रविवार, 4 जुलाई 2021

औरत के विरूद्ध -- पश्यंति मासिक

 

औरत के विरूद्ध

किसी समाज की अच्छाई की माप क्या हो सकती है यहि कि उसके विभिन्न वर्गों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है। इसिलिए यह जानना जरूरी है कि किसी भी समाज में गुन्हगारी कितनी है, खासकर महिलाओं के प्रति घटने वाले अपराध किस तरह के और कितने हैं। इनमें भी बलात्कार के अपराधों का विश्लेषण अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकी औरत जात के विरूद्ध यह सबसे अधिक घृणित अपराध है।

भारत सरकार के नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो की मार्फत यह लेखा- जोखा रखा जाता है कि प्रतिवर्ष देश में कहां- कहां कितने अपराध घट रहे हैं। पिछले तीन वर्षों के आंकडे बताते हैं कि अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में अधिक अपराध घटते हैं। मसलन 1998 में देश की जनसंख्या 97 करोड 9 लाख थी जबकि भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दर्ज कराए अपराधों की संख्या थी 17 लाख 80 हजार। अर्थात प्रति लाख जनसंख्या में 183 अपराध घटे थे। लेकिन महाराष्ट्र के लिए यही औसत प्रति लाख 202 था।

बलात्कार के आंकडे जांचने पर पता चलता हा कि 1998 में 15031 बलात्कार दर्ज हुए जो औसतन प्रति करोड 155 थे, लेकिन महाराष्ट्र के लिए यही औसत 124 था। अर्थात देश के अन्य भागों की तुलना में महाराष्ट्र की छवि कुछ अच्छी रही। यहां यह भी ध्यान रखना पडेगा कि असली औसत दर 155 या 124 से दुगनी माननी पडेगी क्योंकि यह अपराध केवल स्त्रियों के विरूद्ध होता है।

इस संबंध में एक विस्तृत पढाई का संकल्प बनाकर सबसे पहले मैंने पिछले दशक में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों में घटित बलात्कार के अपराधों का ब्यौरा लिया। इसके लिए 1996 की जनसंख्या के आकडों को आधारभूत माना जो समूचे महाराष्ट्र के लिए 9. 27 करोड थी। जनसंख्या के आकडे मैंने जनगणना कार्योलय से प्राप्त किए जबकि जिलावार अपराधों के आकडे ब्यूरो से प्राप्त हुए।

कुल अपराधों का ब्यौरा

सबसे पहले महाराष्ट्र के विभिन्न प्रमंडलों और उनके जिलों में पिछले दस वर्षों में घटित बलात्कार के अपराधों का ब्योरा लें। प्रत्येक प्रमंडल के लिए वहां के डिविजनल कमिश्नर तथा डी. आई. जी. पुलिस की जिम्मेदारी होती है, इसी प्रकार प्रत्येक जिले में वहां के कलेक्टर तथा एस. पी. की जिम्मेदारी होती है। कि वे अपराधों की रोकथाम करें। अतएव इस ब्योरे से उम्मीद की जा सकती है कि संबंधित जिले और प्रमंडल के अधिकारी अपने- अपने आकडों से कुछ सीख लेंगे और अपराधों को कम करने का प्रयत्न करेंगे। साथ ही यह आशा भी की जा सकती है कि उक्त जिले या प्रमंडल के विधायक, लोकसभा सदस्य और सामाजिक संस्थाएं भी अपने- अपने कार्यक्षेत्र में इन अपराधों के विरूद्ध आवाज उठाएंगे या नीति- निर्धारण के लिए उपाय सुझाएंगे।

इस ब्योरे से कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं जैसे-

*महाराष्ट्र में प्रति वर्ष हजार से अधिक बलात्कार होते हैं। 1990 से 1999 तक कुल 11675 अर्थात् प्रति वर्ष औसतन 1168 बलात्कार हुए ।

*1996 में बलात्कार की घटनाओं में अचानक वृद्धि हुई और प्रायः हर जिले में हुई। और प्रायः हर जिले में हुई। 32 में से केवल पांच जिले रत्नागिरी , कोल्हापूर, सांगली, नांदेड और उस्मानाबाद ही इससे अछूत रहे। रत्नागिरी में 1999 में एकाएक बढोत्तरी देखी जा सकती है। जबकि नांदेड, बीड और उस्मानाबाद में भी इसी दौरान अपराधों की संख्या में दुगनी वृद्धि हुई। समाजशास्त्रियों के लिए यह एक सोच का विषय है कि एक साथ हर तरफ बलात्कार की घटनाएं क्योंकर बढी ?

* 1995 और 1996 में अधिकतम बलात्कार दर्ज हुए जो 1997 में कम होकर फिर धीरे- धीरे बढकर 1999 के स्तर पर पहुंच गए। इसकी कोई वजह होगी।

* ंतव्य है कि समय था जब टी. वी पर विभिन्न चैनलौं का प्रसरण जोर- शोर से आरंभ हुआ। इस विषय में विशेष अध्ययन है कि इन प्रसारणों का समाज में बढते बलात्कार के अपराधों से किस तरह का संबंध या प्रभाव है। दूसरी विचारणीय बात है कि 1995 में विधानसभा चुनाव तथा 1996 में लोकसभा चुनाव हुए और महाराष्ट्र में सत्ता पलट हुआ।

* दस वर्षों में कुल घटित अपराधों में से आधे अपराध केवल सात जिलों में हुए हैं जो हैं मुंबई, नागपुर, पुणे, अमरावती, ठाणे, भंडारा और यवतमाला। अतएव यहां की पुलिस से अधिक मेहनत से इन अपराधों के लिए न्याय दिलाने की जिम्मेदारी लेनी पडेगी।

गुनाह की दर एवं आदिवासी क्षेत्र

गुनाह की संख्या के साथ – साथ गुनाह की दर देखना भी आवश्यक है। संख्या का महत्व पुलिस की दृष्टि से है क्योंकि इन्हें हर गुनाह की जांच करनी है और से अंतिम उद्देश्य तक पहुंचाना है, जबकि सामाजिक संस्थाओं या महाविद्यायीन अध्ययन के लिए गुनाह की दर का महत्व अधिक है क्योंकि इससे सामाजिक ढांचे के सुधार के विकल्प समझ में आते हैं।

*अन्य जिलों की तुलना में नागपुर तथा अमरावती प्रमंडल के जिलों यथा नागपुर ,अमरावती, वर्धा, गडचिरोली, भंडारा, चंद्रपुर और यवतमाल में बलात्कार की दर अत्याधिक है। यह सारे ही आदिवासी बहुत जिले हैं। ठाणे जिला भी इसी श्रेणी में है। लेकिन महाराष्ट्र के अन्य के अन्य आदिवासी बहुत जिले जैसे पुणे, नासिक, धुले और रायगढ में यह ट्रेंड नहीं पाया गया। यहां भी विचारणीय है कि धले और नासिक जिले में आदिवासी नागरिकों के पास जमीन है जबकि नागपुर एवं अमरावती में वे प्रायः भूमिहीन हैं।

*एक चित्र यह है कि यद्यपि महाराष्ट्र में घट रहे कुल अपराधों की दर देशभर में घट रहे अपराधों की दर से अधिक है, फिर भी बलात्कार के मामले में महाराष्ट्र की दर देश की दर से कम है। उसी प्रकार महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों का चित्र क्या है मैंने दो नक्शों पर कुल अपराधों की दर तथा बलात्कार की दर की तुलना की। यह देखा गया कि रत्नागिरी, कोल्हापुर, सांगली, नांदेड, उस्मानाबाद, रायगढ और सिंधु दुर्ग में दोनों प्रकार के अपराध की दर कम है जबकि नागपुर, अमरावती, ठाणे, पुणे और यवतमाल में दोनों प्रकार के अपराधों की दर अधिक है।

