपाशा
सरकारी कार्यालयों में संगणक
नौकरशाही की संवेदनशीलता कहाँ गई, व्यवस्था की एक और विफलता - महानगर, ऑगस्ट क्रांति और सरकारी छुट्टियाँ, छुट्टियाँ कम करो अभियान --- ये चार लेख तीसरे संग्रहसे मिलाकर देखना है।
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तीसरा संग्रह - मेरी प्रांतसाहबी
प्रस्तावना -- ललित सुरजन, रायपुर फोन 09827141800
अनुक्रम
1 मेरी प्रांतसाहबी -- नया ज्ञानोदय दिल्ली, y
2 पेपर लीक का जबाब है
3 कौन करेगा ये वादा
4 व्यवस्था की एक और विफलता y
5 इस ढीली दण्ड प्रक्रिया को बदलिये y
6 हिन्दी भाषा और मैं
7 संगणक और हिन्दी -- जरूरत है मूलतत्व तक जाने की
8 गो. नी. दाण्डेकर
9 मथना -- एक सागर को
10 डॉ. राज बुद्धिराजा
11 भगवद्गीताप्रणीत बुद्धियोग
12 तेलगी के दायरे में
13 इस चुनाव में मैं बेजुबान
14 विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराधों का विश्लेषण
15 राजस्थान -- क्या है जनमने और पढने का हक
16 महिला सशक्तीकरण की दिशा में
17 सुरीनामियोंकी चिन्ता
18 उन्मुक्त आनंद का फलसफा
19 बायोडीजल -- अपार संभावनाएँ
20 हाथ जनता की नाडी पर
21 अगस्त क्रांति भवन -- अर्थात् कथा 9 अगस्त की इमारत की
22 मालूम ही नही कि सुभाष स्वतंत्रता सेनानी थे
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दूसरा संग्रह - है कोई वकील लोकतंत्रका
मेरी भूमिका -- वकालत हमें ही करनी है।
1. है कोई वकील ? - दै. महानगर, मुंबई, १९९१ (1996)
२. सावित्री के साथ समाज ने अन्याय किया है - सा. रविवार, मुंबई, १९८६
३. आदि शकंराचार्य के उत्तराधिकारी - सा. रविवार, मुंबई, १९८५
४. आरक्षण नीति IIPA प्रतियोगिता १९९१ प्रथम पुरस्कार- दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली,
५. गुनहगारी के बदलते चेहरे - दै. महानगर, मुंबई, सित.१९९२ (written with signed dt 1-12-92 )
६. अभिभावक की आँखों से - दै. महानगर, मुंबई, मार्च १९९१
७. भंडाफोड से उजागर गलतियां + चालाक दलाल व भ्रष्ट राजनीति के भण्डाफोड से किसकी पोल खुली(in 2 parts)-दै. महानगर, मुंबई, २९.०६.१९९३ + 2.7.93(written on that day???.. no, printed on those days )
८. भारतीय नौकरशाही की पुनःसरंचना IIPA प्रतियोगिता १९९३ द्वितीय पुरस्कार -ok -दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली,
९. निसर्गोपचार एक आवश्यक फलसफा - परिषद प्रभा, दिल्ली, 1991 + मुंबई, भाषण, १९९3
१०. यह शोर कैसा, महानगर - दै. महानगर, मुंबई, ०२.०३.१९९४ -ok
११ राष्ट्रभाषा बचाने का एक सूत्री कार्यक्रम - ? (19-7-??) अन्य संदर्भ दै. महानगर मई 1992
१२. खेरनार के पक्ष में - दै. महानगर, मुंबई,
१३. बटमारी के हिस्सेदार - दै. महानगर, मुंबई,
१४. प्लेग का भय - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,(सित. या अक्तू.) १९९५
१५. हवाला के मुद्दे - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २०.०२.१९९६ व २९.०२.१९९६ (dts are 20 and 21 feb or perhaps 22, 23 feb)
१६. धुन की पक्की महिलाएँ - दै. अक्षरपर्व(देशबन्धु,) रायपुर, (written as settlement com.—96)
१७. नौकरशाही में सन्यासी - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २४.०४.१९९५ – (was that dt of writing?) [+ हिन्दू धर्म में संन्यास-- दै. महानगर 3-5-95 (not referred while editing article for book)]
१८. एक सिंचन व्यवस्था एक विचारधारा (in 2 parts)- दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, १२.०३.१९९५ +(??) -ok
१९. आयुर्वेद पर अवैज्ञानिकता की मुहर क्यों ? दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, (written as settlement com.—96)
२०. क्या भारतीय प्रशासनिक सेवाएं गैर जरूरी बन गई है? ---दै. हिंदुस्तान, दिल्ली, २५.०५.१९९६ --ok
२१. दिल्ली में महिला सुरक्षा - - दै. राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, ??
२२. स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा --कुछ गायब है
२३. औरत के विरुद्ध - पश्यन्ति, दिल्ली, अक्तू २००२ -ok
२४. दिल्ली का सांस्कृतिक बंजर - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,
२५. व्यर्थ न हो यह बलिदान - दै. हिंदुस्तान, दिल्ली,
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पहला संग्रह - जनता की राय
समाज बनाम प्रशासन -- मेरे लेखोंकी भूमिका
बंद दरवाजों पर दस्तक देते आलेख -- कमलेश्वरजी द्वारा लिखी प्रस्तावना
१. हिन्दी में शपथ - जन. १९ अक्टूबर १९९९ y
२. बच्चों को तो बख्शिए - जन. ३० अक्टूबर १९९९ y
३. उठो जागो - जन. ११ दिसंबर १९९९ y
४. नई सहस्त्राब्दी के पहले - जन. १७ दिसंबर १९९९ y
५. हर जगह वही भूल - जन. ३० दिंसबर १९९९ y
६. सुयोग्य प्रशासन - जन. ८ जनवरी २००० y
७. पचास साल बाद हिन्दी - जन. ३ फरवरी २००० y
८. पुलिस प्रपंच - जन. २५ मार्च २००० y
९. दिल्ली में युधिष्ठिर - जन. ६ अप्रैल २००० y
१०. भीड़ के आदमी का हक - जन. १४ अप्रैल २०००
११. नमक का दरोगा - जन. ५ जून २०००
१२. जनतंत्र की खोज में - जन. १७ जून २०००
१३. अर्थव्यवस्था का नमक - जन. २ अक्टूबर २०००
१४ लालकिले पर कालिख - जन. १४ अक्टूबर २०००
१५. इक्कीसवीं सदी की औरत X - जन. १७ दिसंबर २०००
१६. अपने अपने शैतान - जन. २ दिसंबर २०००
१७. तबादलों का अर्थतंत्र - जन. ६ दिसंबर २०००
१८. काननून अन्याय - जन. २६ दिसबंर २०००
१९. राष्ट्रीय संकट में हम - जन. २ फरवरी २००१
२०. गुजरात ने जो कहा X - जन. ६ मार्च २००१
२१. कलाकार की कदर X - जन. ४ मई २००१
२२. नीरस जीवन की भुक्तभोगी X - जन. ६ मई २००१
२३.गुजारा भत्ते की दावेदार कैसे बने - रास. १८ फरवरी २००१
२४. एड्स का खौफ X - रास. २७ मई २००१
२५. छोरी साइकिल चलावै छे - प्रख ३१ अक्टूबर २००२
२६. बीजींग कान्फरंस, सीडॉ और भारतीय महिला नीति X - (जालंधर में दिया गया भाषण)
२७. परीक्षा प्रणाली में आमूलाग्र सुधार हो X - नभाटा. १२ फरवरी १९९९
२८. एक स्त्री का साहस X - जन. ३ फरवरी २०००
२९. एक श्रद्धांजली X - प्रख. जून १९९९
३०. पढाई का बोझ X - रास. २२ जुलाई २००१
३१. क्या हमारे खून में कश्मीर है - हिंदुस्तान २३ जुलाई २००२
३२. लिंगभेद से जूझते हुए - तारा - सनद, अंक १०
३३. शीतला माता - अप. मार्च २००४
३४. सत्ता तंत्र में कमाई : जनता क्या है तेरी की राय- हिंदुस्तान २३ मार्च २००४
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मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010
15 हवाला घपले के मुद्दे
हवाला घपले के मुद्दे -- २
भ्रष्टाचार और घोटाले की रो.ज नई नई कहानी सामने आ रही है । जनता इन कहानियों से सिर्फ परेशान ही नहीं है, बल्कि यह सोचने लगी है कि यह सब कैसे और क्यों होता है तथा इससे निजात पाने का कोई उपाय है या नहीं। लेखक ने उन कारणों पर विस्तार से विचार किया है जिनकी वजह से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल होता है । सबसे बड़ी बाधा यह है कि किसी आरोप को अदालत में साबित कैसे किया जाए । --संपादक
- लीना मेहेंदले -
आज यदि जनता सोचती है कि सी. बी. आई. किसी बड़े व्यक्ति की पूरी जाँच नहीं करती तो फिर इसकी मांग भी जनता को ही करनी पड़ेगी और यह भी संहिता बनानी होगी कि जाँच की लेखाजोखा जल्दी से जल्दी और लगातार जनता के सामने आता रहे । इस जाँच को बलात्कार के समकक्ष नहीं माना जाना चाहिए और इसमें गुप्त रूप से सुनवाई की कोई गुजाइश नहीं होनी चाहिए । इसके लिए यह भी आवश्यक है कि जाँच करने वाली एजेंसी मल्टी-डिसिप्लिनरी हो । आज हालत यह है कि बाहरी आदमी चाहे लाख सिर पटक ले लेकिन जाँच पड़ताल का हक केवल पुलिस विभाग को और इस विभाग की वर्दी की सख्ती इतनी अधिक है कि कई बार अच्छे-अच्छे और ईमानदार पुलिस अफसर छटपटाकर रह जाते हैं और गुनहगारों के विरूद्ध जाँच का काम उन्हें रोक देना पड़ता है ।
बजट और घपला
हमारे आई. पी. सी. और सी. आर. पी. सी. में आर्थिक गुनाहों के संदर्भ में जो भी प्रणाली है वह बड़ी ढीली ढाली है । सोचने की बात है कि जिस देश का बजट ४०,००० करोड़ रूपए का है और जहाँ घपले भी उसी अनुपात में होते है यानी ३५०० करोड़ का घपला, १००० करोड़ का घपला आदि, जहाँ एक घपले का बजट हमारे राष्ट्रीय बजट, जितना बड़ा होता है वहाँ भी हम आर्थिक दुर्व्यवहार और घपले के गुनहगारों को ऐसी ही सजा दे सकते हैं जो नहीं के बराबर हैं । घर में सेंध लगाकर ट्रांजिस्टर सैट चुराने की सजा अधिक है और देश के लाखों रुपये का इनकम टैक्स डकार जाने की सजा उससे कम है । उस पर तुर्रा यह कि आर्थिक दुर्व्यवहार के केसों में सजा आज तक बहुत ही कम मिली है । आज भी हमारे देश में कंपनियाँ है जो गर्व से छपवाती है कि उनका लाभ इतने हजार करोड़ का है और आयकर भुगतान नहीं के बराबर । कुछ लोगों ने सरकार और इसके नीति नियमों को इस कदर काबू में रखा है कि लाभ तो हो जाता है और टैक्स भी नहीं चुकाना पड़ता है । तो फिर इसी के पीछे लोग उस कंपनी के कुछ और ज्यादा शेयर्स खरीद लेते है। कोई यह नहीं सोचता कि यह गलत हो रहा है। हर कोई यह सोचता हैं कि जब बाकी शेयर होल्ङर इसी ट्रिक के कारण अच्छा डिविडेंड ले रहे है और कुछ शेयर मैं भी लूँ । उधर शेयर घोटालों में भी तीन चार हजार करोड़ का स्कैम हो गया, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भी एक करोड़ रुपये रिश्र्वत देने का दावा किया गया और फिर भी न उस केस की कोई जाँच, न सुनवाई और न केस आगे बढ़ा ।
खैर, तो मुद्दा यह है कि हमारे देश में आर्थिक गुनाहों की सजा कोई अघिक नहीं होती । कल मान लो हवाला घपला साबित हो भी गया और कोर्ट में गुनाह भी साबित हो गया तो प्रस्तावित सजा क्या होगी ? यह सवाल लोगों को आज ही पूछना चाहिए कि आई. पी. सी. के किस सेक्शन में केस दर्ज हो रहा है और उसमें अघिकतम सजा क्या हो सकती है । एक महत्वपूर्ण मुद्दा और भी है ।
इस मामले के कागजात तो १९९० के आसपास से ही धीरे- धीरे इकट्ठे हो रहे हैं । अर्थात् प्रधानमंत्री को उन नामों की जानकारी भी जो जैन की लिस्ट में थे और जिनके विरूद्ध सी. बी. आई. कुछ और जानकारी भी जुटा पाई थी जैसे उनकी संपत्त्िा का ब्यौरा । यह सारे कागज प्रधानमंञी ने अवश्य देखें होंगे । फिर भी उन लोगों को मंञिमंडल में शामिल कर लिया । क्या जनता को यह जानने का हक नहीं कि ऐसा क्यों किया गया ? जनता तो चाहती है कि हर पक्ष में कम से कम पक्ष का हाईकमान ऐसा व्यक्तित्व हो जो नीति अनीति में फर्क करता है, और अपने पक्ष में केवल नीतिमान लोगों को ही लेता है । जनता चाहती तो है, लेकिन फिर आग्रह क्यों नहीं करती? पक्ष नेताओं से प्रश्न पूछ पाने का हक क्यों नहीं करती ? पक्ष नेताओं से प्रश्न पूछ पाने का हक क्यों नहीं मांगती ?
