बुधवार, 14 जुलाई 2010

04 आरक्षण नीति - एक चिंतन incomplete

आरक्षण नीति - एक चिंतन



आरक्षण की नीति के मामले को लेकर हमारा देश कई दुर्भाग्य पूर्ण दौर से गुजर चुका है। स्वतंत्रता प्राप्त्िा के पश्चात हमारे संविधान कर्ताओं ने बड़े सोच विचार के बाद इस नीति को अपनाया था। भारतीय संविधान के अनुसार न कोई छोटा है न बड़ा - सबको एक ही सा हक है, चाहे वह राजा हो या रंक। लेकिन हमारे देश में हजारों वर्षों से जो जातिव्यवस्था चली आ रही थी, उसने समाज को टुकड़े-टुकड़े बाँट कर रख दिया था। पिछड़े वर्ग और पिछड़ी जाति को कोई सामाजिक स्थान प्राप्त न था। छुआछूत की समस्या थी। साथ ही पिछड़ी जातियां आर्थिक दृष्टि से कमजोर थी और शिक्षा के स्तर पर भी। यही सब देखकर आरक्षण कि नीति अपनाने की जरूरत आन पड़ी। यह विचार किया गया कि, यद्यपि देश में संविधान के सम्मुख सभी नागरिकों का हक एक सा माना जाना चाहिए, पर फिर भी इस मूल्यांकन में पिछड़े वर्गों को साथ कुछ रियायत बरतना आवश्यक है। शताब्दियों की शोषित मानशिकता के बाद इन जाति जमातियों अपने गुण या अपना मूल्य बढ़ाने का यह मौका नही मिला है जो उच्चवर्णियों को मिला है और जिन्हें मौका मिला भी हो उनकी वह क्षमता नहीं थी कि, मौके का सही लाभ सकें। हमारे संविधान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्वांत है अवसर की समानता, लेकिन यह पिछड़ी जातियाँ इस कदर पिछड़ी है कि अवसर की समानता या मौके का लाभ सही ढंग से उठा पाना उनके लिये संभव नहीं। संविधान कर्ताओं ने इस आवश्यकता को महसूस किया कि पिछड़े वर्गों को आगे लाने के लिये उनकी प्रगति का स्तर अधिक वेग से बढ़ाना आवश्यक था और यह सभी संभव था जब उन्हें कुछ विशेष आरक्षण प्रदान किया जाय।

आरक्षण का आरभं हुआ राजनैतिक क्षेत्र से । हमारे देश ने जब प्रजातंत्र को स्वीकार किया तो नागरिकता और मतदान का हक हर एक वयस्क व्यक्ति को दिया गया जो सामाजिक विषमता दूर करने के लिये एक आवश्यक कदम था। लेकिन केवल मतदान का हक दे देना काफी नहीं था। यह भी आवश्यक थाकि पिछड़ी जातियां राजकीय मुख्य धारा से जुड़े और सरकार चलाने में भी उनका सहयोग हो। अतएव संविधान के अंतर्गत एक विशेष सूची बनाई गई जिसमें उन जातियों को शमिल किया गया जिन्हें अछूत माना गया था और जो इस अछूतपन के कारण समाज की अनन्य उपेक्षा के पात्र बने। साथ ही जनजातियों की भी एक अलग सूची बनी। इस प्रकार अनुसूचित जातियां और जनजातियां घाषित हुई। संविधान की धारा ३३० और ३३२ के अंतर्गत यह प्रावधान तय हुआ कि लोकसभा में और राज्यों की विधानसभाओं में इनके लिये कुछ सीटें आरक्षित रखी जायेंगी । आरंभ में यह आरक्षण केवल १० वर्षों के लिये था और यह अवधि १९६० में समाप्त हो जाती। लेकिन यह देखकर कि दस वर्षों के आरक्षण से इस धारा का पूर्ण उद्देश्य सफल नहीं हो रहा था, सरकार ने हर बार संविधान में संशोधन करते हुए दस - दस वर्षों से इस अवधि को बढ़ाया । सन् १९९० में किये गये संविधान के कारण अब इस प्रावधान की अवधि सन् २००० तक कायम रहेगी।

थोड़ा सा पिछला इतिहास देखने पर हम पाते है कि अंग्रेजों के शासन काल के दौरान सर्वप्रथम मद्रास के गबर्नर ने मुसलमानों को पिछड़ा घोषित किया और सन् १८८१ की जनगणना में, जो भारत की दूसरी जनगणना थी, जाति के आधार पर जनसंख्या के आंकड़े इकट्ठे हुए। धीरे धीरे हिंदू धर्म के अंतर्गत विभिन्न व्यवसायों पर आधारित जो जातियां है, जैसे दर्जी, धोबी, कुम्हार इत्यादि इनका ब्यौरा जनगणना में दिया जाने लगा। सामाजिक उच्च स्तरीय विचार से भारतीय समाज की दस श्रेणियां बनाई गईं और प्रत्येक श्रेणी की जनगणना के अलग अलग आंकड़े जुटाये गये। इसमें एक श्रेणी उनकी भी थी जो अछूत थे या उन्हें मंदिर प्रवेश के अधिकार से वंचित रखा गया था। इसी प्रकार पिछड़ी जनजातियों की अलग श्रेणी बनी। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि इन आंकड़ों के आधार पर इन सभी जातियों या धर्मों के लिये अलग अलग चुनाव क्षेत्र बनाये जा सकें। इस प्रकार की व्यवस्था के कारण मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों को अलग धर्मों के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया । इस लाभ् से प्रभावित होकर सायमन कमिशन के सम्मुख दलितों की १६ संस्थाओं ने अलग चुनाव क्षेत्र और अलग प्रतिनिधित्व की मांग की। यह अलगाव जो एक जाति को दूसरी जाति से, और एक धर्म को दूसरे धर्म से काट कर रख देता है, अंग्रेजों की राजनीति का एक प्रमुख अंग था।