*गडचिरोली जैसे आदिवासी जिले में इतर अपराध कम लेकिन बलात्कार काफी अधिक हैं जबकि अकोला जैसे बिगर आदिवासी जिले में बलात्कार की दर कम परंतु अन्य अपराधों की दर अधिक है। यह और एक कारण है कि बलात्कार की शिकार महिलाएं कौन हैं, इसका भी ब्योरा लेना आवश्यक है। भले ही राजधानी मुंबई या दिल्ली के स्तर पर यह संभव न हे, लेकिन कम से कम उक्त जिले के जिलाधिकारी के स्तर पर यह ब्योरा आवश्यक है।

शहरीकरण और बलात्कार

  • पिछले पचास वर्षों में देश के अन्य प्रांतो की तुलना में महाराष्ट्र का तेजी से शहरीकरण हुआ है। यहां करीब चालीस प्रतिशत जनसंख्या शहरों में रहती है। ब्यूरो के पास शहरों के लिए अलग से उपलब्ध आकंडे बताते हैं कि मुंबई , नई मुंबई पुणे, ठाणे, नासिक, नागपुर, अमरावती, औरंगाबाद और सोलापूर जो कि महानगर माने जाते हैं वहां कुल 2786 बलात्कार घटे जो कुल अपराधों का पच्चीस प्रतिशत है। लेकिन ऐसा नहीं कि हर शहरी इलाका ग्रामीण इलाके की अपेक्षा अधिक सुरक्षित हो।

  • पुणे, सोलापुर और औरंगाबाद जिले में शहरी जनसंख्या की अपेक्षा शहरों में घटने वाले बलात्कार काफी अधिक हैं जबकि ठाणे, नासिक, अमरावती और नागपुर जैसे चारों आदिवासी बहुल जिलों में शहरी इलाका ग्रामीण इलाके की अपेक्षा अधिक सुरक्षित हो।

  • शहरी और ग्रामीण दरों तथा इन शहरों के पुरूष और महिला वर्ग में साक्षरता के प्रतिशत की तुलना करने पर देखा गया कि इन सभी शहरों में महिला साक्षरता का प्रतिशत काफी अच्छा माना जा सकता है। अतएव यह मानना पडेगा कि बलात्कार के अपराध की शिकार महिलाएं अपनी अशिक्षा के कारण से शिकार नहीं हुई हैं। शायद शहरों का तनावग्रस्त माहौल, जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि और समुचित पुलिस फोर्स का न होना इत्यादि कारण हो सकते हैं।

साक्षरता विचार

  • शिक्षा और साक्षरता का विचार करें तो एक अजीब परिस्थिति दिखाई पडती है। मराठवाडा प्रमंडल के औरंगाबाद , जलाना, परभणी, नांदेड बीड जिलों में स्त्री शिक्षा का प्रतिशत सबसे कम है, इसके विपरीत अमरावती और नागपुर प्रमंडल के सभी जिलों में स्त्री शिक्षा का प्रतिशत अधिक है। फिर भी बलात्कार की दर मराठवाडा प्रमंडल में सबसे कम और नागपुर तथा अमरावती प्रमंडलों में सबसे अधिक है।

इस सारे विवेचन से जो प्रमुख निष्कर्ष गिनाये जा सकते हैः

  • महाराष्ट्र प्रशासन को नागपुर तथा अमरावती प्रमंडलों में बलात्कार के अपराधों की छानबीन तथा रोकथाम के लिए अधिक ध्यान देना होगा। इसके लिए यदि समुचित मात्रा में पुलिस फोर्स उपलब्ध नहीं है तो उपलब्ध कराना एवं उसकी कार्यक्षमता बढाना आवश्यक है।

  • बलात्कार की शिकार महिलाओं के बाबत अधिक गहराई से अध्ययन होना आवश्यक है, खासकर यह कि इसमें आदिवासी स्त्रियों का प्रतिशत कितना है और आरोपी व्यक्ति किस श्रेणी अथवा व्यवसाय से संबंधित है।

  • एक अन्य अध्ययन में मैंने पाया है (मेहेंदले 2001) कि अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में यह बात केवल बलात्कार के लिए नहीं बल्कि सभी तरह के अपराधों पर लागू है। इस बात का भी अध्ययन, विधि महाविद्यालयों द्वारा करवाना आवश्यक है।

  • रत्नागिरी, नांदेड, उस्मानाबाद जैसे कम अपराध वाले जिलों में 1996 में अचनक बलात्कार में वृद्धि क्यों हुई अन्य सभी जिलों में 1996 में यह वृद्धि क्यों हुई, इसकी जांच होनी आवश्यक है।

उपरोक्त तमाम विश्लेषण के बावजूद यह मानना पडेगा कि महाराष्ट्र में पिछले दशक में कुछ ऐसी भी घटनाएं हुई हैं जो महज सांख्यिकी या आकडों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इनके लिए एन. सी. आर. बी. के मौजुदा ढरें से हटकर एक नए सिरे से रिपोर्टिंग आवश्यक है। यह मामले हैं सुनियोजित बलात्कार कांडों के। जलगांव तथा सतारा जिले में घटित दो कांडो में यह हुआ कि नौकरी का लालच देकर मध्य और निम्न मध्य वर्ग की थोडा पढी- लिखी औरतों को वासना का शिकार बनाया गया और फिर उनकी वीडियो फिल्म के जरिये उन्हें ब्लैकमेल करके बार- बार यौनाचार के शोषण का शिकार बनाया गया। परभणी जिले में अगले दिन की परीक्षा के प्रश्न-पत्र देने का लालच दिखाकर कुछ शिक्षकों ने ही एक विद्यार्थिनी का सामूहिक बलात्कार किया। ऐसे सारे सुनियेजित अपराधों के लिए अधिक प्रभावी जांच- पडताल और अधिक कडी शिक्षा अत्यावश्यक है। लेकिन यह तभी होगा जब इसकी रिपोर्टिंग अधिक गंभीरता से दर्ज कराई जाए।

एक बार ग्रामीण महिलाओं के एक कार्यक्रम में मै इन निष्कर्षों की चर्चा कर रही थी कि एक प्रौढ महिला ने मुझे ग्रामीण जीवन की एक वास्तविकता से परिचय कराया । उसने कहा कि महिलाओं से बचपन को यही सुनना पडता है कि उसकी जिंदगी तो चूल्हे में है। गांव की लडकियां भी देखती हैं कि उनके अगल- बगल की तमाम प्रौढ महिलाएं केवल रसोईघर में मेहनत का जीवन जीती हैं- चाहे वह मां हो या सास हो या बडी बहन हो या भाभी हो। फिर लडकियां सोचती हैं कि यदि वे पढकर कोई नौकरी ढूंढ लेती हैं तो इस रसोईघर की कैद से उनका छुटकारा हो सकता है। इसीलिए वे उन तमाम लोगों की शिकार बन जाती हैं जो उन्हें थोडा- बहुत फुसला सकें। यदि जलगांव और सतारा जैसे कांडकोरने हैं तो स्त्रियों के लिए व्यवसाय शिक्षा का प्रबंध आवश्यक है। उस अनपढ ग्रामीण किंतु भुक्तभोगी औरत ने मुझे वह वास्तविकता बताई जो मेरे विचारों से कहीं छूट गई थी।