लोकतंत्र के स्तभ्भ
लोकशाही के चार स्तभ्भ होते है - कानून बनाने वाली संसद, देश चलाने वाली सरकार, जिससे मंञिमंडल और नौकरशाही शामिल है, न्याय व्यवस्था और पञकारिता। कानून बनाने वालों ने भी कभी इस बात को जरूरी नहीं समझा कि चुनावी कानूनों में सुधार किए जांए ताकि कौन किससे रुपये ले रहा है यह किताब जनता के सामने खुली हो । यह प्रश्न केवल चुनावी कानूनों का ही नहीं । धीरे - धीरे हमारे देश का कानून ऐसे बनने लगे है जिससे जानकारी का मूलभूत हक लोगों से छीना जा रहा है जो कि वास्तव में लोकतंञ की जान है । वही बात है सरकार की । उनके नियम भी वैसे ही बने है । उनके पास तो है समर्थन के लिए दो अन्य हथियार भी है - एक है गोपनीयता का और दूसरा सुरक्षा का । इन दोनों तर्कां को कई बार हास्यास्पद ढंग तक खींचकर सरकारी गैर-व्यवहार करने वाले बच निकलते हैं । अक्सर न्यायालय भी इन मुद्दों के कवच में लिपटी फ़ाइलों को छेङने से इंकार ही करते हैं ।
लेकिन जनता के लिए तिनके का सहारा इस बात से है कि कभी -कोई न्यायालय, कभी कोई पञकार, कभी कोई नौकरशाह, कभी कोई सामाजिक कार्यकर्ता इस बात को लेकर अड़ जाता है कि रूको, जनता का अपना हक जनता को वापिस सौंप दो । यह जब तक नहीं हो जाता, मैं लड़ता रहूंगा । यह लड़ाई धीरे धीरे जोर पकड़ती है । उठाया हुआ मुद्दा अपने आप में चाहे सही हो या गलत, लेकिन यदि उसमें यह मांग हो कि जनता को अमुक बात की जानकारी पाने का हक है, तो धीरे धीरे उस हक की आवा.ज उठाने वाले के पीछे लोग जमा हो ही जाते हैं । दुख इस बात का है कि आज तक कोई ऐसा ठोस केस सामने नहीं आया जिसमें समय रहते और पूरी तरह से
जनता को यह अधिकार मिल पाया हो और जो जानकारी मिली उसके चलते जनता ने ही देश को किसी गहन संकट से या प्रश्न से बचा लिया । अक्सर यह देखा गया है कि यह जानकारी सामने
आने में भी कई वर्ष लग जाते है । जनता इसके लिए अधिक सतर्क और अधिक आग्रही क्यों नहीं जबकि इसके अच्छे नतीजे को जनता देख चुकी है ? इस सिलसिले में एक छोटा उदाहरण पेश है। आजकल कई बड़े स्टेशनों पर रिजर्वेशन चार्ट लगे होते है कि कौन सी तिथि के लिए कौन सी गाड़ी में कितने स्थान उपलब्ध है । दूसरा नमूना भी है महाराष्ट्र में इंजीनियरिंग कॉलेज के नामांकन के नियम पांच - छह महीने पहले जाहिर किए जाते है, सभी अर्जी देने वाले विद्यार्थियों की लिस्ट चिपकाई जाती है और खुलेआम सब विद्यार्थियों के समक्ष मेधावी छाञों की लिस्ट के मुताबिक सीटों बंटवारा किया जाता है । यह कदम भी महाराष्ट्र शासन ने उठाया तो न्यायालय के आदेश से ही ।
लेकिन इससे विद्यार्थियों में अन्याय की भावना खत्म हो गई और न्यायालय में इस मुद्दे पर दाखिल होने वाली केस भी कम हो गए ।
कहने का अर्थ यह है कि इस प्रकार का कानून बनाने से जनता की सुविधा और जानकारी का हक सुरक्षित रहता है और किन कानूनों से नहीं, यह समझने की शक्ति और जनता को केंद्र बनाकर कानून बनाने कि सामर्थ्य दोनों ही हमारे शासनकर्ता भूल से गए है । इसमें यदि बड़ा हिस्सा राजनीतिक लोगों का है तो छोटा हिस्सा नौकरशाही का भी है । और कोई आश्श्रर्य नहीं कि हवाला कांड में कुछ अफ़सरों के नाम भी शामिल हों ।
आर्थिक अपराघियों के लिए कड़ी सजा हो
अब जो महत्वपूर्ण सुधार देश के नेतागण, नौकरशाही और न्यायपंडितों को तुरंत अपने हाथ में लेना चाहिए वह दो-तीन प्रकार का है । एक तो आर्थिक गुनहगारों की सजा कड़ी से कड़ी करने का सुधार । साथ ही आर्थिक गुनाहों की अच्छी खासी विवेचना । दूसरे कोर्ट में सुधार ताकि वकीलों पर यह बंधन हो को वे कोर्ट को सच्चाई प्रस्थापित करने में मदद करें । यह सुधार किस प्रकार हो यह अमरीका में भी एक विवादास्पद मुद्दा है जबकि हम लोग तो उसकी तुलना में कई गुना पिछड़े हैं । अधिकांश वकीलों की दलील है - हमारी व्यावसायिक नैतिकता कहती है कि हमें अपने मुवक्किल को बचाना है, चाहे उसने कितना ही बड़ा गुनाह क्यों न किया हो । साथ ही वकील यह भी मानते है कि मुवक्किल को बचाने के लिए यदि झूठ का सहारा लेना पड़े तो बेशक लिया जाना चाहिए । व्यावसायिक नैतिकता की यह एक ऐसी दुहाई है जो मेरी और सामान्य जनता की समझ से परे है । आखिर वकील भी समाज में रहता है, समाज का अंग है और हमारे आसपास का समाज सच्चाई पर चलने वाला हो - इसके प्रति क्या वकीलों की कोई जिम्मेदारी नहीं ? आज वकीलों के अपनाए तीन हथकंडे ऐसे है जिनसे हमारी न्याय व्यवस्था अन्यायपरक हो रही है और लोकतंञ प्रणाली खोखली हो रही है । इसमें पहला हथकंडा है झूठ का सहारा लेना, दूसरा है कि फालतू मुद्दे निकाल कर कोर्ट का समय बर्बाद करना । तीसरा हथकंड़ा है अपने विरोधी गवाहों का चरिञ हनन करने का पूरा-पूरा प्रयास करना । यह तीनों ही कारनामे व्यावसायिक नैतिकता के नाम पर किए जाते हैं । लेकिन सवाल यह है कि जब वकील हमारे समाज का ही एक अंग है तो
क्या यह उनकी भी जिम्मेदारी नहीं कि समाज में सच्चाई और शीघ्र गति से न्याय प्रस्थापित करने में और चरिञ हनन के दुर्गुण का खात्मा करने में उनका भी योगदान हो ? फिर भी आज तक ऐसा
नहीं देखा गया कि किसी कोर्ट ने किसी वकील के इन तीन तरह के हथंकंड़ो के प्रति कड़ी कार्रवाई की है । शायद कोर्ट भी मानती है कि वकील यदि यह सब करते हैं तो कोई गलती नहीं ।
आज जनमानस में हवाला कांड से एक आशा सी बंध गई है । एक तीर की तरह उच्चतम न्यायालय का आदेश निकला और हवाला जांच पर पड़े हुए मोटे पर्दे को चीरता चला गया । सो लोगों को यह विश्र्वास हो गया कि भले ही कानून बनाने वाली व्यवस्था हवाला जैसे कांडों का पर्दाफाश नहीं कर पाई हो लेकिन अभी तक न्याय व्यवस्था और पञकारिता के खंभे तो बचे हुए हैं, लोकतंञ को सुरक्षित रखने के लिए लेकिन इस खुशफहमी में फंसी जनता को यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि हमारा सारा हौसला ऐसी इक्का-दुक्का घटना पर टिका होगा तो यह बड़ी चेतावनी हैं और जनता को अपने हक़ों के लिए जल्दी ही चेतना होगा । हम कैसे भुला दें कि अभी तक शेयर स्कैम, नकली शेयर बिक्री बोफोर्स आदि ऐसे कई कांड बचे है जिसमें गुनाहों की जांच या कोर्ट में पेशी या सुनवाई या सजा की कार्रवाई पूरी नहीं हुई है । अर्थात् कोर्ट भी हर जगह, हर केस में कारगर नहीं हो सकता है । इसके लिए जनता को ही चेतना है और माँग करनी है कि हमारे देश में जांच की कार्रवाई अधिक से अधिक पारदर्शी हो ।
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भ्रष्टाचार और घोटाले की रो.ज नई नई कहानी सामने आ रही है । जनता इन कहानियों से सिर्फ परेशान ही नहीं है, बल्कि यह सोचने लगी है कि यह सब कैसे और क्यों होता है तथा इससे निजात पाने का कोई उपाय है या नहीं। लेखक ने उन कारणों पर विस्तार से विचार किया है जिनकी वजह से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल होता है । सबसे बड़ी बाधा यह है कि किसी आरोप को अदालत में साबित कैसे किया जाए । --संपादक
- लीना मेहेंदले -
आज यदि जनता सोचती है कि सी. बी. आई. किसी बड़े व्यक्ति की पूरी जाँच नहीं करती तो फिर इसकी मांग भी जनता को ही करनी पड़ेगी और यह भी संहिता बनानी होगी कि जाँच की लेखाजोखा जल्दी से जल्दी और लगातार जनता के सामने आता रहे । इस जाँच को बलात्कार के समकक्ष नहीं माना जाना चाहिए और इसमें गुप्त रूप से सुनवाई की कोई गुजाइश नहीं होनी चाहिए । इसके लिए यह भी आवश्यक है कि जाँच करने वाली एजेंसी मल्टी-डिसिप्लिनरी हो । आज हालत यह है कि बाहरी आदमी चाहे लाख सिर पटक ले लेकिन जाँच पड़ताल का हक केवल पुलिस विभाग को और इस विभाग की वर्दी की सख्ती इतनी अधिक है कि कई बार अच्छे-अच्छे और ईमानदार पुलिस अफसर छटपटाकर रह जाते हैं और गुनहगारों के विरूद्ध जाँच का काम उन्हें रोक देना पड़ता है ।
बजट और घपला
हमारे आई. पी. सी. और सी. आर. पी. सी. में आर्थिक गुनाहों के संदर्भ में जो भी प्रणाली है वह बड़ी ढीली ढाली है । सोचने की बात है कि जिस देश का बजट ४०,००० करोड़ रूपए का है और जहाँ घपले भी उसी अनुपात में होते है यानी ३५०० करोड़ का घपला, १००० करोड़ का घपला आदि, जहाँ एक घपले का बजट हमारे राष्ट्रीय बजट, जितना बड़ा होता है वहाँ भी हम आर्थिक दुर्व्यवहार और घपले के गुनहगारों को ऐसी ही सजा दे सकते हैं जो नहीं के बराबर हैं । घर में सेंध लगाकर ट्रांजिस्टर सैट चुराने की सजा अधिक है और देश के लाखों रुपये का इनकम टैक्स डकार जाने की सजा उससे कम है । उस पर तुर्रा यह कि आर्थिक दुर्व्यवहार के केसों में सजा आज तक बहुत ही कम मिली है । आज भी हमारे देश में कंपनियाँ है जो गर्व से छपवाती है कि उनका लाभ इतने हजार करोड़ का है और आयकर भुगतान नहीं के बराबर । कुछ लोगों ने सरकार और इसके नीति नियमों को इस कदर काबू में रखा है कि लाभ तो हो जाता है और टैक्स भी नहीं चुकाना पड़ता है । तो फिर इसी के पीछे लोग उस कंपनी के कुछ और ज्यादा शेयर्स खरीद लेते है। कोई यह नहीं सोचता कि यह गलत हो रहा है। हर कोई यह सोचता हैं कि जब बाकी शेयर होल्ङर इसी ट्रिक के कारण अच्छा डिविडेंड ले रहे है और कुछ शेयर मैं भी लूँ । उधर शेयर घोटालों में भी तीन चार हजार करोड़ का स्कैम हो गया, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भी एक करोड़ रुपये रिश्र्वत देने का दावा किया गया और फिर भी न उस केस की कोई जाँच, न सुनवाई और न केस आगे बढ़ा ।
खैर, तो मुद्दा यह है कि हमारे देश में आर्थिक गुनाहों की सजा कोई अघिक नहीं होती । कल मान लो हवाला घपला साबित हो भी गया और कोर्ट में गुनाह भी साबित हो गया तो प्रस्तावित सजा क्या होगी ? यह सवाल लोगों को आज ही पूछना चाहिए कि आई. पी. सी. के किस सेक्शन में केस दर्ज हो रहा है और उसमें अघिकतम सजा क्या हो सकती है । एक महत्वपूर्ण मुद्दा और भी है ।
इस मामले के कागजात तो १९९० के आसपास से ही धीरे- धीरे इकट्ठे हो रहे हैं । अर्थात् प्रधानमंत्री को उन नामों की जानकारी भी जो जैन की लिस्ट में थे और जिनके विरूद्ध सी. बी. आई. कुछ और जानकारी भी जुटा पाई थी जैसे उनकी संपत्त्िा का ब्यौरा । यह सारे कागज प्रधानमंञी ने अवश्य देखें होंगे । फिर भी उन लोगों को मंञिमंडल में शामिल कर लिया । क्या जनता को यह जानने का हक नहीं कि ऐसा क्यों किया गया ? जनता तो चाहती है कि हर पक्ष में कम से कम पक्ष का हाईकमान ऐसा व्यक्तित्व हो जो नीति अनीति में फर्क करता है, और अपने पक्ष में केवल नीतिमान लोगों को ही लेता है । जनता चाहती तो है, लेकिन फिर आग्रह क्यों नहीं करती? पक्ष नेताओं से प्रश्न पूछ पाने का हक क्यों नहीं करती ? पक्ष नेताओं से प्रश्न पूछ पाने का हक क्यों नहीं मांगती ?
लोकतंत्र के स्तभ्भ
लोकशाही के चार स्तभ्भ होते है - कानून बनाने वाली संसद, देश चलाने वाली सरकार, जिससे मंञिमंडल और नौकरशाही शामिल है, न्याय व्यवस्था और पञकारिता। कानून बनाने वालों ने भी कभी इस बात को जरूरी नहीं समझा कि चुनावी कानूनों में सुधार किए जांए ताकि कौन किससे रुपये ले रहा है यह किताब जनता के सामने खुली हो । यह प्रश्न केवल चुनावी कानूनों का ही नहीं । धीरे - धीरे हमारे देश का कानून ऐसे बनने लगे है जिससे जानकारी का मूलभूत हक लोगों से छीना जा रहा है जो कि वास्तव में लोकतंञ की जान है । वही बात है सरकार की । उनके नियम भी वैसे ही बने है । उनके पास तो है समर्थन के लिए दो अन्य हथियार भी है - एक है गोपनीयता का और दूसरा सुरक्षा का । इन दोनों तर्कां को कई बार हास्यास्पद ढंग तक खींचकर सरकारी गैर-व्यवहार करने वाले बच निकलते हैं । अक्सर न्यायालय भी इन मुद्दों के कवच में लिपटी फ़ाइलों को छेङने से इंकार ही करते हैं ।
लेकिन जनता के लिए तिनके का सहारा इस बात से है कि कभी -कोई न्यायालय, कभी कोई पञकार, कभी कोई नौकरशाह, कभी कोई सामाजिक कार्यकर्ता इस बात को लेकर अड़ जाता है कि रूको, जनता का अपना हक जनता को वापिस सौंप दो । यह जब तक नहीं हो जाता, मैं लड़ता रहूंगा । यह लड़ाई धीरे धीरे जोर पकड़ती है । उठाया हुआ मुद्दा अपने आप में चाहे सही हो या गलत, लेकिन यदि उसमें यह मांग हो कि जनता को अमुक बात की जानकारी पाने का हक है, तो धीरे धीरे उस हक की आवा.ज उठाने वाले के पीछे लोग जमा हो ही जाते हैं । दुख इस बात का है कि आज तक कोई ऐसा ठोस केस सामने नहीं आया जिसमें समय रहते और पूरी तरह से
जनता को यह अधिकार मिल पाया हो और जो जानकारी मिली उसके चलते जनता ने ही देश को किसी गहन संकट से या प्रश्न से बचा लिया । अक्सर यह देखा गया है कि यह जानकारी सामने
आने में भी कई वर्ष लग जाते है । जनता इसके लिए अधिक सतर्क और अधिक आग्रही क्यों नहीं जबकि इसके अच्छे नतीजे को जनता देख चुकी है ? इस सिलसिले में एक छोटा उदाहरण पेश है। आजकल कई बड़े स्टेशनों पर रिजर्वेशन चार्ट लगे होते है कि कौन सी तिथि के लिए कौन सी गाड़ी में कितने स्थान उपलब्ध है । दूसरा नमूना भी है महाराष्ट्र में इंजीनियरिंग कॉलेज के नामांकन के नियम पांच - छह महीने पहले जाहिर किए जाते है, सभी अर्जी देने वाले विद्यार्थियों की लिस्ट चिपकाई जाती है और खुलेआम सब विद्यार्थियों के समक्ष मेधावी छाञों की लिस्ट के मुताबिक सीटों बंटवारा किया जाता है । यह कदम भी महाराष्ट्र शासन ने उठाया तो न्यायालय के आदेश से ही ।