परन्तु स्वतत्रंता प्राप्त्िा के बाद यह तय हुआ कि यद्यपि हमें अलगाव की वह नीति दूर रखनी पड़ेगी जो अंग्रेजों ने चलाई थी, फिर भी अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये कुछ विशेष प्रयत्न करने पड़ेगें । इसे पॉजिटिव
डिसक्रिमिनेशन का नाम दिया गया। जहाँ संविधान की धारा ३३० के अनुसार लोकसभा में और ३३२ के अनुसार विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिय सीटें आरक्षित की गई उसी प्रकार धारा ३३१ और ३३३ के अनुसार ऍग्लोइंडियनों के लिये भी सीटें आरक्षित हुई। लेकिन अंग्रेजों ने जो जातिवार जनगणना की पद्वति चलाई थी उसे समाप्त करा दिया गया। अतएव केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों के अलावा अन्य जातियों का अलग स्थान कम से कम जनगणना में नकारा गया है। इसके पीछे भूमिका यही थी कि इससे लाभ के बजाय हानि ही होगी क्योंकि जातीय अलगाववाद बढ़ेगा।

राजनैतिक क्षेत्र के अलावा शिक्षा और आर्थिक स्तर पर अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देने का प्रयास खासकर तीन दिशाओं में हुआ। पहला था शिक्षा की दिशा में । पिछड़ी जातियों की समुचित शिक्षा की गरज से उन्हें मिलनेवाले वजीफें और अन्य सहायता द्वारा, साथ ही शिक्षा संस्थाओं जैसे कॉलेज में उनके लिये कुछ स्थान आरक्षित कराके सबसे पहले उनकी शिक्षा का स्तर सुधारने के प्रयास हुए। नौकरी में उनके लिये कुछ स्थानों का आरक्षण कराके उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास हुआ। और तीसरा सूत्र यही था कि विभिन्न पंचवार्षिक और वार्षिक योजनाओं में कुछ हिस्सा खास तौर से अनुसूचित जाति और जनजातियों की प्रगति के लिये नियत किया जाये।

लेकिन राजनैतिक आरक्षण और अन्य प्रकार के आरक्षणों में यह अंतर है कि शिक्षा और नौकरी के आरक्षण के लिये संविधान में अनुसूचित जाति-जलजातियों के साथ साथ पिछड़ी जातियों का भी अंतर्भाव किया गया है। संविधान की धारा १६ में उल्लेखित शब्द क्ष्द्यद्म डठ्ठड़त्त्ध््रठ्ठद्धड्ड ड़थ्ठ्ठद्मद्मड्ढद्म दृढ ड़त्द्यत्ड्ढदद्म. पर काफी चर्चा हुई। क्योंकि इस प्रावधान में केवल अनुसूचित जाति जनजातियों की ही नहीं बल्कि सभी पिछड़े और कमजोर वर्गों को समाविष्ट किया गया है। उनके लिये प्रयुक्त शब्द भी 'वर्ग' है न कि 'जाति' । इस प्रकार यह तय है कि जहाँ संविधान की धारा ३३०, ३३२ और ३३५ के प्रावधान में अनुसूचित जाति और जनजातियों का उनकी जाति पर आधारित स्पष्ट उल्लेख है, उस प्रकार संविधान की धारा १५ में जो शिक्षा संबंधी आरक्षण का प्रावधान है और धारा १६ में जो सरकारी नौकरियों के आरक्षण संबंधी प्रावधान है वहाँ केवल जाति को आधारभूति नहीं माना गया है।

इस प्रावधान के अंतर्गत केंद्रीय सरकार ने केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये शैक्षणिक और नौकरी के आरक्षण के लिये नियम बनाये। अनुसूचित जातियों के लिये शिक्षा संस्थाओं और सरकरी नौकरी में १५ प्रतिशत आरक्षण और अनुसूचति जनजातियों के लिये ७.५ प्रतिशत आरक्षण नियत हुआ। इस प्रकार के आरक्षण के लिये कोई अंतिम अवधि नहीं की गई है। न्यायालयों ने भी कई बार इसे संपूर्णतया न्यायोचित ही ठहराया है कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये यदि विकास की तेज रफ्तार प्रदान करनी है तो वह आरक्षण नीति द्वारा ही संभव है । उनके लिये शिक्षा और नौकरियों के विशेष और समुचित साधन न जुटाने का अर्थ वही होगा मानो उन्हें मौका प्राप्त करने के सामर्थ्य से वंचित किया गया हो।

अन्य पिछडे वर्गों के लिये आरक्षण देने की नीति को राज्य सरकारों पर छोड़ा गया । फलस्वरूप विभिन्न राज्यों में जहाँ अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये आरक्षण का प्रतिशत तय है पिछड़े वर्गों के आरक्षण के प्रतिक्षण अलग अलग है और समय समय पर इस प्रतिशत में परिवर्तन हुए हैं। साथ ही विभिन्न राज्यों में पिछड़े वर्गों की सूचियाँ विभिन्न हैं। इन्हें बनाने का आधार भी प्रायः जातियाँ ही रही हैं। विभिन्न जातियों ने अपने राजनैतिक दबाव क्षमता के अनुसार बारम्बार आरक्षण सुविधायें अपने पक्ष में जुटाने का प्रयास किया है। इसके कारण कई राज्यों में आंदोलन भी हुए हैं - कभी सौम्य रूप में तो कभी उग्र रूप में, कभी आरक्षण समर्थकों की ओर से तो कभी आरक्षण विरोधकों की ओर से । जब तक यह आंदोलन राज्यों की परिधि में रहे, बाकी देश पर इनका असर कम पड़ा । लेकिन जब केंद्र सरकार ने भी इस नीति पर अमल करना चाहा तो आंदोलनों ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया । आने वाले दिनों में जब भी इस नीति की बात चलेगी तो आंदोलन अवश्य होगें । साथ ही यह आंदोलन दिन प्रति दिन अधिकाधिक हिंसक बनेंगें और समाज में कटुता और अलगाव को बढ़ावा देते रहेगें।

अतः प्रश्न यह उठता है कि जो नीति एक अच्छे उद्देश्य से बनाई गई और आरंभिक काल में जिसके विरुद्ध कोई आक्रोश नहीं उठा, आज उसी नीति को लेकर समाज बिखराव की स्थिति में क्यों आया है?

