शुक्रवार, 14 दिसंबर 2007

12/3 तेलगी के दायरे में-- मेरी प्रांत साहबी (आलेख संग्रह 3)

तेलगी के दायरे में
-- लीना मेहेंदले

किसी देश की प्रभुसत्ता और सार्वभौमता चार बातों से परखी जाती है- जमीन, सेना, संविधान और सिक्के। इनमें से एक पर भी आँच आए तो उस देश की सार्वभौमता पर खतरा माना जाता है।
जब तेलगी कांड का पर्दाफाश हुआ और नकली स्टॅम्प पेपर्स की बात उजागर हुई तो मेरे दिमाग में एक अदने से, अबोध और निरीह से दिखने वाले आदमी की तस्वीर कौंध गई जो पुणे कलेक्टर कचहरी की दिवार के पास बने एक छोटे से पत्थर के बेंच पर बैठता था और स्टॅम्प पेपर्स बेचता था। इस बात को तीस से ज्यादा वर्ष बीत गए। तब मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा में नई नई दाखिल होकर अपने प्रशिक्षण के लिए पुणे में नियुक्त थीं और प्रशिक्षण की जिम्मेदारी थी कलेक्टर पर।
ट्रेनिंग के दौरान मुझे दिखाया गया कि कैसे तहसिल का इन्स्पेक्शन होता है और उसके साथ साथ सब-ट्रेझरी का। उन दिनों बैंकिंग नेटवर्क आज की तरह फैला नही था। तहसिल हेडक्वार्टरों में और कई जिला मुख्यालय के स्थानों पर भी बैंक नही थे। पैसे का सारा लेनदेन ट्रेझरी के मार्फत होता था जिस पर कलेक्टर को निगरानी रखनी होती थी। इनका इन्स्पेक्शन एक उत्सव जैसा ही होता था।
मेरा सबसे पहला इन्स्पेक्शन था मुलशी सब-ट्रेझरी का। वह चल रहा था और मुझे एक एक कर रजिस्टर्स दिखाए जा रहे थे। अचानक एक निरीह सा व्यक्ति और उसका रजिस्टर सामने रखा गया। यह मुलशी तहसिल कचहरी में बैठने वाला स्टॅम्प व्हेण्डर था। सूरत-मूरत, वेषभूषा, चेहरे पर उडती हवाइयाँ, गरीबी की मार, सब कुछ वैसी ही जैसी पुणे कलेक्टर की सरकारी चारदीवारी में बैठने वाले स्टॅम्प व्हेण्डरों की थी।
इसके रजिस्टर का मेरे इन्स्पेक्शन से क्या वास्ता? लेकिन वास्ता था। यह मेरा पहला पाठ था। किसी भी जमीन की खरीद फरोख्त के व्यवहार को सरकारी स्टॅम्प पेपर पर ही दर्ज किया जाता है। इन स्टॅम्प पेपरों की बड़ी तगड़ी कीमत होती है। जिस पर लिखा हुआ हो पचास रूपए उसकी कीमत पचास और जिस पर लिखा हो दस हजार रूपए उसकी कीमत दस हजार। जिस व्यक्ति को स्टॅम्प व्हेण्डिंग की एजन्सी मिलती है, केवल उसी के नाम से स्टॅम्प कागज इश्यू किए जाते हैं और उसे इसका लेखा जोखा रखना पड़ता है कि किस किस को स्टॅम्प पेपर बेचे। तहसिलदार हर महीने में एक दिन इनका इन्स्पेक्शन और स्टॉक व्हेरिफिकेशन करता है। सब ट्रेझरी के साथ साथ यह भी किया जाता है क्यों कि इन स्टॅम्प पेपरों का महत्व भी उतना ही है जितना ट्रेझरी में रख्खी हुई रकम का।
जिन्हें जमीन की खरीद या बिक्री करनी हो उसे जमीन के दाम के अनुपात से लगाए गए मूल्य के स्टॅम्प पेपर्स खरीदकर सारा व्यवहार उन्हीं पर लिखना पड़ता है। तभी सरकारी रिकार्डों में उस जमीन की बिक्री को दर्ज किया जायगा। स्टॅम्प पेपर पर लिखी और वसूली गई रकम सरकार में जमा होगी।
आप कहेंगे यदि किसी जौहरी ने हीरों का हार बेचा तो उसे सरकारी रिकार्ड में दर्ज करवाना जरूरी नही है लेकिन उससे कम कीमत की जमीन बेची तो उसे दर्ज करना क्यों जरूरी है? इस बात के मूल में वही सिद्धान्त काम करता है कि किसी भी देश की जमीन उसकी सार्वभौमता का प्रतीक है। जमीन हमेशा सरकार की होती है लेकिन उस पर रहने का, और गुजर बसर करने का हक लोगों का होता है। जिस देश को अपनी प्रभुसत्ता कायम रखनी है उसकी सरकार को अपने चप्पे चप्पे की बाबत पता होना चाहिए कि उस पर गुजर बसर करने वाला कौन है। इसी कारण जमीन के पट्टे, खसरा खतौनी के हिसाब इत्यादि महत्वपूर्ण हो जाते हैं- इसी कारण जमीन के हर व्यापार पर सरकार अपना कर स्टॅम्प पेपरों के माध्यम से वसूलती है। इसी कारण स्टॅम्प व्हेण्डर का परमिट भी हर किसी को नही दिया जाता बल्कि बड़ी छान बीन के बाद डिप्टी कलेक्टर रैंक का कोई अधिकारी इसे जारी करता है और इसी कारण हर स्टॅम्प व्हेण्डर के स्टॉक का और रजिस्टर का हर महीने इन्स्पेक्शन भी होता है।