लेकिन इससे भी भयावह वह घटना है जो पिछले वर्ष अहमदनगर जिले के कोठेवाडी गांव में घटी। देखा जा सकता है कि सामान्यतः अहमदनगर में बलात्कार के मामले कम थे। फिर भी इतने बडे पैमाने पर इतनी जघन्यता के साथ महाराष्ट्र में कभी अपराध नहीं हुए थे जैसे कोठेवाडी में हुआ। इस घटना में किसी भी पारंपारिक पद्धति से अपराध का विश्लेषण नहीं किया जा सकता है। इस घटना में गांव में सामूहिक डकैती करने के लिए गए युवक डकैती के पश्चात् गांव में अकेली रहनेवाली महिलाओं पर झुंड में टूट पडे और सामूहिक बलात्कार किया। इससे पहले उन्होंने अलाव जलाया, खाया, शराब पी और गांव वालों को रस्सियों से बांधकर मारा- पीटा भी। यह पूरी घटना एक संकेत है कि आने वाले दिनों में सिनेमा तथा अन्य प्रसार माध्यमों में दिखाये जानेवाली घटनाएं समाज के अपराधों को कितना भयावह रूप दे सकती हैं। इस घटना से यह भी आभास मिलता है कि महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके में बढती हुई बेकारी और निराशा समाज को कहां ले जा रही है। मुंबई जैसे कार्यक्षम पुलिस के दबाव में यह बेकारी आर. डी. एक्स. गैंगवार और शार्प शूटर्स के रूप में प्रगट होती है लेकिन ग्रामीण इलाके में यह अवश्यमेव स्त्री- विरोधी अपराधों के रूप में प्रगट होगी जो कि महिलाओं के लिए चिंता का विषय है। यह जरूरी है कि कोठेवाडी की घटना से कुछ सीख लेकर हम अपनी रोजगार की नितियों को अधिक प्रभावी बनायें ।



हिंदू धर्म में संन्यास -- महानगर बुधवार 3 मई 1995

 

हिंदू धर्म में संन्यास -- महानगर बुधवार 3 मई 1995

पश्चिमी दुनिया में बहु-चर्चित जितनी भी आधुनिक मैनेजमेंट टेकनिक की किताबें हैं, उन सब में एक सूत्र समान है, वह यह कि किसी उद्योग या व्यवसाय में सफल होने के लिए मनुष्य का महत्वाकांक्षी होना आवश्यक है, यही सूत्र वहां के वरिष्ठ प्रशासकीय अधिकारियों पर भी लागू किया जाता है और कई बार भारतीय अधिकारी भी इस सूत्र से प्रभावित हो ही जाते बृहै, इसके बावजूद भारतीय प्रशासन में कई ऐसे अधिकारी पाये जाते हैं जो अपनी कर्तव्यदक्षता, ईमानदारी और काम में अच्छा अंजाम देनेवाले हैं, जनसामान्य के प्रश्नों के प्रति संवेदनशील हैं पर फिर भी उन्हें महत्वाकांक्षी नहीं कहा जा सकता. वे अपना काम अच्छी तरह निभा लेने में ही अपनी महारत समझते हैं और इस बात की परवाह नहीं करते कि उन्हें अच्छा पद दिया जा रहा है या नहीं थोडे शब्दों में कहा जाय तो उनके लिए उचित शब्द होगा अलमस्त या फक्कङ इसिलिए एक दिन हमारी चर्चा मंडली में यह चर्चा चली कि हमारा आदर्श कौन है और बडा ही महत्वकांक्षी है. या वह जो काम का तो पक्का है लेकिन अपनी अलमस्ती में खुश है संतुष्ट है, यह भी तय रहा कि ऐसा प्रश्न किसी पश्चिमा चर्चा मंडली में उठेगा ही नहीं क्योंकि उस सोसायटी में महत्वाकांक्षी न होना ही एक कमी या कमजोरी मानी जायेगी. लेकिन भारतीय मानसिकताने ने संतोष को एक कमजोरी नहीं बल्कि गुण कहकर जाना है. जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान. अतः सवाल उठा कि क्या यह संतोष की मानसिकता आज के युग में भी कोई मायने रखती है, यह भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में खतरनाक हो सकती है, वहां से फिर बात आयी धर्म पर और संन्यास पर.

हिंदू फिलोसफी में चार पुरूषार्थ बताये गये हैं- वे भी एक नियम क्रम से. पहले मनुष्य धर्म नामक पुरूषार्थ को हासिल करें. फिर अर्थ को, फिर काम को और फिर मोक्ष को. यहां अर्थ शब्द के माने है संपत्ति या संपन्नता- लेकिन वही जो धर्म का आचरण करते हुए मिली हो- अर्थात अपने श्रम, कार्य कुशलता और उत्पादकता के कारण मिली हो न कि चोरी, डकैती, छल- कपट, घूसखोरी या जुएबाजी से. तीसरा पुरूषार्थ है काम- या उपभोग अर्थात् जो धन कमाया है उसका उपभोग या योग्य कार्य में उस धन का विनियोग करना. यह योग्य उपभोग इसलिए आवश्यक है कि इससे जीवन में एक प्रकार की स्थिरता, सुरक्षिरतता आती है और ऐसा माहौल तैयार होता है जिस माहौल में ज्ञान और कला सुचारू ढंग से पनप सकते हैं- बढ सकते हैं. इन पुरूषार्थों को जो हासिल कर लेता है- वही अगली सीढी .

अर्थात् मोक्ष के चौखट तक पहुंच सकता है और वहां पहुंचना हरेक के लिए वांछनीय बताया गया है. वहां से अंदर जाने का उपाय बताया है संन्यास ग्रहण. लेकिन संन्यास का अधिकार भी हर व्यक्ति को उपलब्ध नहीं है. मनुष्य पहले ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करते हुए ज्ञान अर्जन करे- पढाई करे. फिर गृहस्थ आश्रम का पालन करते हुए अपनी कार्यकुशलता से धन अर्जन करेसाथ ही धर्म का पालन भी करता रहे जिसकी रीति उसे ब्रहमचर्य आश्रम में सिखायी गयी है. दोनों आश्रमों के लिए पच्चीस- पच्चीस वर्ष का काल उपयोगी बताया है. इसी काल में मनुष्य अपने धन का उपभोग भी करे- उसके माध्यम से अपनी परिवार की वृद्धि औस समृद्धी भी करे. लेकिन फिर वह वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करे. अर्थात् जिस व्यवसाय को उसने गृहस्थ आश्रम के दौरान चलाया या बढाया- उसकी जिम्मेदारी बाल- बच्चों को, नयी पीढी को सौंप दे नयी पीढी को जिम्मेदारी उठाने के लिए सक्षम करे. इस दौरान वह नयी पीढी के लिए दूर से पथ- प्रदर्शक का काम करता रहे. कभी- कभार सलाह मशविरा दे दे. संकटकाल हो तो वापस आकर मदद करे. लेकिन रोजाना कामकाज की जिम्मेदारी और अधिकार दोनों को ही नयी पीढी पर सौंप दे. खुद यदि संभव हो तो वन में जाकर रहे- इसीलिए आयु की इस अवस्था का नाम है वानप्रस्थ आश्रम- अर्थात् वन की ओर, प्रकृति की ओर,प्रस्थान करने की अवस्था.वहां वन में वह अपनी जरूरतों को कम- से कम करता रहे. साथ ही कुछ और ज्ञानार्जन भी करता रहे.

इन सारे अनुभवों से गुजरने के बाद यदि वह अपने आपको योग्य और सक्षम समझे तो फिर किसी योग्य गुरू के परामर्श से संन्यास-आश्रम की दीक्षा ले.

इस प्रकार हम देखतेहैं कि ब्रहमचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम और वानप्रस्थ आश्रम का विधान तो सबके लिए बताया गया है लेकिन संन्यास- आश्रम का विधान सबके लिए नहीं है- यह केवल सुयोग्य और दृढ व्यक्तियों के लिए है.

यह इसलिए कि हिंदू फलसफे के अनुसार संन्यासी पर बडी जिम्मेदारी है समाज को रास्ता दिखाने की. संन्यास लेने वाला मनुष्य अपना पहला नाम या परिवार के साथ जुडी हुई अपनी आयडेंटिटी को छोड देता है- फिर वह न किसी का पिता है न पुत्र, न किसी की माता है ना बहन ना पत्नी. इसका प्रतीक है मुंडन. यहां उसका व्यक्तिगत जीवन समाप्त हो जाता है और सामाजिक जीवन प्रांरभ हो जाता है. फिर वह केवल समाज के लिए ही जीता है- वह भी समाज से न्यूनतम दान को स्वीकार कर.