बलसागर भारत -- साने गुरुजी, हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले

बलसागर भारत
-- साने गुरुजी
हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले
[Can be sung with the same tune as original Marathi]
published in Devputra monthly from Indore
बलसागर होवे भारत
विश्र्व में रहे अपराजित।

ये कंकण बाँधा कर में
जीवन हो जनसेवा में
हों प्राण राष्ट्र के हित में
मैं मरने को भी उद्यत
बलसागर होवे भारत।

वैभव दिलवाऊँ इसको
सर्वस्व सौंप दूँ इसको
तिमिर घोर संहारन को
तुम बंधु, बनो सहायक
बलसागर होवे भारत।

हाथों में हाथ मिलाकर
हृदयों से हृदय जुडाकर
एकता मंत्र अपनाकर
हो जाएं कार्यों में रत
बलसागर होवे भारत।

कर ऊँची दिव्य पताका
गूँजाओ गीत भारत का
विश्र्व में पराक्रम इसका
दिग्‌ दिगन्त गूँजे स्वागत
बलसागर होवे भारत।

अब उठो श्रम करो सार्थ
दिखलाना है पुरुषार्थ
यह जीवन ना हो व्यर्थ
चमकाओ भाग्य का सूरज
बलसागर होवे भारत।

भारत माँ फिर सँवरेगी
प्रभुता भी दिव्य पाएगी
विश्र्व में शांति लाएगी
वह स्वर्णिम दिन है निश्चित
बलसागर होवे भारत।
-------------------------------------
बलसागर भारत होवो, विश्वात शोभुनी राहो

हे कंकण करि बांधियले, जनसेवे जीवन दिधले
राष्ट्रार्थ प्राण हे उरले, मी सिद्ध मरायाला हो

वैभवी देश चढवीन, सर्वस्व त्यास अर्पीन
तिमीर घोर संहारीन, या बंधु सहाय्याला हो

हातांत हात घेऊन, हृदयास हृदय जोडून
ऐक्याचा मंत्र जपून, या कार्य करायाला हो

करि दिव्य पताका घेऊ, प्रिय भारतगीते गाऊ
विश्वास पराक्रम दावू, ही माय निजपदा लाहो

या उठा करू हो शर्थ, संपादु दिव्य पुरुषार्थ
हे जीवन ना तरि व्यर्थ, भाग्यसूर्य तळपत राहो

ही माय थोर होईल, वैभवे दिव्य शोभेल
जगतास शांति देईल, तो सोन्याचा दिन येवो

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

03 आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी

आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी
published in weekly Ravivar

कवि इकबाल ने बडे फख्र के साथ कहा कि युनानी, मिस्त्री, रोमन सभी सभ्यताएँ जहाँ मिट गई, मगर हमारी पहचान अभी बाकी है - कुछ ऐसी बात है कि हमारी सभ्यता मिटती नही है ।

मिटती तो खैर न हो, लेकिन सिमटती जा रही है जरूर वह भी हमारे ही बनाये छलावो के कारण ऐसे समय में पथदीपक कौन है ? जब इतिहास की ओर नजर उठाई तो सबसे पास एक व्यक्तित्व दीख पड़ता है - आदि शंकराचार्य

प्रचुर विव्दता, सन्यासी प्रवृत्त्िा, सामाजिक प्रश्नों की मार्मिक पहचान एक तिलतिलाहट, एक चुभन - कि क्योंकर हिन्दु समाज सारी सामाजिक कुरीतियों के दलदल में फंस रहा है, क्योंकर लोगो को सामाजिक न्याय की निश्च्िातंता केवल बौध्द धर्म में ही मिल रही है ? क्योंकर वैदिक कर्मकांण्ड़ मे उलझ कर रह गया हमारा विव्दत् समाज एक शिक्षक, एक आलोचक और एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में असमर्थ है? आदि शंकराचार्य की पहचान हम जाने अनजाने इन प्रश्नों के साथ और उनके समाधान के साथ करते है.

अत्यंत छोटी आयु मे ही आदि शंकराचार्य संन्यास ग्रहण किया और फिर घर से बाहर सुदूर प्रांतो में जाकर विधाध्ययन किया । हिंदू समाज रचना में संन्यासी का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है । सारे समाज को पीढीदर - पीढी गलत रास्ते पर भटकने से रोकते रहना हो तो समाज में कुछ ऐसी परम्परा का होना और कुछ ऐसे व्यक्तियों का होना आवश्यक है जो द्रष्टा हो, दार्शनिक हों और अपने वैयक्तिक लाभ से परे उठकर समाज के विषय मे सोच सकें और समाज को राह दिखाने का काम कर सकें. कहते है कि इस प्रकार पथप्रदर्शन का काम राजा और विद्वान छोटे पैमाने पर और सन्यासी बडे पैमाने पर कर सकते है । लेकिन शर्त यह है कि सन्यासी को अपना धर्म अच्छी तरह मालूम हो । उसका सन्यासी बनना महज एक आलसी के लिये पेट पालने का बहाना न हो।

निश्च्िात ही यह माना जा सकता है कि आदि शंकराचार्य को उस मर्म की पहचान थी। तभी तो सन्यासी होते हुए भी उन्होने समाज से दूर, समाज से अपरिचित रहने का रास्ता नहीं अपनाया। बल्कि समाज में रहते हुए, घुम घुम कर, समाज की अनिष्ट मान्यताओ का खंड़न किया व्दैतवाद के चक्कर में बुरी तरह से फँसे और वैष्णव - शैव - शाक्वत वाद के फलस्वरूप टुकडे टुकड़े होकर बिखर रहे समाज में अव्दैतवाद की स्थापना कर समाज में एकीकरण की प्रक्रिया जारी कराई. इसके साथ बुध्द धर्म में भी जो अधःपतन और अवनति हो रहा था उस पर चोट की जिससे एक और यधापि बौध्द धर्म का भारतवर्ष में विस्तार भले ही रूक गया हो, पर इस अवनति से उबरने के प्रयत्न भी आरंभ हो गये।

अंततः शंकराचार्य ने भारतवर्ष के चारो कोने में चार ज्ञानपीठों की स्थापना की और अपने उत्तराधिकारियों की वहाँ प्रस्थापित किया ताकि यह ज्ञानपीठ पूर्णतः सही माने में समाज के पथप्रदर्शन के लिये एक परमेंनेट इनस्टियुशॅन बन जाये

यह बडे दुर्भाग्य की बात है कि शंकराचार्य की विभिन्न रचनाओं को जिस प्रकार उन्होने शब्दबध्द किया, निबधित किया और उसकी प्रतियाँ बनाकर सुरक्षित रखी गई, उस प्रकार शंकराचार्य के विभिन्न वाद - विवाद, शास्त्रार्थ और चर्चाओ को शब्दाकिंत कर सुरक्षित रखने कि आवश्कता किसी ने नही समझी