लेकिन इससे विद्यार्थियों में अन्याय की भावना खत्म हो गई और न्यायालय में इस मुद्दे पर दाखिल होने वाली केस भी कम हो गए ।
कहने का अर्थ यह है कि इस प्रकार का कानून बनाने से जनता की सुविधा और जानकारी का हक सुरक्षित रहता है और किन कानूनों से नहीं, यह समझने की शक्ति और जनता को केंद्र बनाकर कानून बनाने कि सामर्थ्य दोनों ही हमारे शासनकर्ता भूल से गए है । इसमें यदि बड़ा हिस्सा राजनीतिक लोगों का है तो छोटा हिस्सा नौकरशाही का भी है । और कोई आश्श्रर्य नहीं कि हवाला कांड में कुछ अफ़सरों के नाम भी शामिल हों ।
आर्थिक अपराघियों के लिए कड़ी सजा हो
अब जो महत्वपूर्ण सुधार देश के नेतागण, नौकरशाही और न्यायपंडितों को तुरंत अपने हाथ में लेना चाहिए वह दो-तीन प्रकार का है । एक तो आर्थिक गुनहगारों की सजा कड़ी से कड़ी करने का सुधार । साथ ही आर्थिक गुनाहों की अच्छी खासी विवेचना । दूसरे कोर्ट में सुधार ताकि वकीलों पर यह बंधन हो को वे कोर्ट को सच्चाई प्रस्थापित करने में मदद करें । यह सुधार किस प्रकार हो यह अमरीका में भी एक विवादास्पद मुद्दा है जबकि हम लोग तो उसकी तुलना में कई गुना पिछड़े हैं । अधिकांश वकीलों की दलील है - हमारी व्यावसायिक नैतिकता कहती है कि हमें अपने मुवक्किल को बचाना है, चाहे उसने कितना ही बड़ा गुनाह क्यों न किया हो । साथ ही वकील यह भी मानते है कि मुवक्किल को बचाने के लिए यदि झूठ का सहारा लेना पड़े तो बेशक लिया जाना चाहिए । व्यावसायिक नैतिकता की यह एक ऐसी दुहाई है जो मेरी और सामान्य जनता की समझ से परे है । आखिर वकील भी समाज में रहता है, समाज का अंग है और हमारे आसपास का समाज सच्चाई पर चलने वाला हो - इसके प्रति क्या वकीलों की कोई जिम्मेदारी नहीं ? आज वकीलों के अपनाए तीन हथकंडे ऐसे है जिनसे हमारी न्याय व्यवस्था अन्यायपरक हो रही है और लोकतंञ प्रणाली खोखली हो रही है । इसमें पहला हथकंडा है झूठ का सहारा लेना, दूसरा है कि फालतू मुद्दे निकाल कर कोर्ट का समय बर्बाद करना । तीसरा हथकंड़ा है अपने विरोधी गवाहों का चरिञ हनन करने का पूरा-पूरा प्रयास करना । यह तीनों ही कारनामे व्यावसायिक नैतिकता के नाम पर किए जाते हैं । लेकिन सवाल यह है कि जब वकील हमारे समाज का ही एक अंग है तो
क्या यह उनकी भी जिम्मेदारी नहीं कि समाज में सच्चाई और शीघ्र गति से न्याय प्रस्थापित करने में और चरिञ हनन के दुर्गुण का खात्मा करने में उनका भी योगदान हो ? फिर भी आज तक ऐसा
नहीं देखा गया कि किसी कोर्ट ने किसी वकील के इन तीन तरह के हथंकंड़ो के प्रति कड़ी कार्रवाई की है । शायद कोर्ट भी मानती है कि वकील यदि यह सब करते हैं तो कोई गलती नहीं ।
आज जनमानस में हवाला कांड से एक आशा सी बंध गई है । एक तीर की तरह उच्चतम न्यायालय का आदेश निकला और हवाला जांच पर पड़े हुए मोटे पर्दे को चीरता चला गया । सो लोगों को यह विश्र्वास हो गया कि भले ही कानून बनाने वाली व्यवस्था हवाला जैसे कांडों का पर्दाफाश नहीं कर पाई हो लेकिन अभी तक न्याय व्यवस्था और पञकारिता के खंभे तो बचे हुए हैं, लोकतंञ को सुरक्षित रखने के लिए लेकिन इस खुशफहमी में फंसी जनता को यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि हमारा सारा हौसला ऐसी इक्का-दुक्का घटना पर टिका होगा तो यह बड़ी चेतावनी हैं और जनता को अपने हक़ों के लिए जल्दी ही चेतना होगा । हम कैसे भुला दें कि अभी तक शेयर स्कैम, नकली शेयर बिक्री बोफोर्स आदि ऐसे कई कांड बचे है जिसमें गुनाहों की जांच या कोर्ट में पेशी या सुनवाई या सजा की कार्रवाई पूरी नहीं हुई है । अर्थात् कोर्ट भी हर जगह, हर केस में कारगर नहीं हो सकता है । इसके लिए जनता को ही चेतना है और माँग करनी है कि हमारे देश में जांच की कार्रवाई अधिक से अधिक पारदर्शी हो ।
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21 दिल्ली में महिला सुरक्षा
दिल्ली में महिला सुरक्षा
-- लीना मेहेंदले
पिछले एक महीने में दिल्ली शर्म में डूबी हुई है। बलात्कार की घटनाओं से सहम जाना, उनकी निंदा करना आदि अपनी जगहों पर हैं। लेकिन जब महिला विरोधी अपराधियों के हाथ विदेशी दूतावास की महिलाओं तक पहुँचते हैं तो पूरे राष्ट्र को शर्म में डूब जाना पड़ता है। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के सुरक्षाकर्मियों द्वारा किये गये सामूहिक बलात्कार की शर्म से दिल्लीवासी अभी उभरे भी नहीं थे कि संसार भर के दूसरे देशों के आगे भी शर्म उठानी पडी। फिर एक बार जोर शोर से चर्चा हुई कि दिल्ली कितनी सुरक्षित है। कई अखबारों ने छापना आरंभ कर दिया कि यह शहर महिलाओं के लिये सुरक्षित नही है। इसी विषय को सिद्ध करने के लिए कई चर्चाएँ आयोजित हुईं।
लेकिन अभी तक किसी ने ऐसी चर्चा नही आयोजित की कि दिल्ली में महिलाएँ किस प्रकार सुरक्षित रह सकती हैं और न यही चर्चा सुनने में आई कि दिल्ली को महिलाओं के लिये सुरक्षित कैसे बनाया जाय। गौर से देखें तो ये दोनों प्रश्न अलग अलग हैं। महिलाएँ कैसे सुरक्षित रह सकती हैं? कइयों की मान्यता है कि यह प्रश्न बड़ा आसान है। इसका उत्तर बड़ा सीधा सादा और जाना माना है। महिलाओं को सुरक्षित रखना है, उन्हें बलात्कार की जघन्यता से बचाना है, तो उन्हें घर के अंदर रखो- बाहर मत निकलने दो।
कितना सरल, सुंदर, सुलभ उपाय है! औरत घर के अंदर कितनी अच्छी लगती है- कितनी सुरक्षित रहती है। उनसे सड़क पर, काम के लिए, अकेले, मत निकलने दो- खासकर शाम के बाद तो बिल्कुल ही नही। क्या जरूरत है औरतों से बाहरी काम करवाने की। वे घर के अंदर रहें, घर के कामकाज को देखें। गृहलक्ष्मी ही रहें।
लेकिन क्या घर के अंदर वे पूरी सुरक्षित हैं? शायद नहीं- आजकल रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार की घटनाएँ भी तेजी से सामने आ रही हैं। तो अब क्या किया जाए? इसका भी सरल एवं सुंदर उत्तर है। उन्हें बाहरी कमरों में मत आने दो। रसोईघर एवं शयनघर के आगे मत आने दो। उन्हें पडदे, घूंघट या बुरके में रखो। ताकि घर के अंदर भी वे आदमियों के सामने न पडें। औरत को असूर्यम्पश्या होना चाहिए- वह जिसे सूरज ने भी न देखा हो। वह उजाले में कभी नही आएगी तो यह खतरा कम हो जायगा कि कोई उसे देखेगा और उसे अपनी हवस का शिकार बनाएगा। औरत की जगह मुकर्रर कर दो- घर के किसी अंदरूनी कमरे के एक अंधेरे कोने में- फिर वे सुरक्षित रहेगी।
लेकिन क्या फिर भी वह पूरी तरह सुरक्षित रहेगी? शायद नही। आखिर अंदरूनी कमरे के अंधेरे कोने में भी कोई न कोई उसे देख ही लेगा- उस पर बलात्कार कर ही लेगा। इससे भी सुरक्षित जगह चाहिए।
और ऐसी जगह है भी। अति सुरक्षित जगह। जहाँ मौत के आने तक हर औरत अत्यंत सुरक्षित रह सकती है। वह जगह है गर्भ के अन्दर। वहाँ बलात्कार का कोई डर नही है। औरत को वहीं रहने दो- वहीं मरने दो। वहाँ से बाहर मत निकलने दो। निकलने के दिन पूरे हों, इससे पहले उसकी मौत का इंतजाम कर दो। भला हो डॉक्टर कम्यूनिटी का। कानून-व्यवस्था की रक्षा में उनका कितना बड़ा योगदान हो सकता है। कर दें वे स्त्री-भ्रूण हत्या। न होगी औरत, न होंगे बलात्कार। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
यह सब पढ़कर क्या ऐसा नही लगता कि यह गलत निष्कर्ष है और इसके पीछे जरूर कोई गलती हुई है। जी हाँ। इसीलिए वह दूसरा प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि दिल्ली को किस तरह महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाया जा सकता है। सो सवाल है दिल्ली को सुधारने का न कि महिलाओं को घर के अंदर बंद रखने का। सवाल है दिल्ली को अधिक सौहार्दपूर्ण बनाने का और साथ ही अपराधियों को तत्परता से पकड़ने और दंड देने का। आज की दिल्ली औरतों के घूमने-फिरने या घर से बाहर निकलने के लिए माकूल ढंग से नही बनी है।
हम साऊथ दिल्ली को ही लें। यह एक खूबसूरती से प्लान किया हुआ इलाका है जिसमें चौडी सडकें हैं, पार्क हैं, शिक्षा-संस्थाएँ हैं, फ्लाई ओवर हैं। इसी इलाके में सरकारी दफ्तर हैं- ढेर सारे दफ्तर- बड़े-बड़े ओहदों वाले दफ्तर- जिनमें राष्ट्रपति भवन, नार्थ व साऊथ ब्लाक, तमाम मंत्रालय, विदेशी दूतावास, राज्यों के निवास इत्यादि भी हैं। इन सब की सुंदरता बनाए रखने के लिए यह खास ध्यान दिया गया है कि यहाँ रहाइशी इलाकें अधिक न हों। लोक संख्या कम हो। चीजें बेचने वालों की भीड़ न हो। और
उससे भी बड़ी बात यह कि हर घर, हर बिल्डिंग एक लम्बे चौड़े क्षेत्र में बनाई जाए जहाँ उसकी विशालता और विस्तार भी उसकी खूबसूरती का एक अंग हो।
एक आर्किटेक्ट की निगेहवानी से यह सब कुछ बिल्कुल सही है। लेकिन यही बातें हैं जो असामाजिक तत्वों का काम आसान कर देती हैं।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि दिल्ली को घूमने फिरने के योग्य बनाया जाय और औरतें भी घर से बाहर निकलकर बड़ी तादाद में घूमें। पैदल चलने को और साइकलिंग को बढावा दिया जाय।
पुणे या बैंगलोर शहर में कई अकेली औरतें घूमने निकल जाती हैं- किसी भी सड़क पर केवल घूमने के शौक से निकली औरतें देखी जा सकती हैं। कई परिवार और यार-दोस्तों की टोलियाँ घूमती हुई देखी जा सकती हैं। लेकिन दिल्ली में ऐसा नही दीखता। यदि दिल्ली की कॉलनीज में रहने वाले लोग एक अभियान के तौर पर अपने अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ सुबह-शाम पैदल या साइकिल पर घूमने लगें तो कैसा हो?
मुझे लगता है कि यदि दिल्ली को महिलाओं के प्रति सुरक्षित बनाना है तो चार पांच काम किए जाने चाहिए। सड़कों व पार्कों में अधिक से अधिक लोग घूमने निकलें- इसे बढावा दिया जाय। प्रभात फेरियाँ भी निकाली जा सकती हैं। दिल्ली में अच्छी साइकिलिंग का इन्तजाम किया जाय और इसे बढावा दिया जाय। महिलाओं के प्रति अपराधों को, खासकर छेड़खनी के मामलों को तत्काल दंड दिया जाय। इसके लिए मौके पर ही जुर्माने के अधिकार पुलिस को दिए जाएं। खासतौर से अभियान चलाया जाय ताकि सार्वजनिक वाहनों में होने वाले छेड़छाड़ के अपराधों को तत्काल दंडित किया जा सके। बलात्कार के अपराधी ऐसे ही नही बन जाते। अक्सर वे शुरूआत छेड़खानी से करते हैं। कई छेड़खानियाँ करने के बाद भी जब वे दंडित नही होते तो धीरे धीरे उन्हें शह मिलती जाती है और वे बड़ा अपराध करने का दुःसाहस धारण करने लगते हैं।
देशभर की पुलिस से नॅशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो ने जो आँकडे इकट्ठे किये वे बताते हैं कि सन् २००१ में दिल्ली में बलात्कार की ३८१ घटनाएँ दर्ज हुईं, किडनॅपिंग की १६२७ जबकि लैंगिक छेड़छाड़ की घटनाएँ केवल ५०२ दर्ज हुईं। ये आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली में छेड़छाड़ की घटनाओं को न ही गंभीरता से लिया जाता है और न दर्ज कराया जाता है। जब कि पूरे देश में छेड़छाड़ की करीब पैंतीस हजार घटनाएँ दर्ज हुईं- यानी दिल्ली से सत्तर गुनी अधिक, बलात्कार के अपराध में सोलह हजार यानी दिल्ली से चालीस गुनी अधिक घटनाएँ दर्ज हुईं। अतः आवश्यक है कि छेड़छाड़ की घटनाओं को हम प्रभावी ढंग से दर्ज करायें और तत्काल दंडित भी करें। यही नही, छेड़छाड़ की घटना का विरोध करने वालों की यथोचित सराहना भी होनी चाहिए।
कार से चलने वालों की सुविधा ध्यान में रखते हुए दिल्ली की सड़कों पर जगह जगह उंचे उंचे रोड डिवायडर लगा दिए गए हैं। अर्थात यदि मैं किसी रास्ते से गुजरते हुए देख भी लूँ कि परली तरफ से चलने वाली किसी महिला के साथ छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार हो रहा है, तब भी मैं शीघ्रता से वहाँ पहुँचकर अपराध को रोकने का कोई उपाय नही कर सकती। दिल्ली के आर्किटेक्चर की प्लानिंग में यह भी एक बड़ी कमी है जिसकी तरफ किसी का ध्यान नही है।
यह भी जरूरी है कि जहाँ कहीं संगठन हैं, वहाँ उनके बड़े अधिकारी ज्यूनियर्स के कार्यकलापों का ध्यान रखें। राष्ट्रपति भवन के सुरक्षा कर्मी- या होमगार्ड के जवान या पुलिसकर्मी- जब बलात्कार जैसे मामलों में दोषी पाए जाते हैं तो पूछा जाना चाहिए कि उनके सिनियर्स क्या कर रहे थे। कई वरिष्ठ अधिकारियों का अपना वैल्यू सिस्टम ही ऐसा होता है जिससे उनके ज्यूनियर्स को जाने अनजाने लगने लगता है कि महिलाओं से दुर्व्यवहार करना ही मर्दानगी है। इस मानसिकता को बदलने के लिए सरकार को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। यदि पुलिस में अधिक संख्या में महिलाएँ आने लगें और हर स्तर पर आने लगें तो यह मानसिकता थोड़ी बदल सकती है।
महीने पहले हुई घटना के बाद भी बलात्कार और दुर्व्यवहार के अपराध थमे नही हैं। पुलिस उलझ कर रह गई है चुनावी इन्तजाम में। नेताओं के भाषण, पदयात्रा, रैलियाँ, जनसभाएँ जोरों पर हैं। किसी नेता या पार्टी ने अपने अजेंडे में नही कहा है कि दिल्ली को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने का कोई सोच उनके दिमाग में है। क्या दिल्ली की महिलाएँ अपने अमूल्य बोट का धौंस जमाकर उन्हें इसके लिए घेर सकती हैं?