संन्यासी के लिए भिक्षा का विधान है- ताकि उसे यह अहसास हर पल रहे कि वह समाज के दिये पर जी रहा है और इस दान को उसे चुकाना भी है बदले में समाज को ज्ञानदान देकर और सही रास्ता समझाकर. उसके लिए विधान है कि वह पांच से अधिक घरों में भिक्षा न मांगे. जूठा या बासी अन्न भिक्षा में स्वीकार न करें इस नियम में कभी भूखा रहना पडे तो रह ले. एक गांव में तीन दिन से अधिक दिन तक न रहे. वह केसरिया वस्त्र धारण करे और अपने सामान में केवल एक कमंडल रखे. यह कमंडल या तूंबा जंगली लाल कद्दू का बना होता है जिसमें दो खाने बने रहते हैं. निचले खाने में वह अपने लिए एक दूसरा वस्त्र रख सकता है. ऊपर के खाने में भिक्षा का अन्न या पानी. इसके अलावा वह और कुछ संग्रह नहीं कर सकता है.

संन्यासी केसरिया रंग का वस्त्र ही धारणा कर सकता है. इसका कारण है कि केसरिया रंग को त्याग, तपस्या, उत्सर्ग, बलिदान, वीरता, ज्ञान और संतोष का रंग माना गया है. मानस शास्त्र में रंगों का मन पर पडने वाला प्रभाव जिस किसी ने पढा होगा या प्रयोग किये होंगे वही बता सकता है कि केसरिया रंग इन गुणों के साथ कैसे जुड गया. भारत में जो सब कुछ त्यागकर संन्यासी बन गया हो वह केसरिया वस्त्र पहनता है या फिर जो वीरमरण के लिए सारे मोह को त्याग चुका है वह केसरिया वस्त्र पहनता है. साथ ही जो लंबी तीर्थयात्रा पर जा रहा है वह केसरिया पताका लिए चलता है. क्योंकि केसरिया रंग सांसारिक मोह से लग हटने का प्रतीक तो है, लेकिन समाज से दूर हटने का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि अपने आप को समाज के लिए उपलब्ध और उत्सर्ग तभी संभव है जब मनुष्य के पास संतोष हो. एक संन्यासी संसार को तभी लीडरशीप दे सकता है यदि वह ज्ञानी हो, अपने काम में कार्यकुशल और प्रवीण रह चुका हो, जिसने अपने ज्ञान को खूब घिस कर और तपा कर सोने की तरह खरा कर लिया हो. अब ऐसे संन्यासी को देखकर कोई आलसी आदमी सोच सकता है कि मैं भी केसरिया वस्त्र पहन कर भिक्षा मांगता चलूं तो बिना काम किये ही मेरा पेट भर सकता है. लेकिन केवल केसरिया वस्त्र पहन कर एक आलसी आदमी एक ज्ञानी संन्यासी के समकक्ष नहीं हो सकता है.

यही अंतर है संतोष या अलमस्ती के प्रसंग में भी .एक निखटटू और एवरेज अफसर भी कहा सकता है कि भई मैं तो खुश हूं, संतुष्ट हूं, मुझे कोई ज्यादा काम नहीं करना पडता है और ज्यादा सिर भी नहीं खपाना पडता है. पर उसकी संतुष्टि उसके आलस के कारण उपजी है और वह संतुष्टि किसी गुण का प्रतिक नही है, उससे वह अफसर भला जो महत्वाकांक्षी है और अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए मेहनत और अच्छा काम करने को तत्पर है. लेकीन उससे भी अच्छा वह अधिकारी है जो कर्तव्यतत्पर होते हुए भी अपने आप में संतुष्ट है, परिपूर्ण है,अलमस्त है, इस या उस पोस्ट के पीछे नहीं दौडता. क्योंकी वह जानता है कि उसका बडप्पन उसके बडप्पन उसके पोस्ट पर निर्भर नहीं है. वह तो उसका अपना अंदरूनी बडप्पन है. क्योंकी उसमें अपना काम बेहतर से बेहतर कर दिखाने की खुद की धनु है. इस बेहतर काम को कर निभाने का आनंद और उससे उपजी संतुष्टि उसके पास है. बेहतर काम से एक अलग तरह का अहंकार कार्यकुशलता के लिए घातक भी हो सकता है यह अंहकार भी महत्वाकांक्षा का दूसरा रूप है. लेकिन महत्वाकांक्षा और अहंकार से ऊपर उठकर जिसने कार्यकुशलता से संतोष की अवस्था प्राप्त की है उसकी अवस्था उस ज्ञानी- संन्यासी जैसी है. इस प्रकार हम देखते हैं कि सच्चा संतोष और आनंद तो कार्यकुशलता के कारण ही उपज सकता है लेकिन मूढ व्यक्ति अपने आलस को ही अपनी अलमस्ती बतायेगा, उसे संतोष का नाम देगा, उसमें और कार्यकुशलता से उत्पन्न होने वाले संतोष में फर्क कर सकें यह समझ हमारे अंदर होनी चाहिए.

और धर्म भी क्या है धारयति सः धर्मः जो हमें अपने आपको धारण करने की, अर्थात् अपनी अंदरूनी और साथ ही समाज की भी आंतरिक हार्मोनी को बनाने रखने की सामर्थ्य देता है- वही धर्म है वह धर्म कार्यकुशलता के बगैर भी नहीं आता लेकिन संतोष के बगैर भी नहीं आता. कार्यकुशल व्यक्ति का महत्वाकांक्षी होना स्वाभाविक है. इसलिए पश्चिमी मैंनेजमेंट के गुरू आज चीख- चीखकर कहते हैं- महत्वाकांक्षी बनो- क्योंकि महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए ही सही- तुम्हें अपने काम में कुशलता लानी होगी. लेकिन कार्यकुशलता और महत्वाकांक्षा के बाद तीसरी सीढी है संतोष जिसके बगैरे व्यक्ति या समाज की हार्मोनी अधिक दिन तक नहीं टिकेगी. इसीलीए चाहिए संन्यासी वृत्ति भी. यहीं भारतीय मानसिकता पश्चिमी मैनेजमेंट से अलग हो जाती है.

(खुद यदि संभव हो तो वन में जाकर रहे- इसीलिए आयु की इस अवस्था का नाम है वानप्रस्थ आश्रम- अर्थात् वन की ओर, प्रकृति की ओर, प्रस्थान करने की अवस्था. वहां वन में वह अपनी जरूरतों को कम- से- कम करता रहे. साथ ही कुछ और ज्ञानार्जन भी करता रहे. इन सारे अनुभवों से गुजरने के बाद यदि वह अपने आपको योग्य और सक्षम समझे तो फिर किसी योग्य गुरू के परामर्श से संन्यास- आश्रम की दीक्षा ले. इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम और वानप्रस्थ आश्रम का विधान तो सबके लिए बताया गया है लेकिन संन्यास आश्रम का विधान सबके लिए नहीं है- यह केवल सुयोग्य और दृढ व्यक्तियों के लिए है.)