परंतु शंकराचार्य के जीवन काल की एक घटना ऐसी है जिसकी दुहाई उनके उत्तराधिकारी बार बार देते है उस घटना व्दारा अव्दैतवाद के सिध्दान्त की पुष्टि कराने के लिये

कहते है कि एक बार आदि शंकराचार्य बनारस के घाट पर गंगा स्नान करके बाहर निकले ही थे कि एक चमार उनसे छुआ गया संस्कारों के प्रबल प्रभाव के अंतगर्त शंकराचार्य ने कहा दिया अपसर अर्थात 'दूर हो जा'

चमार ने हँसकर उनसे पुछा यह तुम किससे दूर हटने के लिये कह रहे हो क्या मेरी आत्मा से? पर वह और तुम्हारी आत्मा ब्रह्म एक ही है. रही बात मेरी दोह की तो तुम्हे उससे क्या अंतर पड़ता है? वह उसी के चाभ से बनी है जिससे तुम्हारी भी देह बनी है.
इस पर शंकराचार्य को अपनी गलती का पता चला और उन्होने चमार को प्रणाम कर अपना गुरू बना लिया.

इस घटना से वह स्पष्ट है कि स्पृश्य - अस्पृश्य के भेदभाव को समाप्त करना का निर्णय शंकराचार्य ने अवश्य किया होगा. अवश्य ही उनके ज्ञानपीठो में उन्होने कुछ निर्देश दिये होगें. लेकिन आज इन्ही ज्ञानपीठो के सत्ताधिकारी किसी सामाजिक प्रश्न पर चर्चाए चलाते हुए नही पाये जाते है - और खासकर अस्पृश्यता के प्रश्न पर तो अब ऐसा रुख अपनाया जा रहा है जो अव्दैतवाद के सिध्दान्त को किसी गहन अंधेरे कोने में फेंक देने का सामथ्य रखता है यह भ एक दुर्भाग्य की ही बात है कि ज्ञानपीठो के ये अधिकारी सत्ताधिकारी तो है लेकिन वे ज्ञानाधिकारी है या नही इसके विषय में संदेह किया जो सकता है जब मंड़न मिश्र की पत्नी ने शंकराचार्य को विव्दत्सभा में शास्त्रार्थ के लिए ललकारा तो आदि शंकराचार्य पीछे नही हटे . परन्तु आज यादि कोई जिज्ञासु भी प्रश्न पुछे तो उसे दरकिनार कर दिया जाएगा फिर शास्त्रार्थ के लिए तैयार होना तो दुर ही रहा.


इसलिए आदि शंकराचार्य की गद्दी पर जो भी बैठते हो, यदि उनका दावा है कि वे ज्ञान के अधिकार से वहाँ बैठे है - तो एक प्रश्न उनसे पुछना आवश्यक है । वह यह कि समाज पुरूष की प्रगति के लिए सबसे बाछनीय क्या है? धन धान्य का विस्तार या निरंकुश सत्ता का विस्तार या ज्ञान का विस्तार? यदि ज्ञान का विस्तार ही सबसे - अधिक वाछनीय है, तो किसी को अस्पृश्यता के नाम पर ज्ञान से वंचित रखना क्या उचित है ? यह भी उनसे पुछना चाहिए कि ज्ञानोपासना में श्रध्दा का क्या महत्व है ? (हालाँकि इसका उत्तर भगवद्गीता में है - जब श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि मेरे दर्शन के अधिकारी तुम ङुए हो वह तुम्हारे ज्ञान, दान, जप, तप की अपेक्षा तुम्हारी भक्ति के कारण हुए हो. ) यदि नही है तो स्वयं भी मंदिरो में जाना छोड़ दें - और यदि है तो किसी को श्रध्दास्थान में जाने से रोककर क्या ज्ञान का विस्तार हो सकता है ?

ज्ञान की बात मेंने इसलिए उठाई है के अस्पृश्यता सिध्दान्त को जब कभी बढाया दिया गया और दूसरी ओर से कबुल भी कर लिया गया - उस समय निश्चय ही उनके अज्ञान का लाभ उठाया गया और फिर लाभ कायम रखने के लिये उनके अज्ञान को पनपाया गया - यह कहकर कि वे ज्ञान के अधिकारी नही है. और खासकर आज के परिप्रेक्ष्य में जब हमारा समय अपने ही दायरे में सिमट कर छोटा होता जा रहा है और बिखर रहा है, और वही काम एक बार फिर करना आवश्यक हो गया है जो कभी आदि शंकराचार्य ने किया था - तो जाहिर है कि इस प्रश्न की जिम्मेदारी न केवल उनके उत्तराधिकारियों को ही निभानी है बल्कि उन सभी को जो इन शंकराचार्येकी भक्त मंड़ली में है. क्या वे निभायेगें इस जिम्मेदारी को?
-------------------------------------------------

रविवार, 27 जून 2010

मेरी प्रांतसाहबी के लोकार्पण पर श्रीमति प्रज्ञा शुक्ल

हिन्दी (भारतीय भाषा) दिवस समारोह, आयोजक -- महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी, (देखें उनकी रिपोर्ट)
14 सितम्बर, 2009
---- श्रीमति प्रज्ञा शुक्ल
आदरणीय मंच एवं दीर्घा में उपस्थित आप सब को नमस्कार |
साहित्यकार अपने परिवेश की ही पौध होता है | वह अपने जीवनमें आसपासके, विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक स्थितियों, संस्कारों एवं मूल्यों रूपी हवा, पानी एवं स्वाद से अपने व्यक्तित्व-रुपी पौधे को एक वटवृक्ष के रुप में विकसित करता है | प्रेमचन्द का कथन है कि साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है, जो भाव और विचार लोगों के ह्दयों को स्पंन्दित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं | अत: साहित्यकार अपने परिवेशसे एवं उसके साहित्य-परिवेशगत संवेदनाओंसे प्रभावित होता है |