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-- लीना मेहेंदले
पिछले एक महीने में दिल्ली शर्म में डूबी हुई है। बलात्कार की घटनाओं से सहम जाना, उनकी निंदा करना आदि अपनी जगहों पर हैं। लेकिन जब महिला विरोधी अपराधियों के हाथ विदेशी दूतावास की महिलाओं तक पहुँचते हैं तो पूरे राष्ट्र को शर्म में डूब जाना पड़ता है। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के सुरक्षाकर्मियों द्वारा किये गये सामूहिक बलात्कार की शर्म से दिल्लीवासी अभी उभरे भी नहीं थे कि संसार भर के दूसरे देशों के आगे भी शर्म उठानी पडी। फिर एक बार जोर शोर से चर्चा हुई कि दिल्ली कितनी सुरक्षित है। कई अखबारों ने छापना आरंभ कर दिया कि यह शहर महिलाओं के लिये सुरक्षित नही है। इसी विषय को सिद्ध करने के लिए कई चर्चाएँ आयोजित हुईं।
लेकिन अभी तक किसी ने ऐसी चर्चा नही आयोजित की कि दिल्ली में महिलाएँ किस प्रकार सुरक्षित रह सकती हैं और न यही चर्चा सुनने में आई कि दिल्ली को महिलाओं के लिये सुरक्षित कैसे बनाया जाय। गौर से देखें तो ये दोनों प्रश्न अलग अलग हैं। महिलाएँ कैसे सुरक्षित रह सकती हैं? कइयों की मान्यता है कि यह प्रश्न बड़ा आसान है। इसका उत्तर बड़ा सीधा सादा और जाना माना है। महिलाओं को सुरक्षित रखना है, उन्हें बलात्कार की जघन्यता से बचाना है, तो उन्हें घर के अंदर रखो- बाहर मत निकलने दो।
कितना सरल, सुंदर, सुलभ उपाय है! औरत घर के अंदर कितनी अच्छी लगती है- कितनी सुरक्षित रहती है। उनसे सड़क पर, काम के लिए, अकेले, मत निकलने दो- खासकर शाम के बाद तो बिल्कुल ही नही। क्या जरूरत है औरतों से बाहरी काम करवाने की। वे घर के अंदर रहें, घर के कामकाज को देखें। गृहलक्ष्मी ही रहें।
लेकिन क्या घर के अंदर वे पूरी सुरक्षित हैं? शायद नहीं- आजकल रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार की घटनाएँ भी तेजी से सामने आ रही हैं। तो अब क्या किया जाए? इसका भी सरल एवं सुंदर उत्तर है। उन्हें बाहरी कमरों में मत आने दो। रसोईघर एवं शयनघर के आगे मत आने दो। उन्हें पडदे, घूंघट या बुरके में रखो। ताकि घर के अंदर भी वे आदमियों के सामने न पडें। औरत को असूर्यम्पश्या होना चाहिए- वह जिसे सूरज ने भी न देखा हो। वह उजाले में कभी नही आएगी तो यह खतरा कम हो जायगा कि कोई उसे देखेगा और उसे अपनी हवस का शिकार बनाएगा। औरत की जगह मुकर्रर कर दो- घर के किसी अंदरूनी कमरे के एक अंधेरे कोने में- फिर वे सुरक्षित रहेगी।
लेकिन क्या फिर भी वह पूरी तरह सुरक्षित रहेगी? शायद नही। आखिर अंदरूनी कमरे के अंधेरे कोने में भी कोई न कोई उसे देख ही लेगा- उस पर बलात्कार कर ही लेगा। इससे भी सुरक्षित जगह चाहिए।
और ऐसी जगह है भी। अति सुरक्षित जगह। जहाँ मौत के आने तक हर औरत अत्यंत सुरक्षित रह सकती है। वह जगह है गर्भ के अन्दर। वहाँ बलात्कार का कोई डर नही है। औरत को वहीं रहने दो- वहीं मरने दो। वहाँ से बाहर मत निकलने दो। निकलने के दिन पूरे हों, इससे पहले उसकी मौत का इंतजाम कर दो। भला हो डॉक्टर कम्यूनिटी का। कानून-व्यवस्था की रक्षा में उनका कितना बड़ा योगदान हो सकता है। कर दें वे स्त्री-भ्रूण हत्या। न होगी औरत, न होंगे बलात्कार। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
यह सब पढ़कर क्या ऐसा नही लगता कि यह गलत निष्कर्ष है और इसके पीछे जरूर कोई गलती हुई है। जी हाँ। इसीलिए वह दूसरा प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि दिल्ली को किस तरह महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाया जा सकता है। सो सवाल है दिल्ली को सुधारने का न कि महिलाओं को घर के अंदर बंद रखने का। सवाल है दिल्ली को अधिक सौहार्दपूर्ण बनाने का और साथ ही अपराधियों को तत्परता से पकड़ने और दंड देने का। आज की दिल्ली औरतों के घूमने-फिरने या घर से बाहर निकलने के लिए माकूल ढंग से नही बनी है।
हम साऊथ दिल्ली को ही लें। यह एक खूबसूरती से प्लान किया हुआ इलाका है जिसमें चौडी सडकें हैं, पार्क हैं, शिक्षा-संस्थाएँ हैं, फ्लाई ओवर हैं। इसी इलाके में सरकारी दफ्तर हैं- ढेर सारे दफ्तर- बड़े-बड़े ओहदों वाले दफ्तर- जिनमें राष्ट्रपति भवन, नार्थ व साऊथ ब्लाक, तमाम मंत्रालय, विदेशी दूतावास, राज्यों के निवास इत्यादि भी हैं। इन सब की सुंदरता बनाए रखने के लिए यह खास ध्यान दिया गया है कि यहाँ रहाइशी इलाकें अधिक न हों। लोक संख्या कम हो। चीजें बेचने वालों की भीड़ न हो। और
उससे भी बड़ी बात यह कि हर घर, हर बिल्डिंग एक लम्बे चौड़े क्षेत्र में बनाई जाए जहाँ उसकी विशालता और विस्तार भी उसकी खूबसूरती का एक अंग हो।
एक आर्किटेक्ट की निगेहवानी से यह सब कुछ बिल्कुल सही है। लेकिन यही बातें हैं जो असामाजिक तत्वों का काम आसान कर देती हैं।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि दिल्ली को घूमने फिरने के योग्य बनाया जाय और औरतें भी घर से बाहर निकलकर बड़ी तादाद में घूमें। पैदल चलने को और साइकलिंग को बढावा दिया जाय।
पुणे या बैंगलोर शहर में कई अकेली औरतें घूमने निकल जाती हैं- किसी भी सड़क पर केवल घूमने के शौक से निकली औरतें देखी जा सकती हैं। कई परिवार और यार-दोस्तों की टोलियाँ घूमती हुई देखी जा सकती हैं। लेकिन दिल्ली में ऐसा नही दीखता। यदि दिल्ली की कॉलनीज में रहने वाले लोग एक अभियान के तौर पर अपने अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ सुबह-शाम पैदल या साइकिल पर घूमने लगें तो कैसा हो?
मुझे लगता है कि यदि दिल्ली को महिलाओं के प्रति सुरक्षित बनाना है तो चार पांच काम किए जाने चाहिए। सड़कों व पार्कों में अधिक से अधिक लोग घूमने निकलें- इसे बढावा दिया जाय। प्रभात फेरियाँ भी निकाली जा सकती हैं। दिल्ली में अच्छी साइकिलिंग का इन्तजाम किया जाय और इसे बढावा दिया जाय। महिलाओं के प्रति अपराधों को, खासकर छेड़खनी के मामलों को तत्काल दंड दिया जाय। इसके लिए मौके पर ही जुर्माने के अधिकार पुलिस को दिए जाएं। खासतौर से अभियान चलाया जाय ताकि सार्वजनिक वाहनों में होने वाले छेड़छाड़ के अपराधों को तत्काल दंडित किया जा सके। बलात्कार के अपराधी ऐसे ही नही बन जाते। अक्सर वे शुरूआत छेड़खानी से करते हैं। कई छेड़खानियाँ करने के बाद भी जब वे दंडित नही होते तो धीरे धीरे उन्हें शह मिलती जाती है और वे बड़ा अपराध करने का दुःसाहस धारण करने लगते हैं।
देशभर की पुलिस से नॅशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो ने जो आँकडे इकट्ठे किये वे बताते हैं कि सन् २००१ में दिल्ली में बलात्कार की ३८१ घटनाएँ दर्ज हुईं, किडनॅपिंग की १६२७ जबकि लैंगिक छेड़छाड़ की घटनाएँ केवल ५०२ दर्ज हुईं। ये आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली में छेड़छाड़ की घटनाओं को न ही गंभीरता से लिया जाता है और न दर्ज कराया जाता है। जब कि पूरे देश में छेड़छाड़ की करीब पैंतीस हजार घटनाएँ दर्ज हुईं- यानी दिल्ली से सत्तर गुनी अधिक, बलात्कार के अपराध में सोलह हजार यानी दिल्ली से चालीस गुनी अधिक घटनाएँ दर्ज हुईं। अतः आवश्यक है कि छेड़छाड़ की घटनाओं को हम प्रभावी ढंग से दर्ज करायें और तत्काल दंडित भी करें। यही नही, छेड़छाड़ की घटना का विरोध करने वालों की यथोचित सराहना भी होनी चाहिए।
कार से चलने वालों की सुविधा ध्यान में रखते हुए दिल्ली की सड़कों पर जगह जगह उंचे उंचे रोड डिवायडर लगा दिए गए हैं। अर्थात यदि मैं किसी रास्ते से गुजरते हुए देख भी लूँ कि परली तरफ से चलने वाली किसी महिला के साथ छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार हो रहा है, तब भी मैं शीघ्रता से वहाँ पहुँचकर अपराध को रोकने का कोई उपाय नही कर सकती। दिल्ली के आर्किटेक्चर की प्लानिंग में यह भी एक बड़ी कमी है जिसकी तरफ किसी का ध्यान नही है।
यह भी जरूरी है कि जहाँ कहीं संगठन हैं, वहाँ उनके बड़े अधिकारी ज्यूनियर्स के कार्यकलापों का ध्यान रखें। राष्ट्रपति भवन के सुरक्षा कर्मी- या होमगार्ड के जवान या पुलिसकर्मी- जब बलात्कार जैसे मामलों में दोषी पाए जाते हैं तो पूछा जाना चाहिए कि उनके सिनियर्स क्या कर रहे थे। कई वरिष्ठ अधिकारियों का अपना वैल्यू सिस्टम ही ऐसा होता है जिससे उनके ज्यूनियर्स को जाने अनजाने लगने लगता है कि महिलाओं से दुर्व्यवहार करना ही मर्दानगी है। इस मानसिकता को बदलने के लिए सरकार को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। यदि पुलिस में अधिक संख्या में महिलाएँ आने लगें और हर स्तर पर आने लगें तो यह मानसिकता थोड़ी बदल सकती है।
महीने पहले हुई घटना के बाद भी बलात्कार और दुर्व्यवहार के अपराध थमे नही हैं। पुलिस उलझ कर रह गई है चुनावी इन्तजाम में। नेताओं के भाषण, पदयात्रा, रैलियाँ, जनसभाएँ जोरों पर हैं। किसी नेता या पार्टी ने अपने अजेंडे में नही कहा है कि दिल्ली को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने का कोई सोच उनके दिमाग में है। क्या दिल्ली की महिलाएँ अपने अमूल्य बोट का धौंस जमाकर उन्हें इसके लिए घेर सकती हैं?
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सोमवार, 19 जुलाई 2010
14 प्लेग का भय एक हतोत्साही मानसिकता
प्लेग का भय एक हतोत्साही मानसिकता
दै. हिन्दुस्तान, दिल्ली, सप्टें. 1995
बात है बहुत छोटी सी, पर पिछले हफते से बतंगड़ बनी हुई है। वह है प्लेग। वैसे ईमानदारी की बात तो यह है कि पिछले दिन मुझे भी डर लगा था।लेकिन मेरा जो डर पहले दिन उतर गया वह औरों के दिमाग में अभी तक मौजूद है। यह अंतर क्योंकर है?
२२ सिंतबर की शाम मैं कार्यालयीन कामकाजवश बडौदा पहुंची। मेरे साथ महाराष्ट्र के एडीशनल डायरेक्टर आफॅ हेल्थ भी थे। हमने बड़ौदा शहर का एक लंबा चक्कर लगाया तो पता चला कि ८-१० दिनों पहले गुजरात में जो भयानक बाढ़ आई थी उसने बड़ौदा में भी अपनी तबाही का रंग दिखाया था। बेसमेंट की बिल्डिंगें, जिनमें कई दुकानें थीं, वहां सवार्धिक हानि हुई। गलिसां , रास्ते कचरे के ढेर से भर गये। वह ढेर अब तक साफ नहीं हुए-प्रायःयही हाल अन्य शहरों में रहा होगा। कई बार दूर-दराज से पानी के रेले में बहकर लाशें भी आईं जो शहर में जगह-जगह अटक कर रह गई। धीरे-धीरे पाली कम हुआ लेकिन लाशें तुरंत हटा पाना संभव नहीं हुआ था। बहरहाल, कुछ ऐसा ही दृश्य सूरत में भी रहा होगा।
२३ की सुबह सारे गुजराती अखबारों में सूरत में प्लेग शीर्षक की र्क खबरें थीं। कोई मृतकों की संख्या १४ बताता था, कोई चालीस तो कोई चार सौ। मेरे दिमाग में वे सारे वर्णन कौंध गये जो कि १९२६ के प्लेग के विषय में पढ़े थे-खासकर उस प्लेग के कारण पूना में अंग्रेजी सरकार के अत्याचार के जो कांड हुए थे-वह भी। यदि आज भी प्लेग की संहारकता उसी प्रकार की हुई तो क्या हमारी सरकार को भी प्लेग का फैलाव रोकने के लिए वही ज्यादती करनी पड़ेगी? और जबकि मैं सरकार में एक उच्च पद पर हूं, तो मेरी भूमिका क्या होगी?
मैंने डा.वानेरे से पूछा - अब क्या होगा? उनका उत्तर था-टेट्रासाइक्लिन। उन्होने समझाया कि १९२६ में जब प्लेग की महामारी फैली, तब टेट्रासाइक्लिन या एण्टीबायोब्कि का अविष्कार नहीं हुआ था। आज यह ज्ञान है और गोलियां हैं। बस सीधा-सा उपाय है कि मरीज की टेट्रासाइक्लिन का एक कोर्स करा दो - वह ठीक हो जाएगा। यथासंभव उसे बाकी लोगों से अलग रखो-ताकि अन्य लोगों को इंफेक्शन होने की संभावना कम हो, और जैसा कि हर बैक्टीरियल इंफेक्शन में होता है, बुखार आ गया तो ७-९ दिन रहेगा, उतने दिन धैर्य रखो। है न सीधी-सी बात। बस इतनी-सी बात कोई सुरत के लोागों को समझा दे, कूड़े-कचरे के ढेर उठवा दे, हो गया प्लेग का किस्सा खत्म। तभी किसी ने कहा-टेट्रासाइक्लिन के साइड इफेक्टस भी है। तो चलो उसके साथ विटामिन ए.बी. कर गोलियां भी खाओ और यदि अपना खुद का बाडी रेजिस्टेन्स अच्छा है तो प्लेग वैसे भी पास नहीं फटकेगा। लेकिन शाम होते होते सारा चित्र बदल गया। धुलिया के कलेक्टर तब हमारे साथ थे। उनके लिउ संदेशा था कि सुरत से लोग भारी संख्या में धुलिया आ रहे है, उनका क्या किया जाए? कलेक्टर ने मेरी ओर देखा। हमने तय किया कि बॉर्डर सील नही करना है। आखिर यह कोई जानलेवा बीमारी तो रही नहीं। जिन्हें यह बात ठीक से समझाई नहीं जा सकी, वही सूरत से भागे है। वे बीमार भी नही है -लेकिन बीमारी के कैरियर हो सकते है, सो उन पर निगरान रखनी होगी। फिर पता चला कि सुरत, बड़ौदा और अहमदाबाद में भी बाजार से टेट्रासाइक्लिन लुप्त हो गया है। वैसी हालत में अच्छा ही है कि ये लोग दूसरी जगह चले जाए जहाँ दवाई मिलना दुश्र्वार हो।
शनिवार को मुंबई आकर मैंने अपनी डिवीजन के तीनों कलेक्टरों से बात की जिनका जिला बॉर्डर गुजरात से लगा हुआ है। जलगांव कलेक्टर ने भ्सुसावल - सुरत लाइन के हर रेलवे स्टेशन पर गुजरात से आने वालों के लिए मेडिकल चैक पोस्ट रखे थे। धुलिया कलेक्टर ने धुलिया में स्कुल,कालेज और सिनेमा शो बंद करवाए और हर रेलवे स्टेशन और हर प्रमुख बस अड्डों पर मेडिकल चैक पोस्ट लगवाए। नासिक कलेक्टा ने भी मेडिकल टीमें बनाकर पेठ और सुरगना - दोनों तहसीलों में चार चैक पोस्ट पर चैकिंग करवाई।
अगले चार दिनों में हर जगह बी.एच.सी. या डी.टी.सूप्रेइंग करवाया , यह व्यवस्था की गई कि टेट्रासाइक्लिन बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो। तीनों कलेक्टरों ने प्रेस और आकाशवाणी के मार्फत लोगों को बताया कि सरकार के पास किस-किस बात की उपलब्धता है-अर्थात दवाइयां, बी.एच.सी.पावडर , कितने लोग गुजरात से आए, कितनों के मेडिकल टैस्ट हुए, कितने बीमार पाए गए, किताने बीमारों का बॅल्ड टेस्टिंग किया - उसमें कितनों प्लेग बाधित निकले, कितने चूहे मरे, इत्यादि। चौबीस से तीस तारीख तक छः दिनों में सूरत से करीब साठ हजार लोग इन तीन जिलों में पहुंचे जिनमें से करीब पांस सौ को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उन्हें टेट्रासाइक्लिन दिया गया और बल्ड सेम्पलिंग भी करवरना पड़ा। हालांकि इसकी रिपोर्ट आने में एक या दो दिन लग जाते हैख् फिर भी कुल प्लेग के जीवाणु पाए जाने वाले पचास से भी कम निकले जब कि मुत्यु किसी की भी नहीं हुई।
सबसे बड़ा डर था कि शायद लोग अपनी बीमारी छिपाने की कोशिश करेंगे। जिनके दिल में पिछले प्लेग के
दिनों का भय है और जो अपनी अशिक्षा या अज्ञान के कारण नहीं जानते कि अब प्लेग एक आसानी से इलाज की जाने वाली बीमारी है,वही इसे छिपाना चाहेंगे। लेकिन यदि उन्हें विश्र्वास दिलाया जा सके कि इसमें डरने जैसा कुछ नहीं है, तो लोग इसे छिपाना नहीं चाहेंगे न ही इतने भयग्रस्त होंगे। उपरोक्त आंकडे भर में चार-पांच सौ लोग तो यों भी बीमार पड़ ही जाते हैं। इसी से मुझे लगता है कि यह पेनिक की, घबराहट की नौबत निराधार थी। थोड़ी सही जानकारी लोगों को पहले ही दिन मिल जाती तो लोग इतने भयभीत नहीं होते।
पर एक क्षेत्र ऐसा है जहां वाकई बात का बतंगड़ , राई का पर्वत बन गया। हमारे लोगों का अज्ञान और हमारे शहरों की सफाई कितने छोटे से दो विषय हैं। लेकिन आज प्रायः हर शहर का प्रशासन इस एक मामले में कमजोर पड़ गया है। सूरत में सफाई नहीं हुई, तो बीमारी फैली। जनता को इलाज पता नहीं था तो लोग-बाग भागे-बंबई गए, दिल्ली गए, धुलिया और नासिक भी गए। यदि वहां की सफाई पहले ही अच्छी तरह होती तो डर की कोई बसत नहीं थी। लेकिन चूंकि पता था कि सफाई डांवाडोल है, इसलिए लोग भी डर गए। घबराहट फैली, चर्चा होने लगी और नतीजा यह हुआ कि तमाम अंतर्राष्ट्रीय हवाई कंपनियों ने भारत से आने'जाने वाली फाइट्रस पर रोक लगा दी। सूरत के हीरों के व्यापार को जितना नुकसान हुआ,टेट्रासाइक्लिन या बी.एच.सी.के लिए शहरी प्रशासन को जितना पैसा खर्च करना पड़ा उससे कई गुना अधिक नुकसान इस बात से हुआ कि विदेश व्यापार घटा और वापस नार्मल पर आने के लिए दो-तीन महीने लग जाएंगे।
हमारे रोजमर्रा जीवन का अभिन्न अंग है हमारी उदासीनता और निष्क्रियता, जिसके चलते न हमने कभी शहरों की गंदगी के प्रति आवाज उठाई और न कभी सरकार से विस्तृत जानकारी पाने के लिए। आज उसी ने हमारा इतना नुकसान कर दिया।
दै. हिन्दुस्तान, दिल्ली, सप्टें. 1995
बात है बहुत छोटी सी, पर पिछले हफते से बतंगड़ बनी हुई है। वह है प्लेग। वैसे ईमानदारी की बात तो यह है कि पिछले दिन मुझे भी डर लगा था।लेकिन मेरा जो डर पहले दिन उतर गया वह औरों के दिमाग में अभी तक मौजूद है। यह अंतर क्योंकर है?