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

गरिमा के साथ जीने का हक है

गरिमा के साथ जीने का हक है
Take from Diary no 3

शनिवार, 10 नवंबर 2012

बायोडीजल : अपार संभावनाएं--पूरा है


बायोडीजल : अपार संभावनाएं

1.0
आज पेट्रो पदार्थो के बढते मूल्य के कारण सभी चिन्तित है। खास कर भारत जैसे विकसनशील देश में जहाँ विकास की गति बढ रही है, वहाँ ऊर्जा की आवश्यकता और ऊर्जा आपूर्ति का प्रश्न देश के लिये अहम्‌ हो गया है। आज हमारी 'टॉप टेन' प्राथमिकताओं में ऊर्जा आपूर्ति का मुद्दा आग्रिम है।

२.०
पेट्रो पदार्थों की बढती खपत भी पूरे संसार के लिये चिन्ता का विषय है - एक तो इसलिये कि इसके भंडार सीमित हैं - दूसरा इसलिये कि इनके कारण धरातल से ऊपर बसे हुए कार्बन के स्टॉक में लगातार बढोतरी हो रही है। जो कार्बन डायऑक्साइड बनकर ग्रीनहाऊस गैस इफेक्ट जैसा प्रतिकूल संकट पैदा करता है। इससे वायुमंडल का तापमान बढता जा रहा है, हिमखंड पिघल रहे हैं, और बाढ, तूफान जैसे तात्कालिक संकट उत्पन्न हो रहे हैं। गंगोत्री और यमुनोत्री के ग्लेशियर भी तेजी से पीछे हटते जा रहे हैं, यदि वे पिघल कर नष्ट हो गए तो एक समय वह भी सकता है, जब ये नदियां ही ना रहें, जिन्होंने हमारे देश को सुजलाम्‌ सुफलाम्‌ बनाया। त्सुनामी, रीता, कतरिना जैसे समुद्री बवंडर आते रहेंगे सो अलग।

ऐसे में हर देश ऊर्जा के वैकल्पिक ाोतों की तलाश में हैं। हमारे देश में जिन ाोतो पर तेजी से विचार और कार्य हो रहा है, उनमें सौर उर्जा पवन ऊर्जा, बायोडीजल, इथेनॉल, बायोगैस, कचरे से ऊर्जा आदि कई शामिल हैं।

३.०
संभावनाओं की दृष्टि से आँकने पर बायो डीजल सबसे प्रमुख रुप में उभरता है क्योंकि यह किसान के हाथ में है और देश के दस करोड से अधिक किसान बायोडीजल से लाभ पा सकते हैं।

४.०
हाल में पीसीआरए ने बायोडीजल से संबंधित एक 'शुद्ध वातावरण प्रकल्प' अर्थात सीडीएम्‌ प्रोजेक्ट बनाया है जिसमें क्योटो या प्रोटोकोल के तहत प्रतिवर्ष पांच करोड रुपए पाये जा सकते हैं। इस प्रकल्प का अनुमानित गणित यों है कि करीब दस हजार किसान बीस हजार हेक्टर जमीन पर जट्रोफा के बीज उगाएंगें। इनसे करीब एक हजार घाणियों में तेल निकाला जायगा और करीब सौ केंद्रों में ट्रान्स-इस्टरीफिकेशन की विधि से बायोडीजल बनाया जायगा। प्रतिवर्ष अनुमानित पचीस हजार टन यानी तीन करोड लीटर बायोडीजल बनेगा। यानी इतने ही पेट्रोडीजल की बचत होगी। इस बचत के कारण जो वातावरण प्रदूषण रोका गया उसे कार्बन एमिशन रिडक्शन या क्कङ ईकाई में मापने पर करीब डेढ लाख ईकाई प्रदूषण की बचत होगी। प्रगत देश ऐसी प्रदूषण बचत ईकाईयाँ खरीदने के लिये डॉलर से बीस डॉलर प्रति इकाई का भाव भी देते हैं।

पीसीआरए ऐसे दस हजार किसान, एक हजार घाणी धारक और एक सौ - बायोडीजल उत्पादकों का एक गुट बनाकर इस प्रकल्प के माध्यम से अपना दावा पेश करेगा और प्रकल्प के कार्यकाल में अर्थात्‌ २०१२ मार्च तक प्रतिवर्ष कम से कम पांच करोड रुपये प्राप्त कर सकेगा। इसमें से किसान, घाणीधारक, और
बायोडीजल उत्पादक को लाभांश देने के साथ साथ बायोडीजल के प्रसार में जुटी अन्य संस्थाओं को भी लाभांश दिया जायगा। जैसे बैंक, मशीन उत्पादक, कृषि विद्यापीठों के अध्यापक, इत्यादि।
अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार यह प्रकल्प पहले अपने ही देश में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में जाँच मान्यता के हेतु भेजने के बाद बायोडीजल की संभावनाएं स्पष्ट से स्पष्टतर होती चली गई। आज देश ऐसी स्थिती में हैं कि इस तरह का एक नही बल्कि सौ प्रकल्प भी बनाकर अंतर्राष्ट्रीय सीडीएम बाजार में दाखिल किये जा सकते हैं। एक सौ, दो सौ, गांवो के किसान मिलकर दस - बीस हजार हेक्टर पर रतनज्योत या करंज के बीज उगाकर प्रकल्प पेश करना चाहें तो कर सकते हैं। वर्तमान में विभिन्न राज्यों में बोयोडीडल की बाबत जो भी जन - मुहिम है, या रतनज्योत खेती की शुरुआत है, और सरकार की तैयारी है इसे देखते हुए पीसीआरए में हमने अनुमान लगाया कि आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ, गुजरात, हरियाणा में ऐसे पांच - पांच प्रकल्प
और बाकी राज्यों में भी दो - चार प्रकल्प बन सकते हैं। सौ प्रकल्पों में कुल बीस-पचीस लाख टन बायोडीजल उत्पादन की क्षमता होगी, जिसका कारोबार सात-आठ हजार करोड रुपये तक जा सकता है।

अर्थात आठ हजार करोड रुपये का कारोबार, चार-पांच सौ करोड रुपये की अतिरिक्त आमदनी जो प्रदूषण बचत इकाइयों से आयेगी, बीस लाख हेक्टर जमीन पर बायोडीजल की खेती - ये सारे आंकडे दो बातो की ओर संकेत करते हैं - कि यह एक अनूठी क्रांति का रुप ले सकता है। जैसे देश में पहले हरित क्रान्ति आई, फिर दूध का व्यापार बढा जिसे श्र्वेत क्रान्ति कहा गया। इसी प्रकार एक सुनहरी क्रान्ति दस्तक दे रही है। एक बायोडीजल कार्पोरेशन बन जाये तो यह क्रान्ति और भी तेजी सी लाई जा सकती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब इतनी बडी लागत की बात होती है, तो विभिन्न ग्रुपों को इसके लिये तैयार करना पडता है - उनकी क्षमता बढाने के लिये प्रयास करने पडते हैं। ऐसे कई प्रयास भी करने पडेंगे - किसान, मशीन लगाने वाले, मशीन बनाने वाले, रिसर्च करने वाले, बैंक, यहाँ तक कि निति निर्धारण करने वाले नेता प्रशासक तथा मीडीया इत्यादि सबके लिये विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम करने पडेंगे। विभिन्न शोधसंस्थाओं के शोध कार्य और शोध निबंधो को भी लोगों तक पहुँचाना होगा। कई शोध कार्य करवाने होंगे। इन सब के लिये कुछ तो लागत करनी पडेगी।

६.०
केन्द्र सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को इस काम के लिये सूत्रधार मंत्रालय के रुप में नियुक्त किया है। विभिन्न राज्यों के संबंधित मंत्रालय भी इस प्रकार के क्षमता मूलक कार्यक्रम कर सकते है। यदि हम आठ दस हजार करोड के कारोबार की बात कर रहे हे, तो ऐसे क्षमता मूलक कार्यक्रम के लिये सौ करोड का खर्च भी जायज हो जाता है। ऐसे कार्यक्रमों के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय, पंचायत राज्य मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय, अपांरपरिक ऊर्जा मंत्रालय, योजना आयोग जैसी हस्तियाँ आगे रही हैं।

७.०
किसानों और ग्रामीण रोजगार की दृष्टि से देखने पर बायोडीजल कार्यक्रम की कई खूबियाँ नजर आती हैं।

बायोडीडल को स्टोअर कर रखा जा सकता है, जबकि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा या पनबिजली को स्टोअर नही किया जा सकता है।