श्रीमती लीना मेहेंदले की पुस्तक मेरी प्रांतसाहबी लीनाजी के बहुमुरबी व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब है | इस पुस्तक में समाविष्ट 11 लेख उनके आसपास घटित घटनाओं पर उनके वाचन, मनन और चिंतन की अभिव्यक्ति है| ठोस सामाजिक मुद्दों पर विवेचना लीनाजीके लेखन का सबसे सशक्त माध्यम है| फिजिक्स की प्रवक्ता से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के विभिन्न पदों पर कार्यरत लीनाजी का मातृभाषा मराठी एवं हिन्दी दोनों पर समान अधिकार है जिसका उन्होंने लेखन एवं अनुवाद के द्बारा रचनात्मक रूपसे भरपूर उपयोग किया है | देश की विभिन्न समस्याओं, घटनाओं, सामयिक स्थितियों नें लीनाजी को प्रभावित किया है | उनके प्रति जागरुकता दर्शाकर उन्हें सुधारने की दिशा में लीनाजी निरंतर कार्यरत एवं चिंतनरत है |

लीनाजी का लेखन केवल किसी हकीकत का सीधा सपाट बयान नहीं है परंतु उसमें वे अपने चिंतन के अमूल्य मोती भी पिरोती जाती हैं | सामान्य पाठक की जानकारी हेतु विभिन्न मुद्दों पर छोटी-छोटी टिप्पणी भी करती चलती हैं | इस पुस्तक का शीर्षक है मेरी प्रांतसाहबी | इसी शीर्षक से 41 पृष्ठों का एक आत्मकथ्यात्मक लेख है जिसमें उनके प्रशासकीय जीवन के आरंभिक अनुभव समाविष्ट हैं | असिस्टंट कलेक्टर, सब-डिविजनल ऑफिसर, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के लिए महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में प्रांतसाहब संबोधन अधिक परिचित है अत: शीर्षक है मेरी प्रांतसाहबी | इसमें लीनाजी ने अपने प्रशिक्षण एवं कार्यकाल के दौरान जो गुर सीखे, अपने पिता एवं पति के घड़ी के साथ जुड़े कार्यक्षेत्र की तुलना में अपनी चौबीस घंटोंकी डयूटी का तालमेल, अन्य अधिकारियों से प्राप्त प्रेरणा, अपने स्त्री होने के कारण प्रांतसाहब के समक्ष आनेवाली समस्याऐं एवं दायित्व, एक सजग अधिकारी के रूप में अपनी कार्यकुशलता, विवेकबुध्दि का उपयोग, शासन प्रणाली की कमजोरी एवं महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में प्रगति की धीमी गतिसे चिंतित लीनाजी का विचारोत्तेजक एवं दूरदर्शी रूप उभरता है |

महिला संशक्तिकरण एवं महिलाओं के साथ होनेवाले अत्याचार, उनकी हत्यासे आनेवाली पीढ़ी के लिए एवं देश में स्त्रियों की स्थिति के लिए लीनाजी की चिंता व्यक्त होती है | वे मानती हैं कि अपराधी को तत्परता से सजा नहीं दिए जाने के लिए हमारी ढीली दंड-प्रक्रिया और न्यायिक कार्यवाही जिम्मेदार है | “विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराधों का विश्लेषण”, “राजस्थान : कहाँ है जनमने और पढ़ने का हक”, “महिला सशक्तिकरण की दिशा में”, तथा “उन्मुक्त आनंद का फलसफा” जैसे लेख लीनाजी की महिला विषयक गहरी सोच और सरोकार का परिचय देते हैं | “व्यवस्था की एक और विफलता” लेख हमारी कमजोर पड़ती शासन व्यवस्था का पर्दाफाश करता है | वे मानती हैं पेपरलीक का उपाय परीक्षा पद्धति में बदलाव एवं कम्प्युटर के सही उपयोग द्बारा संभव है |

हिन्दी भाषा के प्रति लीनाजी का लगाव और चिंता उनके भाषा विषयक लेख दर्शाते हैं | हिन्दी एवं भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे से जुड़कर ही अपना भविष्य संवार सकती हैं | आज तक हम हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ में मान्यता नहीं दिला पाए इसके लिए वे राजनेता एवं हिन्दी साहित्यकारोंको जिम्मेदार ठहराती हैं | सुरीनामियों की भाषाविषयक चिंताको लीनाजी हमारी भाषाविषयक चिंता से जोड़कर देखती हैं |

गो.नि.दांडेकर संस्मरण में उनके लेखनकी विशेषताओं का उल्लेख है तो कुसुमाग्रज की कविताओं के अनुवाद को वे एक सागर मथनेके समान मानती हैं | डॉ.राज बुध्दिराजा लेख में भारतीय समाज में पुत्र और पुत्री के बीच भेदभाव का मर्मस्पर्शी चित्रण है | भगवद्गीता से प्रभावित लीनाजीने उसमें वर्णित बुद्धियोग की विस्तार से चर्चा की है |

नकली स्टॅम्प पेपर बनानेका करोबार चलानेवाला एक सामान्य स्टॅम्प वेन्डर तेलगी जब पूरे देश की प्रभुसत्ता के साथ खिलवाड़ करता है तो एक प्रशासक एवं जिम्मेदार नागरिक के रुप में लीनाजी का खून खौल उठता है | मतपत्रिका में नापसंदगी जताने की सुविधा के विषय में जब चुनाव आयोग ने कहा कि अभी हम इसके लिए तैयार नहीं हैं तो लीनाजी सवाल उठाती हैं कि क्या डर है चुनाव आयोग या प्रशासन या संसद-मंडल को ? कहीं यह डर लोगों की मुखरता का तो नहीं ?

बायोडीजn -अपार संभावनाएँ उनका भविष्यदर्शी चिंतनपरक लेख है | दिल्ली में स्थित खाली पड़ी अगस्तक्रांति भवन की इमारत विषयक लेख में कार्यालयों मे छुट्टी के माध्यम से राष्ट्रीय सँपत्ति गंवाने के बारे में लीनाजी ने चिंता प्रकट की है | इस पुस्तक का अंतिम लेख मालूम ही नहीं कि सुभाष स्वतंत्रता सेनानी थे सरकारी फाइलों के रिकार्ड पर करारा व्यंग्य है |

कुल मिलाकर मेरी प्रांतसाहबी पुस्तक लीनाजी के व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन, उनके हर्ष-शोक, संयुक्त कुटुंब पद्धति के लाभ, एक कुशल एवं कर्मनिष्ठ प्रशासक के जीवन की विभिन्न घटनाओं एवं भाषा, समाज, प्रशासन, व देश के प्रति चिंतन का प्रामाणिक दस्तावेज है |

धन्यवाद
----------------------------------------------------------------------














शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

पेट्रो अंकल अर्थात मुनीश की टिप्पणी -- मेरी प्रांतसाहबी

मेरा तीसरा लेख संग्रह -- मेरी प्रांतसाहबी
श्वेताभ अश्क
संकेत प्रकाशन, लखनऊ
अनुक्रम --
मेरी प्रांतसाहबी
.
.
.
.
.