२२ सिंतबर की शाम मैं कार्यालयीन कामकाजवश बडौदा पहुंची। मेरे साथ महाराष्ट्र के एडीशनल डायरेक्टर आफॅ हेल्थ भी थे। हमने बड़ौदा शहर का एक लंबा चक्कर लगाया तो पता चला कि ८-१० दिनों पहले गुजरात में जो भयानक बाढ़ आई थी उसने बड़ौदा में भी अपनी तबाही का रंग दिखाया था। बेसमेंट की बिल्डिंगें, जिनमें कई दुकानें थीं, वहां सवार्धिक हानि हुई। गलिसां , रास्ते कचरे के ढेर से भर गये। वह ढेर अब तक साफ नहीं हुए-प्रायःयही हाल अन्य शहरों में रहा होगा। कई बार दूर-दराज से पानी के रेले में बहकर लाशें भी आईं जो शहर में जगह-जगह अटक कर रह गई। धीरे-धीरे पाली कम हुआ लेकिन लाशें तुरंत हटा पाना संभव नहीं हुआ था। बहरहाल, कुछ ऐसा ही दृश्य सूरत में भी रहा होगा।
२३ की सुबह सारे गुजराती अखबारों में सूरत में प्लेग शीर्षक की र्क खबरें थीं। कोई मृतकों की संख्या १४ बताता था, कोई चालीस तो कोई चार सौ। मेरे दिमाग में वे सारे वर्णन कौंध गये जो कि १९२६ के प्लेग के विषय में पढ़े थे-खासकर उस प्लेग के कारण पूना में अंग्रेजी सरकार के अत्याचार के जो कांड हुए थे-वह भी। यदि आज भी प्लेग की संहारकता उसी प्रकार की हुई तो क्या हमारी सरकार को भी प्लेग का फैलाव रोकने के लिए वही ज्यादती करनी पड़ेगी? और जबकि मैं सरकार में एक उच्च पद पर हूं, तो मेरी भूमिका क्या होगी?
मैंने डा.वानेरे से पूछा - अब क्या होगा? उनका उत्तर था-टेट्रासाइक्लिन। उन्होने समझाया कि १९२६ में जब प्लेग की महामारी फैली, तब टेट्रासाइक्लिन या एण्टीबायोब्कि का अविष्कार नहीं हुआ था। आज यह ज्ञान है और गोलियां हैं। बस सीधा-सा उपाय है कि मरीज की टेट्रासाइक्लिन का एक कोर्स करा दो - वह ठीक हो जाएगा। यथासंभव उसे बाकी लोगों से अलग रखो-ताकि अन्य लोगों को इंफेक्शन होने की संभावना कम हो, और जैसा कि हर बैक्टीरियल इंफेक्शन में होता है, बुखार आ गया तो ७-९ दिन रहेगा, उतने दिन धैर्य रखो। है न सीधी-सी बात। बस इतनी-सी बात कोई सुरत के लोागों को समझा दे, कूड़े-कचरे के ढेर उठवा दे, हो गया प्लेग का किस्सा खत्म। तभी किसी ने कहा-टेट्रासाइक्लिन के साइड इफेक्टस भी है। तो चलो उसके साथ विटामिन ए.बी. कर गोलियां भी खाओ और यदि अपना खुद का बाडी रेजिस्टेन्स अच्छा है तो प्लेग वैसे भी पास नहीं फटकेगा। लेकिन शाम होते होते सारा चित्र बदल गया। धुलिया के कलेक्टर तब हमारे साथ थे। उनके लिउ संदेशा था कि सुरत से लोग भारी संख्या में धुलिया आ रहे है, उनका क्या किया जाए? कलेक्टर ने मेरी ओर देखा। हमने तय किया कि बॉर्डर सील नही करना है। आखिर यह कोई जानलेवा बीमारी तो रही नहीं। जिन्हें यह बात ठीक से समझाई नहीं जा सकी, वही सूरत से भागे है। वे बीमार भी नही है -लेकिन बीमारी के कैरियर हो सकते है, सो उन पर निगरान रखनी होगी। फिर पता चला कि सुरत, बड़ौदा और अहमदाबाद में भी बाजार से टेट्रासाइक्लिन लुप्त हो गया है। वैसी हालत में अच्छा ही है कि ये लोग दूसरी जगह चले जाए जहाँ दवाई मिलना दुश्र्वार हो।
शनिवार को मुंबई आकर मैंने अपनी डिवीजन के तीनों कलेक्टरों से बात की जिनका जिला बॉर्डर गुजरात से लगा हुआ है। जलगांव कलेक्टर ने भ्सुसावल - सुरत लाइन के हर रेलवे स्टेशन पर गुजरात से आने वालों के लिए मेडिकल चैक पोस्ट रखे थे। धुलिया कलेक्टर ने धुलिया में स्कुल,कालेज और सिनेमा शो बंद करवाए और हर रेलवे स्टेशन और हर प्रमुख बस अड्डों पर मेडिकल चैक पोस्ट लगवाए। नासिक कलेक्टा ने भी मेडिकल टीमें बनाकर पेठ और सुरगना - दोनों तहसीलों में चार चैक पोस्ट पर चैकिंग करवाई।
अगले चार दिनों में हर जगह बी.एच.सी. या डी.टी.सूप्रेइंग करवाया , यह व्यवस्था की गई कि टेट्रासाइक्लिन बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो। तीनों कलेक्टरों ने प्रेस और आकाशवाणी के मार्फत लोगों को बताया कि सरकार के पास किस-किस बात की उपलब्धता है-अर्थात दवाइयां, बी.एच.सी.पावडर , कितने लोग गुजरात से आए, कितनों के मेडिकल टैस्ट हुए, कितने बीमार पाए गए, किताने बीमारों का बॅल्ड टेस्टिंग किया - उसमें कितनों प्लेग बाधित निकले, कितने चूहे मरे, इत्यादि। चौबीस से तीस तारीख तक छः दिनों में सूरत से करीब साठ हजार लोग इन तीन जिलों में पहुंचे जिनमें से करीब पांस सौ को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उन्हें टेट्रासाइक्लिन दिया गया और बल्ड सेम्पलिंग भी करवरना पड़ा। हालांकि इसकी रिपोर्ट आने में एक या दो दिन लग जाते हैख् फिर भी कुल प्लेग के जीवाणु पाए जाने वाले पचास से भी कम निकले जब कि मुत्यु किसी की भी नहीं हुई।
सबसे बड़ा डर था कि शायद लोग अपनी बीमारी छिपाने की कोशिश करेंगे। जिनके दिल में पिछले प्लेग के
दिनों का भय है और जो अपनी अशिक्षा या अज्ञान के कारण नहीं जानते कि अब प्लेग एक आसानी से इलाज की जाने वाली बीमारी है,वही इसे छिपाना चाहेंगे। लेकिन यदि उन्हें विश्र्वास दिलाया जा सके कि इसमें डरने जैसा कुछ नहीं है, तो लोग इसे छिपाना नहीं चाहेंगे न ही इतने भयग्रस्त होंगे। उपरोक्त आंकडे भर में चार-पांच सौ लोग तो यों भी बीमार पड़ ही जाते हैं। इसी से मुझे लगता है कि यह पेनिक की, घबराहट की नौबत निराधार थी। थोड़ी सही जानकारी लोगों को पहले ही दिन मिल जाती तो लोग इतने भयभीत नहीं होते।
पर एक क्षेत्र ऐसा है जहां वाकई बात का बतंगड़ , राई का पर्वत बन गया। हमारे लोगों का अज्ञान और हमारे शहरों की सफाई कितने छोटे से दो विषय हैं। लेकिन आज प्रायः हर शहर का प्रशासन इस एक मामले में कमजोर पड़ गया है। सूरत में सफाई नहीं हुई, तो बीमारी फैली। जनता को इलाज पता नहीं था तो लोग-बाग भागे-बंबई गए, दिल्ली गए, धुलिया और नासिक भी गए। यदि वहां की सफाई पहले ही अच्छी तरह होती तो डर की कोई बसत नहीं थी। लेकिन चूंकि पता था कि सफाई डांवाडोल है, इसलिए लोग भी डर गए। घबराहट फैली, चर्चा होने लगी और नतीजा यह हुआ कि तमाम अंतर्राष्ट्रीय हवाई कंपनियों ने भारत से आने'जाने वाली फाइट्रस पर रोक लगा दी। सूरत के हीरों के व्यापार को जितना नुकसान हुआ,टेट्रासाइक्लिन या बी.एच.सी.के लिए शहरी प्रशासन को जितना पैसा खर्च करना पड़ा उससे कई गुना अधिक नुकसान इस बात से हुआ कि विदेश व्यापार घटा और वापस नार्मल पर आने के लिए दो-तीन महीने लग जाएंगे।
हमारे रोजमर्रा जीवन का अभिन्न अंग है हमारी उदासीनता और निष्क्रियता, जिसके चलते न हमने कभी शहरों की गंदगी के प्रति आवाज उठाई और न कभी सरकार से विस्तृत जानकारी पाने के लिए। आज उसी ने हमारा इतना नुकसान कर दिया।
22 स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा Incomplete, check from book
स्वास्थ्य नीति : सेवा बनाम शिक्षा (last 2-3 paras missing
इक्कीसवीं सदी के पहले ही देश की जनसंख्या सौ करोड़ के जादुई अंक को छू लेगी। जैसी दिशाहीन बढ़ती हुई हमारी आबादी है, वैसी ही दिशाहीन फैलती हुई हमारी स्वास्थ्य सेवाएँ भी है। किसी जमाने में डॉक्टरी का पेशा सेवाव्रत माना जाता था। ऐसे कई आदर्शवादी डॉक्टरों को नजदीक से देखने पर भी, तब भी मेरी मान्यता यह थी कि शायद उनकी सेवा की दिशा गलत है। आज तो डॉक्टरों की सेवा भावना पर ही शक किये जाने लायक परिस्थितियॉ मौजूद हो गई है।
सरकारी ऑकडे बताते है कि आज देशा में लगभग पांच लाख एम.बी.बी.एस.डॉक्टर्स और करीब इतने ही आयुवेग्द, होमियो चिकित्सा और अन्य प्रणालियों के डॉक्टर है। स्कूलों के सबसे मेघावी छात्र डॉक्टरी की ओर जाते है। परीक्षाओं की रैट रेस में आगे बने रहना, इसके लिये मेहलत और पैसे खर्च करना और डॉक्टरी के पढाई के दौरान भी वही मेहलत बनाये कोई मामूली बात नहीं है। साथ में परिवार का और समाज का भी काफी पैसा खर्च करके ही यह शिक्षा हासिल होती है। अब समाज के खर्च की बात कोई क्यों सोचे? लेकिन परिवार की लागत की पूरी-पूरी वसूली तो होनी ही चाहिये। और फिर जब उन्हें भी यह सर्टिफिकेट हासिल है कि वे समाज के सबसे अधिक मेघवी, मेहनती और विद्वान संवर्ग मे है। तो क्यों न पैसा, प्रतिष्ठा, और अन्य सुख-सुविधाओं पर उनका हक माना जाय? वह भी तब, जब कि वह डॉक्टर दिन रात मेहनत करने के लिये भी तैयार है। इस प्रकार आजकल जब डॉक्टर्स बैंक बैलेन्स के पीछे भागते दीखते हैं। तो उनके पास जस्टिफिकेशन भी होता है। यही कारण है कि डॉक्टरों में सेवा भावना विदा लेकर व्यावसायिकता की भावना आ चुकी है और होड़ लगाकर बितारों से पैसा वसूल किया जा रहा है।
कोई बड़ा मेघावी छात्र सर्जन बनता है। तुरंत अपना अस्पताल खड़ा कर देता है। उस बिल्डिंग का भी अपना ही एक अर्थशास्त्र होता है। हर दिन अमुक-अमुक ऑपरेशन न हो पायें तो बिल्डिंग का खर्चा नहीं निकलेगा। फिर यह सोच गैर लोगू हो जाता है कि पेशंट की वाकई में ऑपरेशन की जरुरत है या नहीं। या यदि किसी पेशट को अब भी अस्पताल में रखना जरुरी है लेकिन उसे वापस भेज दिया जायेगा क्यांकि किसी ऑपरेशन के पेशंट के लिये खाली कमरा चाहिये होता है।
कोई और मेघावी डॉक्टर है - पैथॅलॉजिस्ट है। चालीस-पचास लाख का नया उपकरण लाकर वह अपनी लैब खोलता है। अब इस मशीनी लागत का हर दिन का ब्याज ही दो हजार रुपये के आसपास है। वहॉ ज्यादा केसेस चाहिये हों तो जनरल प्रैक्टीशनर का सहयोग चाहिये। वह कहे कि फलो-फलो टेस्ट किये बगैर मैं रोग निदान नहीं कर सकता और दवाई नहीं दे सकता। इसके लिये हर रेफर्ड केस के पीछे प्रतिशत का जनरल प्रॅक्टीशनर को पहुँचाया जाता है। वह चाहे ऍलोपैथी का हो या आयुर्वेद का या होमियोपैथी का और तरीके है। मरीज को कहा जाता है कि फलों ऍण्टीबायोटिक अच्छा नहीं - इसकी - जगह वह दूसरा ही लेना। इस प्रकार दूसरी दवाई की मार्केटिंग भी ये धडल्ले से करते रहते है। इस बीच नई दवा की जानकारी कितनी मालूम होती है? केवल वही जो मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव ने बताई हो, और जो उसे कंपनी ने बनाई हो।
ऐसे चित्र आये दिन देखे जाते है। ऐसा नहीं कि हर डाक्टर गलत भावना से ही मरीज को सजाह देता हो - शायद आधे डॉक्टर्स सही हो। लेकिन मरीज को उनकी पहचान कैसे हो? क्योंकि रोग के विषय में जानकारी, समझ और अगली सलाह देने के सारे हक डॉक्टर के ही पास होते है।
आप डॉक्टर से ज्यादा पूछताछ भी नहीं कर सकते उनके अहंकार को ठेस पहुँचती है। उनका उत्तर होगा - डॉक्टर आप है। या हम? चुपचाप कहे मुताबिक कीजिये अर्थात् आप यदि पेशंट है। तो आप अज्ञानी ही है, वैसे चाहे पढ़े लिखें हो पर मेडिकल लेंग्वेज समझने के - हिसाब से तो अज्ञानी ही हुए। फिर वह डॉक्टर जो दिन में पांच दस हजार कमा लेता है। उसके एक मिनट की कीमत भी चार-पॉच सौ रुपये होगी, वह क्योंकर आपको समझाने के लिए अपना एक भी मिनट जाया करें। और अब तो ग्राहक मंच भी है। यदि आप कुछ जानकारी रखते हों अपने विषय में, डॉक्टर ने कोई बात कही, उसमें कोई गलती हो ही गई और आपने पकड ली तो डॉक्टर ने कोई बात कही, उसमें कोई गलती हो ही गई और आपने पकड ली तो डॉक्टर क्यों रिस्क लें? इन सब कारणों से डॉक्टर पेशंट के हित को प्राथमिकता नहीं
देता उसकी प्राथमिकता होती है अपनी कमाई, अपना अहंकार बडप्पन और कोर्ट से अपना बचाव। फिर पेशंट का निरर्थक आपॅरेशन टालने के लिये या उसकी अनावश्यक दवाइयाँ और अनावश्यक टैस्ट्स रोने के लिये डॉक्टर कुछ नहीं करना। कई बार इलाज के दौरान मरीज को किसी दवाई के प्रति ऍलर्जी पैदा हो जाती है, पर उसे नही समझाया जाता कि भविष्य में उसें कौनसी दवाइयाँ टालनी है। यहाँ तक कि उसके केस रिपोर्टस भी उसे नहीं दिये जाते - उन्हें अस्पताल का प्रॉपर्टी कहकर रख लिया जाता है। यदि किसी पेशंट को चार वर्ष बाद या उसी समय भी दूसरे डॉक्टर की सलाह लेनी हो तो उसे उन रिपोर्टस् का उपयोग नहीं करने दिया जाता। यह है हमारे अस्पतालों की नैतिकता का मापदण्ड। सौभाग्य से हाल ही में हाई कोर्ट ने एस केस में फैसला दिया है कि मरीज के मागने पर अस्पताल को उसके टेस्ट रिपोर्ट उसे देने होंगें। यह अभी देखना बाकी है कि कितने बीमार इस फैसले का फायदा उठा पा रहे है।
यह सब लिखने का यह उद्देश्य नहीं कि डॉक्टरी पेशे के काले किस्से को भडकीले ढंग से प्रस्तुत किया जाय। केवल यही स्पष्ट करना है कि आज डॉक्टरी पेशे में व्यावसायिकता और बैंक बैलेन्स का विचार अवश्यंभावी बन गया है। इसके लिये आवश्यक सारी तिकड़मबाजी मेहलत और लागत लगाने का पैसा, सब डॉक्टरों के पास है। और जस्टिफिकेशन भी है। फिर जो ये हमारे अति बुद्धिमान छात्र डॉक्टर होते चलते है। उन्हें बैंक बैलेन्स के पीछे भागने में कोई संकोच नहीं होता। यह हुआ व्यावसायिक डॉक्टरों का पक्ष।
पिसा जाता है बेचारा मरीज और उसके रिश्तेदार। व्यावसायिकता की ढाल की आड़ में उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी को डॉक्टर लोग नहीं निभाते मेरा और कई सैकड़ो लोगों का मानना है कि मरीज के रोग के बाबत खुद उससे और उसके रिश्तेदारों से विस्तृत चर्चा करना डॉक्टर का परम और प्रथम कर्तव्य है लेकिन यह सिद्धांत डाक्टरों को तीन प्रकार से खलता है। एक तो उनका सुपिरिऑरिटी का अंहकार चोट खा जाता है यदि मरीज अपने विषय में कुछ करना या जानना चाहे। दूसरे उनका कमाई का समय खर्च हो जाता है, तीसरे यह भी डर है कि जानकारी लेने के दौरान उनकी कोई गलती मरीज ने पकड़ ली तो कन्ज्यूमर कोर्ट में उन्हें खींचा जा सकता है।