डीजल पम्प, ट्रैक्टर, एक ट्रक, बस इत्यादि में इसे आसानी से मिलाया जा सकता है। अब तक किये गये
प्रयोग बताते हैं कि पांच से दस प्रतिशत बायोडीजल मिलाया जाय तो वह पूर्णतः सुरक्षित है। ये प्रयोग इंडियन ऑयल कार्पोरेशन के अनुसंधान विभाग तथा अन्य कुछ कृषि विद्यापीठों ने किये हैं। पांच प्रतिशत बोयोडीजल से इंडियन ऑयल ने पांच दिनों तक लखनऊ - दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस चलवाई और अब एक पूरी मालगाडी एक साल तक चलवाने जा रहे हैं। साथ ही हरियाणा रोडवेज की बीस बसें भी चलवा रहे हैं। भारत पेट्रोलियम ने गुजरात स्टेट की बसें - चलवाईं जब कि हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने मुंबई मे बेस्ट बसेस चलवाईं। अब इन सारी तसल्लियों के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय ने घोषणा कर दी है कि पचीस रुपये लीटर की कीमत पर जो भी बायोडीजल बेचना चाहे, तेल कंपनियाँ इसे खरीदेंगी। यह व्यवस्था 1 जनवरी २००६ से लागू होगी। इसके लिये देश भर के बीस मार्केटिंग टर्मिनल्स पर बायोडीजल खरीदने की, उसकी शुद्धता के जाँच की, भंडारण की और डीजल के साथ मिश्रण बनाने की व्यवस्था की जायगी। लेकिन बेचने वाले को एक टैंकर लोड यानी करीब .... टन बायोडीजल एक बार में लाना पडेगा, ताकि शुद्धता की जाँच परख का काम बार
बार करना पडे।

इससे पहले भी सरकारने पेट्रोल में अल्कोहल के मिश्रण के लिये व्यवस्था की थी। लेकिन पेट्रोल अधिक ज्वलनशील है इसलिये उसके साथ मिश्रण करने में अधिक एहतिहयात बरतना पडता है, जबकि डीजल में बायोडीजल मिलाना अधिक आसान है। उपभोक्ता खुद भी यह कर सकता है। लेकिन उसके पास शुद्धता की कोई गैरंटी या जाँच परख का तरीका नही होगा।

८.०
आज भी हरियाणा के कई किसान रतनज्योत के तेल से और आंध्र के किसान करंज के तेल से खेती के पम्प और ट्रैक्टर चला रहे हैं। तेल निकालने के लिये गांव की उन्हीं घाणियों का उपयोग किया जाता है, जिसमें गांव के लिये सरसों, मूंगफली या अन्य तिलहनों के तेल निकालते हैं। चूंकि रतनज्योत या करंज का तेल अखाद्य है, इसलिये बाद में आधा किलो सरसों पिसाने से घाणी फिर स्वच्छ होकर खाद्य तेल के लायक बन जाती है। वह आधा किलो सरसों तेल भी रतनज्योत तेल में मिला लिया जाता है।

इस तेल को सीधे ट्रैक्टर में नही डाला जा सकता। लेकिन तीन चार दिन धूप में रखने से इसकी गाज नीचे बैठने लगती है और ऊपर से सुनहरे रंग का तेल निथार लिया जाता है। इससे तेल के अन्दर जो भी गोंद बनाने वाले तत्व हैं, वे काफी हद् तक निकल जाते हैं। कुछ और भी रासायनिक गुण बदलते होंगे।

हालांकि अब तक किसी वैज्ञानिक संस्था ने इस प्रकार का शोध कार्य हाथ में नहीं लिया है कि उपरोक्त विधि से प्राप्त सूर्यस्पर्शित तेल के गुण क्या हैं और विभिन्न मशीनों पर उसका असर क्या पडता है। फिर भी एक हरियाणा और आंध्र के किसान बताते हैं कि खालिस तेल के प्रयोग से उनके मशीनों को कोई नुकसान नही हो रहा, एक लिटर डीजल की जगह सात सौ मिलीलीटर बायोडीजल में काम चल जाता है, मशीन से कोई धुआं या बदबू नही निकलती, मशीन की तंदुरुस्ती अधिक अच्छी रहती है - ये सब हैं उनके अनुभव जिसके लिये सुनियोजित प्रयोग कर परीक्षण करना आवश्यक है। दूसरी ओर हैं वैज्ञानिक जो मानते हैं कि बिना बायोडीजल बनाए खालिस तेल को प्रयोग करने से मशीन को नुकसान हो सकता है। इसलिये तमान वैज्ञानिकों का ध्यान इस ओर लगा है कि बायोडीजल बनाने की प्रक्रिया अर्थात्‌ ट्रान्सईस्टरीफिकेशन की बाबत ऐसे में अधिक अनुसंधान करें। ऐसे में खालिस तेल पर अनुसंधान भी आवश्यक हैं।

९.०
बहरहाल ट्रान्सइस्टीफिकेशम की प्रक्रिया भी कोई महाकठिन नही है। रतनज्यात तेल, मिथेनॉल और कॉस्टिक सोडा के मिश्रण को तीन - चार घंटे तक गर्म करते हैं और बाद में दो - तीन घंटे ठंडा होने पर तेल की जगह बायोडीजल और मिथेनॉल की जगह ग्लिसरॉल बन जाता है  जो एक दूसरे से अलग हो जाते है और बायोडीजल को निथार लिया जाता है

अब वैज्ञानिक तो इस खोज में लगे हैं  कि यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर करने लायक मशीन्स यंत्र बना सकें।  सो किसी ने  प्रतिदिन दस लीटर का, किसी ने सौ का और किसी ने एक टन का संयंत्र  विकसित कर लिया है   कुछ लोग  विदेशों से  लाकर बड़े  संयत्र लगा रहे हैं जिसमें दस से पचास टन बायोडीजल बन सके। कुछ विदेशी कंपनियां प्रतिदिन तीन सौ टन वाले संयंत्रों की  बात करती हैं दूसरी ओर किसान अपने खलिहान में ही छोटे चूल्हे पर इस तरह मिश्रण को गर्म करन बायोडीजल बना रहे हैं तात्पर्य यह है कि
हमारे देश की विभिन्नताओं को देखते हुए आज की तारीख में यह बहुत सिर खपाने वाला प्रश्न नहीं है कि बायोडीजल उत्पादन के लिये कितने बडे पैमाने का संयत्र लगाया जाये यह प्रश्न शायद अगले पांच-दस वर्षों के बाद महत्वपूर्ण होगा  

१०.०
बायोडीजल का कारोबार बढे इसके लिये सरकार की तरफ से चार मुद्दों पर नीति निर्धारण की आवश्यकता है पहला मुद्दा था न्यूनतम मूल्य निर्धारण - जो हर छह महीने में आवश्यकतानुसार बढाया या घटाया जा सके। न्यूनतम मूल्य उतना ही रखना पडेगा जिस भाव में तेल रिफाइनरी कंपनियो को को डीजल का भाव पडता है उदाहरण के लिये  एक अक्टूबर को क्रूड ऑयल का दाम प्रति बैरल? डॉलर, अर्थात्‌ प्रति लीटर? रुपये था   इससे रिफायनरी में डीजल बनाने पर उत्पादक कंपनी को डीजल पडता है पचीस रुपये प्रति लीटर - जिसे रिफायनरी गेट प्राइस कहते हैं   फिर इसकी ढुलाई, भंडारण, वितरण, लाभांश, सरकारी टैक्स आदि सारे खर्च मिलाकर ग्राहक को यही डीजल तैंतीस रुपये प्रति लीटर के भाव पडता है   अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड  की कीमत दो डॉलर से बढ जाये तो डीजल की रिफायनरी गेट प्राइस एक रुपये प्रति लीटर बढ जाती है