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

एक था फेंगाडया

प्रस्तावना
-- डॉ. अरूण गद्रेके उपन्यासके भाषान्तर की--
हजारों वर्षों पहले जब आदिमानव गुफा रहता था, जब उसने केवल आग जलाना और झुण्ड में रहना सीखा था लेकिन गिनती, खेती, वस्त्र, चित्रकला, जख्मी का इलाज आदि से अभी कोसों दूर था, उस जमाने के मानव से आज के मानव तक का उन्ननय का इतिहास क्या है?
प्रसिद्ध मानववंश शास्त्रज्ञ डॉ मार्गरेट मीड अपने एक लेख में कहती हैं-"A healed femur is the first sign of human civilization"
डॉ मीड कहती हैं, उत्खननों में मानवों की कई हड्डियाँ मिली थीं, जो टूटी हुई थीं। ये वे लोग थे जिनकी हड्डियाँ जानवर के आक्रमण या अन्य दुर्घटना में टूटीं और इस प्रकार असहाय, रूद्धगति बना मनुष्य मौत का भक्ष्य हो गया। कई हड्डियाँ मिली जो अपने प्राकृतिक रूप में थी- अखण्डित। ये वे मनुष्य थे जो हड्डी टूटकर, लाचार होकर नही, वरन्‌ अन्य कारणों से मरे थे। लेकिन कई सौ उत्खननों में, कई हजार हड्डियों में कभी एक हड्डी ऐसी मिली, जो टूटकर फिर जुड़ी हुई थी। यह तभी संभव था जब लाचार बने उस आदमी को किसी दूसरे आदमी ने चार छः महीने सहारा दिया हो, खाना दिया हो, जिलाया हो। जब सबसे पहली बार ऐसा सहारा देने का विचार मनुष्य के मन में आया, वहाँ से मानवी संस्कृती की, करूणा की संस्कृति की, एक दूसरे की कदर करने की संस्कृती की शुरूआत हुई। जाँघ की टूटकर जुड़ी हुई हड्डी साक्षी है उस मनुष्य के अस्तित्व की जिसमें करूणा की धारा, और उसे निभाने की सक्षमता पहली बार फूटी।
डॉ. मीड के लेख को पढने के बाद पेशे से डॉक्टर श्री अरूण गद्रे को लगा कि यह एक बड़े ही मार्मिक संक्रमण काल का चिह्न है। कैसा रहा होगा वह मुनष्य, वह हीरो, जिसके ह्रदय में पहली बार यह दोस्ती और सहारे का झरना फूटा होगा।
डॉ. गद्रे ने इस विषय पर डॉ. पॉल ब्रॅण्डट् से चर्चा की। डॉ. ब्रॅण्डट् तीस वर्ष तक वेल्लोर के ख्रिश्चन मेडिकल कॉलेज में कुष्ठरोगियों के बीच रहे और उनके गले हुए हाथों पर सर्जरी की पद्धति विकसित करने के लिए प्रख्यात हैं। एक पत्र में ब्रॅण्डट् ने गद्रे को ऐसी ही दूसरी कहानी लिखी है- 'कोपेनहेगेन की एक म्यूजियम में छः सौ मानवी कंकाल जतन कर रखे गए हैं। ये सारे कंकाल उन कुष्ठरोगियों के हैं जिन्हें पाँच सौ वर्ष पूर्व एक निर्जन द्वीप पर मरने के लिए छोड़ दिया गया था। इन सभी कंकालों के पैर की हड्डियाँ रोग के कारण घिसी हुई हैं। लेकिन इनमें कुछ कंकाल अलग रखे गए हैं क्योंकि उनकी पाँव की हड्डियों पर बाद में भर जाने के चिहन स्पष्ट हैं। इसलिए कि कुछ मिशनरी उस द्वीप पर गए थे और जितना बन सका उन कुष्ठ रोगियों की सेवा की। इसी से कुछ रोगियों के पैर की घिसी हड्डियाँ भर गई। वे अलग रखे गए कंकाल साक्षी हैं उन मिशनरियों की सेवा के।
डॉ. ब्रॅण्डट् से विचार विनिमय के पश्चात डॉ. गद्रे ने जिन संदर्भ ग्रंथों को पठन और मनन किया वे थे- दि ऍसेन्ट ऑफ मॅन, कॅम्ब्रीज फील्ड गाइड टू प्रीहिस्टोरिक लाइफ, दि डॉन ऑफ ऍनिमल लाइफ, इमर्जन्स ऑफ मॅन, तथा गाइड टू फॉसिल मॅन।
इन सभी के मंथन और डॉ. गद्रे की अपनी साहित्यिक प्रतिभा से एक उपन्यास के चरित्र तैयार हुए वे थे फेंगाडया, बापजी और बाई के। उन्हीं से ताना बाना बुना गया टोलियों और बस्तीयों के बनने, उजड़ने और आगे बढ़ने का- मानवी संस्कृति के विकास का। वही उतरा है मराठी उपन्यास 'एक होता फेंगाडया' में।
मराठी में यह उपन्यास १९९५ में प्रकाशित हुआ। उसी वर्ष इसकी बडी जीवट वाली वृद्ध प्रकाशिका श्रीमती देशमुख से मैं मिली थी। तब तक मैं सिद्धहस्त अनुवादक के रूप में प्रसिद्ध हो गई थी क्योंकि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं से कई कहानियाँ मैंने मराठी में अनूदित की थीं और उसी कथा संग्रह का प्रकाशन देशमुख कंपनी करने वाली थी। चूँकि मेरी चुनी हुई कथाओं के कथानक नितान्त विभिन्न रंग-ढंग-इतिहास-भूगोल के थे, तो उसे मेरी रूचि जानकर मुझे यह पुस्तक पढने के लिये कहा। अगले तीन दिनों में ही मेरे दिमाग में यह इच्छा दर्ज हो गई कि इसका हिंदी अनुवाद करना है। ऐसी ही इच्छा अन्य पांच पुस्तकों के लिये है जिनपर मैंने अभी तक काम शुरू नही किया है। ज्ञानपीठ के श्री श्रोत्रिय से एक बार मैंने फेंगाडया की चर्चा की तो उनका आग्रह शुरू हो गया कि इसका अनुवाद जल्द से जल्द किया जाये।