कई बार इससे थलग डॉक्टर्स भी देखे जाते है। जो मरीज को अनावश्यक टेस्ट तो करवाये अनावश्यक ऑपरेशन की सलाह न दे लेकिन वे भी मरीज से चर्चा करने से कतराते। उनके लिये पूरा आदर भव रखकर भी कहना पडेगा कि मैं केवल उनकी सेवा भावना से ही सहमत हूँ सेवा की दिशा से नहीं। इसका भी एक महत्वपूर्ण कारण है।
यह प्रायः देखा गया है कि अच्छे अच्छे सेवाभावी डॉक्टर्स भी अपने डॉक्टरी झाम को लेकर एक अहंकार या कहिये कि एक बडप्पन का भाव पाल लेते है। और उस रौ में यह भूल जाते है कि सामने वाला हर रोगी अपने आप में एक बुद्धिशाली व्यक्ति है जिसके जीवन और जीवन्नता ने उसे भी बहुत कुछ सिखाया होता है। उसके अपने अनुभव के आधार पर जो ज्ञान उसके पास संचित होता है उसे नकारकर इलाज नहीं किया जा सकता। इसीलिये डॉक्टर की रोगी से विस्तृत चर्चा होनी आवश्यक है। डॉक्टर केवल सेवाभावी न हो, वह एक अच्छा शिक्षक और एक अच्छा विद्यार्थी भी हो। उसका प्रयत्न हो कि औरों के पास भी छोटे पैमाने पर ही सही मेडिकल ज्ञान बढ़े न कि उनके संचित अनुभव और ज्ञान का उपहास हो।
एक उदाहरण देखें। मैंने बचपन में कभी नानी से सुना कि हरसिंगार के पत्ते चबाने से बुखार उतर जाता है। अभी चल कर इसका उपयोग हमारे घर मे जमकर किया गया। अब हर बार तो नहीं, लेकिन कई बार हरसिंगार की पत्त्िायाँ खाने से बुखार उतर गया है। अब अगर आप डॉक्टर से कहें कि साधारण ही बुखार हो तो बताइये, फिर हम आपकी दवा खाने के बजाय हरसिंगार की पत्त्िायाँ ही खा लेगें तो उसकी प्रतिक्रिया क्यों होगी? बेहद गुस्से की - आप यहाँ आये ही क्यों?
गुस्सा उतर चुकने के बाद ऍलोपैथी डॉक्टर ही तो कहेगा - यह बकवास है, अंधश्रद्धा है, आप ही जैसे लोगों के कारण हिन्दुस्तान में इतना अस्वास्थ्य है इत्यादि। और आयुर्वेद का वैद्य भ्ंी हो तो उसकी भी प्रतिक्रिया होगी तो हम उनके लिये अच्छी और पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं करापा रहे है। और दूसरी ओर उनका स्वास्थ्य विषयों का ज्ञान बढ़े इसके लिये भी हम कुछ नहीं कर रहे। जब भी पैसा उनलब्ध हुआ और चुन्ना पडा कि हम उनके लिये कौन सी नीति उपनीयेंगे अधिक स्वास्थ्य सेवा देने की अधिक स्वास्थ्य शिक्षा देने की तो हर बार हमने स्वास्थ्य सेवा को ही प्रधानता दी
नतीजा यह है कि आज वह स्वास्थ्य सेवा हर तरह से लडखड़ा रही है और गरीब तथा पिछड़े इलाकों का समाज स्वास्थ्य सेवा के साथ साथ स्वस्थ्य शिक्षा से भी वंचित हो रहा है। आज अमारे दुर्गम और पिछड़े इलाके प्यादा मात्रा में डॉक्टरों पर निर्भर है जबकि वहॉ डॉक्टर उपलब्ध ही नहीं है। फिर क्यों उन्हें कमसे कम इतना नहीं सिखा पाते है कि चलो इस बीमारी में डॉक्टर के न मिलने तक कम से कम ये ये बातें करते रहना। यह शिक्षा देने की जिम्मेदारी डॉक्टरों की है, जिसे उन्होंने पूरी तरह टाल दिया है और इसके लिये लज्जिात भी नहीं है।
मुझे एक प्रसंग याद आता है। एक सज्जान के घर एक सुविख्यात प्राईवेट डॉक्टर से परिचय हुआ। यह सुनकर कि मैं IAS हूँ और कलेक्टर हूँ - उन्होंने कहा - आप IAS अधिकारी बड़ी गलत नीतियाँ बनाते है। 'सो कैसे' तो उनका उत्तर था - देखिये गाँव गाँव में जो बीमारियाँ और महामारियों फैलती है उनका मुख्य कारण होता है पीने का दूषित पानी।
और आप लोग पर्याप्त और शुद्ध पानी मुहैया करने पर अधिक जोर देने के बजाय ज्यादा नये PHU खोलने की नीति बनाते है। अरे PHU में डॉक्टर जायेगा भी तो दूषित पानी से कैसे लड़ेगा? बात बिल्कुल सही कही डॉक्टर साहब ! यह बात तो एक डॉक्टर ही ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है, फिर आज तक कितने डॉक्टरों ने बुलन्द आवाज उठाकर माँग की है कि PHU का बजट कम करके अच्छे पानी की सुविधा के लिये बजट बढ़ाया जाय? वैसे हाल में कुछ डॉक्टर धीमी आवाज में यह कह रहे है। लेकिन वे सारे Public Health Systems के डॉक्टर्स है। जिन्हें डॉक्टरों की जमात में सबसे निचले दर्जे का माना जाता है।
एक प्रसंग और है। पिछले चार वर्षो से महाराष्ट्र के आदिवासी भागों में मलेरिया महामारी की तरह आता है और हाहाःकार मचाता हुआ तीन चार महीनों के बाद कम हो जाता है। ऐसे हर मौके पर पाया गया कि ग्रामीण अस्तताल और जन स्वास्थ्य केंद्र झ््रघ्-क्ट इस संकट के आगे ढुलमुल हो गये है। एक छोटा सा आवश्यक काम होता है कि रोगी के खून की जॉच कर मलेरिया पॉजिटिव है या नहीं और यदि है तो कौन सा पॉल्सिफेरम या...................इसकी जॉच की जाय। इसमें टैक्निकल स्टाफ कम पड़ जाता है। सीधी सी बात है क्यों नही उसी इलाके के नौंवी और ग्यारवी के छात्रों को यह सिखाया जाय कि रोगी की अंगुली से एक बूंद खून कैसे जमा किया जाता है और स्लाइड को माइक्रोस्कोप में कैसे टेस्ट किया जाता है? टेस्ट करने में पांच मिनट से अधिक समय नहीं लगताऔर यूँ भी इन छात्रों की पढ़ाई में स्लाइड बनाकर उनके निरीक्षण की बात शामिल है। फिर मलेरिया की जॉच के लिए उनका उपयोग क्यों न किया जाय? यदि ऐसा हो सके तो मेरी समझ में वह अच्छा डॉक्टर हो ही नहीं सकता क्यांकि रोग जिज्ञासा और औपध जिज्ञासा इन दो गुणों को उसने भुला दिया है। वेद्य के लिए यह ज्ञान कोई नई बात नहीं। लेकिन उसे भी यह विचार करना चाहिए और रोगी से चार्चा करनी चाहिये कि किस रोग में किस कारण से केवल हरसिंगार के पत्ते पर्याप्त नहीं होते, किस किस प्रकार के अन्य रोग में क्या क्या पूरक औपधियाँ चाहियें इसके बजाए यदि वह रेडिमेड पारिजातक वटि खाने की सलाह देता है तो वह रोगी के ज्ञान की बढ़ावा नहीं देता बल्कि उसे परावलंबी ही बनाता है।
शायद यह परावलंबिता शहरी जीवन के लिये ठीक भी हो। लेकिन गांव के इलाके में, आदिवासी और दुर्गम भागों में क्या हो? एक ओर कि सीधे पेड को तोडकर हरसिंगार संस्कृत नाम - परिजातक के पत्ते खाने के बजाय आप परिजातक वटी खाइये - आयुर्वेद में पश्य, कुपथ्य का विचार बहुत होता है, सब है। - आप वही लीजिये - अर्थात् रेडिमेड ! धंधे की वजह से करोडों लोगों के पास रोग और स्वास्थ्य के विषय में जो भी ज्ञान है उसका विचार होने के बजाय उसका हम खात्मा कर रहे है। बुद्धिमान अलोपैथी की डॉक्टर हो और हरसिंगार की पत्त्िायों से बुखार उतरने की बात उसुनकर यदि उसकी उत्सुकता जागृत नहीं होती, यदि वह नहीं सोच पाता कि मैं भी अपने चार पांच रोगियों के लिये यह जॉचकर देखूँ कुछ आयुर्वेद की पुस्तकें पढ़कर देखूँ।
इक्कीसवीं सदी के पहले ही देश की जनसंख्या सौ करोड़ के जादुई अंक को छू लेगी। जैसी दिशाहीन बढ़ती हुई हमारी आबादी है, वैसी ही दिशाहीन फैलती हुई हमारी स्वास्थ्य सेवाएँ भी है। किसी जमाने में डॉक्टरी का पेशा सेवाव्रत माना जाता था। ऐसे कई आदर्शवादी डॉक्टरों को नजदीक से देखने पर भी, तब भी मेरी मान्यता यह थी कि शायद उनकी सेवा की दिशा गलत है। आज तो डॉक्टरों की सेवा भावना पर ही शक किये जाने लायक परिस्थितियॉ मौजूद हो गई है।
सरकारी ऑकडे बताते है कि आज देशा में लगभग पांच लाख एम.बी.बी.एस.डॉक्टर्स और करीब इतने ही आयुवेग्द, होमियो चिकित्सा और अन्य प्रणालियों के डॉक्टर है। स्कूलों के सबसे मेघावी छात्र डॉक्टरी की ओर जाते है। परीक्षाओं की रैट रेस में आगे बने रहना, इसके लिये मेहलत और पैसे खर्च करना और डॉक्टरी के पढाई के दौरान भी वही मेहलत बनाये कोई मामूली बात नहीं है। साथ में परिवार का और समाज का भी काफी पैसा खर्च करके ही यह शिक्षा हासिल होती है। अब समाज के खर्च की बात कोई क्यों सोचे? लेकिन परिवार की लागत की पूरी-पूरी वसूली तो होनी ही चाहिये। और फिर जब उन्हें भी यह सर्टिफिकेट हासिल है कि वे समाज के सबसे अधिक मेघवी, मेहनती और विद्वान संवर्ग मे है। तो क्यों न पैसा, प्रतिष्ठा, और अन्य सुख-सुविधाओं पर उनका हक माना जाय? वह भी तब, जब कि वह डॉक्टर दिन रात मेहनत करने के लिये भी तैयार है। इस प्रकार आजकल जब डॉक्टर्स बैंक बैलेन्स के पीछे भागते दीखते हैं। तो उनके पास जस्टिफिकेशन भी होता है। यही कारण है कि डॉक्टरों में सेवा भावना विदा लेकर व्यावसायिकता की भावना आ चुकी है और होड़ लगाकर बितारों से पैसा वसूल किया जा रहा है।
कोई बड़ा मेघावी छात्र सर्जन बनता है। तुरंत अपना अस्पताल खड़ा कर देता है। उस बिल्डिंग का भी अपना ही एक अर्थशास्त्र होता है। हर दिन अमुक-अमुक ऑपरेशन न हो पायें तो बिल्डिंग का खर्चा नहीं निकलेगा। फिर यह सोच गैर लोगू हो जाता है कि पेशंट की वाकई में ऑपरेशन की जरुरत है या नहीं। या यदि किसी पेशट को अब भी अस्पताल में रखना जरुरी है लेकिन उसे वापस भेज दिया जायेगा क्यांकि किसी ऑपरेशन के पेशंट के लिये खाली कमरा चाहिये होता है।
कोई और मेघावी डॉक्टर है - पैथॅलॉजिस्ट है। चालीस-पचास लाख का नया उपकरण लाकर वह अपनी लैब खोलता है। अब इस मशीनी लागत का हर दिन का ब्याज ही दो हजार रुपये के आसपास है। वहॉ ज्यादा केसेस चाहिये हों तो जनरल प्रैक्टीशनर का सहयोग चाहिये। वह कहे कि फलो-फलो टेस्ट किये बगैर मैं रोग निदान नहीं कर सकता और दवाई नहीं दे सकता। इसके लिये हर रेफर्ड केस के पीछे प्रतिशत का जनरल प्रॅक्टीशनर को पहुँचाया जाता है। वह चाहे ऍलोपैथी का हो या आयुर्वेद का या होमियोपैथी का और तरीके है। मरीज को कहा जाता है कि फलों ऍण्टीबायोटिक अच्छा नहीं - इसकी - जगह वह दूसरा ही लेना। इस प्रकार दूसरी दवाई की मार्केटिंग भी ये धडल्ले से करते रहते है। इस बीच नई दवा की जानकारी कितनी मालूम होती है? केवल वही जो मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव ने बताई हो, और जो उसे कंपनी ने बनाई हो।
ऐसे चित्र आये दिन देखे जाते है। ऐसा नहीं कि हर डाक्टर गलत भावना से ही मरीज को सजाह देता हो - शायद आधे डॉक्टर्स सही हो। लेकिन मरीज को उनकी पहचान कैसे हो? क्योंकि रोग के विषय में जानकारी, समझ और अगली सलाह देने के सारे हक डॉक्टर के ही पास होते है।
आप डॉक्टर से ज्यादा पूछताछ भी नहीं कर सकते उनके अहंकार को ठेस पहुँचती है। उनका उत्तर होगा - डॉक्टर आप है। या हम? चुपचाप कहे मुताबिक कीजिये अर्थात् आप यदि पेशंट है। तो आप अज्ञानी ही है, वैसे चाहे पढ़े लिखें हो पर मेडिकल लेंग्वेज समझने के - हिसाब से तो अज्ञानी ही हुए। फिर वह डॉक्टर जो दिन में पांच दस हजार कमा लेता है। उसके एक मिनट की कीमत भी चार-पॉच सौ रुपये होगी, वह क्योंकर आपको समझाने के लिए अपना एक भी मिनट जाया करें। और अब तो ग्राहक मंच भी है। यदि आप कुछ जानकारी रखते हों अपने विषय में, डॉक्टर ने कोई बात कही, उसमें कोई गलती हो ही गई और आपने पकड ली तो डॉक्टर ने कोई बात कही, उसमें कोई गलती हो ही गई और आपने पकड ली तो डॉक्टर क्यों रिस्क लें? इन सब कारणों से डॉक्टर पेशंट के हित को प्राथमिकता नहीं
देता उसकी प्राथमिकता होती है अपनी कमाई, अपना अहंकार बडप्पन और कोर्ट से अपना बचाव। फिर पेशंट का निरर्थक आपॅरेशन टालने के लिये या उसकी अनावश्यक दवाइयाँ और अनावश्यक टैस्ट्स रोने के लिये डॉक्टर कुछ नहीं करना। कई बार इलाज के दौरान मरीज को किसी दवाई के प्रति ऍलर्जी पैदा हो जाती है, पर उसे नही समझाया जाता कि भविष्य में उसें कौनसी दवाइयाँ टालनी है। यहाँ तक कि उसके केस रिपोर्टस भी उसे नहीं दिये जाते - उन्हें अस्पताल का प्रॉपर्टी कहकर रख लिया जाता है। यदि किसी पेशंट को चार वर्ष बाद या उसी समय भी दूसरे डॉक्टर की सलाह लेनी हो तो उसे उन रिपोर्टस् का उपयोग नहीं करने दिया जाता। यह है हमारे अस्पतालों की नैतिकता का मापदण्ड। सौभाग्य से हाल ही में हाई कोर्ट ने एस केस में फैसला दिया है कि मरीज के मागने पर अस्पताल को उसके टेस्ट रिपोर्ट उसे देने होंगें। यह अभी देखना बाकी है कि कितने बीमार इस फैसले का फायदा उठा पा रहे है।
यह सब लिखने का यह उद्देश्य नहीं कि डॉक्टरी पेशे के काले किस्से को भडकीले ढंग से प्रस्तुत किया जाय। केवल यही स्पष्ट करना है कि आज डॉक्टरी पेशे में व्यावसायिकता और बैंक बैलेन्स का विचार अवश्यंभावी बन गया है। इसके लिये आवश्यक सारी तिकड़मबाजी मेहलत और लागत लगाने का पैसा, सब डॉक्टरों के पास है। और जस्टिफिकेशन भी है। फिर जो ये हमारे अति बुद्धिमान छात्र डॉक्टर होते चलते है। उन्हें बैंक बैलेन्स के पीछे भागने में कोई संकोच नहीं होता। यह हुआ व्यावसायिक डॉक्टरों का पक्ष।
पिसा जाता है बेचारा मरीज और उसके रिश्तेदार। व्यावसायिकता की ढाल की आड़ में उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी को डॉक्टर लोग नहीं निभाते मेरा और कई सैकड़ो लोगों का मानना है कि मरीज के रोग के बाबत खुद उससे और उसके रिश्तेदारों से विस्तृत चर्चा करना डॉक्टर का परम और प्रथम कर्तव्य है लेकिन यह सिद्धांत डाक्टरों को तीन प्रकार से खलता है। एक तो उनका सुपिरिऑरिटी का अंहकार चोट खा जाता है यदि मरीज अपने विषय में कुछ करना या जानना चाहे। दूसरे उनका कमाई का समय खर्च हो जाता है, तीसरे यह भी डर है कि जानकारी लेने के दौरान उनकी कोई गलती मरीज ने पकड़ ली तो कन्ज्यूमर कोर्ट में उन्हें खींचा जा सकता है।