इन्हीं मुद्दों को ध्यान मे रखकर सरकार भविष्य में बायोडीजल के खरीद की दर तय करेगी

११.०
नीति निर्धारण में दूसरा मुद्दा है टैक्स का आज की तारीख में खाद्य तेल पर कोई टैक्स नहीं है और सेल्स टैक्स है केवल चार प्रतिशत वही टैक्स नीती अखाद्य तेल पर भी लागू हो सकती है। बायोडीजल के कारोबार को प्रारंभिक वर्षों मे संबल देने के लिये यह आवश्यक है कि सरकार इसे टैक्स से राहत दिलाये। कुछ ऐसे कदम गुजरात सरकार उठा चुकी है केंद्र सरकार भी अगले तीन पांच वर्षों तक टैक्स राहत दे सकती है। इसके अंतर्गत - एक्साइज से राहत और केवल चार प्रतिशत सेल्स टैक्स - ये दो सुविधाएँ उसे मिले जो बायोडीजल का उत्पादन कर रहा है। साथ ही तेल कंपनियों को भी यह राहत होनी चाहिए कि जब वें पच्चान्यबें लीटर डीजल में पांच लीटर बायोडीजल  मिलायें तो उन्हें  केवल पच्चान्यबें लीटर पर ही सेल्स टैक्स देना पडे, ना कि सौ लीटर पर।  इससे तेल कंपनियों को बायोडीजल
पर जो भी हँडलिंग खर्च रहा है उसकी भरपाई होगी वह बचेगा और वे अधिक बायोडीजल खरीदने के लिए उत्सुक होंगी

१२.०
इन दो छोटे मुद्दों के बाद नीति निर्धारण जो का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा उठता है - वह है बायोडीजल को बाजार में प्रस्थापित करने का। तीन वर्ष पूर्व जब सरकार ने बायोडीजल मिशन बनाया, तब इस से अब तक विषय में कई जगह अलग अलग प्रकार के काम संपन्न हुए। लेकिन इसे बाजार में उतारना हो तो निरंतर उत्पादन और  खरीद, दोनों आवश्यक हैं। तभी कीमतें अपने स्वाभाविक रुप में सकती हैं। पिछले वर्ष तक रतनजोत तेल या बायोडीजल का उत्पादन और उपयोग दोनों ही फुटकर रुप में होते रहे। केवल तीनों तेल कंपनियों ने कुल मिलाकर सौ टन  बायोडीजल अपने प्रयोगों के लिये खरीदा। वह भी टेण्डर इत्यादि लम्बी कार्यप्रणाली को पार करते हुए। यह बायोडीजल भी पड़ा ५५ रुपये से लेकर ८५ रुपये प्रति लीटर के भाव कारण यह था कि पिछले वर्ष तक किसी ने बायोडीजल के निरंतर उत्पादन की बात नही सोची।  जिसने यंत्र लगाए भी हैं वे पांच-छः टन उत्पादन करके रुक जाते हैं, वह बिक जाय तो फिर आगे का सोचते हैं   इसलिए जब तक सप्लाई चेन की निरंतरता नहीं बन पाती तब तक बायोडीजल का दाम बढ चढ कर
ही रहेगा   तब तक तेल कंपनियाँ बडे पैमाने पर इसे खरीदने से कतराती रहेंगी   निरंतर खरीदारी नही हुई तो निरंतर  उत्पादन भी शुरु नही होगा   यह दुष्ट चक्र इस प्रकार चलना रहेगा  

इसे भेदने की यह नीति हो कि सरकार आरंभिक वर्षों के लिए बायोडीजल   पर कुछ सब्सिडी दे। कुछ वर्ष पहले जब डीजल का दाम बहुत कम था, और क्रूड ऑयल के एक बैरल की कीमत मात्र बीस डॉलर थी, तब बायोडीजल की बात बेमानी थी। लेकिन आज क्रूड के बढते दामों ने डीजल को तीस रुपये लीटर के कगार पर ला दिया है भला हो किसानों का जिनके प्रयासों के कारण बायोडीजल  का माहौल बना और अब कई उत्पादकों ने पीसीआरए को बनाया है कि वे तैंतीस रुपये प्रति लीटर से बायोडीजल बेचने को तैयार हैं। इस प्रकार दोनों डीजलों की कीमत एक दूसरे के इतने निकट गई हैं, जहाँ थोड़ी सी सब्सिडी मिलने पर बायोडीजल  का कारोबार जड़ पकड़ कर तत्काल फल - फूल सकता है।

डीजल की रिफायनरी गेट प्राइस पचीस रुपये और डीजल उत्पादक द्वारा प्रस्तावित बिक्री मूल्य तैंतीस रुपये का गणित बैठाकर पीसीआरए ने हिसाब लगाया है कि अगले छः, छः, छः महीने तक बायोडीजल पर क्रमशः आठ रुपये, पांच रुपये और तीन रुपये की सब्सिडी - घोषित की जाये तो उन अठारह महीनों में अनुमानित बिक्री क्रमश : हजार टन, हजार टन और १५ हजार टन होगी   इस प्रकार पचीस हजार टन के कारोबर के लिये सब्सिडी की रकम करीब दस करोड़ की होगी इससे कारोबार को जो तीव्र गति मिलेगी, उसे देखते हुए यह रकम कोई बहुत बड़ी नही है

१३.०
जब देश में ओएनजीसी जैसा बड़ा कमिशन बनाया गया (१९५६) या इंडियन ऑयल कार्पोरेशन बना (१९६४) तब भी देश के सामने ऊर्जा स्वाबलंबन का मुद्दा प्रमुख था जिस कारण इन  दोनों संस्थाओं में सरकार ने भारी मात्रा में निवेश किया   तब जाकर तीन-चार  वर्षों  में ऐसी स्थिती बनी कि क्रूड का उत्पादन और रिफायनिंग हमारे अपने बल बूते पर संभव हो सका और देश में ईंधन की आपूर्ति बढ़ी। आज फिर हमारे देश के लिये ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ है। ऐसे समय बायोडीजल जैसे विकल्प पर अभी से ध्यान देना और खर्च करना उचित है ताकि अगले एक-दो वर्षों में यह कारोबार चल निकले और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड का दाम बढे तब हम उसे धता बनाकर अपने रास्ते पर चल निकलें।

१४.०
सब्सिडी के ही मुद्दे के साथ किसान की लागत और उसे मिलने वाली आय का भी गणित आवश्यक हो जाता है। विदेशों में जहाँ खाद्य तेल बीजों से बायोडीजल बनाया जाता है वहाँ उनके पास सोयाबीन, राई, मूंगफली, सूर्यमुखी, आदि कई विकल्प हैं। इनकी सघन खेती हो सकती है जो तीन-चार माह में फसल दे देती है। लेकिन अपने देश में खाद्य तेल लोगों के खाने के लिये ही पूरा नहीं पड़ता। सो इसे ईंधन के लिये लगाया नही जा सकता। इसी से हमें अखाद्य तेल बीजों का विकल्प ढूंढना पड़ता है। इसके लिये रतनज्योत, करंज, महुआ, नीम जैसे पेड़ उपयुक्त हैं, और हमारे देश में सदियों से बहुयात में हैं। लेकिन उनकी फसल देर से आयेगी। सबसे जल्दी आनेवाले रतनज्योत के लिये भी तीन वर्ष का समय चाहिये। दूसरा पहलू देखें तो एक बार इसकी सघन खेती कर लेने पर अगले तीस - चालीस वर्ष तक इसके फल बीज उगते रहेंगे। करंज इत्यादि बाकी प्रजातियाँ बडे वृक्ष की श्रेणी में आते हैं, उनके बीज आने में पांच वर्ष लग जाते हैं, और उनकी आयु भी सौ वर्षों से अधिक होती है - सो वे सघन खेती के रूप में नही बल्कि खेत की मींड़ पर, साथ ही राजमार्ग के दोनों ओर या वनभूमि पर लगाये जा सकते हैं। रतनज्योत दोनों तरह से उपयुक्त है। यह करीब तीन-चार मीटर ही ऊँचा है जिससे फल तोड़ना या छांटना आसान हो जाता है। हर गांव में जो भी बंजर जमीन है उस पर लगाने के लिये यह अत्यंत उपयोगी है। टिश्यू कल्वार के माध्यम से इसकी पहली फसल तीन के बजाय डेढ वर्ष में भी पाई जा सकती है।