फेंगाडया के कथानक में एक बडी कठिनाई यह है कि यह प्रागैतिहासिक काल से जुडी हुई रचना है। मैं नही जानती की हिंदी में रांगेच राघव जी के अलावा किसी ने इस प्रकार का प्रयास किया है। यह वह काल है जब मनुष्य ने खेती नही सीखी- वस्त्र पहनना नही सीखा- यहाँ तक कि पेड की छाल लपेटना भी नही। केवल बांस की खपच्चियों से बने कुटीर का उपयोग सीखा है। आग का उपयोग सीखा है। फिर भी कंदरा और गुफा पूरी तरह से नही छूटी है। भाषा विकसित नही हुई है। फिर भी मनुष्य विकसित हो रहा है- उसमें एक 'हिरोइक स्पिरिट' है। नया सीखने की ललक है। कलाकार की प्रतिभा है, दार्शनिक का तत्व-चिंतन है।

इसी लिये उपन्यास में एक हीरो या एक हीरोईन नही है- कई हैं। एक फेंगाडया है जिसमें शक्ति-सामर्थ्य है, दूरदृष्टि है, करूणा है और अपने विश्र्वास के प्रति अडिगता है। एक पंगुल्या है जो खोजी है- वैज्ञानिक है, गणितज्ञ है। एक पायडया है जो कथाकार है, कलाकार है और संगीतकार है। एक बाई है जो नेता है, दिशादर्शक है, अनुशासन और शासन करना जानती है। एक चांदवी है जो किशोर बयीन है और हर बार सवाल उठा सकती है- क्यों? एक कोमल है जो अपनी समझदारी से सबके लिये आधार बनकर डटी है।

और एक बापजी है- जो सत्ता के खेल को अच्छी तरह समझ सकता है, खेल सकता है और अपनी विध्वंसक आकांक्षा के लिये मकड जाल बुन सकता है। उस जाल को तोडकर- समाज को विकास के अगले सोपान पर ले जाने वाला उपन्यास है- फेंगाडया।

भाषा- भले ही उपन्यास का प्रकाशन इक्कीसवीं सदी का हो, लेकिन उसका घटनाकाल यदि दस पंद्रह हजार वर्ष पुराना है तो उसकी भाषा कैसी होगी? इसी लिये उपन्यास में जरूरत पडी कि इसका शब्द-भंडार सीमित रखा जाय, सरल रख्खा जाय- और फिर भी अभिव्यक्ति पूरी हो। हाँ, पठन को नादमय, और लयात्मक बनाने के लिये कुछ शब्दों को खास तौर पर रखा गया है जैसे ऋतुचक्र, मरण, मृतात्मा, सूर्यदेव।

भाषा- उस काल में व्यक्तियों का नाम देने का चलन तो था (बिना नामों में उपन्यास कैसे
बने?) लेकिन उसका तरीका क्या हो सकता है? तो सबसे सरल है कि व्यक्ति की देहयाष्टि के अनुरूप नाम दिया जाय। और मराठी में यह चलन भी है कि किसी नाम को आदरपत्र बनाना हो तो अन्त में 'बा' लगे और उसे मित्रता या छोटेपन के भाव से जोडना हो तो 'या' लगे। इसी लिये कथानक के पात्रों के नाम बने- फेंगाडया- जो पांवों को तिरछा फेंक कर चलता है, पंगुल्या- जो पंगु है। वाघोबा- अर्थात्‌ वाघ का भयकारी रूप।

आयुर्वेद की कई मान्यताओं का प्रयोग भी इस उपन्यास में बखूबी हुआ है। मसलन, महाराष्ट्र में अब भी माना जाता है कि कुछ बच्चे जिनके जन्म के समय पैर पहले बाहर निकलते हैं और सिर बाद में, उनमें कुछ विशेषता होती है। उन्हें पायडया कहा जाता है। ग्रामीण भागों में अब भी माना जाता है कि किसी औरत का बच्चा आसानी से पेट से न निकल रहा हो और कोई पायडया उसके पेट पर हल्की सी लात मारे तो बच्चे का जन्म तुरंत हो जाता है। सारे पायडया प्रायः कलाकार होते हैं। यह भी माना जाता है कि उन्हें जमीन के नीचे पानी होने का संकेत मिल जाता है- और धन के होने का भी। जाहिर है कि ये मान्यताएँ हजारों वर्षों में बनी हैं। लेखक ने इनका अच्छा उपयोग उपन्यास में किया है।

उपन्यास में सारे भाव, सारे रसों की सृष्टि आखिरकार शब्दों से ही होती है। और इस उपन्यास का शब्द भांडार है सीमित। इसी लिये कई ध्वन्यात्मक शब्दों को मैंने मराठी से ज्यों का त्यों लिया है- मराठी मूलतः एक कठिन स्वरोच्चारों की भाषा है जबकि हिंदी मृदु स्वरोच्चारों की भाषा है। मराठी का शब्द भांडार भी अधिक विस्तृत है। अतएव कुछ शब्दों का चयन मराठी से करना पडा। पहली बार उन्हें पढना थोडा अटपटा जरूर लगता है, लेकिन दूसरी तीसरी बार पढते पढते उनके अर्थ, उपयोगिता और सटीकता भी सामने आने लगते हैं। ये शब्द हिंदी में इतने आसानी से घुल मिल जाते हैं कि उनका अटपटापन समाप्त हो जाता है।
अनुवाद पूरा कर लेने के बाद श्रोत्रिय जी ने सुझाया कि इस पर श्री रामकुमार 'कृषक' से सलाह ली जाय, उधर मैंने अपने तईं श्री दिनेश शुक्ल जी से भी राय सलाह कर ली थी। इन दोनोंके सुझावों ने उपन्यास के अनुवाद को निखारा है।

एक तो प्रागैतिहास कालीन उपन्यास- तिस पर एक खास ऍन्थ्रोपोलॉजिकल तथ्य को आधार बनाकर लिखा हुआ- फिर भी मुझे विश्वास है कि हिंदी के प्रबुद्ध पाठक इसका स्वागत करेंगे, क्योंकि किसी पाठक के मन में जिज्ञासा और नवीनता के लिये जो अकुलाहट होती है- यह उपन्यास उसका समाधान करता है।
--------------------------------------------------------

गुरुवार, 19 मार्च 2009

महिला समस्या सहारा (18-04-2001)

 महिला समस्या सहारा
(mahila samasya sahara)  नोट:- यह लीना मेहेंदले के व्यक्तिगत विचार और सुझाव हैं।
To look for these articles.
राष्ट्रीय सहारा
१८/४/२००१ के लिये
प्रश्न १:- शादीके नौ वर्ष हो गये। दहेजके लियेे पतिने तंग करना आरंभ किया तो मैं मैके आ गई। साथमें दो बच्चियाँ भी हैं । पति कोई पैसे नही देता। मुझे क्या करना चाहिये?