यह सारा ट्रेनिंग उन पांच मिनटों में हो लिया। अगले दो वर्ष तक डिप्टी कलेक्टर रही तब, और बाद में एक बार कलेक्टर रही, तब, स्टॅम्प व्हेण्डर्स के रजिस्टर्स देखे। उसके बाद में इस जमात का अस्तित्व मेरे दिमाग से निकल गया।
पिछले तीस वर्षों में प्रशासन में इन्स्पेक्शन और मेंटेंनन्स की कई व्यवस्थाएं ध्वस्त हुई हैं और स्टॅम्प व्हेण्डर भी अब वैसे निरीह नही रहे। अब तो उनकी वह हैसियत हो गई है कि मंत्रियों और नेताओं से शिफारस करवा सकते हैं और पुलिस कमिश्नरों तक को आराम से सौ-दो सौ करोड़ रूपए घूस में दे सकते हैं।
वे फर्जी स्टॅम्प पेपर्स छाप सकते हैं, सरकार को बीस-तीस हजार करोड़ रूपए का चूना लगा सकते हैं, हिरासत में होने के बावजूद अपने आलीशान घर में बैठकर सारे धंधे चला सकते हैं। इस दौर में देश की प्रभुसत्ता के प्रतीक जमीन और करन्सी का क्या होता है इसकी परवाह न नेताओं को, न अफसरशाही को और न जनता को।
कहते हैं कि एक बार किसी के मुँह में खून लग जाय तो वह रुकता नही है। जाली स्टॅम्प पेपर्स का कारखाना खुल गया तो तेलगी एण्ड कम्पनी ने सीधे नोटों को छापने का कारखाना शुरू कर दिया। वह भी केवल भारत के नोट ही नही बल्कि कई कई देशों की करेन्सी। यदि इसी तरह कोई भी करेन्सी को छापना शुरू कर दे, उसपर रिझर्व बैंक का और वित्त मंत्रालय का कोई कण्ट्रोल नही रहे तो उसकी तुलना में मेरी जेब में पड़े उन थोड़े से नोटों का क्या होगा जो मैंने अपनी मेहनत से कमाए और जिसके अस्तित्व को अपने देश की प्रभुसत्ता के साथ भी जोड़ा। क्या मूल्य रह गया है उन नोटों का?
यह पूरे देश की प्रभुसत्ता के साथ खिलवाड़ है। फर्जी स्टॅम्प पेपर्स तो भयानक हैं ही लेकिन फर्जी करन्सी और भी अधिक भयानक है। फिर भी देश की प्रतिक्रिया ढीली ढाली है। सेक्यूरिटी प्रेस के अफसरों की कोई खास जाँच पड़ताल नही हुई। वित्तमंत्री सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जरूरत बताकर अपने लिए समय निकालना चाहते हैं। एक न्यूज चैनल का संवाददाता नाशिक में जाली करंसियों का भण्डाफोड़ करता है तब भी दो दिनों तक देश के बाकी सभी न्यूज चैनल इस मामले पर ऐसी चुप्पी साधते हैं मानों कहीं कुछ हुआ ही नहीं। यह मिडिया सॉलिडॅरिटी है या मिडिया रैट रेस? नाशिक पुलिस तभी हरकत में आती है जब गृहमंत्री निर्देश देते हैं। दिल्ली या मुंबई में छोड़िए, नाशिक तक में लोग कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते, कोई रैली, कोई सभा, कोई भाषण नही होता। पूरे चौबीस घंटे तक पंचनामा कर चुकने के बाद नाशिक पुलिस जनता को बताती है कि पहाड़ खोदा, चूहा निकला, वो भी मरा हुआ। तो सवाल उठता है कि इस मरे हुए चूहे के फोटोग्राफ भी समाचार एजन्सियों को लेने दिये होते। कैसा अजीब संयोग है कि एक पत्रकार अपरिचित घर के अंदर घुसकर डेढ़ सौ बक्से देखता है और केवल कोई से दो बक्से खोलता है तो उसे शेर से दहाड़ते हुए तमाम जाली नोट दिखाई पड़ते हैं। लेकिन पुलिस सब की नजरों से छिपकर बाकी बक्से खोलती है तो उसे केवल ऐसी चीजें मिलती हैं जिनकी कोई हिमाकत नही। तो फिर पत्रकार ने वही बक्से कैसे खोले? या फिर पुलिस की पारदर्शिता शक में है?
असल बात तो यह है कि राजनीतिक पार्टियाँ इस बात से डर रही हैं कि तेलगी कांड में पता नही किस किस की पोल खुले। इसलिए हर कोई संभल कर बात कर रहा है। कई सारे व्हीआईपी चाहते हैं कि तेलगी काण्ड की कडियाँ आगे और न खुलें- चाहे वे नेतागण हों या पुलिस हों या वरिष्ठ अफसर हों। केवल कुछेक वरिष्ठ जन चाहते हैं कि इस काण्ड की पूरी पोल खुले और दोषी को सजा मिले। इसलिए बात जनता के पाले में आ जाती है। इस काण्ड को पूरा खोलने के लिए हर आम आदमी को सोचना पड़ेगा कि वह क्या छोटा सा योगदान कर सकता है।
जनसत्ता ११.१२.०३
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