कई बार इससे थलग डॉक्टर्स भी देखे जाते है। जो मरीज को अनावश्यक टेस्ट तो करवाये अनावश्यक ऑपरेशन की सलाह न दे लेकिन वे भी मरीज से चर्चा करने से कतराते। उनके लिये पूरा आदर भव रखकर भी कहना पडेगा कि मैं केवल उनकी सेवा भावना से ही सहमत हूँ सेवा की दिशा से नहीं। इसका भी एक महत्वपूर्ण कारण है।
यह प्रायः देखा गया है कि अच्छे अच्छे सेवाभावी डॉक्टर्स भी अपने डॉक्टरी झाम को लेकर एक अहंकार या कहिये कि एक बडप्पन का भाव पाल लेते है। और उस रौ में यह भूल जाते है कि सामने वाला हर रोगी अपने आप में एक बुद्धिशाली व्यक्ति है जिसके जीवन और जीवन्नता ने उसे भी बहुत कुछ सिखाया होता है। उसके अपने अनुभव के आधार पर जो ज्ञान उसके पास संचित होता है उसे नकारकर इलाज नहीं किया जा सकता। इसीलिये डॉक्टर की रोगी से विस्तृत चर्चा होनी आवश्यक है। डॉक्टर केवल सेवाभावी न हो, वह एक अच्छा शिक्षक और एक अच्छा विद्यार्थी भी हो। उसका प्रयत्न हो कि औरों के पास भी छोटे पैमाने पर ही सही मेडिकल ज्ञान बढ़े न कि उनके संचित अनुभव और ज्ञान का उपहास हो।
एक उदाहरण देखें। मैंने बचपन में कभी नानी से सुना कि हरसिंगार के पत्ते चबाने से बुखार उतर जाता है। अभी चल कर इसका उपयोग हमारे घर मे जमकर किया गया। अब हर बार तो नहीं, लेकिन कई बार हरसिंगार की पत्त्िायाँ खाने से बुखार उतर गया है। अब अगर आप डॉक्टर से कहें कि साधारण ही बुखार हो तो बताइये, फिर हम आपकी दवा खाने के बजाय हरसिंगार की पत्त्िायाँ ही खा लेगें तो उसकी प्रतिक्रिया क्यों होगी? बेहद गुस्से की - आप यहाँ आये ही क्यों?
गुस्सा उतर चुकने के बाद ऍलोपैथी डॉक्टर ही तो कहेगा - यह बकवास है, अंधश्रद्धा है, आप ही जैसे लोगों के कारण हिन्दुस्तान में इतना अस्वास्थ्य है इत्यादि। और आयुर्वेद का वैद्य भ्ंी हो तो उसकी भी प्रतिक्रिया होगी तो हम उनके लिये अच्छी और पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं करापा रहे है। और दूसरी ओर उनका स्वास्थ्य विषयों का ज्ञान बढ़े इसके लिये भी हम कुछ नहीं कर रहे। जब भी पैसा उनलब्ध हुआ और चुन्ना पडा कि हम उनके लिये कौन सी नीति उपनीयेंगे अधिक स्वास्थ्य सेवा देने की अधिक स्वास्थ्य शिक्षा देने की तो हर बार हमने स्वास्थ्य सेवा को ही प्रधानता दी
नतीजा यह है कि आज वह स्वास्थ्य सेवा हर तरह से लडखड़ा रही है और गरीब तथा पिछड़े इलाकों का समाज स्वास्थ्य सेवा के साथ साथ स्वस्थ्य शिक्षा से भी वंचित हो रहा है। आज अमारे दुर्गम और पिछड़े इलाके प्यादा मात्रा में डॉक्टरों पर निर्भर है जबकि वहॉ डॉक्टर उपलब्ध ही नहीं है। फिर क्यों उन्हें कमसे कम इतना नहीं सिखा पाते है कि चलो इस बीमारी में डॉक्टर के न मिलने तक कम से कम ये ये बातें करते रहना। यह शिक्षा देने की जिम्मेदारी डॉक्टरों की है, जिसे उन्होंने पूरी तरह टाल दिया है और इसके लिये लज्जिात भी नहीं है।
मुझे एक प्रसंग याद आता है। एक सज्जान के घर एक सुविख्यात प्राईवेट डॉक्टर से परिचय हुआ। यह सुनकर कि मैं IAS हूँ और कलेक्टर हूँ - उन्होंने कहा - आप IAS अधिकारी बड़ी गलत नीतियाँ बनाते है। 'सो कैसे' तो उनका उत्तर था - देखिये गाँव गाँव में जो बीमारियाँ और महामारियों फैलती है उनका मुख्य कारण होता है पीने का दूषित पानी।
और आप लोग पर्याप्त और शुद्ध पानी मुहैया करने पर अधिक जोर देने के बजाय ज्यादा नये PHU खोलने की नीति बनाते है। अरे PHU में डॉक्टर जायेगा भी तो दूषित पानी से कैसे लड़ेगा? बात बिल्कुल सही कही डॉक्टर साहब ! यह बात तो एक डॉक्टर ही ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है, फिर आज तक कितने डॉक्टरों ने बुलन्द आवाज उठाकर माँग की है कि PHU का बजट कम करके अच्छे पानी की सुविधा के लिये बजट बढ़ाया जाय? वैसे हाल में कुछ डॉक्टर धीमी आवाज में यह कह रहे है। लेकिन वे सारे Public Health Systems के डॉक्टर्स है। जिन्हें डॉक्टरों की जमात में सबसे निचले दर्जे का माना जाता है।
एक प्रसंग और है। पिछले चार वर्षो से महाराष्ट्र के आदिवासी भागों में मलेरिया महामारी की तरह आता है और हाहाःकार मचाता हुआ तीन चार महीनों के बाद कम हो जाता है। ऐसे हर मौके पर पाया गया कि ग्रामीण अस्तताल और जन स्वास्थ्य केंद्र झ््रघ्-क्ट इस संकट के आगे ढुलमुल हो गये है। एक छोटा सा आवश्यक काम होता है कि रोगी के खून की जॉच कर मलेरिया पॉजिटिव है या नहीं और यदि है तो कौन सा पॉल्सिफेरम या...................इसकी जॉच की जाय। इसमें टैक्निकल स्टाफ कम पड़ जाता है। सीधी सी बात है क्यों नही उसी इलाके के नौंवी और ग्यारवी के छात्रों को यह सिखाया जाय कि रोगी की अंगुली से एक बूंद खून कैसे जमा किया जाता है और स्लाइड को माइक्रोस्कोप में कैसे टेस्ट किया जाता है? टेस्ट करने में पांच मिनट से अधिक समय नहीं लगताऔर यूँ भी इन छात्रों की पढ़ाई में स्लाइड बनाकर उनके निरीक्षण की बात शामिल है। फिर मलेरिया की जॉच के लिए उनका उपयोग क्यों न किया जाय? यदि ऐसा हो सके तो मेरी समझ में वह अच्छा डॉक्टर हो ही नहीं सकता क्यांकि रोग जिज्ञासा और औपध जिज्ञासा इन दो गुणों को उसने भुला दिया है। वेद्य के लिए यह ज्ञान कोई नई बात नहीं। लेकिन उसे भी यह विचार करना चाहिए और रोगी से चार्चा करनी चाहिये कि किस रोग में किस कारण से केवल हरसिंगार के पत्ते पर्याप्त नहीं होते, किस किस प्रकार के अन्य रोग में क्या क्या पूरक औपधियाँ चाहियें इसके बजाए यदि वह रेडिमेड पारिजातक वटि खाने की सलाह देता है तो वह रोगी के ज्ञान की बढ़ावा नहीं देता बल्कि उसे परावलंबी ही बनाता है।
शायद यह परावलंबिता शहरी जीवन के लिये ठीक भी हो। लेकिन गांव के इलाके में, आदिवासी और दुर्गम भागों में क्या हो? एक ओर कि सीधे पेड को तोडकर हरसिंगार संस्कृत नाम - परिजातक के पत्ते खाने के बजाय आप परिजातक वटी खाइये - आयुर्वेद में पश्य, कुपथ्य का विचार बहुत होता है, सब है। - आप वही लीजिये - अर्थात् रेडिमेड ! धंधे की वजह से करोडों लोगों के पास रोग और स्वास्थ्य के विषय में जो भी ज्ञान है उसका विचार होने के बजाय उसका हम खात्मा कर रहे है। बुद्धिमान अलोपैथी की डॉक्टर हो और हरसिंगार की पत्त्िायों से बुखार उतरने की बात उसुनकर यदि उसकी उत्सुकता जागृत नहीं होती, यदि वह नहीं सोच पाता कि मैं भी अपने चार पांच रोगियों के लिये यह जॉचकर देखूँ कुछ आयुर्वेद की पुस्तकें पढ़कर देखूँ।
बृहस्पतिवार, 15 जुलाई 2010
13 बटमारी के हिस्सेदार
बटमारी के हिस्सेदार
वाणिज्य राज्यमंत्री ने फेयरग्रोथ कंपनी में खरीदे शेयरों के कारण इस्तीफा दे दिया तो एक नयी बहस की शुरूआत हो गयी। लोग पुछने लगे कि किसी कंपनी ने गैरकानूनी ढंग से मुनाफ़ा कमाया हो और उस कंपनी के मुनाफ़े के कारण शेयर होल्डरों को डिविडेंड मिलता हो या उनके शेयरों के दाम बढ़ते हों तो इस मुनाफ़े को स्वीकार करने में क्यों कोई दोष माना जाय ? आखिर कंपनी के कामकाज के तरीकों पर या सिद्धांतों पर शेयर होल्डर का नियंत्रण नहीं के बराबर होता है। खासकर जब लाखों शेयरों की तुलना में उसके शेयरों की संख्या केवल सैकड़ों या हजारों में ही होता है। प्रश्न है कि क्या यह दलील सही मानी जा सकती है ? इसके लिए हमें अर्थशास्त्र के कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर नजर डालनी पड़ेगी।
किसी भी उत्पादन के लिए पूंजी एक महत्वपूर्ण घटक होता है। इसके अलावा चाहिए जमीन, कच्ची सामग्री और म.जदूर। लेकिन इन सबसे पहले चाहिए एक अच्छा दिमाग, तकनीकी ज्ञान, उत्पादन से हो सकने वाले मुनाफ़े का सही अंदाज लगा पाने की क्षमता और इस काम में कूद पड़ने के लिए निर्णय ले पाने का साहस ! ये अंतिम गुण जिस उद्योजक में होंगे वही पूंजी जुटाने की बात सोचेगा। उसकी अपनी पूंजी कम हो तो शेयरों के माध्यम से पूंजी जुटायेगा। शेयरों की अधिक से अधिक बिक्री हो इसलिए वह अपनी योजना और उससे होने वाले मुनाफ़े का अनुमान लोगों के सामने रखेगा। लोग उसका प्रस्ताव परखेंगे। यह जानना चाहेंगे कि उसके कारखाने का मैनेजमेंट अच्छा होगा या नहीं। खासकर यदि उसने पहले किसी उद्योग में अच्छा मुनाफ़ा कमाया हो तो लोग उसकी जांच परख की क्षमता और उद्योग चला सकने की क्षमता पर भरोसा रखेंगे और उसकी नयी प्रस्तावित कंपनी में अपनी भी पूंजी लगायेंगे। किसी नये उद्योग का पब्लिक इशू जब ओवर सब्सक्राइब हो जाता है तो इसका अर्थ होता है कि लोगों को उस उद्योजक के या उसकी कंपनी के सफल होने की आशा है। इसलिए उन्होंने अपनी पूंजी भी उसके साथ लगायी ताकि मुनाफ़े और शेयर एप्रीसिएशन के लाभ में उनका भी हिस्सा रहे।
जब सामान्य आदमी किसी उद्योग में पूंजी लगाता है तो माना जाता है कि उस उद्योग के कारण बढ़ने वाली उत्पादकता और राष्ट्रीय संपत्त्िा की बढ़ोतरी में वह हाथ बंटा रहा है। इसी कारण मुनाफ़े में हिस्सा कमाना भी उसका हक माना जायेगा। लेकिन यह है उन देशों की परिस्थिति जहां पिछले दो शतकों में औधोगिक क्रांति हुई। नई-नई मशीनों के आविष्कार हुए, उन मशीनों से उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। लोगों ने नए-नए कल-कारखाने लगाये, देश की उद्योग क्षमता और उद्योग संपत्त्िा बढ़ायी। दुर्भाग्य से हमारा देश उनकी पंक्ति में नहीं बैठाया जा सकता।
पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से हमारे देश में प्रथा चल पड़ी है कि नयी कंपनी घोषित करना ही काफी है, उसमें अच्छी प्लानिंग करना या अच्छा उत्पादन निकालना या पूरी कार्यक्षमता से कंपनी को चलाना आवश्यक नहीं है। आप पूछेंगे कि भाई उत्पादन न हो तो मुनाफ़ा कहां से आयेगा। इसका उत्तर भी इस प्रथा में है। कंपनी का उद्देश्य जब केवल मुनाफ़ा कमाना ही है, तो हर चीज जाय.ज है वाली कहावत लागू हो जाती है। फिर आप अलग तरीकों से भी मुनाफ़ा कमा सकते हैं -- मसलन आपकी कंपनी टैक्स ही न दे। कहा जाता है कि हर्षद मेहता और उसकी कंपनियों ने अब तक ३००० करोड़ से भी अधिक रुपये का टैक्स छिपाया है। यह तो मुम्बई शहर से वसूल होने वाले कुल टैक्स से भी अधिक है। लेकिन टैक्स छिपाकर अपना मुनाफ़ा बढ़ानेवाला पहला व्यक्ति हर्षद मेहता हो एसा भी नहीं है। उसके पहले भी कई और नाम सामने आ चुके हैं। मुनाफ़ेखोरी का दूसरा तरीका यह भी है, आपकी कंपनी या आप साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर सरकारी नीतियों को ही अपने हक में यूं घूमा-फिरा लें कि आयात और निर्यात की सुविधा, कम ब्याज दर पर बैंक से कर्ज मिलने की सुविधा या अपनी कंपनी के शेयरों को उछालने के लिए थोड़े समय तक बैंक से पैसे या कर्ज हासिल करने की सुविधा इत्यादि आपको मिलती रहे जो कि अन्य किसी कंपनी को नहीं मिल रही हो। यह मुनाफ़ा उत्पादन से नहीं बल्कि हिसाब की हेरा-फेरी से बढ़ा है, भले ही शेयर मार्केट में इसे स्मार्ट्-नेस का नाम दे दिया गया हो।
अब अर्थशास्त्र का नियम है कि जब वास्तविक उत्पादन के कारण मुनाफ़ा बढ़ रहा तो किसी से कुछ छिने बगैर कंपनी अपनी आय और मुनाफ़ा बढ़ा रही होती है। कंपनी का उत्पादन लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा होता है, लेकिन जब उत्पादन करके भी हेरा-फेरी से मुनाफ़ा कमाया जाता है तो किसी की जेब से निकलकर पैसा ''स्मार्ट गाय'' की जेब में जा रहा होता है। आखिर किसकी जेब से पैसा जाता है? उसकी जेब से जिसने अपनी मेहनत की कमाई बैंक में डिपॉजिट की या उछाल आने पर अपनी कमाई से शेयर खरीद लिये, क्योंकि जिन शेयरों को उत्पादन का जोर नहीं है, उन्हें कभी तो गिरना ही है। आज भी स्टेट बैंक का ५०० करोड़ रुपये के घाटे का उदाहरण हम देखें या कराड़ बैंक के डिपॉजिटर्स का नतीजा वही है कि इस घाटे में सामान्य आदमी ही पिसेगा। बैंक के वरिष्ठ अधिकारी तो कई एक करोड़ डकार जायेंगे। किसी एकाध को सजा हो जायेगी बस क्योंकि अपने देश के कानून भी उतने सक्षम नहीं हैं।
देश को सरकार की या शासन की असल जरुरत इसलिए होती है कि एसी हेरा-फेरी को सरकार रोक सके, कानून को और कानूनी प्रक्रिया को सक्षम रखे और आम आदमी के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखे। लेकिन आम आदमी से अलग अपने देश में एक ऊंचे तबके का कुनबा है जिसके लोग इस हेरा-फेरी को रोकने के बजाय इसके मुनाफ़े में हाथ बंटाने में विश्र्वास रखते हैं। इसलिए जब फेयरग्रोथ जैसी कंपनी धड़ल्ले से मुनाफ़ा कमाती है तो शेयर होल्डर यह नहीं पूछता कि मुनाफ़ा कहां से आया? कंपनी के तौर-तरीके क्या हैं। वह मुनाफ़े में अपना हिस्सा पाकर संतुष्ट हो जाता है बल्कि कंपनी के लिए दुआ भी करता है। लेकिन यह अब जाहिर है कि फेयरग्रोथ का मुनाफ़ा ईमानदारी से नहीं आया बल्कि यह लूट का मुनाफ़ा ही है। फिर क्या शेयर होल्डर का इस दोष में कोई भी हिस्सा नहीं?