शादी के सात वर्ष बाद पति आपसे दहेज माँगना शुरु करे यह बात कुछ समझ में नही आती। आप शारिरिक यातनाओंके विरुध्द भी रपट दर्ज करा सकती हैं और दहेज माँगने के बाबत भी। गुजारा भत्तेके लिये भी आप भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ के अंतर्गत पुलिस व कोर्ट में जा सकती हैं। या फिर राष्ट्रीय महिला आयोग में विस्तार से अपनी शिकायत भेज सकती हैं। गुजारा भत्ता केवल आपको ही नही, लडकियों को भी मिलेगा।

प्रश्न २:- मैं तेइस वर्षकी हूँ। जिस लडकेसे प्यार करती हूँ वह माँ-पिताको पसंंद नही है, वे शादीके लिये राजी नही। हमारे शारिरिक संबंध बन गये और अब मैं पेटसे हूँ। क्या मैं माता-पिताकी इच्छा विरुद्ध शादी कर सकती हूँ?

आप बालिग हैं। यदि लडका आपसे शादी करने के लिये तैयार है तो आपको रजिस्टर्ड मॅरिज कर लेना चाहिये, वरना गर्भ की बात कितने दिन छुपी रहेगी? फिर इस दौरान जो मानसिक तनाव होगा उसका गर्भ पर बुरा असर पड सकता है। आपको तुरंत रजिस्टर्ड मॅरिज कर लेना चाहिये।
प्रश्न ३:- हमारी शादी के चार साल  हो चुके और हम सास-ससुरसे अलग घरमें रहना चाहतेे हैं, परन्तु ससुरने धमकी दी है कि वे हमें संपत्तिसे बेदखल कर देंगे। संपत्तिमें अपना हक पाने के लिये मेरे पति को क्या करना चाहिये ?
आपके ससुर की अपनी मेहनतसे कमाई संपत्ति में आपके पति का कोई हक नही बनता है। पैतृक संपत्ति में अवशय ही आपके पति हक माँग सकते हैं और न मिलता हो तो सिविल कोर्ट में केस कर सकते हैं। दूसरी ओर आप यह भी सोच सकती हैं कि यदि पति की कमाई ठीक ठाक है और आप दोनो आपस में खुश हैं तो असल कमाई तो आपने पा ही ली। आगे की सलाह इस बात पर निर्भर करेगी कि आपके पति के अन्य भाई-बहन कितने हैं और आपका उनसे व्यवहार कैसा है। लेकिन मैं अपने व्यक्तिगत उदाहरणसे जानती हूँ कि  छोटेमोटे झगडे हों तो उन्हें टालकर एकत्र रहनेमें सबका फायदा होता है। सरसे पानी गुजर जाय तो ही अलग होना चाहिये।

प्रश्न ४:- मेरी आयु 12 वर्ष की है और घरमें सौतेली माँ, सौतेले भाई-बहन हैं जिस कारण पिा मेरी पिटाई और शारिरिक शोषण करे हैं। मैं किससे मदद माँगू ?
तुम्हारा शारिरिक शोषण क्या होता है, यह तुम्हें खुलासेवार बताना होगा। बच्चों को मारपीट करना कानून की आँखों में गंभीर अपराध है और तुम पुलिस में या महिला आयोग या अपने राज्यके मानवधिकार आयोग में जा सकती हो। लेकिन उससे पहले क्या तुम्हारे ऐसे कोई रिश्तेदार नही बचे, जो तुम्हारे पिता को समझा
सकें, मसलन दादा-दादी, चाचा, बुआ, नानी, मामा, मौसी इत्यादि? तुम अपने स्कूल के प्रिंसिपल से भी बिनती कर सकती हो कि वे पिता को बुलाकर समझायें। क्या तुम्हारे सौतेले भाई बहन हैं? यदि हाँ तो तुम बडप्पन के नाते उनसे कैसा व्यवहार करती हो यह भी तुम्हें देखना पडेगा।

प्रश्न ५:- मेरी उम्र 73 वर्षकी है, पहली पत्नी व दूसरी पत्नी का देहान्त हुआ है। मेरी कमाई का कोई जरिया नही। परन्तु मेरा सौतेला बेटा जो सरकारमें ऊँचे ओहदेपर है, वह मुझे कोई मदद नही देता। क्या मैं महिला आयोगसे शिकायत कर सकता हूँ ?
अभी के कानून के मुताबिक सौतेले बेटेसे गुजारा भत्ता नही माँगा जा सकता।

प्रश्न ६:- मैं एक मुसलमान लडकी हूँ। मेरे पतिने दूसरी शादी करके मुझे व बच्ची को मायके भेज दिया है और कोई गुजारा नही देता। कोर्ट में उसने केस दे दी है कि वह मेहर की रकम तथा तीन महिने के गुजारे की रकम मुझे देने की पेशकश कर चुका है, लेकिन मैंने मना कर दिया था इसलिये उसे तलाकशुदा घोषित किया जाय। क्या मुझे कोई हक नही?
नसरीन (बदला हुआ नाम), फरीदाबाद

मुसलमान धर्मग्रंथों के मुताबिक भी पति दूसरी शादी तभी कर सकता है, जब वह दोनों बीवियोंसे समान रूप से व्यवहार करे और दोनों का समान रूप से खयाल रखे। तलाक चाहने पर गुजारा भी केवल ३ महीने का नही बल्कि पूरी उमर का देना पडेगा, जैसा कि हाल में मुंबई हायकोर्ट ने फैसला दिया है। इसके अलावा आप भारतीय दंड- प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ में भी कोर्ट से गुजारा भत्ते की माँग कर सकती हैं।