१५.०
जिसे रतनज्योत की सघन खेती करनी हो उसके लिये तीन बातें आवश्यक हैं - पहली है अच्छे किस्म के बीज जिसके लिये किसी कृषि विद्यापीठ की राय लेनी चाहिये। कुछ विद्यापीठों ने डेमान्स्ट्रेशन प्लॉट्स किये हैं उन्हें देखकर खाद, पानी इत्यादि के साथ इंटरक्रापिंग के तौर तरीके भी जानने चाहिये। छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर टमाटर, गेहूँ, पुदीना, ब्राहमी, सफेद मूसली जैसी फसलें रतनज्योत के साथ लगाई जा रही हैं। साथ ही बीज बेचने की सुविधा नर्सरी टिश्यू कल्चर और बैंक से कर्जा मिलने की सुविधा की भी जानकारी आवश्यक है।

१६.०
गाँवों में इस प्रकार जो अखाद्य तेलबीज उगेंगे, उन्हें इकठ्ठा करनाछिलके उतारना और घाणी से तेल निकालने का व्यवसाय किया गांव में ही किया जा सकता है। इसके अलावा बायोडीजल बनाने का लघुउद्योग भी आरंभ किया जा सकता है जिसके लिये छोटे यंत्र भी उपलब्ध हैं। दो अन्य व्यवसाय भी शुरू किये जा सकते हैं। भविष्य में जहाँ कहीं बायोडीजल बनेगा वहीं उसकी शुद्धता परखने की बात उठेगी। इस जाँच में मुख्यतः पांच बातें देखी जाती हैं - ज्वलन बिंदु, कॉपर कोटोजन अर्थात्‌ तांबा क्षति का दोष (अधिक आम्लना हो ता यह मशीनों में लगे ताबें के पुर्जों का नुकसान पहुँचायेगा) इत्यादि। इस तरह के जाँच की सुविधा भी व्यवसाय के तौर पर तहसील या जिला स्तर पर मुहैया कराई जा सकती है। नर्सरी तथा टिश्यू कल्चर भी व्यवसाय बन चुके हैं।

१७.०
आज किसान खेती के पम्प में डीजल की जगह रतनज्योत तेल डाल ही रहे हैं। इसी बात को आगे बढाते हुए गांव में छोटे पैमाने पर बिजली उत्पादन भी आरंभ किया जा सकता है। इसके लिये सीधा रतनज्योत तेल इस्तेमाल करना कहां तक सफल होगा? यह शोध कार्य छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में शुरू हो चुका है और बायोडीजल आधारित बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन का गणित भी किया जाने लगा है। प्रतिदिन  ,,  टन बायोडीजन की खपत से ,,,, मेगावाट बिजली उत्पादन का प्रकल्प आरंभ करने का प्लान गढ़ा जा रहा है।

१८.०
ये सारी संभावनाएँ इसलिये उपलब्ध हैं कि बायोडीजल कई विकल्प प्रस्तुत करता है। खेत की मेड़ों पर लगाना हो, जंगल में उपजाना हो, बंजर जमीन में लगाना हो या सघन खेती करनी हो रतनज्योत हर तरह से काम आयेगा। यह समूचे देशभर की तमाम जलवायुओं में उगाया जा सकता है। इसके साथ दूसरी फसलें लगाई जा सकती हैं। हाँ -- रतनज्योत आवश्यक  मात्रा में उपलब्ध हो वहॉ करंज इत्यादि बीजो से आपूर्ति की जा सकती है। बायोडीजल बनाने के बजाय केवल सूर्यस्पर्शना प्रक्रिया से काम चलाया जा सकता है। बायोडीजल बनाना हो तो लघु उद्योग, मध्यम उद्योग और बडे उद्योग - तीनों विकल्प आज उचित हैं। परिवहन के लिए अर्थात्‌ बस, ट्रक, ट्रॅक्टर और कारों में काम आयेगा तो उधर खेती का पम्प चलाने, बिजली बनाने और उद्योगों मे डिजल के विकल्प के रूप में भी काम सकता है। बडे पैमाने पर उत्पादन करने के लिये में आवश्यक मात्रा में बीज मिले तो अन्य पर्याय भी हैं। उदाहरण के लिये बडे होटलों की रसोई के बाद अधजला हुआ तेल, पाम ऑयल खाद्य तेल के शुद्धिकरण से बची हुई गाज - जो आज खली बनाने के काम आती हैं - इत्यादी का तात्कालिक उपाय किया जा सकते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि एक ओर जहाँ अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों की तुलना में बायोडीजल की संभावनाएॅ अधिक हैं, वही दूसरी ओर यह पूर्णतया कृषि-उन्मुखी कार्यक्रम है जो किसान के हाथ में रहेगा। 
१९. आज हम लगभग एक सौ बीस हजार करोड रूपये का क्रूड आयात करते हैं। इसमें सें पॉच प्रतिशत यानी केवल हजार करोड रूपये का कारोबार भी यदि देश के किसान के हाथ जाय तो देश का चेहरा चमक उठेगा। इसलिये आवश्यक है कि इस संभावित   हजार करोड रूपये के कारोबार को ध्यान मे रखकर केन्द्र सरकार क्षमता-वृध्दि यानी कपैसिटी बिल्डिंग के उपाय तत्काल आरंभ करे। सौ दो सौ करोड के आसपास बजट खर्च करे। जिसमें किसानों का प्रशिक्षण, कृषि विधापीठों के प्रयोग, बीज- गुणन, पौधवाटिका, मशीनों के प्रयोग, बैंक और सरकारी अधिकारियों का प्रशिक्षण, यंत्र बनाने वाले उद्यमियो का प्रशिक्षण, बिजली उत्पादन, ल्युब्रिकेशन, साथ ही बायोडीजल उत्पादन प्रक्रिया में शोधकार्य इत्यादि कई काम तत्काल और विस्तृत स्तर पर हाथ में लेना आवश्यक है।
२०. थोडे शब्दों मे यदि सरकार वास्तव में एक मिशन बनाकर उसे  सौ- दो सौ करोड का एक बीज-धन फंड दे दे, तो कुछ ही वर्षों मे वह बीज एक बडे वृक्ष के रूप मे आठ दस हजार करोड का कारोबार करेगा, शायद हम अपना बायोडीजल निर्यात भी कर सकेंगे। देश से बाहर जाने वाला पैसा देश के अंदर रहा तो किसान समृध्द होंगे और किसानों का नारा- कि अब तेल खाडी से नही झाडी से- सर्वथा सार्थक सिध्द होगा।
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NOVEMBER 6, 2005 business today
MANI'S DIKTAT
Petroleum Minister Aiyar: Just blend it
Agreed that biodiesel is the need of the hour. But the Union Petroleum Minister Mani Shankar Aiyar's diktat to public sector oil companies to start buying biodiesel to blend with their regular diesel (in a 5:95 ratio) has left them in a bind. "Even if we were to blend only 5 per cent of biodiesel, we will need more than 20 lakh tonnes per annum," says a senior executive in an oil company. India has an installed biodiesel capacity of 50 tonnes a day. But Leena Mehendale, Joint Secretary, Petroleum Ministry and Executive Director of Petroleum Conservation Research Association, says that demand, and not supply is the issue. "Once the oil companies start buying (biodiesel) on a regular basis, the capacities will be increased," she says. Quality is another issue. If biodiesel were to be sourced from disparate sources around the country, monitoring and ensuring quality will be near impossible. "Oil companies will have to install the equipment to check the standard of supplies," says Mehendale. There's hope for the biodiesel advocates yet. There's a lot of global interest in the sector. The UK's d1 Oils, for instance, plans to set up an 8,000-tonnes-a-year biodiesel refinery near Chennai by next year
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