कहते हैं कि ऋषि वाल्मीकि पहले बटमार थे, राह चलतों को लूटकर उनका धन लूटते थे। एक दिन नारद मुनि से सामना हो गया। मुनि ने कहा -- मुझे मारते हो तो मारो, लेकिन यह पाप ही है। जिन घरवालों और रिश्तेदारों की सुख-सुविधा के लिए तुमने यह पाप का रास्ता चुना, वे तुम्हारी लूट से खुश होते हैं, लूट में हिस्सा बंटाते हैं, लेकिन क्या वे तुम्हारे पाप में भी हिस्सा बांटेंगें? जरा पूछकर तो आना। डाकू ने घर जाकर सबसे पूछा तो वे कहने लगे - तुम्हारा पाप तुम्हारे पास, इसका जिम्मा हमपर कैसा? और जब जिम्मा नहीं तो पाप में हमारा हिस्सा भी क्यों करें? इस पर वाल्मीकि का मोहभंग हुआ और वो बटमारी छोड़कर तपस्या करने चले गये। हर्षद मेहता या फेयरग्रोथ जैसी नावों पर सवार हजारों की संख्या में शेयरों की खरीद-फ़रोख्त करने वाले इस कलयुग में वाल्मीकि के रिश्तेदार ही हैं। उन्हें इससे क्या मतलब कि कंपनी वाकई कुछ उत्पादन कुछ काम करती है या हेरा-फेरी! वह तो यही कहेंगें कि हमने इतनी पूंजी लगायी। कंपनी ने इतने डिविडेंड दिये और शेयर इतने चढ़े, इससे हमें इतना मुनाफ़ा हुआ बस! और इन हेरा-फेरी प्रवीण कंपनियों की मदद से अपना ढोल पिटवाते लोग भी कहेंगें कि देखो-देखो, पूछो इन शेयर होल्डरों से।
लेकिन जो जानता है कि बिना उत्पादन के देश की संपत्त्िा नहीं बढ़ती और जिसे इस देश की चिंता है, यहां के उत्पादन की चिंता है, या जिस पर यह चिंता करने की जिम्मेदारी है, वह जानता है कि फेयरग्रोथ जैसी कंपनी के मुनाफ़े में हिस्सा बांटने पर वह किस दोष की श्रेणी में आता है।
वाणिज्य राज्यमंत्री ने फेयरग्रोथ कंपनी में खरीदे शेयरों के कारण इस्तीफा दे दिया तो एक नयी बहस की शुरूआत हो गयी। लोग पुछने लगे कि किसी कंपनी ने गैरकानूनी ढंग से मुनाफ़ा कमाया हो और उस कंपनी के मुनाफ़े के कारण शेयर होल्डरों को डिविडेंड मिलता हो या उनके शेयरों के दाम बढ़ते हों तो इस मुनाफ़े को स्वीकार करने में क्यों कोई दोष माना जाय ? आखिर कंपनी के कामकाज के तरीकों पर या सिद्धांतों पर शेयर होल्डर का नियंत्रण नहीं के बराबर होता है। खासकर जब लाखों शेयरों की तुलना में उसके शेयरों की संख्या केवल सैकड़ों या हजारों में ही होता है। प्रश्न है कि क्या यह दलील सही मानी जा सकती है ? इसके लिए हमें अर्थशास्त्र के कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर नजर डालनी पड़ेगी।
किसी भी उत्पादन के लिए पूंजी एक महत्वपूर्ण घटक होता है। इसके अलावा चाहिए जमीन, कच्ची सामग्री और म.जदूर। लेकिन इन सबसे पहले चाहिए एक अच्छा दिमाग, तकनीकी ज्ञान, उत्पादन से हो सकने वाले मुनाफ़े का सही अंदाज लगा पाने की क्षमता और इस काम में कूद पड़ने के लिए निर्णय ले पाने का साहस ! ये अंतिम गुण जिस उद्योजक में होंगे वही पूंजी जुटाने की बात सोचेगा। उसकी अपनी पूंजी कम हो तो शेयरों के माध्यम से पूंजी जुटायेगा। शेयरों की अधिक से अधिक बिक्री हो इसलिए वह अपनी योजना और उससे होने वाले मुनाफ़े का अनुमान लोगों के सामने रखेगा। लोग उसका प्रस्ताव परखेंगे। यह जानना चाहेंगे कि उसके कारखाने का मैनेजमेंट अच्छा होगा या नहीं। खासकर यदि उसने पहले किसी उद्योग में अच्छा मुनाफ़ा कमाया हो तो लोग उसकी जांच परख की क्षमता और उद्योग चला सकने की क्षमता पर भरोसा रखेंगे और उसकी नयी प्रस्तावित कंपनी में अपनी भी पूंजी लगायेंगे। किसी नये उद्योग का पब्लिक इशू जब ओवर सब्सक्राइब हो जाता है तो इसका अर्थ होता है कि लोगों को उस उद्योजक के या उसकी कंपनी के सफल होने की आशा है। इसलिए उन्होंने अपनी पूंजी भी उसके साथ लगायी ताकि मुनाफ़े और शेयर एप्रीसिएशन के लाभ में उनका भी हिस्सा रहे।
जब सामान्य आदमी किसी उद्योग में पूंजी लगाता है तो माना जाता है कि उस उद्योग के कारण बढ़ने वाली उत्पादकता और राष्ट्रीय संपत्त्िा की बढ़ोतरी में वह हाथ बंटा रहा है। इसी कारण मुनाफ़े में हिस्सा कमाना भी उसका हक माना जायेगा। लेकिन यह है उन देशों की परिस्थिति जहां पिछले दो शतकों में औधोगिक क्रांति हुई। नई-नई मशीनों के आविष्कार हुए, उन मशीनों से उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। लोगों ने नए-नए कल-कारखाने लगाये, देश की उद्योग क्षमता और उद्योग संपत्त्िा बढ़ायी। दुर्भाग्य से हमारा देश उनकी पंक्ति में नहीं बैठाया जा सकता।
पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से हमारे देश में प्रथा चल पड़ी है कि नयी कंपनी घोषित करना ही काफी है, उसमें अच्छी प्लानिंग करना या अच्छा उत्पादन निकालना या पूरी कार्यक्षमता से कंपनी को चलाना आवश्यक नहीं है। आप पूछेंगे कि भाई उत्पादन न हो तो मुनाफ़ा कहां से आयेगा। इसका उत्तर भी इस प्रथा में है। कंपनी का उद्देश्य जब केवल मुनाफ़ा कमाना ही है, तो हर चीज जाय.ज है वाली कहावत लागू हो जाती है। फिर आप अलग तरीकों से भी मुनाफ़ा कमा सकते हैं -- मसलन आपकी कंपनी टैक्स ही न दे। कहा जाता है कि हर्षद मेहता और उसकी कंपनियों ने अब तक ३००० करोड़ से भी अधिक रुपये का टैक्स छिपाया है। यह तो मुम्बई शहर से वसूल होने वाले कुल टैक्स से भी अधिक है। लेकिन टैक्स छिपाकर अपना मुनाफ़ा बढ़ानेवाला पहला व्यक्ति हर्षद मेहता हो एसा भी नहीं है। उसके पहले भी कई और नाम सामने आ चुके हैं। मुनाफ़ेखोरी का दूसरा तरीका यह भी है, आपकी कंपनी या आप साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर सरकारी नीतियों को ही अपने हक में यूं घूमा-फिरा लें कि आयात और निर्यात की सुविधा, कम ब्याज दर पर बैंक से कर्ज मिलने की सुविधा या अपनी कंपनी के शेयरों को उछालने के लिए थोड़े समय तक बैंक से पैसे या कर्ज हासिल करने की सुविधा इत्यादि आपको मिलती रहे जो कि अन्य किसी कंपनी को नहीं मिल रही हो। यह मुनाफ़ा उत्पादन से नहीं बल्कि हिसाब की हेरा-फेरी से बढ़ा है, भले ही शेयर मार्केट में इसे स्मार्ट्-नेस का नाम दे दिया गया हो।
अब अर्थशास्त्र का नियम है कि जब वास्तविक उत्पादन के कारण मुनाफ़ा बढ़ रहा तो किसी से कुछ छिने बगैर कंपनी अपनी आय और मुनाफ़ा बढ़ा रही होती है। कंपनी का उत्पादन लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा होता है, लेकिन जब उत्पादन करके भी हेरा-फेरी से मुनाफ़ा कमाया जाता है तो किसी की जेब से निकलकर पैसा ''स्मार्ट गाय'' की जेब में जा रहा होता है। आखिर किसकी जेब से पैसा जाता है? उसकी जेब से जिसने अपनी मेहनत की कमाई बैंक में डिपॉजिट की या उछाल आने पर अपनी कमाई से शेयर खरीद लिये, क्योंकि जिन शेयरों को उत्पादन का जोर नहीं है, उन्हें कभी तो गिरना ही है। आज भी स्टेट बैंक का ५०० करोड़ रुपये के घाटे का उदाहरण हम देखें या कराड़ बैंक के डिपॉजिटर्स का नतीजा वही है कि इस घाटे में सामान्य आदमी ही पिसेगा। बैंक के वरिष्ठ अधिकारी तो कई एक करोड़ डकार जायेंगे। किसी एकाध को सजा हो जायेगी बस क्योंकि अपने देश के कानून भी उतने सक्षम नहीं हैं।
देश को सरकार की या शासन की असल जरुरत इसलिए होती है कि एसी हेरा-फेरी को सरकार रोक सके, कानून को और कानूनी प्रक्रिया को सक्षम रखे और आम आदमी के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखे। लेकिन आम आदमी से अलग अपने देश में एक ऊंचे तबके का कुनबा है जिसके लोग इस हेरा-फेरी को रोकने के बजाय इसके मुनाफ़े में हाथ बंटाने में विश्र्वास रखते हैं। इसलिए जब फेयरग्रोथ जैसी कंपनी धड़ल्ले से मुनाफ़ा कमाती है तो शेयर होल्डर यह नहीं पूछता कि मुनाफ़ा कहां से आया? कंपनी के तौर-तरीके क्या हैं। वह मुनाफ़े में अपना हिस्सा पाकर संतुष्ट हो जाता है बल्कि कंपनी के लिए दुआ भी करता है। लेकिन यह अब जाहिर है कि फेयरग्रोथ का मुनाफ़ा ईमानदारी से नहीं आया बल्कि यह लूट का मुनाफ़ा ही है। फिर क्या शेयर होल्डर का इस दोष में कोई भी हिस्सा नहीं?
कहते हैं कि ऋषि वाल्मीकि पहले बटमार थे, राह चलतों को लूटकर उनका धन लूटते थे। एक दिन नारद मुनि से सामना हो गया। मुनि ने कहा -- मुझे मारते हो तो मारो, लेकिन यह पाप ही है। जिन घरवालों और रिश्तेदारों की सुख-सुविधा के लिए तुमने यह पाप का रास्ता चुना, वे तुम्हारी लूट से खुश होते हैं, लूट में हिस्सा बंटाते हैं, लेकिन क्या वे तुम्हारे पाप में भी हिस्सा बांटेंगें? जरा पूछकर तो आना। डाकू ने घर जाकर सबसे पूछा तो वे कहने लगे - तुम्हारा पाप तुम्हारे पास, इसका जिम्मा हमपर कैसा? और जब जिम्मा नहीं तो पाप में हमारा हिस्सा भी क्यों करें? इस पर वाल्मीकि का मोहभंग हुआ और वो बटमारी छोड़कर तपस्या करने चले गये। हर्षद मेहता या फेयरग्रोथ जैसी नावों पर सवार हजारों की संख्या में शेयरों की खरीद-फ़रोख्त करने वाले इस कलयुग में वाल्मीकि के रिश्तेदार ही हैं। उन्हें इससे क्या मतलब कि कंपनी वाकई कुछ उत्पादन कुछ काम करती है या हेरा-फेरी! वह तो यही कहेंगें कि हमने इतनी पूंजी लगायी। कंपनी ने इतने डिविडेंड दिये और शेयर इतने चढ़े, इससे हमें इतना मुनाफ़ा हुआ बस! और इन हेरा-फेरी प्रवीण कंपनियों की मदद से अपना ढोल पिटवाते लोग भी कहेंगें कि देखो-देखो, पूछो इन शेयर होल्डरों से।
लेकिन जो जानता है कि बिना उत्पादन के देश की संपत्त्िा नहीं बढ़ती और जिसे इस देश की चिंता है, यहां के उत्पादन की चिंता है, या जिस पर यह चिंता करने की जिम्मेदारी है, वह जानता है कि फेयरग्रोथ जैसी कंपनी के मुनाफ़े में हिस्सा बांटने पर वह किस दोष की श्रेणी में आता है।
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