बुधवार, 7 नवंबर 2007

मृगशिरा नक्षत्र


आओ बच्चों 1

वसंत ऋतु आ पहुंचा । दिन बड़े होने लगे । और यदि सूर्यास्त के घंटें भर बाद तुम पूरब की ओर देखो तो आकाश में सबसे खूबसूरत नक्षत्र मृगशिरा को तुम आसानी से पहचान सकोगे । इसे अंग्रेजी में ओरायन कहते हैं ।

आकाश के सबसे बड़े तारे हैं शुक्र, गुरू, व्याध, और अभिजित। आजकल गुरू भी मृगशिरा नक्षत्र के पास है इसलिए आजकल गुरू और व्याध की आसान सी पहचान यह है कि शाम को पूरब की ओर सबसे बड़े जो दो सितारे हैं वही व्याध और गुरू हैं। देखो चित्र।

मृगशिरा नक्षत्र आकाश में काफी फैला हुआ है । इसके तीन चमकीले छोटे तारे एक सीधी रेखा में हैं और बड़े खूबसूरत हैं । उन्हें त्रिकांड कहते हैं । उनके कारण मृगको पहचानना बहुत सरल है । त्रिकांड के चारों ओर आयताकार चार तारे है । और नीचे की ओर तीन छोटे छोटे तारे हैं । त्रिकांड की बाई ओर व्याध तथा दाईं ओर रोहिणी का बडा तारा है आरे ये पांच एक सीधी रेखा में हैं । व्याध से थोडा ऊपर पुनर्वसु नक्षत्र के चार चमकीले तारे हैं। पुनर्वसु, रोहिणी, व आर्द्रा, नक्षत्रों की पहचान बाद में करेंगे ।


मृगशिरा का अर्थ होता है हिरण का सिर। भारतीय मिथकों में कहानी है कि एक दुष्ट राक्षस ने रोहिणी नामक अप्सरा को तंग करने के लिये हिरण का रूप लिया और उसे सताने लगा । इस पर विष्णु ने एक व्याध या शिकारी बनकर एक बाण चलाया जो हिरण के पेट में लगा । यही बाण त्रिकांड के तीन तारे हैं । इसी कारण व्याध, त्रिकांड और रोहिणी एक लाईन में हैं । त्रिकांड के नीचे तीन छोटे तारे हैं जो बाण लगने से बहने वाली खून की बूंदे हैं । चार आयताकार तारों के बीच छोटे छोटे और कई तारे हैं जो हिरण के शरीर हैं। उन्हें दूरबीन से ही देखा जा सकता है ।

लेकिन ग्रीक मिथकों के अनुसार मृगशिरा का नाम है ओरायन । माना जाना है कि ओरायन अपने जमाने का एक घुरंधर शिकारी था जो अपनी कमर में हीरों जड़ी चमकीली बेल्ट बांधता है जिससे उसका खंजर नीचे लटकता है । त्रिकांड के तीने तारे हुए बेल्ट और उनसे नीचे लटकने वाले तीन तारे हुए खंजर । और जिस तारे को हम व्याध अर्थात शिकारी कहते हैं, उसका ग्रीक मिथकों मे नाम है सिरीयस जो कि ओरायन का बडा कुत्ता था । अंग्रेजी पुस्तकों में उसे केनिस मेजर कहते है । इसके अलावा एक केनिस मायनर भी है । यानी ओरायन को छोटा कुत्ता ।

पृथ्वी के सबसे नजदीक जो तारे हैं वे क्रमशः सूर्य, अल्फा सेंटारी और व्याध हैं । इस लिये भी व्याध तारे का बडा महत्व है ।

आजकल मृगशिरा या ओरायन नक्षत्र सूर्यास्त के बाद से ही पूर्व दक्षिण क्षितिज में देखा जा सकता है । धीरे धीरे ऊपर आकर दूसरे दिन भोर में दक्षिण पश्च्िाम दिशा में इसके एक एक तारे ढलने लगते हैं । उनसे दोस्ती बढानी है तो रात में अलग अलग समय उठकर देखते चलो कि यह आकाश में कहाँ कहाँ कैसे भ्रमण करते हैं।

आजकल रोहिणी के साथ मंगल ग्रह भी देखा जा रहा है, लेकिन वह हमेशा वहाँ नही होगा । एक महीने के बाद वह रोहिणी से काफी हट कर अलग हो जायेगा । हर सप्ताह देखते रहो तो आगे वह जहाँ कहीं जाये, तुम पहचान सकोगे । तो फिर क्यों न अभी से उससे दोस्ती बना ली जाय ।
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लीना मेहेंदले,
ई १८, बापू धाम सेंट मार्टिन मार्ग चाणक्यपुरी नई दिल्ली ११००२१

published in Devputra monthly from Indore
Also on ye_ye_pawsa. Star chart kept separate

1 टिप्पणी:

mahashakti ने कहा…

अच्‍छा लगा आपका ब्‍लाग, बधाई